07/07/2026
⚖️ सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी शिकायत (Complaint Case) में ऐसा अपराध शामिल है जिसकी सुनवाई केवल सेशंस कोर्ट द्वारा की जा सकती है, तो मजिस्ट्रेट को CrPC, 1973 की धारा 244 के तहत आरोप तय होने से पहले अभियोजन पक्ष के साक्ष्य (Pre-Charge Evidence) रिकॉर्ड करने की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने कहा कि इस चरण पर मजिस्ट्रेट का कार्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि मामला सेशन ट्रायबल है या नहीं। यदि अपराध केवल सेशंस कोर्ट द्वारा विचारणीय है, तो बिना किसी साक्ष्य को रिकॉर्ड किए मामले को सेशंस कोर्ट को कमिट किया जा सकता है।
यह फैसला जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने Neeraj Gupta vs. Pardeep Kumar Bansal & Ors. मामले में सुनाया। इस निर्णय के साथ सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मजिस्ट्रेट को CrPC की धारा 244 के तहत अभियोजन पक्ष के साक्ष्य रिकॉर्ड करने के बाद ही मामला सेशंस कोर्ट भेजने का निर्देश दिया गया था।
मामले में शिकायतकर्ता ने IPC की धारा 302 (हत्या) सहित ऐसे आरोप लगाए थे जिनकी सुनवाई केवल सेशंस कोर्ट में हो सकती है। मजिस्ट्रेट ने बिना प्री-चार्ज साक्ष्य रिकॉर्ड किए मामला सेशंस कोर्ट भेज दिया था। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, जहां यह कहा गया कि चाहे अपराध सेशन ट्रायबल ही क्यों न हो, मजिस्ट्रेट को पहले अभियोजन के सभी साक्ष्य रिकॉर्ड करने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को कानून के विपरीत बताते हुए कहा कि CrPC की धारा 209 (वर्तमान BNSS की धारा 232) के तहत कमिटल (Committal) की प्रक्रिया में किसी प्रकार का मिनी ट्रायल या साक्ष्य रिकॉर्ड करने की आवश्यकता नहीं है।
कोर्ट ने Superintendent and Remembrancer of Legal Affairs vs. Ashutosh Ghosh (1979) 4 SCC 381 के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट को केवल यह देखना होता है कि अपराध विशेष रूप से सेशंस कोर्ट द्वारा विचारणीय है या नहीं। इस स्तर पर साक्ष्य रिकॉर्ड करना कानून की मंशा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि हाईकोर्ट की व्याख्या को स्वीकार कर लिया जाए तो गवाहों को पहले मजिस्ट्रेट और फिर सेशंस कोर्ट के समक्ष एक ही तथ्यों पर दो बार गवाही देनी पड़ेगी, जिससे न्यायिक प्रक्रिया अनावश्यक रूप से लंबी और बोझिल हो जाएगी, जबकि इसका कोई कानूनी औचित्य नहीं है।
अपने फैसले में कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि CrPC की धारा 244 केवल उन वारंट मामलों पर लागू होती है जिनकी सुनवाई स्वयं मजिस्ट्रेट द्वारा की जाती है। इसलिए इस प्रावधान को उन शिकायत मामलों पर लागू नहीं किया जा सकता जिनकी सुनवाई विशेष रूप से सेशंस कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आती है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट की भूमिका सीमित है और उसे मामले के गुण-दोष पर विचार करने के बजाय केवल आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने तथा कानून के अनुसार मामला सेशंस कोर्ट को भेजने तक ही सीमित रहना चाहिए। कोर्ट ने इस संदर्भ में Sanjay Gandhi vs. Union of India (1978) 2 SCC 39 में जस्टिस कृष्ण अय्यर की उस टिप्पणी का भी उल्लेख किया, जिसमें मजिस्ट्रेट की भूमिका को "Narrow Inspection Hole" बताया गया था।
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