22/06/2026
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि हिरासत में मारपीट, अवैध निरुद्धीकरण और मौत जैसे कृत्यों को सरकारी कर्तव्य का हिस्सा नहीं माना जा सकता इसलिए ऐसे मामलों में पुलिसकर्मियों के खिलाफ अभियोजन चलाने के लिए सरकार की पूर्व अनुमति (सैंक्शन) आवश्यक नहीं है।
जस्टिस गजेन्द्र सिंह की एकलपीठ ने दो पुलिस कांस्टेबलों द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए यह स्पष्ट किया कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी के कार्य और उसके आधिकारिक कर्तव्य के बीच उचित और तार्किक संबंध नहीं है, तो उसे दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 (वर्तमान में बीएनएसएस की धारा 218) का संरक्षण नहीं मिल सकता।
मामला इंदौर जिला न्यायालय में कार्यरत 24 वर्षीय चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी पंकज वैष्णव की हिरासत में हुई मौत से संबंधित था। अभियोजन के अनुसार 19 दिसंबर 2015 को स्कूटर चोरी के एक मामले में पूछताछ के लिए पंकज वैष्णव को एमआईजी थाना, इंदौर लाया गया था, जहां उसी रात उसकी मृत्यु हो गई।
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 176 के तहत अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा की गई जांच में मृत्यु को आपराधिक मानव वध (Culpable Homicide) माना गया। बाद में सीआईडी जांच के पश्चात दो कांस्टेबलों तथा तत्कालीन थाना प्रभारी के विरुद्ध आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण, अवैध निरुद्धीकरण और अभिलेखों में हेरफेर सहित विभिन्न आरोपों में आरोपपत्र दाखिल किया गया।
पुलिसकर्मियों ने तर्क दिया कि वे जांच कार्य कर रहे थे और कथित घटनाएं उनके आधिकारिक कर्तव्य से जुड़ी थीं, इसलिए उनके खिलाफ मुकदमा चलाने से पहले सरकारी अनुमति आवश्यक है। इसके समर्थन में उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णयों का हवाला भी दिया।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि थाने की डायरी में पंकज वैष्णव को हिरासत में लेने का कोई उल्लेख नहीं था। जांच में यह भी सामने आया कि हिरासत के दौरान उसके साथ मारपीट की गई थी। एम्स भोपाल की मेडिकल राय में भी मृत्यु से पूर्व अंडकोष क्षेत्र में चोट का उल्लेख किया गया था।
अदालत ने कहा कि जांच रिपोर्ट के अनुसार मृतक के कपड़े उतरवाए गए, उससे मारपीट की गई, उसे प्रताड़ित किया गया तथा उसके परिवार को हिरासत की सूचना तक नहीं दी गई। मृत्यु के बाद घटना को छिपाने और रिकॉर्ड में हेरफेर करने के भी आरोप सामने आए।
हाईकोर्ट ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने कई मामलों में यह सिद्धांत स्थापित किया है कि सरकारी कर्मचारी को संरक्षण तभी मिलेगा जब उसके कार्य और आधिकारिक कर्तव्य के बीच "उचित संबंध" हो। लेकिन हिरासत में किसी व्यक्ति के साथ मारपीट करना और उसकी मृत्यु के बाद घटना को छिपाने का प्रयास करना किसी भी प्रकार से वैध पुलिस कर्तव्य का हिस्सा नहीं हो सकता।
अदालत ने कहा कि यह ऐसा मामला नहीं है जहां पुलिस भीड़ नियंत्रण या कानून-व्यवस्था बनाए रखने के दौरान बल प्रयोग कर रही हो। यहां आरोप ऐसे व्यक्ति पर हिंसा के हैं जो पहले से पुलिस की हिरासत में था।
निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय की उन टिप्पणियों का भी उल्लेख किया गया जिनमें कहा गया है कि कानून के शासन वाले सभ्य समाज में पुलिस हिरासत में मृत्यु सबसे गंभीर अपराधों में से एक है। हिरासत में मौत मानवाधिकारों के सबसे गंभीर उल्लंघनों में से एक मानी जाती है।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि आरोपित पुलिसकर्मी धारा 197 सीआरपीसी/धारा 218 बीएनएसएस के संरक्षण के पात्र नहीं हैं। परिणामस्वरूप ट्रायल कोर्ट द्वारा पूर्व अनुमति की मांग अस्वीकार करने के आदेश को बरकरार रखते हुए पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई।
केस शीर्षक-
Rajkumar Dwivedi and Others v. The State of Madhya Pradesh and Others
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