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15/03/2020
14/03/2020

Right Direction...will give you Right Directions

06/03/2020

“ जब आप इस महान नियम के बारे में जान जाते है , तो इस बारे में भी जान जाते है कि आप अविश्वसनीय रूप से कितने शक्तिशाली हैं और आपमें अपने *विचारों* के माध्यम से अपनी मनचाही ज़िंदगी पाने की क्षमता है ।”

06/03/2020

जानिय ये जीवनका रहस्य

06/03/2020

श्रीमद्भगवद्गीता क्रम
.. गहरी अनुभूति के लिए सुझाव 15

मेरा सुझाव है कि किसी की भी करी हुई व्याख्या में बिना उलझे, उसमें निजी स्वार्थ के लिए निकाले अर्थों से बिना भ्रमित हुए , आप भगवान और मनुष्य के इस दिव्य संवाद को सम्पूर्ण, धाराप्रवाह और शब्दशः देखें , पढ़ें, सुने और मनन करें । भगवान में ही पूरी श्रद्धा से विश्वास रखते हुए , भगवान से ही उनके श्री मत को समझने और आत्मसात् करने की अपेक्षा रखते हुए, मनन - गुणन करते जाएँ । क्योंकि भगवान की आपको सीधी कही और सरल बात को, उनसे बेहतर कोई और कैसे समझा देगा ?
श्रीमद्भगवद्गीता को दो से तीन बार लगातार धाराप्रवाह पढ़ कर आप पायेंगे कि श्रीमद्भगवद्गीता के तीन आयाम हैं। ये आयाम हैं - सकारात्मक कर्म साधना ( अध्याय १ से ६), परम की श्रेष्ठ अभिव्यक्ति से भी आगे भगवान के पुरुषोत्तम स्वरूप को प्राप्त होने के लिए ध्यान साधना (अध्याय ७ से १२)

क्रमशः

परम - श्रद्धेय गुरुदेव तत्वदर्शी
गुरुसखा डॉ. श्री खुशदीप बंस

15/02/2020

श्रीमद्भगवद्गीता क्रम
.. गहरी अनुभूति के लिए सुझाव 15

तभी तो शुरू हो सकेगी आपकी यात्रा, अपनेआप को साक्षात साकार करने की, नहीं तो अपने बारे में अपनी मनघडंत छवि को ही सही मान कर, कि मैं तो यह हूँ, साकार करने की कोशिश में लगे दुःखों, पीड़ाओं और अनावश्यक विरोधों से छटपटाते हुए, कहीं ना पहुँचने वाला चिन्तन करते रहते हैं कि भूल कहाँ लग रही है ? अपनी मनघडंत छवि से भ्रमित अपना ही और नुकसान करते रहते है।
अपने बारे में इसी मनघडंत अवधारणा को श्रीमद्भगवद्गीता १८.५९ में भगवान अहंकार कहते है । अहम् + कार अर्थात् मैं ये करने वाला हूँ, परन्तु आप जो हो ही नहीं वो साकार कैसे करोगे? जो हो वह साकार होगा ही और ‘ आपके बस में भी वही साकार करना है ‘२.४७|
जब अपने बारे में कोईभ्रमित होता है तभी दुःखों, पीड़ाओं और विरोधों का सामना करता है | श्रीमद्भगवद्गीता में स्वयं भगवान यही स्पष्ट करते है और रणभूमि में लड़ाई के ऐन मौके पर, इसी भ्रमित स्थिति के कारण मन गिराए अर्जुन को, इसी में से निकाल कर उसे उसके स्व भाव में पुनः स्थापित कर देते है |

क्रमशः

नमन - परम - श्रद्धेय गुरुदेव तत्वदर्शी
गुरुसखा डॉ. श्री खुशदीप बंसल

13/02/2020

श्रीमद्भगवद्गीता क्रम

.. गहरी अनुभूति के लिए सुझाव 15

मैं कौन हूँ ? मैं क्या हूँ और क्या नहीं हूँ मैं ?
यह जान जाना, पहचान जाना, इतना ज़्यादा सुखद और आनंदित करने वाला है कि आप अपने आपे से प्रेम में पड़ जाते हो । बिना आपे से प्रेम किये किसी अन्य से प्रेम करना कैसे संभव है ? फिर भगवान को प्रेमपूर्वक अर्पित हो पाना तो बहुत ही दूर की बात है । जो पाया ही नहीं उसे बांटना कैसे संभव है ? पाने के लिए ज़रूरी है, अति ज़रूरी ये जानना और पहचानना कि कौन हूँ मैं ? क्या हूँ मैं और क्या नहीं हूँ मैं ?

क्रमशः


नमन परम - श्रद्धेय गुरुदेव तत्वदर्शी
गुरुसखा डॉ. श्री खुशदीप बंसल

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