18/03/2019
🔊🔊 As Forwrded...
मैं राजपुत हुं
मै राजपुत हूँ, मै प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री नही बन सकता, क्योकि मेरी तादाद कम है और जातिवाद ज्यादा, लेकिन मैं कलेक्टर, एडीएम, तहसीलदार, कमिश्नर, एसपी, डीएसपी तो बन ही सकता हूँ।
लेकिन मै दिनो- दिन आलसी होता जा रहा हूं ।
मुझ से घंटो पढ़ाई नही होती, अगर मैं पढ़ने लग गया तो चौराहों की रौनकें ख़त्म हो जाएगी, जो की मै होने नही दूंगा, मै पढ़ गया तो टीका दस्तुर , गोठो , शादिंयो और वारी गोठो मे लगी टेबलें छूट जाएगी जो की मै छोड़ना नही चाहता।
मै पढ़ गया तो बन्नागीरी की रौनक कम हो जाएगी, दिन भर मोबाईल पर वाटस्एप , फेसबूक,टीकटोक सूने हो जाऐंगे हां! काम नही है मेरे पास, लेकिन क्या फ़र्क़ पढता है, भगवान दो वक़्त की रोटी तो खिला ही देता है ना!
हां मै राजपूत हूँ, सच में मेरी तुलना किसी और कौम से कैसे हो सकती है मै बडा हूँ । मै बापू हूँ। इसी मुगालते में जीते-जीते पता नहीं कितनी कौम के युवा मुझसे आगे हो गये पता ही नही चला । मेरे परिवार वालो को मैने कहते सूना है कि मै नहीं पढा तो जमीन गिरवी रखकर कुवैत भेज देंगे या गाडी ले लेंगे । तब से मेरा मन पढाई में और कम हो गया । एक सील ठप्पा तो लगा हुआ है कि मै जमींदार हूँ भले उसमें एक मन भी नहीं होता हो । उसमें कुछ भी उपजाने की कला मुझमें नहीं रही।
हां मै राजपुत हूँ, , अपने भाइयों की टांग खिंचाई, मेरा अहम सिद्धान्त है।
आखिर मै क्यों नही पढा हूँ ? या मै क्यों नही पढ़ नही पाया? ये सवाल हो सकता है! लेकिन मैं अभी भी इस पढाई की अहमियत को नही समझा हूं ये सवाल मैं किससे करू?
हां मै राजपुत हूं,और हिंदुस्थान में 20 करोड़ के लगभग हुँ , 1500 वर्ष से अधिक समय तक मेरा शासन रहा है फिर भी मै क्यों पिछड़ गया । अब मै ज्यादातर कम पढा लिखा , गरीब , बेरोजगार हूँ । इसका दोष मैं दुसरो पर मंढता हूँ । मैं चाहता हूँ कि मेरे घर आंगन तक सरकार आये वो मुझे नौकरी दे । मै सरकार पर आश्रित होने लगा हूँ ।क्योंकि मुझे छोटे काम- धन्धे पसन्द नहीं है ।
मै हमेशा पुरखो की बडाई करके बडा रहना चाहता हूँ परन्तु ये नही समझता कि परिवर्तन संसार का नियम है अब मै यह नहीं समझता कि मेरे पुरखो की आन बान शान को बनाऐ रखने के लिए मुझे पढना पडेगा , मेहनत करनी पडेगी । बेहतर शिक्षा देने के लिए दाता-भबा के पास रुपया नही है तो भी मेरा मन छोटा नहीं करूंगा । छोटा मोटा काम करके भी पढाई करुंगा ।
दाता-भबा मजबूर थे, लेकिन मेरी कौम मजबूर न थी, न है! मैने आंखो से देखा है लाखो रुपयों की गोठे कराते हुए, मैने आँखों से देखा है लाखों रुपए मुझरो पर उड़ाते हुए, मैने आँखों से देखा है बेइंतहा फ़िज़ूल खर्च करते हुए।
काश! मेरे दाता-भबा या मेरी कौम मेरी शिक्षा की फ़िक़्र मंद होती तो आज मै प्रधान मंत्री या मंत्री न सही, लेकिन मैं आज बडी सख्या में क्लेक्टर, एडीएम,कमिश्नर जैसे बड़े पदों पर होता, बिना वोट पाये भी लाल बत्ती में होता, या कम से कम मै डॉक्टर,इंजिनियर,आर्किटेक्चर,या एक अच्छा बिजनेस मैन तो होता ही, लेकिन बचपन से मन में एक वहम घर कर गया है, "कि तुम राजपुत हो और राजपुतो को यहाँ नौकरी आसानी से नही मिलती" आरक्षण का डर घुस गया । लेकिन मैं ये तो भूल ही गया कि मेरी मेहनत से मै सबको झुका सकता हूँ । मेरे समाज के सफल विद्वानो ने शिक्षा पर अहम् जोर दिया है और बहूत से उच्च पदो पर सफल भी हूऐं है , फिर मै उनका अनुयायी होकर नौकरी मिलने की बात सोच कर शिक्षा क्यों हासिल नही करता ?
(नोट- दोस्तों ये मेसेज सिर्फ राजपुतो के लिए लिखी गयी है, कुवैत जाना, कडक्टरी करना, गाडी चला कर पेट पालना या छोटा धन्धा करना , दूध बेचना गैरेज के पाने उठाना या मजदूरी करना कोई गलत काम नही, लेकिन हम इसके लिए पैदा हुए है ये सोच कर शिक्षा हासिल न करना गलत है, खूब पढ़ाई करो, कि हर पद पर सिर्फ आप दिखो, हर कोई आपको पद की इज्जत से देखे । आप सबसे उच्चतम पढ़ें लिखे तबके में गिने जाओ, अंधविश्वास से दूर एक नयी जिंदगी जीकर देश व समाज की सेवा करें और.....जहां प्रोपोगंडा नामक चीज ही न हो, आने वाली पीढियों को पढा लिखा कर हम अब तक के अपने इतिहास को मजबुत दिशा की ओर बदल दे, यही एक ललक है कि ये समाज एक नया सवेरा देखे, कि जब भी सुबह का अखबार देखे हर अखबार के फ्रंट पेज पर आये इस शहर के नए कलेक्टर नए एडीएम नए कमीशनर आप हो!!
आपका भूपेन्द्रसिंह 🗡🚩