16/12/2025
𝗗𝗘𝗖𝗘𝗠𝗕𝗘𝗥 𝟭𝟲, 𝟭𝟵𝟳𝟭
विजय दिवस - ज़ब दक्षिण एशिया का राजनैतिक नक्शा बदल दिया गया
सन 70 के उत्तरार्ध और 71 के पूर्वार्ध में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश ) में चल रहे घटनाक्रमों से यह लगभग तय हो गया था कि भारत-पाकिस्तान के बीच एक और सशस्त्र संघर्ष अनिवार्य हो गया है I
सन 71 के अप्रैल माह में ही तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने आर्मी चीफ जरनल मानेक शा (जो कि बाद में फील्ड मार्शल के पद पर पदोन्नत हुए ) से पूछा कि क्या सेना युद्ध के लिए तैयार है ? जरनल मानेक शा ने अप्रैल -मई का समय उपयुक्त नहीं बताया और वर्ष के अंत तक युद्द की सलाह दी I माना जाता है कि जरनल ने इंदिरा जी को यह भी कहा कि यदि वे युद्ध का समय और अन्य शर्ते तय करने का अधिकार दें, तो वह युद्ध में विजय की गारंटी दे सकते हैं ई
इंन्दिरा जी देश और दक्षिण एशिया की बदलती परिस्थितयों से भली भांति वाकिफ थी , और जल्दबाजी में भी न थी , अतः उन्होंने जरनल के सुझाव को मान लिया I
राजनीतिक नेतृत्व से संकेत मिलते ही सैन्य नेतृत्व ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी I जरनल मानेक शा ( थल सेनाध्यक्ष ) , एडमिरल एस एम नन्दा (नौ सेनाध्यक्ष ) एवं एयर चीफ मार्शल पी सी लाल ने अपने कमांडर्स को उचित निर्देश दे दिए I
नवम्बर 71 में पाकिस्तान के अतिवादी राजनैतिक –धार्मिक कठमुल्लों के नेतृत्व में पाकिस्तान के लाहौर एवं अन्य शहरों में हजारों पाकिस्तानियों ने “ भारत को नेस्तनाबूद कर दो “ के नारों के साथ प्रदर्शन करना शुरू कर दिया I पाकिस्तान की सेना ने भारतीय सीमा पर हथियारों और सैनिकों का जमाव शुरू कर दिया I जबाब में भारतीय सेनायें भी सीमाओं पर मुस्तैद हो गयी ,ताकि पाक की किसी भी नापाक हरकत का तुरंत मुंहतोड़ जबाब दिया जा सके I 23 नवंबर 1971 को पाकिस्तान के सैन्य शासक एवं राष्ट्रपति जरनल याह्या खान ने पाकिस्तान में आपातकाल घोषित कर दिया और देश को युद्ध के लिए तैयार रहने के लिए कहा I पाकिस्तान को भरोसा था कि अमेरिका और चीन युद्ध में उसकी मदद करेंगे I अमेरिका और चीन की तरफ से भारत को अप्रत्यक्ष धमकियाँ पहले से ही दी जा रही थी I बड़ी शक्तियों में सिर्फ सोवियत संघ भारत के साथ था I
3 दिसम्बर की शाम को लगभग 5 बजकर 42 मिनट पर पाकिस्तान ने बिना किसी उकसावे के ही , भारत की पश्चिमी सीमा पर स्थित 11 वायुसेना अड्डों पर एक साथ भारी बमवर्षकों के द्वारा हवाई हमला कर दिया I इस हमले का कोड नाम " आपरेशन चंगेज खान “ रखा गया था I
पाकिस्तान का यह अचानक हमला ( surprise attack या pre-emptive attack ) अरब –इजराइल युद्ध ( जिसे युद्ध इतिहास में "six days war" के नाम से जाना जाता है ) के उस हमले की नकल थी जिसमें इजराइल ने अचानक एक साथ कई ठिकानों पर हमला कर अरब के कई हवाई ठिकानों सहित उसकी वायु प्रतिरक्षा प्रणाली को ध्वस्त कर दिया था I
हमला अचानक जरूर था , पर भारतीय सेनाएं तैयार थी I दुश्मन ने आगरा तक बम बरसाए, किन्तु कुछ स्थानों पर छिटपुट नुकसान के अलावा कहीं कोई गंभीर नुकसान नहीं हुआ I
तुरंत हुई कैबिनेट की आपात बैठक में निर्णायक- All Out War -युद्ध के निर्णय के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी राष्ट्रपति इंदिरा गांधी वी वी गिरी से मिली और उन्हें कैबिनेट के फैसले के बारे में बताया I राष्ट्रपति ने युद्ध की घोषणा की ( declaration of state of war and hostility ) I
इंदिरा जी ने तुरंत रेडियो पर देश को संबोधित किया और पाकिस्तान को “ दुश्मन “ देश घोषित करते हुए युद्ध की घोषणा की I
युद्ध घोषित होते ही कुछ ही समय बाद 3 दिसंबर 71 की रात्रि को भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान के कई ठिकानों पर हवाई हमला कर उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया I पूर्वी पाकिस्तान में तो भारतीय हमला इतना तीव्र और सटीक था कि 4 दिसम्बर की सुबह होते तक पूर्वी पाकिस्तान की वायुसेना लगभग तबाह हो चुकी थी , उसका एक भी हवाई ठिकाना ऐसा न बचा जहाँ से उनके लड़ाकू जहाज उड़ान भर सकें I पूर्वी पाकिस्तान के वायु क्षेत्र में अब भारत का वर्चस्व था I
इस हमले के साथ ही जल -थल और नभ सेना के तीनों अंगों ने पूर्वी और पश्चिमी सीमा पर एक साथ कई जगह co -ordineted attack शुरू कर दिया l
थल सेना को आदेश दे दिया गया कि दुश्मन के क्षेत्र में घुस कर कब्ज़ा करें I पूर्वी और पश्चिमी –दोनों ही सीमाओं पर भारतीय फ़ौज आगे बढ़ने लगी I पाकिस्तानी जमीन भारतीय टैंकों और फ़ौजी बूटों की धमक से काँप उठी I तोपखानों के गोलों ने पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों को दोजख में बदल दिया I
4-5 की रात को भारतीय नौ सेना ने अपना गुप्त आपरेशन “ त्रिशूल “ शुरू कर दिया I इस आपरेशन के तहत करांची बंदरगाह और नौसेना ठिकानों – युद्धपोतो पर जबरदस्त हमला बोल दिया गया I करांची धू धू कर जलने लगा , कुछ ही घंटों में पाकिस्तान के युद्धपोत "पीएनएस खैबर " , "पीएनएस हफीज" और "पीएनएस जहाँ " समुद्र के गर्भ में डूबा दिए गए I बंदरगाह को भारी नुकसान पहुंचा , पाकिस्तान के अनुसार उसके 720 नौसैनिक हताहत हुए I यह हमला इतना भयंकर था कि करांची बंदरगाह की आग बुझाने में हफ़्तों लग गए I युद्द समाप्त होने के बाद भी कई दिनों तक बंदरगाह से उठने वाले धुंवे ने मीलों तक आसमान पर घने बादल बना दिए थे I इस हमले के चार दिन बाद करांची पर एक और बड़ा हमला किया गया ( आपरेशन अजगर ) l अरब सागर पर अब भारतीय नियंत्रण पूरी तरह से स्थापित हो चुका था I
नौसेना की पूर्वी कमांड ( वाइस एडमिरल नीलकंठ कृष्णन के नेतृत्व में ) ने बंगाल की खाड़ी को पूरी तरह से नियंत्रण में ले लिया था I 4 दिसम्बर को भारतीय विमानवाहक युद्धपोत आईएनएस विक्रांत बंगाल की खाड़ी में पोजीशन ले चुका था और यहाँ से पाकिस्तानी नौसैनिक ठिकानों और युद्धपोतों पर इतना भारी हमला किया गया कि पाकिस्तानी नौसेना लुंज-पुंज हो गयी I चंद दिनों में ही पूर्वी पकिस्तान का समुद्री और वायु क्षेत्र एवं पश्चिम में अरब सागर हमारे नियंत्रण में आ गया I बहुत से पाकिस्तानी नौसैनिक मोर्चा छोड़ कर भाग भी गए I
अब पाकिस्तान हमला करने की बजाय बचाव की मुद्रा में आ गया I उसके मुख्य संरक्षक अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र संघ में युद्धविराम का प्रस्ताव रखा, किन्तु सोवियत संघ ने उसे वीटो कर दिया I
पूर्वी कमांड के प्रमुख लेफ्टनेंट जरनल जगजीत सिंह अरोड़ा के नेतृत्व में भारतीय सेना ने पूर्वी पाकिस्तान पर इतना भयानक हमला बोला कि पाकिस्तानी सेना का पैर ही उखड़ गए I हर दिन –हर घंटे –हर मिनट न उसे सिर्फ पीछे भागना पड़ रहा था ,बल्कि भारी नुक्सान भी झेलना पड़ रहा था I
16 दिसम्बर 1971 को जरनल अरोड़ा ने पाकिस्तान की सेना को अंतिम अल्टीमेटम के रूप में महज आधे घंटे की मोहलत दी कि या तो वे आत्मसमर्पण कर दें , या निश्चित मृत्यु के लिए तैयार हो जाएँ I जल -थल -नभ में कहीं भी बचाव का कोई रास्ता न देख 16 दिसम्बर 1971 की शाम 4 बजकर 31 मिनट पर पाकिस्तानी सेना की पूर्वी कमांड के प्रमुख लेफ्टिनेंट जरनल नियाजी एवं वाइस एडमिरल खान के नेतृत्व में पूर्वी पाकिस्तान की सेना ने बिना शर्त सशस्त्र आत्मसमर्पण कर दिया I
संसार के युद्धों के इतिहास में आज तक यह सबसे बड़ा आत्मसमर्पण है I
जयहिंद ...
JWO (Retd) MP Bahuguna