Mahendra jain- Adhyapak

Mahendra jain- Adhyapak .................??????????.............

04/04/2025

लघुकथा

रामलाल एक दुकान पर काम करता था। वह रोज की तरह साइकिल से अपनी दुकान जा रहा था। मार्ग में उसे एक विक्षिप्त महिला मिली। जब वह महिला के पास से गुजरा, उसने अचानक से रामलाल पर पत्थर फेंका। जिससे रामलाल हड़बड़ा गया और उसका संतुलन गड़बड़ा गया। दुकान पर पहुंच कर उसने अन्य कर्मचारियों के समक्ष सेठ को इस घटना के बारे में सचेत किया और इस समस्या का हल निकालने को कहा ताकि आने वाले ग्राहकों और अन्य कर्मचारियों को परेशानी न हो। अन्य कर्मचारियों ने भी सेठ को बताया कि उनके साथ भी ऐसी घटना हो चुकी है पर उन्होंने महिला को विक्षिप्त जानकर किसी से इस बारे में चर्चा नहीं की। सेठ ने हमेशा की तरह पूरी बात को ध्यान से सुना और रामलाल के प्रति संवेदना व्यक्त की और समस्या का हल निकालने की भी बात की भले ही वो कुछ न करे। इस घटना को जानकर मुनीम ने रामलाल को समझाया कि सारी गलती तो रामलाल की ही है। यदि वो सावधानी से साईकल चलाता तो उसका संतुलन न गड़बड़ाता। उसे ही दूर से निकलना चाहिये था और इस बात की व्यर्थ चर्चा दुकान पर नहीं करना चाहिये थी। जब रामलाल ने इस बावत सफाई दी तो उसने रामलाल को धमकाया कि उसने इस बात की चर्चा कर दुकान का बहुमूल्य समय खराब किया अतः इसका दंड उसको मिलना चाहिए। इसके बाद मुनीम ने नाना प्रकार से रामलाल को परेशान करना प्रारंभ कर दिया और अन्य कर्मचारियों को भी व्यर्थ वार्तालाप में संलग्न होने के लिये डाँटा। कुछ कर्मचारियों ने भी रामलाल के मजे लिये। कहा कि क्या हो गया यदि उस विक्षिप्त महिला ने उस पर पत्थर फेंका। उसे पत्थर लगा तो नहीं। और ये भी तो देखो कि वो महिला कितनी सुंदर है। कितने ही लोग उसके इर्द गिर्द मँडराते हैं और पत्थरों से बचकर उसके पास जाने का प्रयास करते हैं। परेशान होकर रामलाल दूसरे रास्ते से दुकान जाने लगा और मुनीम से भी सतर्क रहने लगा। इस घटना ने रामलाल के जीवन के कटु अनुभवों की श्रृंखला में एक कड़ी और जोड़ दी।

10/10/2021

*अध्यापिकाऐं*

अध्यापिकाएं हड़बड़ी में निकलती हैं रोज सुबह घर से।
आधे रास्ते में याद आता है सिलेंडर नीचे से बंद किया ही नहीं।
उलझन में पड़ जाता है दिमाग कि कहीं गीजर खुला तो नहीं रह गया।
जल्दी में आधा सैंडविच छूटा रह जाता है टेबल पर।

कितनी ही जल्दी उठें और तेजी से निपटायें काम, विद्यालय पहुँचने में देर हो ही जाती है।
खिसियाई हंसी के साथ बैठती हैं अपनी सीट पर,
इंचार्ज के बुलावे पर सिहर जाती हैं।
सिहरन को मुस्कुराहट में छुपाकर,
नाखूनों में फंसे आटे को निकालते हुए,
अटेंड करती हैं
काम करती हैं पूरी लगन से।

पूछना नहीं भूलतीं बच्चों का हाल।
सास की दवाई के बारे में।
उनके पास नहीं होता वक्त पान, सिगरेट या चाय के लिए बाहर जाने का।
उस वक्त में वे जल्दी-जल्दी निपटाती हैं काम।
ताकि समय से काम खत्म करके घर के लिए निकल सकें।
दिमाग में चल रही होती सामान की लिस्ट,
जो लेते हुए जाना है घर,
दवाइयां, दूध, फल, राशन।

विद्यालय से निकलने को होती ही हैं कि
तय हो जाती है कोई ट्रेनिंग,
जैसे देह से निचुड़ जाती है ऊर्जा।
बच्चे की मनुहार जल्दी आने की,
रुलाई बन फूटती है वाशरूम में।
मुंह धोकर, लेकर गहरी सांस,
शामिल होती है ट्रेनिंग में।
नजर लगातार होती है घड़ी पर,
और ज़ेहन में होती है बच्चे की गुस्से वाली सूरत।
साइलेंट मोड में पड़े फोन पर,
आती रहती हैं ढेर सारी कॉल्स।
दिल कड़ा करके वो ध्यान लगाती हैं ट्रेनिंग में।

घर पहुंचती हैं सामान से लदी-फंदी।
देर होने के संकोच और अपराधबोध के साथ।
शिकायतों का अम्बार खड़ा मिलता है घर पर।
जल्दी-जल्दी फैले हुए घर को समेटते हुए,
सबकी जरूरत का सामान देते हुए,
करती हैं डैमेज कंट्रोल।

मन घबराया हुआ होता है कि कैसे बतायेंगी,
कैसे मनायेंगी सबको।

विद्यालय में सोचती हैं
कितनी बार कहेंगी घर की समस्या की बात।

अध्यापिकाएं!!!
सुबह ढेर सा काम करके जाती हैं घर से,
कि शाम को आराम मिलेगा,
रात को ढेर सारा काम करती हैं सोने से पहले
कि,
सुबह हड़बड़ी न हो

विद्यालय में तेजी से काम करती हैं,
कि घर समय पर पहुंचे।
घर पर तेजी से काम करती हैं
कि विद्यालय समय से पहुंचे।

हर जगह सिर्फ काम को जल्दी से निपटाने की हड़बड़ी में,
एक रोज मुस्कुरा देती हैं आईने में झांकते सफ़ेद बालों को देख।
किसी मशीन में तब्दील हो चुकी अध्यापिकाओं से,
कहीं कोई खुश नहीं
न घर में, न विद्यालय में, न मोहल्ले में,
फिर भी कोशिश यही रहती है कि
हर समय सबको खुश रख सकें।😊

समस्त सम्माननीय महिला कर्मचारियों को समर्पित।
🙏🙏🙏

12/09/2021

*(एक खूबसूरत कविता सभी शिक्षकों के लिये!!)*

*मत पूछिए कि शिक्षक कौन है?*
*आपके प्रश्न का सटीक उत्तर*
*आपका मौन है।*
*शिक्षक न पद है, न पेशा है,*
*न व्यवसाय है ।*
*ना ही गृहस्थी चलाने वाली*
*कोई आय हैं।।*
*शिक्षक सभी धर्मों से ऊंचा धर्म है।* *गीता में उपदेशित*
*"मा फलेषु "वाला कर्म है ।।*

*शिक्षक एक प्रवाह है ।*
*मंज़िल नहीं राह है ।।*
*शिक्षक पवित्र है।*
*महक फैलाने वाला इत्र है*
*शिक्षक स्वयं जिज्ञासा है ।*
*खुद कुआं है पर प्यासा है ।।*

*वह डालता है चांद सितारों ,*
*तक को तुम्हारी झोली में।*
*वह बोलता है बिल्कुल,*
*तुम्हारी बोली में।।*
*वह कभी मित्र,*
*कभी मां तो ,*
*कभी पिता का हाथ है ।*
*साथ ना रहते हुए भी,*

*ताउम्र का साथ है।।*

*वह नायक ,खलनायक ,*
*तो कभी विदूषक बन जाता है ।*
*तुम्हारे लिए न जाने,*
*कितने मुखौटे लगाता है।।*

*इतने मुखौटों के बाद भी,*
*वह समभाव है ।*
*क्योंकि यही तो उसका,*
*सहज स्वभाव है ।।*

*शिक्षक कबीर के गोविंद सा,*
*बहुत ऊंचा है ।*
*कहो भला कौन,*
*उस तक पहुंचा है ।।*
*वह न वृक्ष है ,*
*न पत्तियां है,*
*न फल है।*
*वह केवल खाद है।*
*वह खाद बनकर,*
*हजारों को पनपाता है।*
*और खुद मिट कर,*
*उन सब में लहराता है।।*

*शिक्षक एक विचार है।*
*दर्पण है , संस्कार है ।।*

*शिक्षक न दीपक है,*
*न बाती है,*
*न रोशनी है।*
*वह स्निग्ध तेल है।*
*क्योंकि उसी पर,*
*दीपक का सारा खेल है।।*

*शिक्षक तुम हो, तुम्हारे भीतर की*
*प्रत्येक अभिव्यक्ति है।*
*कैसे कह सकते हो,*
*कि वह केवल एक व्यक्ति है।।*

*शिक्षक चाणक्य, सान्दिपनी*
*तो कभी विश्वामित्र है ।*
*गुरु और शिष्य की*
*प्रवाही परंपरा का चित्र है।।*

*शिक्षक भाषा का मर्म है ।*
*अपने शिष्यों के लिए धर्म है ।।*

*साक्षी और साक्ष्य है ।*
*चिर अन्वेषित लक्ष्य है ।।*

*शिक्षक अनुभूत सत्य है।*
*स्वयं एक तथ्य है।।*

*शिक्षक ऊसर को*
*उर्वरा करने की हिम्मत है।*

*स्व की आहुतियों के द्वारा ,*
*पर के विकास की कीमत है।।*
*वह इंद्रधनुष है ,*

*जिसमें सभी रंग है।*
*कभी सागर है,*
*कभी तरंग है।।*

*वह रोज़ छोटे - छोटे*
*सपनों से मिलता है ।*
*मानो उनके बहाने*
*स्वयं खिलता है !*

*वह राष्ट्रपति होकर भी,*
*पहले शिक्षक होने का गौरव है।*
*वह पुष्प का बाह्य सौंदर्य नहीं ,*
*कभी न मिटने वाली सौरभ है।*

*बदलते परिवेश की आंधियों में ,*
*अपनी उड़ान को*
*जिंदा रखने वाली पतंग है।*
*अनगढ़ और बिखरे*
*विचारों के दौर में,*
*मात्राओं के दायरे में बद्ध,*
*भावों को अभिव्यक्त*
*करने वाला छंद है। ।*

*हां अगर ढूंढोगे ,तो उसमें*
*सैकड़ों कमियां नजर आएंगी।*
*तुम्हारे आसपास जैसी ही*
*कोई सूरत नजर आएगी ।।*

*लेकिन यकीन मानो जब वह,*
*अपनी भूमिका में होता है।*
*तब जमीन का होकर भी,*
*वह आसमान सा होता है।।*

*अगर चाहते हो उसे जानना ।*
*ठीक - ठीक पहचानना ।।*

*तो सारे पूर्वाग्रहों को ,*
*मिट्टी में गाड़ दो।*
*अपनी आस्तीन पे लगी ,*
*अहम् की रेत झाड़ दो।।*
*फाड़ दो वे पन्ने जिन में,*
*बेतुकी शिकायतें हैं।*
*उखाड़ दो वे जड़े ,*
*जिनमें छुपे निजी फायदे हैं।।*

*फिर वह धीरे-धीरे स्वतः*
*समझ आने लगेगा*
*अपने सत्य स्वरूप के साथ,*
*तुम में समाने लगेगा।।*

*सादर सभी शिक्षकों को समर्पित* 🙏🙏

मानव ह्रदय की संरचना
13/08/2021

मानव ह्रदय की संरचना

08/11/2018

cute colour fillings

17/09/2016

*MUST READ*
ये एक *अंग्रेज़ी ग़ज़ल* है जो सभी रिश्ते नातों से ऊपर है और हम सब के ऊपर लागू होती है -

*"When I'll be dead.....,*
*Your tears will flow,..*
*But I won't know...*
*Cry for me now instead !*
(कल जब मैं मर जाऊंगा,
तब तुम मेरे लिए आंसू बहाआगे....पर मुझे पता नही चलेगा
तो ....उसके बजाय मेरे लिए आज रोओ ना...)

*You will send flowers,..*
*But I won't see...*
*Send them now instead !*
(तुम मेरे लिए फूल चढ़ाओगे ....पर मैं तो नही देखूंगा
तो .....उसके बजाय मुझे आज फूल दो ना)

*You'll say words of praise,..*
*But I won't hear..*
*Praise me now instead !*
(कल तुम मेरी तारीफ़ में लफ्ज़ बोलोगे
पर मैं तो नही सुन पाऊंगा
तो उसके बजाय आज तारीफ़ के लफ्ज़ बोलो ना)

*You'll forget my faults,..*
*But I won't know...*
*Forget them now, Instead !*
(कल तुम मेरी गलतियां भूल जाओगे
पर मुझे नही पता चलेगा,
तो उसके बजाय आज मेरी गलतियां भूल जाओ ना)

*You'll miss me then,...*
*But I won't feel...*
*Miss me now, instead*
(मेरे बाद तुम मेरे लिए तड़पोगे
पर मैं नही महसूस करूँगा
तो उसके बजाय आज मेरे लिए तड़पो ना)

*You'll wish...*
*You could have spent more time with me,...*
*Spend it now instead !!"*
(कल तुम तमन्ना करोगे की....
काश मेरे साथ और वख्त बिता पाते
तो ....उसके उसके बजाय मेरे साथ आज वख्त बिताओ ना)

Moral......
Spend time with every person you love,
Every one you care for.
Make them feel special,
For you never know when time will take them away from you...

30/08/2016

*mobile chori hone par kya kare*
आजकल हम सभी के पास महंगे _मोबाइल फोन_ होते है ।अगर आपका *फोन* गुम हो जाता है तो आप उसे वापस कैसे पा सकते है ।
इसी विषय पर एक *रोचक जानकारी* साझा कर रहा हूं ।
प्रत्येक *मोबाइल* का *IMEI(International Mobile Equipment Identity) no.* होता है । इसके माध्यम से आप *विश्व* में कही भी अपना *मोबाइल ट्रैक* कर सकते है ।
यह कैसे काम करता है :-
1. अपने फोन से _* #06 ायल करें ।
2. आपका फोन *15 अंको* का एक *युनिक कोड*दिखाएगा ।
3. इसे संभाल कर कहीं लिख लें, फोन मे न सेव करें ।
4. अगर आपका फोन गुम हो जाए तो इस नम्बर को नीचे लिखी डिटेल के साथ _*[email protected]*_ पर ईमेल कर दें ।
*Your name*:-__________
*Address* :- ______________
*Phone model* :-__________
*Make* :-___________
*Last used no.* :-__________
*Email for *communication*:_______
*Missed date*:- __________
*IMEI no* :- __________
5. *पुलिस*मे जाने की जरूरत नही ।
6. आपका फोन अगले चौबीस घंटो मे *जीपीआरएस* के जरिए ट्रैक हो जाएगा ।और आपका हैंडसेट आपका नंबर बदल जाने की दशा मे भी मिल जाएगा ।

29/08/2016

🕉

*BHAGWAD GITA*
_*in one sentence*_
_*per chapter...*_

*Chapter 1*

_Wrong thinking is the only problem in life_

*Chapter 2*

_Right knowledge is the ultimate solution to all our problems_

*Chapter 3*

_Selflessness is the only way to progress & prosperity_

*Chapter 4*

_Every act can be an act of prayer_

*Chapter 5*

_Renounce the ego of individuality & rejoice in the bliss of infinity_

*Chapter 6*

_Connect to the Higher consciousness daily_

*Chapter 7*

_Live what you learn_

*Chapter 8*

_Never give up on yourself_

*Chapter 9*

_Value your blessings_

*Chapter 10*

_See divinity all around_

*Chapter 11*

_Have enough surrender to see the Truth as it is_

*Chapter 12*

_Absorb your mind in the Higher_

*Chapter 13*

_Detach from Maya & attach to Divine_

*Chapter 14*

_Live a lifestyle that matches your vision_

*Chapter 15*

_Give priority to Divinity_

*Chapter 16*

_Being good is a reward in itself_

*Chapter 17*

_Choosing the right over the pleasant is a sign of power_

*Chapter 18*

_Let Go, Lets move to union with God_

21/07/2016

Education system of MP.

see glimpses..

छठी के छात्र छेदी ने छत्तीस की जगह बत्तीस कहकर जैसे ही बत्तीसी दिखाई, गुरुजी ने छडी उठाई और मारने वाले ही थे की छेदी ने कहा, "खबरदार अगर मुझे मारा तो! मे गिनती नही जानता मगर आरटीई की धाराएँ अच्छी तरह जानता हूँ.
गणित मे नही, हिंदी मे समझाना आता है."

गुरुजी चौराहों पर खड़ी मूर्तियों की तरह जडवत हो गए. जो कल तक बोल नही पाता था, वो आज आँखें दिखा रहा है!

शोरगुल सुनकर प्रधानाध्यापक भी उधर आ धमके. कई दिनों से उनका कार्यालय से निकलना ही नही हुआ था. वे हमेशा विवादों से दूर रहना पसंद करते थे. इसी कारण से उन्होंने बच्चों को पढ़ाना भी बंद कर दिया था. आते ही उन्होंने छडी को तोड़ कर बाहर फेंका और बोले, "सरकार का आदेश नही पढ़ा? प्रताड़ना का केस दर्ज हो सकता है. रिटायरमेंट नजदीक है, निलंबन की मार पड़ गई तो पेंशन के फजीते पड़ जाएँगे. बच्चे न पढ़े न सही, पर प्रेम से पढ़ाओ. उनसे निवेदन करो. अगर कही शिकायत कर दी तो ?"

बेचारे गुरुजी पसीने पसीने हो गए. मानो हर बूँद से प्रायस्चित टपक रहा हो! इधर छेदी "गुरुजी हाय हाय" के नारे लगाता जा रहा था और बाकी बच्चे भी उसके साथ हो लिए.

प्रधानाध्यापर ने छेदी को एक कोने मे ले जाकर कहा, "मुझसे कहो क्या चाहिए?"
छेदी बोला, "जब तक गुरुजी मुझसे माफी नही माँग लेते है, हम शाला का बहिष्कार करेंगे. बताए की शिकायत पेटी कहाँ है?"

समस्त स्टाफ आश्चर्यचकित और भय का वातावरण हो चुका था. छात्र जान चुके थे की उत्तीर्ण होना उनका कानूनी अधिकार है.

बड़े सर ने छेदी से कहा की मे उनकी तरफ से माफी माँगता हूँ, पर छेदी बोला, "आप क्यों मांगोगे ? जिसने किया वही माफी माँगे. मेरा अपमान हुआ है."

आज गुरुजी के सामने बहुत बड़ा संकट था. जिस छेदी के बाप तक को उन्होंने दंड, दृढ़ता और अनुशासन से पढ़ाया था, आज उनकी ये तीनों शक्तिया परास्त हो चुकी थी. वे इतने भयभीत हो चुके थे की एकांत मे छेदी के पैर तक छूने को तैयार थे, लेकिन सार्वजनिक रूप से गुरूता के ग्राफ को गिराना नही चाहते थे. छडी के संग उनका मनोबल ही नही, परंपरा और प्रणाली भी टूट चुकी थी. सारी व्यवस्था नियम कानून एक्सपायर हो चुके थे. कानून क्या कहता है, अब ये बच्चो से सिखना पढ़ेगा!

पाठक्रम मे अधिकारों का वर्णन था, कर्तव्यों का पता नही था. अंतिम पड़ाव पर गुरु द्रोण स्वयं चक्रव्यूह मे फँस जाएँगे!

वे प्रण कर चुके थे की कल से बच्चे जैसा कहेंगे, वैसा ही वे करेंगे. तभी बड़े सर उनके पास आकर बोले, "मे आपको समझ रहा हूँ. वह मान गया है और अंदर आ रहा है. उससे माफी माँग लो, समय की यही जरूरत है."

छेदी अंदर आकर टेबल पर बैठ गया और हवा के तेज झोंके ने शर्मिन्दा होकर द्वार बंद कर दिए.

कलम को चाहिए कि यही थम जाए. कई बार मौन की भाषा संवादों पर भारी पड़ जाती है....

16/10/2015

नदी में हाथी की लाश बही जा रही थी। एक कौए ने लाश देखी, तो प्रसन्न हो उठा, तुरंत उस पर आ बैठा। यथेष्ट मांस खाया। नदी का जल पिया। उस लाश पर इधर-उधर फुदकते हुए कौए ने परम तृप्ति की डकार ली। वह सोचने लगा, अहा! यह तो अत्यंत सुंदर यान है, यहां भोजन और जल की भी कमी नहीं। फिर इसे छोड़कर अन्यत्र क्यों भटकता फिरूं?
कौआ नदी के साथ बहने वाली उस लाश के ऊपर कई दिनों तक रमता रहा। भूख लगने पर वह लाश को नोचकर खा लेता, प्यास लगने पर नदी का पानी पी लेता। अगाध जलराशि, उसका तेज प्रवाह, किनारे पर दूर-दूर तक फैले प्रकृति के मनोहरी दृश्य-इन्हें देख-देखकर वह विभोर होता रहा।
नदी एक दिन आखिर महासागर में मिली। वह मुदित थी कि उसे अपना गंतव्य प्राप्त हुआ। सागर से मिलना ही उसका चरम लक्ष्य था, किंतु उस दिन लक्ष्यहीन कौए की तो बड़ी दुर्गति हो गई। चार दिन की मौज-मस्ती ने उसे ऐसी जगह ला पटका था, जहां उसके लिए न भोजन था, न पेयजल और न ही कोई आश्रय। सब ओर सीमाहीन अनंत खारी जल-राशि तरंगायित हो रही थी।
कौआ थका-हारा और भूखा-प्यासा कुछ दिन तक तो चारों दिशाओं में पंख फटकारता रहा, अपनी छिछली और टेढ़ी-मेढ़ी उड़ानों से झूठा रौब फैलाता रहा, किंतु महासागर का ओर-छोर उसे कहीं नजर नहीं आया। आखिरकार थककर, दुख से कातर होकर वह सागर की उन्हीं गगनचुंबी लहरों में गिर गया। एक विशाल मगरमच्छ उसे निगल गया।
शारीरिक सुख में लिप्त मनुष्यों की भी गति उसी कौए की तरह होती है, जो आहार और आश्रय को ही परम गति मानते हैं और अंत में अनन्त संसार रूपी सागर में समा जाते है।
जीत किसके लिए, हार किसके लिए
ज़िंदगीभर ये तकरार किसके लिए....
जो भी आया है वो जायेगा एक दिन
फिर ये इतना अहंकार किसके लिए...

07/10/2015

छोड़ा शिक्षक धर्म को, शिक्षक छाने ख़ाक
जनशिक्षक बी.आर.सी., बाँट रहे है डाक |

अब शिक्षक स्कूल में, खरीद रहे हैं प्लाट
व्यापारी सब एक से, क्या बनिया, क्या जाट |

वर्दी - खाना दे रहे गए पढाई भूल
डाक बंगला के जैसे आज बन गए हैं स्कूल

अध्यापक बनवा रहा, देखो रोटी - दाल
बच्चों की तो मौज है, खेल रहे फुटबाल |

बस शिक्षा का आज तो , इतना ही है सार
बच्चे होगये हैं दबंग अध्यापक है लाचार
|
मंशा है सरकार की, घर - घर पहुंचे ज्ञान
बच्चों औ' माँ-बाप का, इनसेंटिव पर ध्यान
|
शिक्षक ऐसा जीव है, सहता सबकी चोट
जनगणना करता कभी, फिरे बनाता वोट |

बढ़ते जाते अंक हैं, घटता जाता ज्ञान
ऐसा क्यों होने लगा, देना इस पर ध्यान |

बातें करें ना ज्ञान की, है डिग्री पर जोर
महल बनाना चाहते , नींव बड़ी कमजोर |

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470002

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