29/12/2023
झारखंड की सदियों पुरानी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं के खुलेंगे कई राज, ASI को खुदाई से मिले कई साक्ष्य
झारखंड की सभ्यता-संस्कृति हजारों वर्ष पुरानी है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की ओर से राज्य के कई हिस्सों में ऐतिहासिक स्थलों के रख-रखाव और खुदाई से कई ऐसे ऐतिहासिक साक्ष्य भी मिल रहे है, जिससे इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों के रहन-सहन और परंपरा समेत इतिहास के बारे में कई जानकारियां मिल रही है। एएसआई की ओर से हाल ही में चतरा जिले के पत्थलगड्डा प्रखंड अंतर्गत ओबरा स्थित मेगालिथ साइट में खुदाई की गई। यहां से घड़ा में अस्थियां, आभूषण और कई औजार मिले हैं, जिससे सदियों पुरानी सभ्यता के बारे में कई जानकारियां सामने आएगी।
दुनिया भर में चल रहे कई वैज्ञानिक अध्ययनों से यह साबित हो चुकी हैं कि पृत्वी के जिन इलाकों की उत्पत्ति सबसे पहले हुई, उनमें झारखंड का हिस्सा सबसे पुराना हैं। भूवैज्ञानिक इसे लेकर लगातार अब भी गहन अध्ययन में जुटे हैं। वहीं इस क्षेत्र की सभ्यता-संस्कृति और इतिहास को समझने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की ओर से हाल के दिनों में चतरा के ओबरा इलाके में मेगालिथ साइट में खुदाई का कार्य किया गया हैं। इस खुदाई में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की टीम को घड़ा में कई अस्थियों के अवशेष के अलावा विभिन्न तरह के औजार और लोहे-तांबे और पत्थर के जेवरात मिले हैं। जो काफी पुराने हैं। यह कितना पुराना है, इसकी पूरी जानकारी कार्बन डेटिंग और अन्य अध्ययन से प्राप्त रिपोर्ट के बाद ही मिल पाएगी।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के झारखंड इकाई के प्रमुख और अधीक्षक पुरातत्वविद् डॉ. राजेंद्र देहुरी के नेतृत्व में एएसआई की एक टीम पिछले दिनों चतरा जिले के पत्थलगड्डा प्रखंड स्थित ओबरा में खुदाई का काम कर चुकी है। एएसआई की टीम को कई पुराने औजार, आभूषण, पत्थर और घड़ा में रखे अस्थियों के अवशेष मिले हैं। ये आभूषण तांबा और लोहे के हैं। कुछ अंगूठियां ताम्रपाषाण (तांबा) युग के हैं, वहीं कुछ लोहे के जेवरात मिले हैं। इसके अलावा माला, मनके और पत्थर भी मिले हैं।
अधीक्षण पुरातत्वविद् डॉ. राजेंद्र देहुरी का कहना है कि पत्थलगड्डा से करीब 4 किलोमीटर दूर ओबरा इलाके में खुदाई से कई चीजें मिली हैं, लेकिन इसकी प्राचीनता को लेकर अभी वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन का काम किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि मेगालिथ साइट पर खुदाई के दौरान घड़ा में कई अस्थियों के अवशेष जरूर मिले हैं, लेकिन इसे जलाने के बाद घड़ा में सुरक्षित रखा गया, या फिर दफन कर देने के बाद फिर निकाल कर उसे घड़ा में रखा गया। इसे लेकर वैज्ञानिक अध्ययन का सिलसिला अभी जारी रहने की संभावना हैं। उन्होंने कहा कि जब खुदाई के दौरान कोई सिक्का या अभिलेख नहीं मिलता है, तो उसकी प्राचीनता के बारे में जानकारी हासिल करना मुश्किल हो जाता है। लेकिन जिस तरह से तांबे और लोहे कई आभूषण और औजार मिले हैं, उसके अध्ययन से आने वाले समय में जल्द ही कई वैज्ञानिक तथ्य उभर कर सामने आएंगे।
डॉ. राजेंद्र देहुरी ने कहा कि घड़े में जो अस्थियों के अवशेष मिले हैं, वे किसी महिला, पुरुष या बच्चे के हैं। इसका भी खुलासा हो पाएगा। साथ ही यह भी पता सकेगा कि उस काल में किसी विशेष व्यक्ति को ही इस तरह से दफनाया जाता था या उस समाज में सभी की अंत्येष्टि करने का यही तरीका था। वैज्ञानिक अध्ययन से उस समाज के लोगों का रहन-सहन, खान-पान और सभ्यता-संस्कृति के बारे में कई जानकारियां मिल पाएगी।