28/06/2024
अथ विवाह के प्रकार
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"ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः ।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः॥"
ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच, ये विवाह आठ प्रकार के होते हैं॥
1 पहला—ब्राह्म—कन्या के योग्य सुशील, विद्वान् पुरुष का सत्कार करके, कन्या को वस्त्रादि से अलंकृत करके, उत्तम पुरुष को बुला, अर्थात् जिस को कन्या ने प्रसन्न भी किया हो, उस को देना, वह ‘ब्राह्म’ विवाह कहाता है॥
2 दूसरा—दैव—विस्तृत यज्ञ में बड़े-बड़े विद्वानों को वरण कर, उस में कर्म करनेवाले विद्वान् को वस्त्र-आभूषण आदि से कन्या को सुशोभित करके देना, वह ‘दैव’ विवाह है॥
3 तीसरा—आर्ष—1 एक गाय, बैल का जोड़ा अथवा 2 दो जोड़े* वर से लेके धर्मपूर्वक कन्यादान करना, वह ‘आर्ष’ विवाह है॥
[*यह बात मिथ्या है, क्योंकि आगे मनुस्मृति में निषेध किया है और युक्तिविरुद्ध भी है। इसलिये कुछ भी न ले-देकर दोनों की प्रसन्नता से पाणिग्रहण होना ‘आर्ष’ विवाह है।]
4 चौथा—प्राजापत्य—कन्या और वर को यज्ञशाला में विधि करके सब के सामने तुम दोनों मिलके गृहाश्रम के कर्मों को यथावत् करो, ऐसा कहकर दोनों की प्रसन्नतापूर्वक पाणिग्रहण होना, वह ‘प्राजापत्य’ विवाह कहाता है। ये 4 चार विवाह उत्तम हैं॥
और 5 पांचवाँ—वर की जातिवालों और कन्या को यथाशक्ति धन देकर होम आदि विधि कर कन्या देना, ‘आसुर’ विवाह कहाता है॥
6 छठा—वर और कन्या की इच्छा से दोनों का संयोग होना और अपने मन में मान लेना कि हम दोनों स्त्री-पुरुष हैं, यह काम से हुआ ‘गान्धर्व’ विवाह कहाता है॥
और 7 सातवाँ—हनन, छेदन अर्थात् कन्या के रोकनेवालों का विदारण कर क्रोशती, रोती, कंपती और भयभीत हुई कन्या को बलात्कार हरण करके विवाह करना, वह ‘राक्षस’ विवाह है॥
और [8 आठवाँ]—जो सोती, पागल हुई वा नशा पीकर उन्मत्त हुई कन्या को एकान्त पाकर दूषित कर देना, यह सब विवाहों में नीच से नीच महानीच, दुष्ट, अतिदुष्ट ‘पैशाच’विवाह है॥
ब्राह्म, दैव, आर्ष और प्राजापत्य इन चार विवाहों में पाणिग्रहण किये हुए स्त्री-पुरुषों से जो सन्तान उत्पन्न होते हैं, वे वेदादिविद्या से तेजस्वी, आप्त पुरुषों के सम्मत, अत्युत्तम होते हैं॥
14/02/2024