04/04/2025
लघुकथा
रामलाल एक दुकान पर काम करता था। वह रोज की तरह साइकिल से अपनी दुकान जा रहा था। मार्ग में उसे एक विक्षिप्त महिला मिली। जब वह महिला के पास से गुजरा, उसने अचानक से रामलाल पर पत्थर फेंका। जिससे रामलाल हड़बड़ा गया और उसका संतुलन गड़बड़ा गया। दुकान पर पहुंच कर उसने अन्य कर्मचारियों के समक्ष सेठ को इस घटना के बारे में सचेत किया और इस समस्या का हल निकालने को कहा ताकि आने वाले ग्राहकों और अन्य कर्मचारियों को परेशानी न हो। अन्य कर्मचारियों ने भी सेठ को बताया कि उनके साथ भी ऐसी घटना हो चुकी है पर उन्होंने महिला को विक्षिप्त जानकर किसी से इस बारे में चर्चा नहीं की। सेठ ने हमेशा की तरह पूरी बात को ध्यान से सुना और रामलाल के प्रति संवेदना व्यक्त की और समस्या का हल निकालने की भी बात की भले ही वो कुछ न करे। इस घटना को जानकर मुनीम ने रामलाल को समझाया कि सारी गलती तो रामलाल की ही है। यदि वो सावधानी से साईकल चलाता तो उसका संतुलन न गड़बड़ाता। उसे ही दूर से निकलना चाहिये था और इस बात की व्यर्थ चर्चा दुकान पर नहीं करना चाहिये थी। जब रामलाल ने इस बावत सफाई दी तो उसने रामलाल को धमकाया कि उसने इस बात की चर्चा कर दुकान का बहुमूल्य समय खराब किया अतः इसका दंड उसको मिलना चाहिए। इसके बाद मुनीम ने नाना प्रकार से रामलाल को परेशान करना प्रारंभ कर दिया और अन्य कर्मचारियों को भी व्यर्थ वार्तालाप में संलग्न होने के लिये डाँटा। कुछ कर्मचारियों ने भी रामलाल के मजे लिये। कहा कि क्या हो गया यदि उस विक्षिप्त महिला ने उस पर पत्थर फेंका। उसे पत्थर लगा तो नहीं। और ये भी तो देखो कि वो महिला कितनी सुंदर है। कितने ही लोग उसके इर्द गिर्द मँडराते हैं और पत्थरों से बचकर उसके पास जाने का प्रयास करते हैं। परेशान होकर रामलाल दूसरे रास्ते से दुकान जाने लगा और मुनीम से भी सतर्क रहने लगा। इस घटना ने रामलाल के जीवन के कटु अनुभवों की श्रृंखला में एक कड़ी और जोड़ दी।