17/12/2025
अधिकांश छात्र कक्षा 11 की शुरुआत JEE Advanced में टॉप रैंक के सपने के साथ करते हैं, लेकिन कक्षा 11 के अंत तक आते–आते ज़मीनी हकीकत खुद ही सामने आने लगती है। छात्र समझने लगता है कि उसका वर्तमान स्तर इस लक्ष्य से मेल नहीं खा रहा। यहीं से लक्ष्य बदलता है—JEE Advanced से JEE Main की ओर। कक्षा 12 के middle तक पहुँचते–पहुँचते IIT का सपना पीछे छूट जाता है और प्राथमिक चिंता बन जाती है किसी तरह JEE Main में सम्मानजनक स्कोर करना और उससे भी ज़्यादा ज़रूरी, कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षा पास करना। विडंबना यह है कि इस पूरे सफ़र में कोचिंग संस्थान कभी यह डेटा साझा नहीं करते कि JEE Advanced या NEET की तैयारी कर रहे कितने छात्र अंततः बोर्ड परीक्षा में ही असफल हो जाते हैं, या कितने छात्र इतने हताश हो जाते हैं कि वे कोचिंग जाना, टेस्ट देना और पढ़ाई ही छोड़ देते हैं। वास्तविकता यह है कि ऐसे छात्रों का प्रतिशत कई बार 50% से भी अधिक होता है, लेकिन यह सच्चाई कभी पोस्टर या विज्ञापन का हिस्सा नहीं बनती।
यह चुप्पी संयोग नहीं है। सिस्टम केवल टॉप रैंकर्स और सफल चयन की कहानियों को सामने रखता है, जबकि वह बड़ी संख्या में मौजूद उन छात्रों को अदृश्य बना देता है जो अंततः सिर्फ़ बोर्ड पास करने की जद्दोजहद में फँस जाते हैं। न यह बताया जाता है कि कितनों को आख़िरी महीनों में बोर्ड–फोकस्ड क्रैश कोर्स करने पड़ते हैं, न यह कि कितनों का आत्मविश्वास इस प्रक्रिया में टूट जाता है। यदि यह डेटा ईमानदारी से सामने रखा जाए, तो बहुत से अभिभावक कक्षा 11 के अंत में ही अधिक practical और logical निर्णय ले सकें।
हकीकत यह भी है कि ऐसे कई छात्र होते हैं जिनकी औसत कोचिंग टेस्ट परफॉर्मेंस 30% से नीचे रहती है, जिन्होंने कभी Exercise-1 से आगे के सवाल तो छोड़िए, Exercise-1 भी ठीक से हल नहीं किए होते और जिनके बेसिक कॉन्सेप्ट्स अब भी डगमगा रहे होते हैं। इसके बावजूद ऐसे छात्रों को भी JEE Advanced का कोर्स दे दिया जाता है। इसे अगर मेडिकल उदाहरण से समझें, तो तस्वीर और स्पष्ट हो जाती है। मान लीजिए किसी मरीज को साधारण सर्दी या चार दिनों से नाक बहने की समस्या है, जहाँ सीमित दवा या छोटा एंटीबायोटिक कोर्स पर्याप्त है। लेकिन यदि उसे ज़रूरत से ज़्यादा स्ट्रॉन्ग दवाएँ और लंबा इलाज दे दिया जाए, तो लाभ के बजाय नुकसान की संभावना बढ़ जाती है।