Mahfil E Mushaira

Mahfil E Mushaira

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15/11/2025

मुख़्तसर ये है हमारी दास्तान-ए-ज़िंदगी
इक सुकून-ए-दिल की ख़ातिर उम्र भर तड़पा किए
मुईन अहसन जज़्बी

08/08/2025

उम्र आधी इश्क़ की वो यूँ गवाता रह गया
बेवफ़ा कह कर मुझे बस आज़माता रह गया

शौक़ से तस्वीर जिसकी खींचते रहते थे सब
तीर खा के वो परिंदा फड़फड़ाता रह गया

पूछ डाला जब किसी ने हँसने रोने का सबब
नाम तेरा इन लबों पे आता आता रह गया

दौड़ते थे पीछे कुछ बच्चे ख़्वाबो सा समझ
और साहिब देख कर गाड़ी भगाता रह गया

इक तरफ कोई शहर में आ के वापस जा चुका
इक तरफ कोई मगर बस घर सजाता रह गया

क्या किया है आज तक ये कह दिया है उसने आज
बाप जिस बेटे की ख़ातिर बस कमाता रह गया

जा रहा है सामने से हाथ थामे ग़ैर का
और मैं पागल उसे अपना बताता रह गया

सौ दफ़ा बिखरा समेटा होगा दिल को खुद-ब-खुद
चोट खा कर ज़ख्म पर जो मुस्कुराता रह गया

'नूर' जब सारे शहर को थी निगलती तीरगी
घर मिरा अपने चराग़ों को बचाता रह गया

Parul Singh Noor

05/08/2025

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा

हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा

कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िंदगी ने कह दिया
तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जाएगा

मैं ख़ुदा का नाम ले कर पी रहा हूँ दोस्तो
ज़हर भी इस में अगर होगा दवा हो जाएगा

सब उसी के हैं हवा ख़ुशबू ज़मीन ओ आसमाँ
मैं जहाँ भी जाऊँगा उस को पता हो जाएगा

سر جھکاؤ گے تو پتھر دیوتا ہو جائے گا
اتنا مت چاہو اسے وہ بے وفا ہو جائے گا

ہم بھی دریا ہیں ہمیں اپنا ہنر معلوم ہے
جس طرف بھی چل پڑیں گے راستہ ہو جائے گا

کتنی سچائی سے مجھ سے زندگی نے کہہ دیا
تو نہیں میرا تو کوئی دوسرا ہو جائے گا

میں خدا کا نام لے کر پی رہا ہوں دوستو
زہر بھی اس میں اگر ہوگا دوا ہو جائے گا

سب اسی کے ہیں ہوا خوشبو زمین و آسماں
میں جہاں بھی جاؤں گا اس کو پتہ ہو جائے گا

Poet: Dr. Bashir Badr

31/07/2025

ग़ज़ल /غزل

अधूरी इक कहानी चल रही है,
मुसलसल ज़िंदगानी चल रही है,

ادھوری اک کہانی چل رہی ہے،
مسلسل زندگانی چل رہی ہے۔

लुटा दी जान हमने दोस्तों पर,
रवायत खानदानी चल रही है,

لٹا دی جان ہم نے دوستوں پر،
روایت خاندانی چل رہی ہے،

भरोसा भाइयों पर कर रहा हूं,
वसीयत तक ज़ुबानी चल रही है,

بھروسہ بھائیوں پر کر رہا ہوں،
وصیت تک زبانی چل رہی ہے،

करेंगे यार तौबा बाद में अब,
अभी तो नौजवानी चल रही है,

کریں گے یار توبہ بعد میں اب،
ابھی تو نوجوانی چل رہی ہے،

हमारे ख़ून की क़ीमत न पूछो,
इसी से राजधानी चल रही है।

ہمارے خون کی قیمت نہ پوچھو،
اسی سے راجدھانی چل رہی ہے۔

Hamza Bilal Sb

31/07/2025

सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं
हम देखने वालों की नज़र देख रहे हैं

कोई तो निकल आएगा सरबाज़-ए-मोहब्बत
दिल देख रहे हैं वो जिगर देख रहे हैं

कुछ देख रहे हैं दिल-ए-बिस्मिल का तड़पना
कुछ ग़ौर से क़ातिल का हुनर देख रहे हैं

पहले तो सुना करते थे आशिक़ की मुसीबत
अब आँख से वो आठ पहर देख रहे हैं

ख़त ग़ैर का पढ़ते थे जो टोका तो वो बोले
अख़बार का परचा है ख़बर देख रहे हैं

पढ़ पढ़ के वो दम करते हैं कुछ हाथ पर अपने
हँस हँस के मेरे ज़ख़्म-ए-जिगर देख रहे हैं

मैं 'दाग़' हूँ मरता हूँ इधर देखिए मुझ को
मुँह फेर के ये आप किधर देख रहे हैं

दाग़ देहलवी

29/07/2025

कहाँ से लफ़्ज़ लाऊं कैफ़ियत के
तकाज़े पूरे हों जो शेरियत के

कहाँ बैसाखियाँ बनती हैं ऐसी
जो काम आयें अपाहिज ज़हनियत के

बहुत कुछ जान कर अनजान रहना,
तक़ाज़े हैं हमारी मस्लेहत के।

सुना है दोस्त हैं आपस में सारे
जो दुश्मन हो गए इंसानियत के

क़यामत है कि दुनियाँ दार सारे
कसीदे पढ़ते हैं रूहानियत के

सिया थमने लगीं जब मेरी साँसे
सभी तालिब हैं मेरी ख़ैरियत के

सिया सचदेव
Siya Ji

28/07/2025

دشت میں پیاس بجھاتے ہوئے مر جاتے ہیں
ہم پرندے کہیں جاتے ہوئے مر جاتے ہیں

ہم ہیں سوکھے ہوئے تالاب پہ بیٹھے ہوئے ہنس
جو تعلق کو نبھاتے ہوئے مر جاتے ہیں

گھر پہنچتا ہے کوئی اور ہمارے جیسا
ہم ترے شہر سے جاتے ہوئے مر جاتے ہیں

کس طرح لوگ چلے جاتے ہیں اٹھ کر چپ چاپ
ہم تو یہ دھیان میں لاتے ہوئے مر جاتے ہیں

ان کے بھی قتل کا الزام ہمارے سر ہے
جو ہمیں زہر پلاتے ہوئے مر جاتے ہیں

یہ محبت کی کہانی نہیں مرتی لیکن
لوگ کردار نبھاتے ہوئے مر جاتے ہیں

ہم ہیں وہ ٹوٹی ہوئی کشتیوں والے تابشؔ
جو کناروں کو ملاتے ہوئے مر جاتے ہیں
عباس تابش
عباس تابش

27/07/2025

غزل/ ग़ज़ल

कर मेरा ए'तिबार..................बहुत सोचता हूं मैं,
ऐ मेरे ग़मगुसार....................बहुत सोचता हूं मैं,

کر میرا اعتبار۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔ بہت سوچتا ہوں میں،
اے میرے غم گسار۔۔۔۔۔۔۔۔ بہت سوچتا ہوں میں،

रंजो अलम के दौर में.......... दिल को कभी कभी,
मिलता है जब क़रार............. बहुत सोचता हूं मैं,

رنج و الم کے دور میں۔۔۔۔۔۔ دل کو کبھی کبھی،
ملتا ہے جب قرار۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔ بہت سوچتا ہوں میں،

क्यों कर तेरे फ़िराक़ में............. नींद आ गई मुझे,
ये बात बार बार.....................बहुत सोचता हूं मैं,

کیوں کر تیرے فراق میں۔۔۔۔ نیند آ گئی مجھے،
یہ بات بار بار۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔ بہت سوچتا ہوں میں،

वहशत के बाग़ में कभी....... लम्बी ख़िज़ांँ के बाद,
आती है जब बहार.................बहुत सोचता हूं मैं,

وحشت کے باغ میں کبھی لمبی خزاں کے بعد،
آتی ہے جب بہار۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔ بہت سوچتا ہوں میں،

आकर के तैश में........ तुझे रुख़सत तो कर दिया,
अब हो के शर्मसार.................बहुत सोचता हूं मैं,

آکر کے طیش میں، تجھے رخصت تو کر دیا،
اب ہو کے شرم سار۔۔۔۔۔ بہت سوچتا ہوں میں،

जब शे'र वेर कह के भी........... मिलता नहीं सुकूं,
फिर रो के ज़ार ज़ार...............बहुत सोचता हूं मैं,

جب شعر ویر کہہ کے بھی، ملتا نہیں سکوں،
پھر رو کے زار زار۔۔۔۔۔۔۔ بہت سوچتا ہوں میں

किस क़िस्म का वो इश्क़ था, फ़रहाद ओ कैस का,
ए दश्तो रेगज़ार................... बहुत सोचता हूं मैं।

کس قسم کا وہ عشق تھا، فرہاد و قیس کا،
اے دشت و ریگزار۔۔۔۔ بہت سوچتا ہوں میں۔

Hamza Bilal Sb

25/07/2025

बे-फ़ैज़ इक चराग़ बताया गया मुझे
सूरज बुझा तो ढूंढ के लाया गया मुझे

उभरा हर एक बार नया फूल बन के मैं
मिट्टी में जितनी बार मिलाया गया मुझे

काग़ज़ क़लम के बीच रहा क़ैद उम्र भर
लिखा गया मुझे न भुलाया गया मुझे

हैरान हूं मैं वक़्त की तक़सीम देखकर
किसके लिए था किसपे लुटाया गया मुझे

पहले कहा गया कि लब आज़ाद हैं तेरे
मैं बोलने लगा तो डराया गया मुझे

शामिल तो कर लिया गया अहबाब में मगर
महफ़िल में सबसे दूर बिठाया गया मुझे

इक़बाल अशहर

24/07/2025

तिरे सवाल का तन्हा जवाब मैं ही था
निगाह-ए-नाज़ तिरा इंतेख़ाब मैं ही था

ये और बात कि अब तू मुझे न पहचाने
गुज़िश्ता शब तिरी आंखों का ख़्वाब मैं ही था

मिरे वजूद से रौशन थीं हसरतें तेरी
तिरे फ़लक का कभी आफ़ताब मैं ही था

- शकील आज़मी

24/07/2025

کیا خزانے مِری جاں ہجر کی شب یاد آئے
تیرا چہرہ، تِری آنکھیں، تِرے لب یاد آئے

ایک تُو تھا جسے غُربت میں پُکارا دِل نے
ورنہ، بِچھڑے ہُوئے احباب تو سب یاد آئے

ہم نے ماضی کی سخاوت پہ جو پَل بھر سوچا
دُکھ بھی کیا کیا ہمیں یاروں کے سبَب یاد آئے

پُھول کِھلنے کا جو موسم مِرے دل میں اُترا
تیرے بخشے ہُوئے کچھ زخم عجَب، یاد آئے

اب تو آنکھوں میں فقط دُھول ہےکچھ یادوں کی
ہم اُسے یاد بھی آئے ہیں تو، کب یاد آئے

بُھول جانے میں، وہ ظالِم ہے بھَلا کا ماہر !
یاد آنے پہ بھی آئے، تو غضب یاد آئے

یہ خُنک رُت، یہ نئے سال کا پہلا لمحہ !
دِل کی خواہش ہے کہ، مُحسن، کوئی اب یاد آئے

مُحسن نقوی

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