26/04/2020
शीर्षक आप सुझाइए
आज अक्षय तृतीया के दिन ईश्वर की प्रेरणा से मानव जीवन में विचारों व अनुभूतियों के कारण उत्पन्न होने विकारो को जानने व समझने के लिए एक श्रंखला का लेखन करने का प्रयास कर रहा हूँ । हो सकता हो यह मेरा दुस्साहस मेरी अज्ञानता व अति आत्मविश्वास का फल हो । यह मेरा प्रथम प्रयास है, अत: आप लोग मेरी भाषा , व्याकरण व वर्तनी की त्रुटियों को उसी प्रकार क्षमा कर देगें जिस प्रकार एक माता अपने शिशु की तोतली बोली के शब्दों के स्थान पर भाव पर ध्यान देकर उसे कुछ नहीं कहती ।
हमारा शरीर पाँच महाभूत पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश व पाँच महाप्राण प्राण, अपान, दान, समान, व्यान से मिलकर बना है । हम इस संसार को पाँच ज्ञानेन्द्रियों त्वचा , आँख , कान , नाक व जिव्हा व पाँच कर्मेन्द्रियों कर्मेंद्रियाँ मुख, हाथ, पैर, मलद्वार तथा जननेंद्रिय तथा ग्यारहवें मन के माध्यम से जानते हैं । ज्ञानेन्द्रियाँ क्रमश: स्पर्श(महसूस) ,देखने, सुनने, सूंघने व स्वाद का अनुभव करती हैं । कर्मेंद्रियाँ क्रमश: बोलने, ग्रहण करने, चलने, मल त्यागने तथा संतानोत्पादन का कार्य करती हैं।
बाह्य इंद्रियाँ द्वारा गंध, रस, रूप स्पर्श तथा शब्द का अनुभव मन के द्वारा किया जाता है। कर्मेन्द्रियों की क्रिया आदि का नियंत्रण भी मन के द्वारा ही होता है । सुख दु:ख आदि भीतरी विषय की अनुभूति भी मन ही करता है। मन हृदय के भीतर रहनेवाला तथा अणु परमाणु से युक्त माना जाता है। अगर हम देखें तो सारा खेल मन का है। सारी समस्या की जड़ में मन ही है, अगर हम इस मन को किसी प्रकार से नियंत्रित कर लें तो सारा झंझट ही मिट जायेगा । मन के विकार को जानने के पूर्व हम पहले इन इन्द्रियों की कार्यप्रणाली को जान लें। आज हम दो बातों को जानने का प्रयास करेंगे।
अनुभव व अनुभूति
हम जिस दिन इन दोनो को जान जायेंगे बस उसी दिन हमारी यात्रा शुरू हो जायेगी, जबतक इसको नही जाना तो समझो हमारी यात्रा उस पेंडुलम की तरह है जो चलता तो बहुत है पर पहुँचता कहीं नही। आइए एक उदाहरण को लें एक बार एक व्यक्ति अपनी अपने पोते को गोद में लेकर दुलरा रहा था यकायक उसे कुछ गीला गीला सा लगा इस अनुभव को त्वचा ने मस्तिष्क को संवेदना भेजी । इस अनुभव को मन ने अनुभूति में परिवर्तित कर दिया। मन ने वात्सल्य की अनुभूति को मन में उत्पन्न कर दिया । देखा मन का खेल , अब मन इस अनुभूति को पुन: आनन्द में बदलकर उस आनन्द की अनुभूति का आभास कराता है। अब मन इस आनन्द की अनुभूति के साथ क्रिया को प्रारम्भ कर देता है। अब बाबा जी की जिव्हा व मुख गतिमान हुआ और बाबा जी बोले “ अले अले बेता ये क्या कल दिया बाबा पल गंगाजल छिलक दिया ...... अरे लो लो इसे ले जाओ इसकी नेपकिन बदलो कहीं इसके दाने न पड़ जाएं। ........... जरा संभाल कर बदलना, थोड़ा सिनेटाइजर लगा देना, कहीं इंफेक्सन न हो जाए ।“ देखा मन का खेल । जिस दिन हम इस खेल को जान गये, बस हो गया काम। आइए एक और उदाहरण लें एक बार एक घर जिसमे सभी बच्चे बड़े हो चुके थे, वात्सल्यवश बच्चे पड़ोसी के एक छोटे बच्चे को ले आए और उसे दुलराने लगे, यकायक बाबा जी की नजर सोफे की तरफ गई, बाबा जी ने हाथ बढ़ाकर सोफे को छूकर देखा, बाबा जी को गीला गीला लगा । इसबार भी त्वचा ने गीलेपन के अनुभव को मस्तिष्क को भेजा । मन का खेल फिर चालू हो गया । इसबार भी मन ने अनुभव को अनुभूति में बदला , इसबार मन ने वात्सल्य के स्थान पर क्रोध की अनुभूति का प्रादुर्भाव किया । बाबा जी के मन मे पल पल अनुभूतियों के ज्वार भाटा की तरह क्रोध व घ्रणा की तरंगे उठ रही थी। अब मन ने बाबा जी के क्रिया का संदेश भेजना शुरू किया । बाबा जी की आँखें लाल हो गई, ओठ फड़कने लगे, आँखों में पुतलियां तो ऐसे नाच रहीं थी जैसे समुद्र में भवंर में फसी कोई नाव । बाबा जी की दसा देखकर बच्चों की आँखों ने दर्शन का अनुभव मस्तिष्क को भेजा । इस अनुभव को बच्चों के मन ने एक नई अनुभूति में बदला। बच्चो के मन ने भय व पीड़ा की अनुभूति का प्रस्फुटन किया । अब बाबा जी के मन मे एक और अनुभूति ने जन्म लिया, यह अनुभूति कुछ हिसाब किताब से सम्बन्धित थी। अब बाबा जी का मन हिसाब लगाने में लग गया ,“कितना महंगा सोफा खराब कर दिया ........ बताओ यूरिन में कितने जर्म होते हैं ........... अगर ड्राईक्लीन नहीं कराया पता नहीं क्या इंफेक्सन फैला दे....... अब बताओ ड्राईक्लीन क्या मुफ्त में होती है..... न जाने कितने पैसे लगेंगे .......... पैसे क्या पेड़ में उगते हैं....... बच्चों को कमाना पड़े तो पता लगे......... ये पड़ोसी भी हैं, कितनी बार समझाया कि बच्चा छोटा है डाईपर पहनाया करो ........ “ बाबा जी मन ही मन में बोल रहे थे , क्योंकि मन में एक अनुभूति और चल रही कि अगर बोल दिया तो शाम का खाना न मिले।
इन दो उदाहरणों के माध्यम से मैनें अनुभव व अनुभूति की एक झलक दिखाने का प्रयास किया है । हो सकता है आपने इन दोनो शब्दों के माध्यम से इन्द्रियों व मन की प्रक्रिया को समझा हो । आज के अंक मे अधिक नहीं लिखेंगे हो सकता है कि आप का मन भी कोई नई अनुभूति का स्वागत कर ले और अगले अंक को बिना पढ़े डिलीट मार दे .
गुमनाम
आपकी प्रतिक्रिया हमारे लिया दिशासूचक होगी शेष अगले अंक में...................................