02/05/2021
अब गाँव और शहर में कोई सीमाएं नहीं रही। यहाँ भी हालात वही है जो और कहीं है।
वो समय भी चला गया, जब क्या फ़र्क पड़ता था कि दुनिया में क्या हो रहा है। अपनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हम किसी से भी लड़ने के लिए तैयार है, चाहे विषाणु हो या विष्णु! लेकिन.....
इस बीच हम बहुत कुछ भूल रहे है। हम भूल रहे है कि हम गाँववाले है। हमारी सभ्यता स्वागत-सत्कार की है, तिरस्कार की नहीं। इस समय शायद स्वागत ना कर सकें, लेकिन कम से कम तिरस्कार तो न करें। विषाणु से लड़ना है लोगों से नहीं। आज नहीं तो कल इसे भी इतिहास होना है, क्यों न हम इतिहास लिखें, सहयोग का, संशक्ति का, उदारता का। हमे हमारे गाँववाला होने का परिचय देने का सही समय यही है।
अपनों में अपने गाँववालो को भी शामिल करें।
स्वस्थ रहें, सशक्त रहें।
जय गोगासर