24/09/2024
मनुष्यों और परमात्मा की बातों में फर्क करना सीखिए : “सिर्फ मम्मा बाबा” इसका क्या अर्थ है ?
अंतर्मन के रहस्य: भाग -4
ज्ञान की वर्षा
ओम शांति ।
आपसे निवेदन है कि इस लेख को पूरा पढ़ें। समय - 10 मिनट
मैं आपसे एक अनुरोध करना चाहूंगी कि आप एक बार अपने स्मृति पर गौर कीजिये। क्या अपने कभी भी किसी भी मुरली में ऐसे वाक्य देखें है, या किन्ही और शब्दों में जिसके अर्थ ये निकले ?
- “सकारात्मकता (पाजिटिविटी)”
- “क्षमा”, “क्षमा कर आगे बढ़ना”
- “वर्तमान में रहना”, “जीवन को खुलके जीना”, “पास्ट को याद ना करना”
-“पाजिटिव एहसास करना”,”भूतकाल या भविष्य काल के बारे में ना सोचना”,
“हर परिथिति वैसे ही स्वीकार करना”
- “वैज्ञानिक रूप से सिद्ध”
“जज या जजमेंट ना करना”, “क्रिटिकल ना रहना”
या और कोई स्लोगन जो अन्य मैडिटेशन में बहुप्राय हैं, सुने हैं ? मैं ज्ञान में करीब 10 वर्षों से मुरली का अध्ययन कर रही हूँ मैंने चाहे साकार मुरली या अव्यक्त मुरली में कभी नहीं सुनें। हालाँकि कई बीके प्रवक्ताओं के प्रवचनों के यह मुख्य विषय हैं। आप शायद इसे अन्य धर्मग्रथों के मुख्य संस्करण में भी नहीं पाएंगे। गीता में तो बिल्कुल भी नहीं। आप सोच सकतें हैं शायद ये मुरली के अनुवाद में हो लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। इसका सीधा कारण है कि यह अध्यात्म या आत्मा के फायदे की बातें है ही नहीं।
सुनने में ये आकर्षक लगते हैं, और हमें ये भी लगता है की यही तो महानता की पराकाष्ठ है ।
मैं आपको मुरलियों के कई ऐसी पॉइंट्स बताती हूँ इसके विपरीत हैं सैधान्तिक तौर पर भी और जो बाबा की सलाह है।
- “योग से माया के तूफ़ान आयेंगे; बीमारी उथाल खाएगी ”: अर्थात विकर्मों और विकारों की आंधी जो हमें कतई सकारात्मक और मनमोहक एहसास तो नहीं देगी।
- “अंतिम पेपर की तैयारी; पास होना; घर चलने की बात करना”: निश्चित रूप से हम भविष्य के बारे में सोच रहे हैं।
- “स्वदर्शन चक्र फिरना”: जिसमे हम भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों के बारे में सोच रहें ना की दो को अनदेखा कर रहें।
- “पास्ट सतुग याद है ?; आदि संस्कारों को इमर्ज करना”: ये पास्ट है और भविष्य है, वर्तमान नहीं, बाबा चाहता है हम याद करें।
- “परिथितियों और चीजों को परखना; माया को परखना”: परखने को इंग्लिश में क्रिटिकल थिंकिंग या एनालिसिस कहते हैं, इसका उल्टा होगा परख ना पाना, इगनोर करना या आँखें बंद रखना, निश्चित ही योद्धा सबसे पहले अपने युद्ध क्षेत्र का आंकलन करेगा।
- “परिस्थिति मोल्ड करना”: इसका मतलब हम उसे वैसे ही स्वीकार नहीं कर रहें।
अपने आप से पूछिए की कितनी बार आपने ये कोशिश की है ?
- अपने मन से विकारी संकल्पों को जल्द से जल्द भगाने की कोशिश करना और खुद को पापी समझना
- संकल्पों को व्यर्थ मानकर खुद को कोसना की आखिर धारणाओं में कहाँ कमी रह गयी।
- अच्छा अच्छा महसूस करने की कोशिश करना
- पुरनी बात याद आए तो उस विचार को भागना, फिर भविष्य सोचना फिर कंफ्यूज हो जाना
- ख़ुशी का पैमाना मुस्कराहट मानना और मुस्कराहट को बनाये रखने की भरसक कोशिश
- आपको दिखे की कोई आपके प्रति विकर्म या पाप कर रहा है लेकिन आपके कोशिश कर रहें उसके विशेषताएं आपको दिखे
शायद कई लोगों के लिए योग का मतलब ही यही है।
यह इस रेस का नियम है, यहाँ कदम कदम पर जाल बिछें हैं, जिनमें हम फसतें हैं, कुछ मर जातें हैं, कुछ तैरतें हैं ,निकलतें हैं, और सबसे आगे वो जाता है जो बचते हैं। इसे सहज कहा गया है पर सहज जैसा इसमें कुछ नहीं है।
ये मुरली से मिलते जुलते शब्द या ज्ञान के प्रचलित सिद्धांतों के हवाला देकर कहे जाते हैं कि हमें सब ठीक लगता है। प्रॉब्लम तब होती है जब करना चाहते हैं पर लम्बे समय इनपर चल नहीं पातें। फिर लगता है क्योकि हम सम्पूर्ण नहीं बनें है और खुद को दोष देकर रह जाते हैं। लेकिन वास्तव में ये एक हेरफेर है।
आज के सोशल मीडिया के युग में मुरली में क्या है ये जानना पर्याप्त नहीं, बल्कि ये भी जानना पड़ेगा की क्या नहीं हैं। जैसे गीता का नाम लेकर लोग कुछ भी बोलते हैं, वैसे बाबा या परमात्मा का नाम लेकर भी।
इस ज्ञान में चलने और आगे बढ़ते रहने के लिए कुछ मूल बातों की गांठ बांध लेना अत्यंत जरुरी है:
- भीड़ ज्यादा होना अर्थात श्रेष्ठ योगी नहीं, ज्यादातर लोग सरल चीजों ही चाहते हैं, थोडा-बहुत।
- ऊँचा पद अर्थात श्रेष्ठ योगी नहीं, जरूरी नहीं उसने १००% श्रीमत पर चलते हुए पद पाया हो।
- ऊँचें मकान अर्थात ऊँचा योग नहीं।
- सफ़ेद वस्त्र अर्थात ऊँचा योग नहीं।
- हर चमकती चीज़ सोना नही।
- जरुरी नहीं सोना चमकता हुआ ही पाया जाये।
- मनमोहक आवाज़ या भाषा अर्थात श्रेष्ठ योगी नहीं, यह कनरस है।
- श्रीमत हमेशा आपको जचेगी नहीं, वास्तव में श्रीमत हमें हिलती है, क्योकि उसका काम है हमारे संस्कारों और मान्यताओं को ढीला करना।
- अच्छा महसूस करने के लिए योग नहीं करना है, वास्तव में अगर आपके अन्दर का कचरा बाहर आया अर्थात योग अच्छा हुआ, कचरा पहले बहार आयेगा फिर ही तो सफाई होगी।
- विज्ञान हमें परमात्म सत्य तक नहीं पंहुचा सकता, कभी कुछ बोलेगा, फिर कुछ वक्त बाद उसे नकारेगा, भिन्न भिन्न वैज्ञानिकों एकमत भी नहीं होते, क्योकि कोई पूछ पकड़ता है कोई सूड (हाथी और अंधों की कहानी)।
- लोग जैसा दिखाते हैं वो वैसे होते नहीं, बेहद कम अपवादों के साथ।
- हम अपनी रक्षा नहीं करेंगे तो बाबा क्या करेगा, वो हमें स्वालंबी बनाना चाहता है, भोला भक्त नहीं।
- यदि कोई चीज़ हद से ज्यादा अच्छी और आकर्षक लग रही तो संभवतः वह झूठ है, सतयुग और बाबा को छोड़कर।
- लोगों, परिस्थितियों का आंकलन करना अत्यंत आवश्यक है।
- बीके की वाणी और बाबा की वाणी एक नहीं।
- रेस करने के बाबा ने कहा है, रीस (जलन ) के लिए माना किया रेस करने को बोला है ; कोई रेस करने से माना करे तो वो जाने अनजाने कम्पटीशन कम करने का काम कर रहा जो बाबा ने कभी नहीं कहा।
- शब्दों से ज्यादा मंशा और प्रयोजन पर ध्यान दीजिये, पूछिए यह कहने के प्रति इस व्यक्ति की क्या मंशा है? मंशा अवचेतन रूप से भी कार्य करती है। हालाँकि किसी व्यक्ति की मंशा शुद्ध हो सकती है और सलाह गलत।
- बीके द्वारा लिखित मैगज़ीन, क्लास, किताबें, इत्यादि को मुरली की तरह अवशोषित ना करें, अटल सत्य ना मानें, विरोधाभाष को पकड़ें और मुरली को तवज्जों दें।
- पुराने या विख्यात कहावतें रचनात्मक कृतियां, किसी तथाकथित महात्मा की सलाह पर वाहवाही ना कर, बाबा के ज्ञान के लेंस से देखें।
- कट्टर अनुरूपताओं (अनालोजी) से बचें, जैसे “देह सांप है, डसेगा”
सावधान रहें जब यह सुनें:
-“फलाना सीनियर ऐसा कहते थे, दादा दादी कहकर गए, इसलिए आपको ये करना चाहिए”, - कही हुई बातें प्रासंगिक, समयानुसार, परिस्थितिनुसार होती हैं और एक वाक्य उठाकर नियम नहीं बनाये जातें। सुनने वाले अपने अर्थ भी निकाला करते है, किसी ने सुना फिर सुनाया, फिर उसने सुनाया, रूप बदल गया।
- “क्वेश्चन मत करो, बस करते जाओ” क्या आपन कर्म का फल कोई और इंसान लेगा? नहीं । तो कर्म का फल क्या होगा आपको सोचना समझना होगा, बाबा बोलेगे मैंने सब बताया मुरली सुने, तुमने क्यों नहीं सुनी।
- “मम्मा जी हुजूर करती थीं तो आपको भी हमारे आगे करना है”- मम्मा किसके आगे करती थीं, जिसकी जिम्मेवारी शिवबाबा ने स्वयं ली थी। कोई खुद को भगवान मानें आप ना मानों।
एक आध्यात्मिक लॉ जो यहाँ पर प्रासंगिक है :
“आत्माएं कभी सम्पूर्ण सत्य को उद्घाटित नहीं कर सकती। वो अपने नंबर के अनुसार ही सत्य को आत्मसात कर पाएंगी, चूँकि कई भी ब्रह्मा कुमार या कुमारी नंबर एक या दो पर नहीं, सम्पूर्ण सत्य कोई नहीं बोल रहा, उसमें कुछ ना कुछ झूठ मिक्स होगा।”
झूठ से तात्पर्य मुख्यतः समाज में चले आ रहे सोच और मान्यताओं और संस्कृति से है जो समय के साथ ज्ञान या ब्राह्मण जीवन में ऐसे घुल जाती हैं की दोनों एक लगने लगते हैं । एक विशेष वर्ग की बहुमत होने के कारण लोग भी इसे स्वीकार किये रहते हैं। इससे उन्हें चीजें आसान लगती हैं। लेकिन जब और एक से ज्यादा संस्कृतियों में रहेंगे या अनुभव करेंगे तो अंतर स्पष्ट होता जायगा। इसलिए आप देखेंगे की संस्था की नयी नेतृत्व मंडली में बाबा ने उन आत्माओं को रखा है जो दुनिया के अलग अलग कल्चर का अनुभव रखती हों। ऐसा इसलिए की जब आप कई कल्चर में रहते हो, सेवा करते हो तो आपको मौका मिलता है की ज्ञान और कल्चर की अवधारणा में अंतर कर पाओ और निष्पक्ष बनोगे। फिर आप कभी ये नहीं नहीं कहोगे की फलाना संस्कृति महान है, दूसरों से श्रेष्ठ है या निकृष्ट है।
एक और समस्या ये है कि कई बार हम मनुष्यात्माओं पर निर्भर होते हैं ज्ञान के विशलेषण के लिए, और उन्होंने ही हमें चलना सिखाया है। पर अब हम चलना सीख चुके हैं और वास्तम में अब हम भी उसे रेस का हिसा हैं, बच्चे सदा नहीं रहेंगे ना, बड़े होंगे जिम्मेदारी लेंगे, उनसे आगे भी जायेंगे। लोगों को लगता है की निर्मानता यही है कि पीछे पीछे रहा जाये ।अपने गुरु से आगे जाना का सोचना अर्थात उसकी इन्सुल्ट करना। लेकिन गुरु कौन है? भक्ति का संस्कार है कि आप देहधारी को गुरु मान रहें। ये संस्कार आपके अन्दर अहंकारी सन्यासियों ने डालें हैं, विशेषकर वे गुरु की हर जो आपने फ्लावर्स को आप सामान बनाने का प्रयत्न भी नहीं करतें। और यदि आप लोकिक अच्छे टीचर देखेंगे तो उसे गर्व महसूस होगा अगर उनका छात्र उनसे आगे निकलें। बाबा भी हमें आगे रखता है। ये भाव बीके के बीच में नहीं मिलेगा क्योकि हम सभी स्टूडेंट हैं और एक दुसरे के प्रतिस्पर्धी। रेस में आगे बढ़ रहें और एक दूसरों को आगे बढ़ा रहे हैं। पर रीस भी यहाँ पर आम है, जिससे लोग येन केन प्रकारेन गलत तरीके से प्रतिस्पर्धा को कम से कम करना चाहते हैं। या आगे बढ़ाएंगे लकिन अपने से कम।
यहाँ पर रियल काम और रॉयल आत्माएं ज्यादा है। अत्यधिक शक्तिशाली आत्माएं ही अन्दर बहार एक हो सकती हैं। ज्यादातर लोग किसी ना किसी प्रकार से पद, पोजीशन, नाम मान शान, इत्यादि चीज़े पाने के लिए झूठ का सहारा ले लिया करती हैं, या दूसरों को नुकसान ही पंहुचा देती हैं। ऐसे में किसी के मंशा और प्रयोजन को भाप पाना एक बहुत जरूरी स्किल बन जाता है।
होमवर्क: एक एक पॉइंट्स का चिन्तन करें और अपने अनुभवों में झाकें कि यदि आप इसमें कहाँ तक फसें है
“पास्ट” और कालों के बारे में एक अव्यक्त मुरली में विस्तार से है, दिनांक और टाइटल मैं यहाँ डाल रही हूँ। बाकी की रिसर्च आप खुद करना
“31-12-86 पास्ट प्रेजेंट और फ्यूचर को श्रेष्ठ बनाने की विधि”
अगले भाग में हम मंशा और प्रयोजन पर चर्चा करेंगे ।
आपके क्या विचार है इसके प्रति आप कमेंट में अवश्य बताएं…
बीके सान्वी | ज्ञान की वर्षा
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इसका अगला भाग कुछ दिनों बाद आयेगा…
ओम शांति ।