19/10/2023
*_हजरत सुल्तान अलाउद्दीन अय्यूबी पोस्ट 6_*
मुसलमानों की तारीख देखें। उनके रसूले अकरमﷺ ) के बाद ये लोग ख़िलाफ़त पर एक दूसरे से लड़ते रहे। उनके जरनलयों ने निहायत दियानत दारी से अपना काम जारी रखा। वह दूसरे मुल्कों को तहो तेग़ करते रहे और इसलामी सलतनत को वसीअ करते रहे। लेकिन उनके ख़लीफों ने जहां देखा कि फलां जरनल एसा मकबूल हो गया है कि उस की फतुहात की बदौलत कौम उसे ख़लीफा से ज़्यादा मुकाम देने लगी है तो ख़लीफा उसके हव्वारीयों ने उस जरनल को ग़लत अहकाम देकर उसे ज़लील और रुसवा कर दिया। खुद खलीफा की गद्दी मुखालीफीन से महफूज़ न रही। मुखालिफीन की निगाह इसलामी सलतनत की वुसअत से हट कर ख़िलाफ़त के हुसूल पर मरकूज़ हो गई। नतीजे में हारते चले गये और उनके फतह किये हुए इलाके उनके हाथों से निकलते चले गये। इसी का नतीजा है कि आज हम अरब में बैठे हैं। सलाउद्दीन अय्यूबी इन्हीं जरनल में से है जो सलतनत को उन्हीं सरहदों तक ले जाना चाहता है जहां तक उन जरनैलों ने पहुंचाई थीं। उस शख़्श में खूबी ये है कि वह इन्तिज़ामिया और ख़िलाफ़त की परवाह नहीं करता। उसने मिस्र की ख़िलाफ़त को अपने इरादों के सामने रुकावट बनते देखा तो ख़लीफ़ा को ही माजूल कर दिया।
ये दिलेराना कदम उसने फौजी ताकत और अपनी फहम व फरासत के बल बूते पर उठाया है।"
हरमन बोलता जा रहा था। तमाम हुक्मरां और सलीबी कमाण्डर इनहिमाक से सुन रहे थे। वह कह रहा था...." सलाउद्दीन अय्यूबी अपनी कौम की इस कमज़ोरी को समझ गया है
कि गैर फौजी कियादत गद्दी की ख्वाहिश मन्द है और ये ख्वाहिश ऐसी है जो ज़न और ज़र परसती और शराब नोशी जैसी आदतें पैदा करती हैं। हमने सिर्फ उन फौजी अफसरों को हाथ में लिया है जो इक्तदार के ख्वाहिश मन्द हैं। इसी लिये हम ज़्यादा तर असर इन्तिज़ामिया के सरबराहों पर डाल रहें हैं। फ़ौज को कमज़ोर करने का तरीका ये है कि उसे लोगों कि नज़रों में रुसवा कर दिया जाये। यह काम मेरा है जो मैं कर रहा हूं। आप शायद मेरी ताईद
न करें लेकिन मैं आपको बता देना चाहता हूं कि आप सलाउद्दीन अय्यूबी को मैदाने जंग में आसानी से शिकस्त नहीं दे सकते। वह सिर्फ लड़ने के लिये नही लड़ता। उसकी अज़्म की बुनयाद एक एसे मनसूबे पर हैं जिसे उसकी सारी फ़ौज समझती है। उसकी बुन्यादी खूबी यह है कि वह अपने ख़लीफा से या गैर फौजी कियादत से हुक्म नहीं लेता। वह कट्टर मुसलमान है।
वह कहता है कि मैं खुदा और कुरआन से हुक्म लेता हूं। मेरे जो जासूस बगदाद में हैं उन्होंने इत्तिला दी है कि अय्यूबी ने नूरुद्दीम जंगी को साथ मिला कर यहां से इनकलाबी तजाबीज़ भेजी हैं जिन पर अमल दर आमद शुरू हो गया है। एक यह है कि अमीरे उलमा से ये फतवा सादिर कराया गया है कि ख़िलाफ़त सिर्फ एक होगी और ये बगदाद की ख़िलाफ़त होगी। ये ख़िलाफ़त दूसरे मुमालिक के मुतअल्लिक एहकाम नाफिज़ करने और समझौतों की बात चीत करने से पहले आला फ़ौजी कियादत से मन्जूरी लेगी। जंगी उमूर में फौजी हुक्काम के हाथ में होगें। खलिफा दूर दराज़ इलाकों में लड़ने वाले जरनैलों को कोई हुक्म नही भेज सकता । तिसरे यह कि खलिफा का नाम खुतबे में नहीं लिया जाएगा और ख़िलाफत का असर व रसूख ख़त्म करने के लिये अय्यूबी ने हुक्म जारी करादिया है कि ख़लीफा या उसके नाएब या कोई किला दार वगैरह, जब दौरे वगैरह के लिये बाहर निकलेगें तो लोगों को रास्ते मे खड़े होने, नारे लगाने और सलाम करने की इजाजत नहीं होगी..
📚 *दास्तान ईमान फरोसा की हिस्सा दो पेज 12*
✍🏻✍🏻अली रजवी 8237878378