#लशुनं_गृञ्जनं_चैव_पलाण्डुं_कवकानि_च ।
#अभक्ष्याणि_द्विजातीनांममेध्य_प्रभावानि_च।। (मनुस्मृति 5,5। विष्णुस्मृति अध्याय 51, गौतम स्मृति अध्याय 15,आदि स्मृतियां।भविष्यपुराण ब्राह्म 186,22 व् अन्य पुराण।)
लहसुन,गाजर(वैसे गृञ्जन शब्द के तीन अर्थ हैं - गाजर,चुकन्दर और गांजा पर सभी अनुवादकों ने केवल गाजरअर्थलियाहै।),प्याज,कुकुरमुत्ता,तथा अपवित्र स्थान पर उत्पन्न शाक अभक्ष्य हैं।
हमारे कई धर्म शस्त्रों के अनुसार गाजर अभक्ष्य के अंतर्गत है
साधक के लिए वर्ज्य है । जो शरीर को ही सबकुछ समझते हैं
आयुर्वेद उनके लिए ही है । रोग घटे कुछ औषधि खाई ।
शंख भस्म अस्थि का ही भस्म है । काय प्रेमी लेते ही हैं ।
गृञ्जन किसी भी अर्थ में हो वह अभक्ष्य ही है||
#स्वाद_एवं_स्वार्थ_के_लिए_शास्त्र_नही_है_अनुशासन_के_लिये_है!!
Shree hatkesh astrology center
Hari om
03/05/2025
🌹🙏दुर्गासप्तशती के पाठ के विषय मे एक सामान्य विषय एवं पाठ क्रम :-
कामना भेद से विभिन्न प्रकार से दुर्गा पाठ किए जाते हैं, जो कि निर्णय सिन्धु मे उल्लिखित है कि दुर्गाभक्तितर गिणी के अनुसार इस प्रकार से हैं :-
01 :- महाविद्या क्रम (सर्वकामना हेतु) :- इसमे क्रमशः प्रथम, मध्यम व उत्तर चरित्र का पाठ किया जाता है !
02:- महातंत्री (शत्रु नाश, लक्ष्मी प्राप्ति हेतु) :- उत्तर चरित्र, प्रथम चरित्र, मध्यम चरित्र का पाठ किया जाता है !
03:- चन्डी (शत्रु नाश हेतु) :- उत्तर, मध्यम, प्रथम चरित्र का पाठ किया जाता है !
04:- महाचण्डी (शत्रु नाश, लक्ष्मी प्राप्ति हेतु) :- उत्तर चरित्र, प्रथम चरित्र, मध्यम चरित्र का पाठ किया जाता है !
05:- रूप दीपिका ( विजय एवं आरोग्यता के लिए) :- रूपं देहि जयं देही यशो देही........ इस अर्ध श्लोक से संपुटित करके प्रथम, उत्तर, मध्यम चरित्र का पाठ करना चाहिए !
इसके अलावा तंत्र शास्त्रों मे निम्न क्रम उल्लिखित हैं :-
01:- निकुंभला ( रक्षा, विजय हेतु) :- शूलेन पाहिनो देवी............ इस मंत्र से संपुटित करके मध्यम, प्रथम, उत्तर चरित्र का पाठ करना चाहिए !
02:- योगिनी (बालोपद्रव शमन हेतु) :- प्रतेक चरित्र से पहले संबन्धित योगिनियों का पाठ एवं प्रटेक मंत्र को वं, शम, षम, सं से संपुटित करके पाठ करें !
03:- विलोम (शत्रु नाश हेतु) संहार क्रम :- तेहरवें अध्याय के अंतिम श्लोक से प्रारम्भ कर प्रथम अध्याय के प्रथम श्लोक पर समाप्त करें ! अर्थात पूरा उल्टा पाठ करें !
04:- प्रतिअध्याय विलोम लोम पाठ ( उत्कीलन क्रम) :- इसमे इस करम से पाठ होगा तेहरवां-प्रथम, बारहवां-दूसरा, ग्यारहवाँ-तीसरा, दसवां-चौथा, नवम-पंचम, आठवाँ-छठा, सातवाँ विलोम ओर फिर सातवाँ ही अनुलोम पाठ करें !
05:- चतुःषष्ठी पड़ी युक्त :- (क) :- श्री सूक्त या पुरुसूक्त का पाठ प्रटेक अध्याय के साथ करें !
(ख) :- महिषासुर वध के समय 64 देवियों का प्राकाट्य भी लिखा है, उनकी नामावली का पाठ भी प्रति अध्याय के साथ किया जा सकता है !
06:- तंत्रात्मक सप्तशती :- प्रतेक मंत्र का विनियोग न्यास ध्यान युक्त पाठ करें !
07:- इसके अलावा अन्य मंत्रों जैसे बगलामुखी, महामृतुंजय आदि से संपुटित करके भी अनेक कामनाओं की पूर्ति की जाती है !
नोट :- (क) चरित्रों का वर्णन इस प्रकार से है :- प्रथम चरित्र ( प्रथम अध्याय), मध्यम चरित्र ( दूसरा-तीसरा-चौथा अध्याय), उत्तर चरित्र (पाँचवाँ- छठा-सातवाँ-आठवाँ-नौवाँ-दसवाँ-ग्यारहवाँ-बारहवाँ-तेरहवाँ अध्याय) !
(ख) प्रथम अध्याय के पूर्व (पहले) कवच, अर्गला, कीलक, नवार्ण मंत्र जप व रात्रि सूक्त का पाठ करें व अंत मे देवीसूक्त नवार्ण मंत्र जप एवं त्रिरहस्यों का पाठ करें !
दुर्गा पाठ के छः मुख्य अंग माने गए हैं :-
01-कवच, 02-अर्गला, 03-कीलक, 04-प्राधानिक-रहस्य, 05-वैकृतिक-रहस्य, 06-मूर्ति-रहस्य !
सप्तशती के प्रसिद्ध टीकाकार नागोजी भट्ट का मत है कि :- इस प्रकार पाठ करें कवच, अर्गला, कीलक, का पाठ करें व फिर ऋस्यादिन्यास के सहित नवार्ण मंत्र जप, इसके बाद रात्रि सूक्त ओर फिर पाठ तथा अंत मे देविसूक्त का पाठ तदनंतर 108 बार नवर्ण मंत्र का जप करें !
एक मत यह भी है की सप्तशती का पाठ करने से पूर्व उसका शापोद्धार, उत्कीलन, आदि करना चाहिए !
एक मत है की पाठ से पूर्व मार्कन्डेय पुराणोक्त सरस्वती सूक्त का भी पाठ करें !
रावण के मत से निकुंभला पाठ अति श्रेष्ठ है !
मेरे व्यक्तिगत मत से सप्तशती क्रम इस प्रकार रखना श्रेष्ठ है पहले माध्यम चरित्र, फिर प्रथम चरित्र, ओर फिर उत्तर चरित्र का पाठ करना चाहिए क्यूंकि इस क्रम से पाठ करने पर पाठ का उत्कीलन भी हो जाता है ओर अधिक सफलता भी मिलती है !
सम्पूर्ण दुर्गा पाठ का क्रम (सुप्रसिद्ध टिकाओं के आधार पर एवं निर्णय सिंधु के आधार पर ):-
01:- सर्व प्रथम आचमन, प्राणायाम, पवित्रीकरण, आसन पवित्रीकरण आदि करें |
02:- फिर संकल्प करें |
03:- फिर ब्रह्मादि शाप विमोचन करें यह अति आवश्यक है क्यूँ की लिखा है की - "इन (ब्रह्मादि शाप विमोचन ) मंत्रों को पढ़ कर ही पाठ करें दिन या रात अपनी सुविधा अनुसार पाठ करें, तथा जो इन मंत्रों को पढे या जाने बिना पाठ करता है वह स्वयं एवं यजमान के नाश का कारण बनता
है |
04:- इसके बाद सिद्धकुंजिका-स्तोत्र का पाठ करें !
05:- तत्पश्चात कवच, अर्गला, कीलक का पाठ करें |
06:- फिर ऋष्यादि न्यास पूर्वक नवार्ण मंत्र का जप करें |
07:- फिर तन्त्रोक्त रात्रि सूक्तम का पाठ करें |
08:- इसके पश्चात सप्तशती न्यास व ध्यान करें |
09:- फिर चरित्र (अध्याय) पाठ करें, अध्याय पाठ अपनी सुविधा अनुसार क्रम, उत्क्रम, चंड, महाचण्डी आदि जो भी क्रम उचित लगे उस अनुसार करें |
10:- चरित्र (अध्याय) पाठ समाप्ति के बाद उत्तर न्यास करें तथा तन्त्रोक्त देवी सूक्त का पाठ
करें |
11:- तत्पश्चात नवार्न मंत्र का जप करें तथा त्रिरहस्य ( प्राधानिक-रहस्य, वैकृतिक-रहस्य, मूर्ति-रहस्य) का पाठ करें |
12:- फिर उत्तर पूजन एवं क्षमापन स्तोत्र का पाठ करें |
इतना ही पाठ आवश्यक है |
संपुट कैसे लगाएँ :-
संपुट तीन प्रकार से लगाए जाते हैं 01-उदय-संपुट, 02-अस्त-संपुट, 03-अर्द्ध-संपुट |
01:- उदय संपुट :- इस संपुट मे पहले संपुट मंत्र फिर सप्तशती मंत्र फिर संपुट मंत्र सीधा लगाया जाता है | जैसे :- ॐ एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः | ऐं मार्कन्डेय उवाच | एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः ||
02:- अस्त संपुट :- इस संपुट मे पहले संपुट मंत्र सीधा फिर फिर सप्तशती मंत्र फिर संपुट मंत्र उल्टा लगाया जाता है | जैसे :- ॐ एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः | ऐं मार्कन्डेय उवाच | क्षत्रियर्षभःसुरथःलब्ध्वा वरं देव्या एवं ॐ ||
03:- अर्द्ध संपुट :- कामना मंत्र को सिर्फ एक बार पहले या अंत मे पढ़ा जाता है | जैसे :- ॐ एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः | ऐं मार्कन्डेय उवाच |
अथवा
ॐ ऐं मार्कन्डेय उवाच | एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः |
इन तीन प्रकार के संपुटों के विधान का विवरण श्री शिव-पार्वती के संवाद के अंतर्गत रुद्र यामलतंत्रादि ग्रन्थों मे प्राप्त होता है |
दुर्गा पाठ मे वृद्धि (बढ़ते) क्रम का विचार :-
वृद्धि पाठ पाँच दिन का होता है, यह क्रम बिना संपुट के ही संभव है | प्रथम दिन एक पाठ, दूसरे दिन दो, तीसरे दिन तीन, चौथे दिन चार इस प्रकार चार दिन मे एक ब्राह्मण द्वारा दस पाठ किए जाते है ओर दस ब्राह्मणों द्वारा शतचंडी का विधान पूरा हो जाता है | इसके साथ ही एक मूल पाठ के साथ 10 माला अलग से नवार्ण मंत्र जप करने का भी विधान है | तथा पांचवें दिन दशांश हवन दशांश ब्राह्मण भोजन व कुमारिका भोजन करवाएँ ! विशेष जानकारी एवं प्रयोग के लिए संपर्क करें 9106538353
17/11/2024
बगलामुखी वशीकरण साधना विधि :-
“ #बगलामुखी साधना और सिद्धी” ..एक ऐसी साधना जिससे किसी भी तरह के मनवांछित फल की प्राप्ति होती है | इस साधना को सिद्ध करने के बाद उपासक अपनी अभिष्ट सिद्धि को प्राप्त करने में सक्षम हो जाता है | कई विद्वानों के अनुसार किसी भी साधक के अभिलाषा की पूर्णता हेतु यह साधना अन्य किसी साधना से सर्वोपरी है | मनवांछित संतान की प्राप्ति, धन की प्राप्ति, बंदीगृह (कारागार) से मुक्ति, किसी को भी वश में करना, किसी भी बैरी(दुश्मन) पर विजय, मारण, आकर्षण इत्यादि प्रयोगों के लिए इस साधना को अपनाया जाता है | अगर, आप भी इसी तरह की कुछ इच्छा रखते हैं तो इस आर्टिकल के द्वारा सहायता प्राप्त करें | यहां पर आपको जानकारी मिलेगी बगलामुखी साधना और सिद्धि /मंत्र प्रयोग/ शाबर मंत्र साधना/ वशीकरण प्रयोग इत्यादि के विषय में |
बगलामुखी #वशीकरण साधना विधि
बगलामुखी वशीकरण साधना विधि
बगलामुखी साधना और सिद्धी
सामग्री–इस साधना के लिए खुले हुए स्थान का चुनाव ना करें अर्थात आसमान के नीच खुले में साधना ना करें | अगर खुला स्थान हो तो ऊपर से चादर अथवा तिरपाल आदि से चंदोबा (टेंट) तान लें | स्थान की शुद्धता का ध्यान रहे | वस्त्रों के चुनाव में पीले रंग का ध्यान रखें | फूल भी पीले रंग के ही होने चाहिए | जप के लिए माला ले हल्दी की गांठ की बनी हुई | आसन भी पीला रंग का ही लें | भोजन में भी पीले रंग की वस्तुओं का विशेष ध्यान रखें |
मंत्र –” ओम् ह्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्रीं ओम् स्वाहा”
विधि– सबसे पहले किसी पाटे/चौकी पर पीले रंग का कपड़ा बिछा कर उस पर अष्टदल का कमल बनाएं पीले चावलों द्वारा| यह करने के बाद इसपर मां बगलामुखी की तस्वीर अथवा यंत्र को स्थापित करें | अब पूजन करें षोडसी का | उसके बाद जाप करना प्रारंभ करें | जाप संख्या आप अपने कार्य के अनुसार दस हजार अथवा एक लाख तक रखें | इसे आप ७, ९, ११ या २१ दिनों के भीतर पूरा करें | लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि हर दिन जाप की संख्या को उतना ही रखें जितना संख्या अपने पहले दिन रखी थी, इसमें परिवर्तन कदापि न करे | हवन जाप की संख्या का दशांश, तर्पण हवन की संख्या का दशांश, मार्जन तर्पण की संख्या का दशांश और ब्राह्मण भोजन मार्जन की संख्या का दशांश कराएं | सिद्धि प्राप्त करने हेतु इसी तरह से साधना करें |
बगलामुखी #मंत्र प्रयोग –साधना की सिद्धी हो जाने पर इससे निम्नलिखित प्रयोग किये जा सकते हैं–
* मनवाछिंत संतान की प्राप्ति के लिए हवन करते समय करवीर एवं अशोक के पत्तों द्वारा हवन करें | * धन धन की प्राप्ति के लिए तिल, चावल एवं दूध से बनी हुए खीर से हवन करें |
* गुगल और तिल से हवन यदि हवन किया जाए तो कैदी को जेल से मुक्ति मिलती है |
* सिमर के फलों द्वारा हवन किए जाने पर निश्चय ही शत्रु को पराजित किया जा सकेगा |
* रोग निवारण हेतु कुम्हार के चाक की मिट्टी, चीनी का बुरा (शक्कर), शहद, चार अंगुल की लकड़ियां रेड़ी की, घी और खील लव को मिलाकर हवन करें | विभिन्न प्रकार के सभी रोगों से मुक्ति मिलेगी |
* हवन में अगर सरसों का व्यवहार किया जाए तो वशीकरण प्रभाव पैदा होता है |
* आकर्षण शक्ति बढ़ाने के लिए शक्कर, घी, शहद और नमक के साथ हवन करें |
बगला मुखी साबर मंत्र साधना
मन्त्र–”ओम ह्लीं ब्रह्मस्त्रायै विद्महे स्तंभन बाणाय धीमही तन्नो बगला प्रचोदयात् “
उपरोक्त विधि द्वारा ही अश्विनी नक्षत्र में इस मंत्र को १००० बार जाप कर सिद्ध कर ले |
प्रयोग
* लाभ किसी भी प्रकार के लाभ की प्राप्ति के लिए इस मंत्र का दो हजार बार
जाप करें भरणी नक्षत्र में |
* कृतिका नक्षत्र में जागृत हो जाता है मंत्र अगर २००० बार जाप किया जाए तो |
* कामना पूर्ति के लिए १०० या १००० बार जाप करें रोहिणी नक्षत्र में |
* तीव्र बुद्धि करने के लिए ५००० बार जाप करें मृगशिरा नक्षत्र में |
* किसी भी कार्य की सिद्धि के लिए आद्रा नक्षत्र में मंत्र जाप करें ६००० बार |
* देवत्व की प्राप्ति होती है पुनर्वसु नक्षत्र में १००० बार जाप करने से |
* ७००० बार पुष्य में जाप करने से भी मंत्र की सिद्धि होती है |
* कामना पूर्ति के लिए अश्लेषा नक्षत्र में ६००० बार जाप करें |
* किसी भी अधिकार की प्राप्ति के लिए १०००० बार जाप करें मघा नक्षत्र में |
* तीनों पूर्वा नक्षत्र में ११००० बार जाप करने से प्राप्ति होती है धन की |
* उत्तरा नक्षत्र में १२००० बार जाप करने से किसी भी प्रकार के कामना की
पुर्ति सम्भव है |
* १३००० बार जाप करें हस्त नक्षत्र में तेजस्वी बनने के लिए|
* दो हजार बार जाप करें चित्रा नक्षत्र में सफलता की प्राप्ति के लिए |
* सौम्यता प्राप्त करने के लिए विशाखा नक्षत्र में जाप करें ४००० बार |
* परिवारिक सुख प्राप्त करने के लिए पूरे समय अनुराधा नक्षत्र में जाप करें |
* २००० बार जाप करें जेष्ठा नक्षत्र में | इससे भी मंत्र की सिद्धि होती है |
* ५००० बार जाप करें मूला नक्षत्र में साधना सफल करने के लिए |
* यशस्वी बनने के लिए २००० बार जाप करें श्रवन नक्षत्र में |
* कार्य सिद्धि के लिए २००० बार जाप करें घनिष्ठा में |
* किसी भी पाप की मुक्ति के लिए सतभिषा नक्षत्र में जाप करें २००० बार |
* अधिकार बढ़ाने के लिए ४ हजार बार जाप करें रेवती में |
* स्तंभन, उच्चाटन, वशीकरण आदि कार्यों की सिद्धि के लिए ८००० बार जाप
करें स्वाति नक्षत्र में |
बगलामुखी वशीकरण प्रयोग
“ ओम बगलामुखी सर्व अमुक (स्त्री/ पुरुष का नाम) हृदय मम् वश्यं कुरु ऐं ह्रीं स्वाहा” “.. पूरे विधि विधान से इस मंत्र का जाप करते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करें
बगलामुखी साधना की पू्र्णता के बाद निम्नलिखित मंत्र द्वारा मां से क्षमा की प्रार्थना भी करें —
“ आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ,
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरी |
मंत्रहीनं क्रियाहिनं भक्तिहीनं सुरेश्वरी,
यत्यूजितम मया देवी परिपूर्ण तदस्तु मे |”
जय माँ #कामाख्या !!!💐
17/11/2024
#दक्षिणा
30/08/2024
पार्थिव श्रीगणेश पूजन का महत्त्व और विधि
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अलग अलग कामनाओ की पूर्ति के लिए अलग अलग द्रव्यों से बने हुए गणपति की स्थापना की जाती हैं। यहाँ गणेश जी के 12 प्रकार के पार्थिव स्वरूपो की पूजा का फल दिया जा रहा है।
(1) श्री गणेश👉 मिट्टी के पार्थिव श्री गणेश बनाकर पूजन करने से सर्व कार्य सिद्धि होती हे!
(2) हेरम्ब👉 गुड़ के गणेश जी बनाकर पूजन करने से लक्ष्मी प्राप्ति होती हे।
(3) वाक्पति👉 भोजपत्र पर केसर से पर श्री गणेश प्रतिमा चित्र बनाकर। पूजन करने से विद्या प्राप्ति होती हे।
(4) उच्चिष्ठ गणेश👉 लाख के श्री गणेश बनाकर पूजन करने से स्त्री। सुख और स्त्री को पतिसुख प्राप्त होता हे घर में ग्रह क्लेश निवारण होता हे।
(5) कलहप्रिय👉 नमक की डली या। नमक के श्री गणेश बनाकर पूजन करने से शत्रुओ में क्षोभ उतपन्न होता हे वह आपस ने ही झगड़ने लगते हे।
(6) गोबरगणेश👉 गोबर के श्री गणेश बनाकर पूजन करने से पशुधन में व्रद्धि होती हे और पशुओ की बीमारिया नष्ट होती है (गोबर केवल गौ माता का ही हो)।
(7) श्वेतार्क श्री गणेश👉 सफेद आक मन्दार की जड़ के श्री गणेश जी बनाकर पूजन करने से भूमि लाभ भवन लाभ होता हे।
(8) शत्रुंजय👉 कडूए नीम की की लकड़ी से गणेश जी बनाकर पूजन करने से शत्रुनाश होता हे और युद्ध में विजय होती हे।
(9) हरिद्रा गणेश👉 हल्दी की जड़ से या आटे में हल्दी मिलाकर श्री गणेश प्रतिमा बनाकर पूजन करने से विवाह में आने वाली हर बाधा नष्ठ होती हे और स्तम्भन होता हे।
(10) सन्तान गणेश👉 मक्खन के श्री गणेश जी बनाकर पूजन से सन्तान प्राप्ति के योग निर्मित होते हैं।
(11) धान्यगणेश👉 सप्तधान्य को पीसकर उनके श्रीगणेश जी बनाकर आराधना करने से धान्य व्रद्धि होती हे अन्नपूर्णा माँ प्रसन्न होती हैं।
(12) महागणेश👉 लाल चन्दन की लकड़ी से दशभुजा वाले श्री गणेश जी प्रतिमा निर्माण कर के पूजन से राज राजेश्वरी श्री आद्याकालीका की शरणागति प्राप्त होती हैं।
पार्थिव गणेश प्रतिष्ठा पूजा
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द्विराचम्य प्राणायामं कृत्वा। इष्टकुलस्वाम्यादि देवतानां फल-तांबूलानि प्रदानं कृत्वा। ज्येष्ठां नमस्कृत्य।
ॐ श्रीमन्महागणपतये नम:॥
इष्ट,कुल,ग्राम,वास्तु,गुरू देवताभ्यो नम:॥
सुमुखश्चैकदंतश्च……॥
पूजा संकल्प
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श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य….शालिवाहनशके .. नामसंवत्सरे, दक्षिणायने, वर्षा ऋतौ, भाद्रपद मासे, शुक्लपक्षे, चतुर्थ्यां तिथौ ..वासरे, .. नक्षत्रे, राशि (अहोरात्र) स्थिते वर्तमाने चंद्रे, राशि स्थिते श्रीसूर्ये राशि स्थिते शेषेशु ग्रहेषु यथायथं….. शुभपुण्यतिथौ….॥
मम आत्मन: श्रुतिस्मृति-पुराणोक्त फलप्राप्त्यर्थं श्रीपरमेश्वर प्रीत्यर्थं….अमुक …गोत्रोत्पन्नाय अमुक…शर्माणं अहं अस्माकं सकलकुटुंबानां सपरिवाराणां द्विपद-चतुष्पद-सहितानां क्षेम स्थैर्य आयु: आरोग्य ऐश्वर्य अभिवृद्धी अर्थं,समस्त मंगल अवाप्ति अर्थं,समस्त अभ्युदय अर्थं,अभीष्ट कामना सिद्धी अर्थंच प्रतिवार्षिक विहितं {पार्थिवसिद्धिविनायक} देवता प्रीत्यर्थं यथाज्ञानेन यथामिलित उपचार द्रव्यै: पुरुषसूक्त/पुरणोक्तमंत्रै: प्राणप्रतिष्ठापन पूर्वक ध्यानआवाहनादि षोडश उपचार पूजन अहं करिष्ये॥ आदौ निर्विघ्नता सिद्ध्यर्थं महागणपति स्मरणं, शरीर शुद्ध्यर्थं षडंगन्यासं कलश, शंख, घंटा, दीप पूजनं च करिष्ये॥
॥प्राणप्रतिष्ठा॥
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अस्य श्री प्राणप्रतिष्ठामंत्रस्य ब्रह्म-विष्णू-महेश्वरा ऋषय:। ऋग्यजु:सामाथर्वाणि च्छंदासि। पराप्राणशक्तिर्देवता आं बी
जम्। -हीं शक्ति:। क्रों कीलकम्। अस्यां मृन्मयमूर्तौ प्राणप्रतिष्ठापने विनियोग:॥
॥ॐ आं -हीं क्रों॥ अं यं रं लं वं शं षं सं हं ळं क्षं अ:॥ क्रों -हीं आं हंस: सोहं॥
अस्यां मूर्तौ १ प्राण २ जीव ३ सर्वेंद्रियाणि वाङ् मन:त्वक् चक्षु श्रोत्र जिव्हा घ्राण पाणि पाद पायूपस्थानि इहैवागत्य सुखं चिरं तिष्ठंतु स्वाहा॥
ॐ असुनीते…ॐ चत्वारिवाक्…॥
गर्भाधानादि पंचदश संस्कार सिद्ध्यर्थं १५ प्रणवावृती: करिष्ये॥
रक्तांभोधिस्थ… तच्चक्षुर्देवहितं…॥
अस्यै प्राणा: प्रतिष्ठंतु अस्यै प्राणा:क्षरंतु च।
अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन॥
देवस्य आज्येन नेत्रोन्मीलनं कृत्वा।
प्राणशक्त्यै नम:। पंचोपचारै: संपूज्य॥
१ ध्यानं,आवाहनं👉
एकदंतं शूर्पकर्णं गजवक्त्रं चतुर्भुजं।
पाशांकुशधरं देवं ध्यायेत्सिद्धिविनायकं॥
आवाहयामि विघ्नेश सुरराजार्चितेश्वर।
अनाथनाथ सर्वज्ञ पूजार्थं गणनायक॥
२ आसन👉
नानारक्तसमायुक्तं कार्तस्वरविभूषितम्।
आसनं देवदेवेश प्रीत्यर्थं प्रतिगृह्यताम्॥
३ पाद्यं👉
पाद्यं गृहाण देवेश सर्वक्षेमसमर्थ भो।
भक्त्या समर्पितं तुभ्यं लोकनाथ नमोस्तु ते॥
४ अर्घ्य👉
नमस्ते देव देवेश नमस्ते धरणीधर।
नमस्ते जगदाधार अर्घ्यं न: प्रतिगृह्यताम॥
५ आचमन👉
कर्पूरवासितं वारि मंदाकिन्या:समाहृतम्।
आचम्यतां जगन्नाथ मया दत्तं हि भक्तित:॥
६ स्नान👉
गंगादिसर्वतीर्थेभ्यो मया प्रार्थनया हृतम्।
तोयमेतत्सुखस्पर्शं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्॥
॥पंचामृतस्नान,पंचोपचारपूजा,अभिषेक॥
मांगलिक स्नान
तैलेलक्ष्मीर्जलेगंगा यतस्तिष्ठति वै प्रभो।
तन्मांगलिकस्नानार्थं जलतैले समर्पये॥
तदस्तुमित्रा… सुप्रतिष्ठितमस्तु॥
७ वस्त्र👉
सर्वभूषाधिके सौम्ये लोकलज्जानिवारणे।
मयोपपादिते तुभ्यं वाससी प्रतिगृह्यताम्।
८ यज्ञोपवीत👉
देवदेव नमस्तेतु त्राहिमां भवसागरात्।
ब्रह्मसूत्रं सोत्तरीयं गृहाण परमेश्वर॥
९ गंध👉
श्रीखंडं चंदनं दिव्यं गंधाढ्यं सुमनोहरम्।
विलेपनं सुरश्रेष्ठ चंदनं प्रतिगृह्यताम्॥
अक्षतास्तंडुला:शुभ्रा:कुंकूमेन विराजिता:।
मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर॥
हरिद्रा स्वर्णवर्णाभा सर्वसौभाग्यदायिनी।
सर्वालंकारमुख्या हि देवि त्वं प्रतिगृह्यताम्॥
हरिद्राचूर्णसंयुक्तं कुंकुमं कामदायकम्।
वस्त्रालंकारणं सर्वं देवि त्वं प्रतिगृह्यताम्॥
उदितारुणसंकाश जपाकुसुमसंनिभम्।
सीमंतभूषणार्थाय सिंगूरं प्रतिगृह्यताम्॥
परिमलद्रव्य👉
अहिरिवभोगै:…
ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं नमस्ते विश्वरूपिणे।
नानापरिमलद्रव्यं गृहाण परमेश्वर॥
१० फुले,हार,कंठी👉
माल्यादीनि सुगंधीनि मालत्यादीनि वै प्रभो।
मया हृतानि पूजार्थं पुष्पाणि प्रतिगृह्यताम्॥
करवीरैर्जातिकुसुमैश्चंपकैर्बकुलै:शुभै:।
शतपत्रैश्चकल्हारैरर्चयेत् परमेश्वर॥
॥अथ अंग पूजा॥ 👉
गणेश्वराय नम:-पादौ पूजयामि॥
विघ्नराजाय नम:-जानुनी पू०॥
आखुवाहनाय नम:-ऊरू पू०॥
हेरंबाय नम:-कटिं पू०॥
लंबोदराय नम:-उदरं पू०॥
गौरीसुताय नम:-स्ननौ पू०॥
गणनायकाय नम:- हृदयं पू॥
स्थूलकर्णाय नम:-कंठं पू०॥
स्कंदाग्रजाय नम:-स्कंधौ पू०॥
पाशहस्ताय नम:-हस्तौ पू०॥
गजवक्त्राय नम:-वक्त्रं पू०॥
विघ्नहत्रे नम:-ललाटं पू०॥
सर्वेश्वराय नम:- शिर:पू०॥
गणाधिपाय नम:-सर्वांगं पूजयामि॥
अथ पत्र पूजा:👉
सुमुखायनम:-मालतीपत्रं समर्पयामि॥
गणाधिपायनम:-भृंगराजपत्रं॥
उमापुत्रायनम:-बिल्वपत्रं॥
गजाननायनम:-श्वेतदूर्वापत्रं॥
लंबोदरायनम:-बदरीपत्रं॥
हरसूनवेनम:-धत्तूरपत्रं॥
गजकर्णकायनम: विजयापत्रं॥
वक्रतुंडायनम:-शमीपत्रं॥
गुहाग्रजायनम:-अपामार्गपत्रं।।
एकदंतायनम:-बृहतीपत्रं॥
विकटायनम:-करवीरपत्रं॥
कपिलायनम:-अर्कपत्रं॥
गजदंतायनम:-अर्जुनपत्रं।।
विघ्नराजायनम:-विष्णुक्रांतापत्रं॥
बटवेनम:-दाडिमपत्रं॥(डाळिंब)
सुराग्रजायनम:-देवदारुपत्रं॥
भालचंद्रायनम:-मरुपत्रं॥
हेरंबायनम:-अश्वत्थपत्रं॥
चतुर्भुजायनम:-जातीपत्रं॥
विनायकायनम:-केतकीपत्रं॥
सर्वेश्वरायनम:-अगस्तिपत्रं।।
११ धूप,अगरबत्ती👉
वनस्पतिरसोद्भूतो गंधाढ्यो गंधउत्तम:।
आघ्रेय:सर्वदेवानां धूपोयं प्रतिगृह्यताम्॥
१२ दीप,निरांजन👉
आज्यंच वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया।
दीपं गृहाण देवेश सर्वक्षेमसमर्थ भो:॥
१३ नैवेद्य,प्रसाद👉
नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्तिं मे ह्यचलां कुरू।ईप्सितं मे वरं देहि परत्रं च परां गतिम्॥
शर्कराखंडखद्यानी दधिक्षीरघृतानिच।
आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्॥
पूगीफलं महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतं।
कर्पूरैलासमायुक्तं तांबूलं प्रतिगृह्यताम्॥
हिरण्यगर्भ गर्भस्थं हेमबीजं विभावसो:।
अनंतपुण्यफलद मत:शातिं प्रयच्छ मे॥
इदं फलं मयादेव स्थापितं पुरतस्तव।
तेन मे सुफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि॥
फलेन फलितं सर्व त्रैलोक्यं सचराचरम्।
तस्मात्फलप्रदानेन सफलाश्च मनोरथा:॥
दूर्वायुग्म पूजा👉
गणाध्यक्ष महादेव शिवपुत्राभयप्रद।
दूर्वापूजां गृहाणेश गणाधिप नमोऽस्तुते॥
ॐ गणाधिपायनम:-दूर्वायुग्मं समर्पयामि॥
पतिर्गणानां सर्वेषामम्बिकागर्भसम्भव।
दूर्वायुग्मं गृहाणेश उमापुत्र नमोऽस्तुते॥
ॐ उमापुत्रायनम:-दूर्वायुग्मं ०॥
भक्तानां स्मरणादेव सर्वाद्यक्षयकृद्विभु:।
दूर्वायुग्मं गृहाणेश अघनाश नमोऽस्तुते॥
ॐ अघनाशनायनम:-दूर्वायुग्मं ०॥
नृपाणां युद्धसमये भजतामभयप्रद।
दूर्वापूजां गृहाणेश विनायक नमोऽस्तते॥
ॐ विनायकायनम:-दूर्वायुग्मं ०॥
जनितो देवतार्थाय तारासुतवधो विभु:।
दूर्वापूजां गृहाणेश ईशपुत्र नमोऽस्तुते॥
ॐ ईशपुत्रायनम:-दूर्वायुग्मं०॥
स्कन्दावरज भूतेश लम्बोदर गजानन।
दूर्वायुग्मं गुहाणेश सर्वसिद्धिप्रदायक॥
ॐ सर्वसिद्धिप्रदायकायनम:-दूर्वायुग्मं ०॥
राक्षसानां विनाशाय दूतायुधधरोभव।
दूर्वापूजां गृहाणेश एकदन्त नमोनम:॥
ॐ एकदंतायनम:-दूर्वायुग्मं ०॥
उमामहेश्वरं दृष्ट्वा कृतोऽसौ गजवक्त्रक:।
दूर्वायुग्मं गृहाणेश इभवक्त्र नमो नम:॥
ॐ इभवक्त्रायनम:-दूर्वायुग्मं ०॥
मूषकोत्तममारुह्य जिता देवा सुराहवे।
दूर्वापूजां गृहाणेश नमो मूषकवाहन॥
ॐ आखुवाहनायनम:-दूर्वायुग्मं ०॥
अग्निर्भू:बाहुलेयश्च गुरुमुख्यो भवप्रभो।
दूर्वापूजां गृहाणेश कुमारगुरवे नम:॥
ॐ कुमारगुरवेनम:-दूर्वायुग्मं ०॥
गणाधिप नमस्तेस्तु उमापुत्राघनाशन।
विनायकेशपुत्रेति सर्वसिद्धिप्रदायक॥
एकदंतेभवक्त्रेति तथा मूषकवाहन।
कुमारगुरवे तुभ्यं पूजनीय:प्रयत्नत:॥
एकैकेन तु नाम्ना तु दत्वैकं सर्वनामभि:।
तत:स्वर्णमयं पुष्पं विघ्नेशाय समर्पयेत्॥
दूर्वामेकां समर्पयामि॥
श्रियेजात:
चंद्रादित्यौच धरणी विद्युदग्निस्तथैवच।त्वमेव सर्व ज्योतींषि आर्तिक्यं प्रतिगृह्यताम्॥
१४ प्रदक्षिणा👉
यानि कानि च पापानि जन्मांतरकृतानि च।
तानि तानि विनश्यंति प्रदक्षिण पदे पदे॥
१५ नमस्कार👉
नमस्ते विघ्नसंहर्त्रे नमस्ते ईप्सितप्रद।
नमस्ते देवदेवेश नमस्ते गणनायक॥
१६ प्रार्थना👉
विनायकगणेशान सर्वदेवनमस्कृत।
पार्वतीप्रिय विघ्नेश मम विघ्नान्निवारय॥
आवाहनं न जानामि……
यस्यस्मृत्या……
अनेन मया यथाज्ञानेन कृतषोडशोपचार पूजनेन तेन श्रीसिद्धिविनायक:प्रीयताम्॥
06/06/2023
स्त्री को व्यभिचार की ओर ले जाने वाला पुरुष है, दण्ड पाती है स्त्री शंकराचार्य कहते हैं-
"विश्वासपात्रं न किमस्ति ? नारी।
द्वारं किमेकं नरकस्य ? नारी ।
विद्वान् महा विज्ञतमोऽस्ति को वा ?
नार्या पिशाच्या न च वञ्चितो यः ।"
( प्रश्नोत्तरी)
प्रश्न- किसका विश्वास नहीं करना चाहिये।
उत्तर- नारी का।
प्रश्न- नरक का एकमात्र द्वार क्या है ?
उत्तर-नारी जाति ।
प्रश्न- विद्वानों में महाविद्वान कौन है ?
उत्तर- नारी रूपी पिशाचिनी से जो ठगा नहीं गया है।
अर्थात् जिसने स्त्री संग नहीं किया है।
"विपाद्विषं भाति सुधोपमं स्त्री।"
(प्रश्नोत्तरी)
प्रश्न- विष से भी बड़ा विष जो अमृत के समान है, क्या है ?
उत्तर- स्त्री ।
गोस्वामी तुलसीदास जी नारी के विषय में क्या कहते हैं ? इसकी एक झलक देखिये ।
"विधिहुँ न नारि हृदय गति जानी।
सकल कपट अद्य अवगुन खानी ॥"
( रामचरित मानस, अयोध्याकाण्ड )
नारी के हृदय की गति (बात) को बह्मा भी नहीं जान सकते। यह नारी हर प्रकार के छल कपट), अघ (पाप) और अवगुणों की खान है।
"सत्य कहहिं कवि नारि सुभाऊ ।
सब बिधि अगह अगाध दुराऊ ||
निज प्रतिबिम्ब बरकु गहि जाई ।
जानि न जाई नारि गति भाई ॥"
( रा.च.मा, अयोध्याकाण्ड )
स्त्री के स्वभाव के विषय में कविगण सत्य कहते हैं। हर प्रकार से स्त्री पकड़ (अधिकार) में न आने वाली है। स्त्री के स्वभाव की गहराई का थाह नहीं है तथा इसे जाना नहीं जा सकता। अपना प्रतिबिम्ब भले ही पकड़ लिया जाय, नारी की गति, हे भाई! अज्ञेय है।
स्त्री की दशा पर आह भरते हुए एक कवि लिखता है-
"अबला जीवन हाय ! तुम्हारी यही कहानी।
आँचल में है दूध और आँखों में पानी |"
नारी अबला (बलहीना है। इसके जीवन की केवल एक कहानी है। क्या कहानी ? आँचल में दूध है वह पालनकर्त्री है तथा आँखों में पानी (आँसू) है-बदले में दुःख पाती है।
अब तक के वर्णन से स्पष्ट है =पुरुषों ने नारी के विषय में कहा है, नारी ने स्वयं अपने विषय में यह बात नहीं कही। अपने को व्यक्ति जितना जानता है, उतना दूसरा उसके विषय में नहीं जान सकता। इसलिये नारी के बारे में कहे गये पुरुषों के विचार अपूर्ण एक पक्षीय एवं असत्य हैं। यह सत्य है कि नारी डाकिनी, हाकिनी, साकिनी, पिशाचिनी, चुडेल, कुलरा, कर्कशा, चण्डी, जिन मस्तका, उमा, रक्तपा, काली, कपालिनी, भैरवी, चामुण्डा, कालिका, कपालिका है। यह भी सत्य है कि नारी दया, क्षमा, माया, ममता, करुणा, सुफला, मधुरा, निर्मला, विमला, शिवा, लक्ष्मी, विद्या, कामाशीला, सुहृदा, सुप्रभा, दया है।
नारी के सभी वैविध्यपूर्ण रूप पुरुष के लिये आदरणीय हैं। महोग्रा एवं सौम्या दोनों रूपों में नगरी वरेण्य है। नारी का अपमान पुरुष का अपमान है। क्योंकि नारी पुरुष से अपृथक है। दोनों को अलग-अलग मानना एवं जानना मूर्खता है। नारी का हर रूप शक्ति है। शक्ति सबके लिये सब काल में सम्मान्य है। हर नारी को मेरा नमस्कार ।
अब मैं स्त्री-पुरुष संबंधों पर ज्योतिषीय दृष्टि से विचार करता हूँ। नारी पुरुष से कम नहीं, अधिक भी नहीं अपितु बराबर है। क्योंकि राशि चक्र में ६ स्वी राशियाँ हैं तो ६ पुरुष राशियाँ सम राशिया (२, ४, ६, ८, १०, १२) स्त्री हैं। विषम राशियाँ (१,३,५, ७, ९, ११) पुरुष हैं। पुरुष-पुरुष को देखता है। क्योंकि पुरुष राशियाँ शीख है। इसका अर्थ हुआ पुरुष पुरुष का पक्ष लेता है। स्त्री राशियों परस्पर अभिमुख होने से एक दूसरे को देखती हैं। निष्कर्ष निकला स्त्री स्त्री का पक्ष ग्रहण करती है। चक्र से यह भी स्पष्ट है कि स्त्री के आगे पीछे पुरुष है तथा पुरुष के आगे पीछे रखी है। इसका अर्थ निकला- स्त्री पुरुष के घेरे में है तथा पुरुष स्त्री के घेरे में दोनों एक दूसरे को आप्यायित कर रहे हैं। फिर पुरुष को स्त्री से वा स्त्री को पुरुष से कैसे अलग किया जा सकता है। दोनों अपृथक् हैं। दोनों का सह अस्तित्व है। स्त्री के आगे उसका पति है तो पीछे उसका पुत्र है। पुरुष के आगे उसकी माता है तो पीछे उसकी कन्या है। यह चक्र अनादि एवं अटूट है। स्त्री पुरुष के इस संसारिक चक्र को मेरा नमस्कार ।
स्त्री, पुरुष की सखा है तो पुरुष, स्त्री का मित्र है। इन दोनों में पारस्परिक सौमनस्य है। एक दूसरा पक्ष भी है। वह क्या ? स्त्री, पुरुष की वैरिणी है तथा पुरुष, स्त्री का शत्रु है। इन दोनों में परस्पर वैमनस्य रहता है। लोक व्यवहार में यह घटित होता है। यह प्रत्यक्ष सत्य है। लोक में देखा जाता है-स्त्री, पुरुष के लिये आत्म बलिदान करती है। पुरुष स्त्री के लिये प्राण न्यौछावर करता है। स्त्री, पुरुष का प्राण हर लेती है। पुरुष, स्त्री की हत्या कर देता है। स्त्री और पुरुष दोनों लालन एवं ताडन के अस्त्र का प्रयोग परस्पर करते हैं। अत्याचारी पक्ष को अपने-अपने अत्याचार का फल इसी जीवन में भुगतना पड़ता है। स्त्री जब पुरुष को यातना देकर सताती है तो उस स्त्री का पुरुष संतान अर्थात् पुत्र उसे (अपनी माता को) दुःख देता है। पुरुष जब स्त्री के प्रति रूक्ष एवं हिंसक व्यवहार करता है तो उस पुरुष की स्त्री संतान अर्थात् पुत्री उसे (अपने पिता को) दुःख देती है। यहाँ पुत्र = पुत्री। यह अकाट्य एवं प्रत्यक्ष सत्य है तथा नैसर्गिक नियम से आबद्ध है। कहा है-'बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय' जहाँ स्त्री पुरुष आपस में लड़ते झगड़ते नहीं, परस्पर प्रेम एवं सौहार्द से रहते हैं, उनकी सन्तानें अनुशासित होती हैं, अपने माता पिता की आज्ञा का पालन करती हैं। वहाँ शांति रहती है। ऐसे परिवार कितने हैं ? इने गिने मात्र ऐसे संस्कृत दाम्पत्य जीवन एवं सुव्यवस्थित कुटुम्ब को मेरा प्रगल्भ नमस्कार !
प्रेतों का भोजन ❓
महर्षि गौतम ने पूछा -- संसार में कोई भी प्राणी बिना भोजन के नहीं रहते -- अतः बताओ , तुम लोग क्या आहार करते हो ❓
प्रेतों ने कहा --
" अप्रक्षालितपादस्तु यो भुङ्क्ते दक्षिणामुखः ।
यो वेष्टितशिरा भुङ्क्ते प्रेता भुञ्जन्ति नित्यशः ।।
अर्थात् :--
द्विजश्रेष्ठ ! जहाँ भोजन के समय आपस में कलह होने लगता है - वहाँ उस अन्न के रस को हम ही खाते हैं ।
जहाँ मनुष्य बिना लिपी - पुती ( पोछा आदि से साफ हुई ) धरती पर खाते हैं -
जहाँ ब्राह्मण शौचाचार से भ्रष्ट होते हैं वहाँ हम को भोजन मिलता है --
जो पैर धोये बिना खाता है - और जो दक्षिण की ओर मुँह करके भोजन करता है-- अथवा जो सिर पर वस्त्र लपेट कर भोजन करता है - उसके उस अन्न को सदा हम प्रेत ही खाते हैं --
जहाँ रजस्वला स्त्री - चाण्डाल - और सुअर श्राद्ध के अन्न पर दृष्टि डाल देते हैं - वह अन्न पितरों का नहीं हम प्रेतों का ही भोजन होता है --
जिस घर में सदा जूठन पडा रहे - निरन्तर कलह होता रहे - और बलिविश्वैदैव न किया जाता हो - वहाँ हम प्रेत लोग भोजन करते हैं ।
महर्षि गौतम ने पूछा ❓
कैसे घरों में तुम्हारा प्रवेश होता है - यह बात मुझे सत्य - सत्य बताओ ❓
प्रेत बोले :---
" ब्राह्मण ! जिस घर में बलिवैश्वदेव होने से धुएं की बत्ती उडती दिखाई देती है - उसमें हम प्रवेश नहीं कर पाते ---
जिस घर में सवेरे चौका लग जाता है - तथा वेद मंत्रों की ध्वनि होती रहती है- वहाँ की किसी वस्तु पर हमारा अधिकार नहीं होता ।
गौतम ने पूछा ❓
" किस कर्म के परिणाम में मनुष्य प्रेत भाव को प्राप्त होता है ❓
प्रेत बोले :--
" जो धरोहर हडप लेते हैं - जुठे मुँह यात्रा करते हैं - गाय और ब्राह्मण की हत्या करने वाले हैं वे प्रेत योनि को प्राप्त होते हैं ।
चुगली करने वाले -झूठी गवाही देने वाले - न्याय के पक्ष में नहीं रहने वाले - वे मरने पर प्रेत होते हैं ।
सूर्य की ओर मुँह करके थूक - खकार - और मल - मूत्र त्याग करते हैं - वे प्रेत शरीर प्राप्त करके दीर्घकाल तक उसी में स्थित रहते हैं --
गौ - ब्राह्मण तथा रोगी को जब कुछ दिया जाता हो - उस समय जो न देने की सलाह देते हैं - वे भी प्रेत ही होते हैं -
यदि शूद्र का अन्न पेट में रहते हुए ब्राह्मण की मृत्यु हो जाये तो वह अत्यंत भयंकर प्रेत होता है --
विप्रवर ! -- जो अमावस्या की तिथि में हल में बैलों को जोतता है वह मनुष्य प्रेत बनता है ।
जो विश्वासघाती - ब्रह्महत्यारा - स्त्रीवध करने वाला - गोघाती - गुरूघाती - और पितृहत्या करने वाला है वह मनुष्य भी प्रेत होता है।
मरने पर जिसके १६ एकोदिष्ट श्राद्ध नहीं किये गये हैं - उसको भी प्रेतयोनि प्राप्त होती है ।
:( भूत) -प्रेत और आत्माओं के विभिन्न प्रकार-
1.भूत :- सामान्य भूत जिसके बारे में आप अक्सर सुनते है ।
2.प्रेत :- परिवार के सताए हुए बिना क्रियाकर्म के मरे हुए आदमी,जो पिडीत रहेते है।
3.हाडल :- बिना नुक्सान पहुचाये प्रेतबाधित करने वाली आत्माए ।
4.चेतकिन :- चुडेले जो लोगो को प्रेतबाधित कर दुर्घटनाए करवाती है ।
5.मुमिई :- मुंबई के कुछ घरो में प्रचलित प्रेत,जो कभी कभी दिखाई देते है।
6.विरिकस:- घने लाल कोहरे में छिपी और अजीबो-गरीब आवाजे निकलने वाला होता है।
7.मोहिनी या परेतिन : -प्यार में धोका खाने वाली आत्माए जिनसे मनुष्यों को मदत मिल सकती है।
8.शाकिनी:- शादी के कुछ दिनों बाद दुर्घटना से मरने वाली औरत की आत्मा जो कम खतरनाक होती है।
9.डाकिनी :- मोहिनी और शाकिनी का मिला जुला रूप किन्ही कारणों से हुई मौत से बनी आत्मा होती है।
10.कुट्टी चेतन :- बच्चे की आत्मा जिसपर तांत्रिको का नियंत्रण होता है ।
11.ब्रह्मोदोइत्यास :- बंगाल में प्रचलित,श्रापित ब्राह्मणों की आत्माए,जिन्होने धर्म का पालन ना किया हो ।
12.सकोंधोकतास :- बंगाल में प्रचलित रेल दुर्घटना में मरे लोगो की सर कटी आत्माए होती है।
13.निशि :- बंगाल में प्रचलित अँधेरे में रास्ता दिखाने वाली आत्माए ।
14.कोल्ली देवा :- कर्नाटक में प्रचलित जंगलो में हाथो में टोर्च लिए घुमती आत्माए ।
15.कल्लुर्टी :-कर्नाटक में प्रचलित आधुनिक रीती रिवाजो से मरे लोगो की आत्माए ।
16.किचचिन:- बिहार में प्रचलित हवस की भूखी आत्माए ।
17.पनडुब्बा:- बिहार में प्रचलित नदी में डूबकर मरे लोगो की आत्माए ।
18.चुड़ैल:- उत्तरी भारत में प्रचलित राहगीरों को मारकर बरगद के पेड़ पर लटकाने वाली आत्माए ।
19.बुरा डंगोरिया :- आसाम में प्रचलित सफ़ेद कपडे और पगड़ी पहने घोड़े पसर सवार होनेवाली आत्माए ।
20.बाक :- आसाम में प्रचलित झीलों के पास घुमती हुई आत्माए ।
21.खबीस:- पाकिस्तान ,गुल्फ देशो और यूरोप में प्रचलित जिन्न परिवार से ताल्लुक रखने वाली आत्माए ।
22.घोडा पाक :- आसाम में प्रचलित घोड़े के खुर जैसे पैर बाकी मनुष्य जैसे दिखाई देने वाली आत्माए ।
23.बीरा :- आसाम में प्रचलित परिवार को खो देने वाली आत्माए ।
24.जोखिनी :-आसाम में प्रचलित पुरुषो को मारने वाली आत्माए ।
25.पुवाली भूत :-आसाम में प्रचलित छोटे घर के सामनो को चुराने वाली आत्माए ।
26.रक्सा :- छतीसगढ़ मे प्रचलित कुँवारे मरने वालो की खतरनाक आत्माए ।
27. मसान:- छतीसगढ़ की प्रचलित पाँच छै सौ साल पुरानी प्रेत आत्मा नरबलि लेते हैँ , जिस घर मेँ निवास करेँ पुरे परिवार को धीरे धीरे मार डालते हैँ ।
28.चटिया मटिया :- छतीसगढ़ मेँ प्रचलित बौने भुत जो बचपन मेँ खत्म हो जाते हैँ वो बनते हैँ बच्चो को नुकसान नहीँ पहुँचाते । आँखे बल्ब की तरह हाथ पैर उल्टे काले रंग के मक्खी के स्पीड मेँ भागने वाले चोरी करने वाली आत्माए ।
29. बैताल:- पीपल पेड़ मेँ निवास करते हैँ एकदम सफेद रंग वाले ,सबसे खतरनाक आत्माए ।
30. चकवा या भुलनभेर :- रास्ता भटकाने वाली आत्मा महाराष्ट्र ,एमपी आदि मेँ पाया जाता हैँ ।
31. उदु:- तलाब या नहर मेँ पाये जाने वाली आत्मा जो आदमियोँ को पुरा खा जाऐँ , छतीसगढ़ मेँ प्रचलित आत्माए ।
32. गल्लारा :- अकाल मरे लोगो की आत्मा धमाचौकडी मचाने वाली आत्मा छतीसगढ़ मेँ प्रचलित है ।
34. भंवेरी :- नदी मेँ पायी जाने वाली आत्मा,जो पानी मेँ डुब कर मरते हैँ पानी मेँ भंवर उठाकर नाव या आदमी को डूबा देने वाली आत्मा छतीसगढ़ मेँ प्रचलित है।
35. गरूवा परेत:- बिमारी या ट्रेन से कटकर मरने वाले गांयो और बैलो की आत्मा जो कुछ समय के लिए सिर कटे रूप मेँ घुमते दिखतेँ हैँ नुकसान नही पहुचातेँ छतीसगढ मेँ प्रचलित है।
36. हंडा :- धरती मेँ गडे खजानोँ मेँ जब जीव पड़ जाता हैँ याने प्रेत का कब्जा तो उसे हंडा परेत कहते हैँ , ये जिनके घर मेँ रहते हैँ वे हमेशा अमीर रहते हैँ , हंडा का अर्थ हैँ कुंभ , जिसके अंदर हीरे सोने आदि भरे रहते हैँ,जो लालच वश हंडा को चुराने का प्रयास करेँ उसे ये खा जाते हैँ , ये चलते भी हैँ,छतीसगढ़ मेँ प्रचलित है।
37. सरकट्टा:-छत्तीसगढ़ में प्रचलित एक प्रेत जिसका सिर कटा होता है,बहुत ही खतरनाक होता है।
38.ब्रह्म :-ब्राह्मणों की आत्मा जो सात्विक और धार्मिक रहे हों अथवा जो साधक और पुजारी रहे हों किन्तु दुर्घटनावश अथवा स्वयं जीवन समाप्त कर चुके हों,बेहद शक्तिशाली ,तांत्रिक नियंत्रित नहीं कर सकते,केवल मना कर या प्रार्थना कर ही शांत किया जा सकता है । जिस परिवार के पीछे पड़ जाएँ खानदान साफ़ हो जाता है ,कोई रोक नहीं सकता । पूजा देने पर ही शांत हो सकते हैं ।
39.जिन्न :-अग्नि तत्वीय मुस्लिम धर्म से सम्बंधित आत्मा,बेहद शक्तिशाली,नियंत्रण मुश्किल परंतु मनाया जा सकता है ।
40.शहीद :-युद्ध अथवा दुर्घटना में मृत मुस्लिम बीर|अक्सर मजारें बनी मिलती हैं,शक्तिशाली आत्माएं जो पूजा पाकर और शक्तिशाली हो उठती हैं ।
41.बीर:- लड़ाकू अथवा उग्र ,साहसी व्यक्ति जिसकी दुर्घटना अथवा हत्या से मृत्यु हुई हो ।
42.सटवी:-इसका हवा मे स्थायित्व होता है और ये हर जगह होती है,यह स्त्री की आत्मा होती है। किसी भी शरीर मे प्रवेश करके उसको उदास कर देती है।
----और भी वहुत से प्रकार है!!
प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें।
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