05/06/2026
अहा प्रकृति का देखो नर्तन ........
रितु ,मास ,दिन आते
संग में भरकर जीवन ,
अहा प्रकृति का देखो नर्तन ..........
प्रेम की बूंदो से भर ,
प्रस्फुटित हो रही नवकोपल ,
अंगड़ाई ले किलकारी गूजी हर घर आंगन ;
अहा प्रकृति का देखो नर्तन....
रस की बूंद बन रच गई हथेली
महकी लहकी नई नवेली,
पाकर पिया का बंधन;
अहा प्रकृति का देखो नर्तन ...
मेघ के आंचल से निकली धार ,
संग ले पवन की पतवार , सजता फसलों का यौवन ;
आहा प्रकृति का देखो नर्तन ......
कभी अश्रु ,कहीं जीवन बीज
तो कहीं संकल्प को रुधिर से सींच ,
उमड़ घूमड़ कर घिर आया देखो बन गर्जन...
अहा प्रकृति का देखो नर्तन ...
श्रम की बूंदें गगनचुंबी निर्माण में
कभी चमक रहीं सुनहले खलिहान में ,
धन्य हैं जो तपती धूप में करते स्वेद से तर्पण ,
अहा प्रकृति का देखो नर्तन ....
🌲🌲🌻🌲🌲
पर्यावरण दिवस की समस्त शुभकामनाओ सहित
डॉ शालिनी जोशी पंत
20/05/2026