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⚖️  सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी शिकायत (Complaint Case) में ऐसा अपराध शामिल है ...
07/07/2026

⚖️ सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी शिकायत (Complaint Case) में ऐसा अपराध शामिल है जिसकी सुनवाई केवल सेशंस कोर्ट द्वारा की जा सकती है, तो मजिस्ट्रेट को CrPC, 1973 की धारा 244 के तहत आरोप तय होने से पहले अभियोजन पक्ष के साक्ष्य (Pre-Charge Evidence) रिकॉर्ड करने की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने कहा कि इस चरण पर मजिस्ट्रेट का कार्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि मामला सेशन ट्रायबल है या नहीं। यदि अपराध केवल सेशंस कोर्ट द्वारा विचारणीय है, तो बिना किसी साक्ष्य को रिकॉर्ड किए मामले को सेशंस कोर्ट को कमिट किया जा सकता है।

यह फैसला जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने Neeraj Gupta vs. Pardeep Kumar Bansal & Ors. मामले में सुनाया। इस निर्णय के साथ सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मजिस्ट्रेट को CrPC की धारा 244 के तहत अभियोजन पक्ष के साक्ष्य रिकॉर्ड करने के बाद ही मामला सेशंस कोर्ट भेजने का निर्देश दिया गया था।

मामले में शिकायतकर्ता ने IPC की धारा 302 (हत्या) सहित ऐसे आरोप लगाए थे जिनकी सुनवाई केवल सेशंस कोर्ट में हो सकती है। मजिस्ट्रेट ने बिना प्री-चार्ज साक्ष्य रिकॉर्ड किए मामला सेशंस कोर्ट भेज दिया था। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, जहां यह कहा गया कि चाहे अपराध सेशन ट्रायबल ही क्यों न हो, मजिस्ट्रेट को पहले अभियोजन के सभी साक्ष्य रिकॉर्ड करने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को कानून के विपरीत बताते हुए कहा कि CrPC की धारा 209 (वर्तमान BNSS की धारा 232) के तहत कमिटल (Committal) की प्रक्रिया में किसी प्रकार का मिनी ट्रायल या साक्ष्य रिकॉर्ड करने की आवश्यकता नहीं है।

कोर्ट ने Superintendent and Remembrancer of Legal Affairs vs. Ashutosh Ghosh (1979) 4 SCC 381 के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट को केवल यह देखना होता है कि अपराध विशेष रूप से सेशंस कोर्ट द्वारा विचारणीय है या नहीं। इस स्तर पर साक्ष्य रिकॉर्ड करना कानून की मंशा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि हाईकोर्ट की व्याख्या को स्वीकार कर लिया जाए तो गवाहों को पहले मजिस्ट्रेट और फिर सेशंस कोर्ट के समक्ष एक ही तथ्यों पर दो बार गवाही देनी पड़ेगी, जिससे न्यायिक प्रक्रिया अनावश्यक रूप से लंबी और बोझिल हो जाएगी, जबकि इसका कोई कानूनी औचित्य नहीं है।

अपने फैसले में कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि CrPC की धारा 244 केवल उन वारंट मामलों पर लागू होती है जिनकी सुनवाई स्वयं मजिस्ट्रेट द्वारा की जाती है। इसलिए इस प्रावधान को उन शिकायत मामलों पर लागू नहीं किया जा सकता जिनकी सुनवाई विशेष रूप से सेशंस कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आती है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट की भूमिका सीमित है और उसे मामले के गुण-दोष पर विचार करने के बजाय केवल आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने तथा कानून के अनुसार मामला सेशंस कोर्ट को भेजने तक ही सीमित रहना चाहिए। कोर्ट ने इस संदर्भ में Sanjay Gandhi vs. Union of India (1978) 2 SCC 39 में जस्टिस कृष्ण अय्यर की उस टिप्पणी का भी उल्लेख किया, जिसमें मजिस्ट्रेट की भूमिका को "Narrow Inspection Hole" बताया गया था।

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03/07/2026

असम में अनमुल हक 16 डॉक्यूमेंट पेश करने के बावजूद भारतीय नागरिकता साबित नहीं कर सका। 28 फरवरी 2019 को असम जिले के विदेशी न्यायाधिकरण ने उसे विदेशी घोषित किया था। वह इसके खिलाफ हाईकोर्ट गया। खुद को भारतीय साबित करने के लिए उसने 16 दस्तावेज पेश किए।

>1951 की NRC कॉपी, जिसमें पिता और दादा का नाम दर्ज था
>1966 से 2017 तक की वोटर लिस्ट, जिसमें अनिमुल और पूरे परिवार का नाम था
>1973 के जमीन खरीद के कागज
>पेन कार्ड, वोटर ID, स्कूल ID जैसे कागज

हाईकोर्ट ने माना कि अनिमुल हक अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने में नाकाम रहे। ऐसे में HC ने "विदेशी" होने का फैसला बरकरार रखा।

02/07/2026

⚖️ इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस विवेक कुमार सिंह की पीठ ने न्यायिक एकरूपता (Judicial Consistency) और समान परिस्थितियों में कानून के समान अनुप्रयोग को लेकर एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। कोर्ट ने गाज़ियाबाद के एडिशनल सेशन जज, कोर्ट नंबर 7 से यह स्पष्ट करने को कहा है कि एक ही आपराधिक मामले में समान भूमिका वाले दो सह-आरोपियों के साथ अलग-अलग व्यवहार क्यों किया गया।

मामला मोहम्मद रफ़ीक उर्फ़ रफ़ीकुल इस्लाम की ज़मानत याचिका से जुड़ा है, जिनके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराएँ 109(1), 352, 351(2), 115(2), 191(2) और 3(5) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। अभियोजन के अनुसार रफ़ीक ने घायल नौशाद पर चाकू से हमला किया था। वहीं बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार पीड़ित को कुल 10 चोटें आई थीं, जिनमें केवल एक चाकू की चोट थी और वह भी मामूली प्रकृति की थी। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि रफ़ीक का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और उसे झूठा फंसाया गया है।

सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि इसी मामले के सह-आरोपी अंशु, जिस पर भी चाकू से हमला करने और समान भूमिका निभाने का आरोप था, उसे 9 जून 2026 को उसी अदालत ने ज़मानत दे दी थी। जबकि इससे पहले 14 मई 2026 को उसी अदालत ने रफ़ीक की ज़मानत याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि उसने शिकायतकर्ता पर जान से मारने की नीयत से हमला किया और उसकी भूमिका मुख्य थी।

इन दोनों आदेशों में स्पष्ट अंतर को देखते हुए जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने कहा कि न्यायिक निर्णयों में एकरूपता और समान परिस्थितियों में समान कानूनी सिद्धांतों का पालन न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए अत्यंत आवश्यक है। हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायिक अधिकारी को निर्देश दिया है कि वह सात दिनों के भीतर विस्तृत स्पष्टीकरण दें कि किन विशेष तथ्यों, परिस्थितियों या कानूनी आधारों के कारण समान स्थिति वाले एक सह-आरोपी को ज़मानत दी गई, जबकि दूसरे की ज़मानत पहले अस्वीकार कर दी गई थी।

हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह स्पष्टीकरण प्रशासनिक उद्देश्य से मांगा गया है और इसे निचली अदालत के आदेशों की मेरिट पर किसी अंतिम टिप्पणी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वहीं, मामले के तथ्यों, चोटों की प्रकृति और सह-आरोपी को पहले ही मिली ज़मानत को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने मोहम्मद रफ़ीक उर्फ़ रफ़ीकुल इस्लाम को भी ज़मानत प्रदान कर दी।

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02/07/2026

🔴👉इलाहाबाद हाईकोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले Umme Farva v. State of Uttar Pradesh & Another, न्यूट्रल साइटेशन 2026:AHC:8949, केस नंबर Application U/S 528 BNSS No. 12575 of 2025। यह फैसला माननीय जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि ने 14 जनवरी 2026 को दिया।

🔴👉झूठी FIR कराने वालों की अब खैर नहीं! इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि जांच में शिकायत झूठी पाए जाने पर सिर्फ शिकायतकर्ता ही नहीं, बल्कि झूठे गवाहों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

🔴👉हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पुलिस जांच के बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि कोई अपराध नहीं बनता और एफआईआर झूठी है, तो केवल क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करना पर्याप्त नहीं होगा। जांच अधिकारी को कानून के अनुसार झूठी सूचना देने वाले शिकायतकर्ता और आवश्यक होने पर झूठे गवाहों के खिलाफ भी लिखित शिकायत करनी होगी।

🔴👉अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि विवेचना अधिकारी, थाना प्रभारी या न्यायिक अधिकारी इस कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं करते, तो उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई और अदालत की अवमानना की कार्यवाही भी हो सकती है।

⚖️  बिहार के भोजपुर में 28 वर्षीय भारत भूषण तिवारी की कथित फर्जी मुठभेड़ में मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने CBI जांच ...
02/07/2026

⚖️ बिहार के भोजपुर में 28 वर्षीय भारत भूषण तिवारी की कथित फर्जी मुठभेड़ में मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने CBI जांच की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को इस मामले में पटना हाईकोर्ट का रुख करने की स्वतंत्रता प्रदान की।

यह मामला जस्टिस एम. एम. सुंदरेश और जस्टिस शील नागू की खंडपीठ के समक्ष आया। सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि वह इस याचिका पर सुनवाई नहीं करेगी और बेहतर होगा कि याचिकाकर्ता हाईकोर्ट जाएं, क्योंकि ऐसे मामलों की निगरानी हाईकोर्ट अधिक प्रभावी ढंग से कर सकता है।

यह जनहित याचिका एडवोकेट विशाल तिवारी द्वारा दायर की गई थी। याचिका में भारत भूषण तिवारी की कथित न्यायेतर हत्या की जांच CBI से कराने, संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने तथा सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित कर मामले की जांच कराने की मांग की गई थी।

याचिका के अनुसार, 17 जून को भोजपुर में पुलिस मुठभेड़ के दौरान भारत भूषण तिवारी की मौत हुई थी। मृतक के पिता का आरोप है कि हथियार डालने के बावजूद पुलिस ने उन्हें गोली मार दी। याचिका में यह भी दावा किया गया कि कथित मुठभेड़ का सीधा प्रसारण भारत भूषण तिवारी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर किया था। साथ ही यह भी कहा गया कि घटना से एक दिन पहले पुलिस ने उन्हें मानसिक रूप से अस्थिर बताया था और उन्हें सुरक्षित हिरासत में लेने के प्रयास किए जाने की बात कही थी।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि स्थानीय लोगों और मृतक के पिता के आरोपों को देखते हुए यह जांच आवश्यक है कि क्या मामले की निष्पक्ष जांच हुई और क्या PUCL बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुलिस मुठभेड़ों को लेकर जारी दिशा-निर्देशों का पालन किया गया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी किए बिना याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया और स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता इस मामले में पटना हाईकोर्ट का रुख कर सकते हैं।

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01/07/2026

परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence) क्या है?

परिस्थितिजन्य साक्ष्य वह साक्ष्य होता है जिसमें किसी अपराध को प्रत्यक्ष रूप से देखने वाला गवाह (Eyewitness) नहीं होता, बल्कि ऐसे तथ्यों और परिस्थितियों की एक श्रृंखला (Chain of Circumstances) प्रस्तुत की जाती है, जिनसे न्यायालय यह निष्कर्ष निकालता है कि अपराध अभियुक्त ने ही किया है।
उदाहरण के लिए:
अभियुक्त को घटना से ठीक पहले मृतक के साथ अंतिम बार देखा जाना (Last Seen Theory)
हत्या का हथियार अभियुक्त की निशानदेही पर बरामद होना
अभियुक्त का घटना के बाद फरार होना
वैज्ञानिक साक्ष्य (DNA, Fingerprint, FSL Report)
अपराध का उद्देश्य (Motive)
अभियुक्त का झूठा स्पष्टीकरण देना
यदि ये सभी परिस्थितियां मिलकर एक पूर्ण और अखंड श्रृंखला बनाती हैं, जिससे केवल अभियुक्त के अपराधी होने का ही निष्कर्ष निकले और किसी अन्य संभावना की गुंजाइश न रहे, तो केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर भी दोषसिद्धि की जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्णय
Hanumant Govind Nargundkar v. State of Madhya Pradesh
इस निर्णय में कहा गया कि परिस्थितियां पूरी तरह सिद्ध होनी चाहिए और उनका निष्कर्ष केवल अभियुक्त के अपराध की ओर ही इंगित करना चाहिए।
Sharad Birdhichand Sarda v. State of Maharashtra
यह परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर सबसे महत्वपूर्ण निर्णय माना जाता है।
इसमें सुप्रीम कोर्ट ने 'पंचशील (Five Golden Principles)' निर्धारित किए।
Sharad Sarda के पाँच सिद्धांत (Five Golden Principles):
प्रत्येक परिस्थिति पूर्ण रूप से सिद्ध हो।
सिद्ध परिस्थितियां केवल अभियुक्त के दोष की ओर ही संकेत करें।
परिस्थितियां निर्णायक (Conclusive) हों।
वे अभियुक्त की निर्दोषता की किसी भी उचित संभावना को समाप्त करें।
परिस्थितियों की श्रृंखला इतनी पूर्ण हो कि अपराध किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किए जाने की संभावना न बचे।
Trimukh Maroti Kirkan v. State of Maharashtra
यदि अपराध घर के अंदर हुआ हो और तथ्य अभियुक्त के विशेष ज्ञान में हों, तो भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 109) के सिद्धांत लागू हो सकते हैं।
Satpal Singh v. State of Haryana
न्यायालय ने कहा कि यदि परिस्थितियों की श्रृंखला पूर्ण है तो प्रत्यक्षदर्शी के अभाव में भी दोषसिद्धि संभव है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का दृष्टिकोण
Allahabad High Court ने अनेक निर्णयों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांतों का पालन करते हुए कहा है कि:
केवल संदेह के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।
अभियोजन को परिस्थितियों की प्रत्येक कड़ी सिद्ध करनी होगी।
यदि श्रृंखला में कोई महत्वपूर्ण कड़ी टूटती है तो अभियुक्त को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) मिलेगा।
क्रिमिनल मुकदमों में महत्व
प्रत्यक्षदर्शी न होने पर भी दोषसिद्धि संभव।
हत्या, दहेज मृत्यु, विषप्रयोग, बंद कमरे में हत्या, षड्यंत्र जैसे मामलों में अत्यंत महत्वपूर्ण।
वैज्ञानिक एवं इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का महत्व बढ़ जाता है।
न्यायालय प्रत्येक परिस्थिति का अलग-अलग और समग्र रूप से मूल्यांकन करता है।

निष्कर्ष:
परिस्थितिजन्य साक्ष्य भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि अभियोजन ऐसी सुसंगत और पूर्ण परिस्थितियों की श्रृंखला स्थापित कर दे जो केवल अभियुक्त के अपराध की ओर संकेत करे और किसी अन्य उचित संभावना को समाप्त कर दे, तो केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर भी दोषसिद्धि और आजीवन कारावास अथवा मृत्युदंड तक दिया जा सकता है। वहीं, यदि श्रृंखला अधूरी हो या उचित संदेह बना रहे, तो अभियुक्त को दोषमुक्त किया जाएगा।

जिला जज को लिंचिंग केस में 'गौ-रक्षकों' को दोषी ठहराने वाला फैसला सुनाने के बाद गंभीर सांप्रदायिक हमलों का सामना करना पड...
01/07/2026

जिला जज को लिंचिंग केस में 'गौ-रक्षकों' को दोषी ठहराने वाला फैसला सुनाने के बाद गंभीर सांप्रदायिक हमलों का सामना करना पड़ा है।

इस महीने की शुरुआत में,नर्मदापुरम जिले की एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज तबस्सुम खान ने 2022 में ट्रक ड्राइवर शेख लाला नज़ीर अहमद की गौ-तस्करी के शक में पीट-पीटकर हत्या (लिंचिंग) करने के मामले में 7 लोगों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी।

फैसले वाले दिन, दोषियों के परिवारों ने विरोध प्रदर्शन किया और दोषी ठहराए गए लोगों को जेल ले जा रही पुलिस गाड़ी को रोकने की कोशिश की।

फैसले के कुछ ही समय बाद कई ऑनलाइन वीडियो और पोस्ट सामने आए, जिनमें जज को उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाया गया।

सिवनी मालवा में मध्य प्रदेश पुलिस ने जज तबस्सुम खान के खिलाफ चलाए गए टारगेटेड, सांप्रदायिक ऑनलाइन कैंपेन के बाद अज्ञात लोगों के खिलाफ BNS की धारा 302 और 196 के तहत FIR दर्ज की।

X (पहले ट्विटर) पर एक वीडियो बड़े पैमाने पर शेयर किया गया, जिसका सोर्स पता नहीं है। इसमें गुजरात के विशाल सिंह नाम के व्यक्ति को जज को धमकी देते और सांप्रदायिक अपशब्द कहते हुए देखा जा सकता है, जो दोषी ठहराए गए लोगों को 10 दिनों के भीतर रिहा करने की मांग कर रहा है।

एक अन्य वीडियो में कई लोगों को - जो कथित तौर पर पंजाब के मोहाली से है - जज का पुतला जलाते हुए और दोषियों की रिहाई की मांग करते हुए दिखाया गया।

'हिंदूनेशन' नाम के एक अन्य ट्विटर अकाउंट ने एक ट्वीट में कहा,

"जज तबस्सुम खान ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करते हुए माननीय अदालत के नियमों को नज़रअंदाज़ किया और दुर्भावनापूर्ण पक्षपात दिखाते हुए गौ-रक्षकों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई। माननीय सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध है कि जज तबस्सुम खान को सस्पेंड किया जाए, जो जनता के प्रति पक्षपाती हैं और जिन्होंने न्यायपालिका के नियमों का उल्लंघन किया है, ताकि जनता को न्याय मिल सके और गाय को बचाने वाले सभी गौ-रक्षकों को रिहा किया जा सके ताकि वे फिर से गायों की सेवा कर सकें और इस तथाकथित धार्मिक जज के पूरे कार्यकाल के दौरान दिए गए सभी फैसलों की दोबारा जांच की जानी चाहिए।"

एक अन्य वीडियो में गौ-रक्षकों का एक जुलूस दोषियों की रिहाई की मांग करता हुआ दिखाई दिया। यह वीडियो एक यूज़र ने शेयर किया, जिसने जज पर धर्म के आधार पर फैसले सुनाने का आरोप लगाया और उन्हें हटाने की मांग की। यूज़र ने दावा किया कि गौ-रक्षा कोई अपराध नहीं है। सिवनी मालवा इलाके में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों समेत कई जाने-माने लोगों ने एक न्यायिक अधिकारी के खिलाफ हो रही इस ऑनलाइन बदसलूकी को रोकने के लिए असरदार कदम न उठाए जाने की निंदा की।

राज्यसभा सदस्य और इंडियन नेशनल कांग्रेस के नेता पवन खेड़ा ने जज को निशाना बनाने वाले एक वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा,

"सभी दोषी हिंदू पुरुष ही हैं। लेकिन उन्हें उनके धर्म की वजह से दोषी नहीं ठहराया गया; उन्हें इसलिए दोषी ठहराया गया, क्योंकि जांच में वे दंगा करने, हत्या की कोशिश और हत्या के दोषी पाए गए। फिर भी वीडियो में दिख रहे हमारे हिंदू भाई को उनके व्यवहार पर कोई गुस्सा नहीं है। उनका गुस्सा सिर्फ़ एक बात पर है: कि जिन जज ने उन्हें दोषी ठहराया, वे एक मुस्लिम महिला हैं।"

खेड़ा ने सवाल किया कि जज के खिलाफ नफरत फैलाने वालों के खिलाफ कोई त्वरित कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

सीनियर वकील विवेक तन्खा ने जज पर हुए हमलों की निंदा करते हुए कहा,

"अब समय आ गया है कि कानूनी बिरादरी और जागरूक नागरिक उन जजों की सराहना करें और उनकी रक्षा करें, जो कानून के शासन (Rule of Law) के साथ खड़े होने और उसे बनाए रखने का साहस दिखाते हैं। खासकर तब, जब वे न्यायपालिका के निचले स्तर पर हों।"

तन्खा ने आगे कहा कि इस मामले में उच्च न्यायपालिका और सरकार की चुप्पी हैरान करने वाली है।

यह मामला 2 और 3 अगस्त, 2022 की दरमियानी रात का है, जब पीड़ित मवेशियों को नरदरवाड़ा से महाराष्ट्र ले जा रहे थे और उन्हें सिवनी मालवा के बराखंड गांव के पास रोका गया। ग्रामीणों की एक भीड़ ने गाड़ी को रोक लिया और लाठियों व लकड़ी के डंडों से उन लोगों पर हिंसक हमला किया। इस हमले में नज़ीर अहमद की मौत हो गई, जबकि उनके साथी शेख मुश्ताक घायल हो गए

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