गीता गुरूकुल

गीता गुरूकुल

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त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पितम् | जय श्री कृष्ण

"गीता गुरूकुल" का ध्येय श्रीमद्भगवद्गीता का प्रचार करने का है | एवं आप लोगों द्वारा श्री गीता जी पर जो अनुभव प्राप्त हुआ है वहीं आपके प्रति समर्पित है |

10/07/2025

।। श्रीहरि ।।

प्रश्न-क्या स्त्री किसी को गुरु बना सकती है ?

उत्तर-स्त्री को कोई गुरु नहीं बनाना चाहिये । अगर बनाया हो तो छोड़ देना चाहिये । स्त्री का पति ही उसका गुरु है । शास्त्र में आया है-

गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरु: ।
पतिरेव गुरु: स्त्रीणां सर्वस्याऽभ्यागतो गुरु: ॥
( पद्मपुराण, स्वर्ग○ ५१ । ५१, ब्रह्मपुराण ८० । ४७ )

'अग्नि द्विजातियों का गुरु है, ब्राह्मण चारों वर्णों का गुरु है, एकमात्र पति ही स्त्रियों का गुरु है और अतिथि सबका गुरु है ।'

वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः ।
पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ॥
( मनुस्मृति २ । ६७ )

'स्त्रियों के लिये वैवाहिक विधि का पालन ही वैदिक- संस्कार (यज्ञोपवित), पति की सेवा ही गुरुकुलवास और गृह-कार्य ही अग्निहोत्र कहा गया है।'

स्त्री को पति के सिवाय किसी भी पुरुष से किसी प्रकार का भी सम्बन्ध नहीं जोड़ना चाहिये । स्त्रियों से प्रार्थना है कि वे कभी किसी साधु के फेर में न पड़ें । आजकल बहुत ठगी, दम्भ, पाखण्ड हो रहा है । मेरे पास ऐसे पत्र भी आते हैं और भुक्तभोगी स्त्रियाँ भी आकर अपनी बात सुनाती हैं, जिससे ऐसा लगता है कि वर्तमान समय में स्त्री के लिये गुरु बनाना अर्थात् किसी भी परपुरूष से सम्बन्ध जोड़ना अनर्थ का मूल है ।

साधु को चाहिये कि वह किसी स्त्री को चेली न बनाये । दीक्षा देते समय गुरु को शिष्य के हृदय आदि का स्पर्श करना पड़ता है, जबकि संन्यासी के लिये स्त्री के स्पर्श का कड़ा निषेध है । श्रीमद्भागवतम में आया है कि हाड़-मांसमय शरीरवाली स्त्री का तो कहना ही क्या है, लकड़ी की बनी हुई स्त्री का भी स्पर्श न करे और हाथ से स्पर्श करना तो दुर रहा, पैर से भी स्पर्श न करे-

पदापि युवतीं भिक्षुर्न स्पृशेद् दारवीमपि ।
(श्रीमद्भा○ ११ । ८ । १३) ।

शास्त्र में यहाँतक कहा गया है-

मात्रा स्वस्त्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत् ।
बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ।।
(मनु○ २ । २१५)

'मनुष्य को चाहिये कि अपनी माता, बहन अथवा पुत्री के साथ भी कभी एकान्त में न रहे; क्योंकि इन्द्रियाँ बड़ी प्रबल होती हैं, वे विद्वान् मनुष्य को भी अपनी तरफ खींच लेती हैं ।'

संग न कुर्यात्प्रमदासु जातु योगस्य पारं परमारूरूक्षुः ।
मत्सेवया प्रतिलब्धात्मलाभो वदन्ति या निरयद्वारमस्य ।।
(श्रीमद्भा○ ३ । ३१ । ३९)

'जो पुरुष योग के परम पदपर आरूढ़ होना चाहता हो अथवा जिसे मेरी सेवा के प्रभाव से आत्मा-अनात्मा का विवेक हो गया हो, वह स्त्रियों का संग कभी न करे; क्योंकि उन्हें ऐसे पुरुष के लिये नरक का खुला द्वार बताया गया है ।'

विश्वामित्रपराशरप्रभृतयो वाताम्बुपर्णाशनास्तेऽपि स्त्रीमुखपंकजं सुललितं दृष्ट्वैव मोहं गताः ।
शाल्यन्नं सघृतं पयोदधियुतं भुञ्जन्ति ये मानवास्तेषामिन्द्रियनिग्रहो यदि भवेद्वन्ध्यस्तरेत्सागरे ।।
(भर्तृहरिशतक)

'जो वायु-भक्षण करके, जल पीकर और सूखे पत्ते खाकर रहते थे, वे विश्वामित्र, पराशर आदि भी स्त्रियों के सुन्दर मुख को देखकर मोह को प्राप्त हो गये, फिर जो लोग शाली धान्य ( सांठी चावल ) को घी, दूध और दही के साथ खाते हैं, वे यदि अपनी इन्द्रिय का निग्रह कर सकें तो मानो विन्ध्याचल पर्वत समुद्रपर तैरने लगा !'

ऐसी स्थिति में जो जवान स्त्रियों को अपनी चेली बनाते हैं, उनको अपने आश्रम में रखते हैं, उनका स्वप्न में भी कल्याण हो जायगा-यह बात मेरे को जँचती नहीं ! फिर उनके द्वारा आपका भला कैसे हो जायगा ? केवल धोखा ही होगा ।

'क्या गुरु बिना मुक्ति नहीं ?' पुस्तक से , पुस्तक कोड - 1072, विषय- गुरु-विषयक प्रश्नोत्तर, पृष्ठ-संख्या- ४८-५०, गीताप्रेस, गोरखपुर

परम श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज

20/08/2024
09/08/2024

।। श्रीहरि ।।

नागपंचमी-

यह व्रत श्रावण शुक्ल पंचमी को किया जाता है । लोकाचार या देश-भेदवश किसी जगह कृष्णपक्ष में भी होता है । इसमें परविद्धा पंचमी ली जाती है । इस दिन सर्पों को दूध से स्नान और पूजन कर दूध पिलाने से, वासुकीकुण्ड में स्नान करने, निज गृह के द्वार में दोनों ओर गोबर के सर्प बनाकर उनका दधि, दूर्वा, कुशा, गन्ध, अक्षत, पुष्प, मोदक और मालपुआ आदि से पूजा करने और ब्राह्मणों को भोजन कराकर एकभुक्त व्रत करने से घर में सर्पों का भय नहीं होता है । यदि 'ॐ कुरुकुल्ये हुं फट् स्वाहा' के परिमित जप करे तो सर्पविष दूर होता है ।

'व्रत-परिचय' पुस्तक से, पुस्तक कोड- 610, पृष्ठ-संख्या- १११, गीताप्रेस, गोरखपुर

27/07/2024

।। श्रीहरि ।।

श्रोता-हम गंगाजी में डुबकी लगाते हैं, यह सही है क्या ? गंगाजी में स्नान कैसे करना चाहिये ?

स्वामीजी-सही है मूसल स्नान करना । पहले साधारण जल से बाहर स्नान करके फिर गंगाजी में स्नान करना चाहिये । पहले स्नान करने के बाद ही मनुष्य गंगाजी में स्नान करने लायक होता है । गंगाजी में हमारी अशुद्धि नहीं जानी चाहिये । इसलिये गंगाजी में मूसल-स्नान करना चाहिये, शरीर को हाथ से रगड़ना नहीं चाहिये । गंगा-स्नान करके कपड़े से शरीर नहीं पोंछना चाहिये, प्रत्युत गंगाजल को शरीर के ऊपर ही सूखने देना चाहिये ।

गंगाजल को गरम नहीं करना चाहिये । इसलिये हम धूप में रखे हुए गंगाजल से स्नान करते हैं ।

शरीर में नाभि से नीचे के अंग अशुद्ध और ऊपर के अंग शुद्ध माने जाते हैं । अतः स्नान करते समय नाभि से नीचे बायाँ हाथ और नाभि से ऊपर दायाँ हाथ फेरना चाहिये ।

'बन गये आप अकेले सब कुछ' पुस्तक से, पृष्ठ-संख्या- ८१-८२, गीता प्रकाशन, गोरखपुर

परम श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज

21/07/2024

।। शिव ।।

विनय-पत्रिका

शिव-स्तुति

[ ३ ]

को जाँचिये संभु तजि आन ।
दीनदयालु भगत-आरति-हर, सब प्रकार समरथ भगवान ।। १ ।।

कालकूट-जुर जरत सुरासुर, निज पन लागि किये बिष पान ।
दारुन दनुज, जगत-दुखदायक, मारेउ त्रिपुर एक ही बान ।। २ ।।

जो गति अगम महामुनि दुर्लभ, कहत संत, श्रुति, सकल पुरान ।
सो गति मरन-काल अपने पुर, देत सदासिव सबहिं समान ।। ३ ।।

सेवत सुलभ, उदार कलपतरु, पारबती-पति परम सुजान ।
देहु काम-रिपु राम-चरन-रति, तुलसिदास कहँ कृपानिधान ।। ४ ।।

भावार्थ-भगवान् शिवजी को छोड़कर और किससे याचना की जाय ? आप दीनोंपर दया करनेवाले, भक्तों के कष्ट हरनेवाले और सब प्रकार से समर्थ ईश्वर हैं ।। १ ।। समुद्र-मन्थन के समय जब कालकूट विष की ज्वाला से सब देवता और राक्षस जल उठे, तब आप अपने दीनोंपर दया करने के प्रण की रक्षा के लिये तुरंत उस विष को पी गये । जब दारुण दानव त्रिपुरासुर जगत् को बहुत दुःख देने लगा, तब आपने उसको एक ही बाण से मार डाला ।। २ ।। जिस परम गति को संत-महात्मा, वेद और सब पुराण महान् मुनियों के लिये भी दुर्लभ बताते हैं, हे सदाशिव ! वही परम गति काशी में मरनेपर आप सभी को समानभाव से देते हैं ।। ३ ।। हे पार्वतीपति ! हे परम सुजान !! सेवा करनेपर आप सहज में ही प्राप्त हो जाते हैं, आप कल्पवृक्ष के समान मुँहमाँगा फल देनेवाले उदार हैं, आप कामदेव के शत्रु हैं । अतएव, हे कृपानिधान ! तुलसीदास को श्रीराम के चरणों की प्रीति दीजिये ।। ४ ।।

'विनय-पत्रिका से' कोड- 1701, पृष्ठ-संख्या- १२-१३, गीताप्रेस, गोरखपुर

श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजीरचित

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