02/10/2026
वेदों के मूल संस्कृत मंत्रों में सामान्यतः “कबीर” देवनागरी में सीधे नहीं लिखा है; वहाँ कविर्, कविः, कविर्देव आदि शब्द आते हैं। संत रामपाल जी महाराज की वेबसाइट इन शब्दों का अर्थ/पहचान “कबीर परमेश्वर” के रूप में करती है।
1. ऋग्वेद — मंडल 9, सूक्त 96, मंत्र 17
संदर्भ: ऋग्वेद मंडल 9, सूक्त 96, मंत्र 17
शिशुम् जज्ञानम् हर्य तम् मृजन्ति शुम्भन्ति वह्निमरूतः गणेन।
कविर्गीर्भि काव्येना कविर् सन्त् सोमः पवित्रम् अत्येति रेभन्।।17।।
वेबसाइट के अनुसार इसमें “कविर्गीर्भिः” तथा “कविर्” शब्द हैं और इनका संबंध कबीर परमेश्वर से किया गया है। वेबसाइट का भावार्थ है कि पूर्ण परमात्मा विलक्षण बालक के रूप में प्रकट होकर अपनी ज्ञान-वाणी का उच्चारण करते हैं।
2. ऋग्वेद — मंडल 9, सूक्त 96, मंत्र 18
संदर्भ: ऋग्वेद मंडल 9, सूक्त 96, मंत्र 18
ऋषिमना य ऋषिकृत् स्वर्षाः सहस्त्राणीथः पदवीः कवीनाम्।
तृतीयं धाम महिषः सिषासन्त्सोमो विराजमनु राजति ष्टुप्।।18।।
इसमें “कवीनाम्” शब्द आता है। आधिकारिक वेबसाइट इसे पूर्ण परमात्मा कविर्देव से जोड़ती है और बताती है कि वे संत/ऋषि की भूमिका में प्रकट होकर ज्ञान-वाणी देते हैं।
3. ऋग्वेद — मंडल 9, सूक्त 96, मंत्र 19
चमूषच्छ्येनः शकुनो विभृत्वा गोविन्दुर्द्रप्स आयुधानि बिभ्रत्।
अपामूर्भि सचमानाः समुद्रं तुरीयं धाम महिषो विवक्ति।।19।।
संत रामपाल जी महाराज की वेबसाइट के अनुसार इस मंत्र के अर्थ में पूर्ण परमात्मा कविर्देव का वर्णन किया गया है।
4. ऋग्वेद — मंडल 9, सूक्त 96, मंत्र 20
मर्यो न शुभ्रस्तन्वं मृजानोऽत्यो न सृत्वा सनये धनानाम्।
वृषेव यूथा परि कोशमर्षन् कनिक्रदच्चम्बो३रा विवेश।।20।।
वेबसाइट के भाष्य में यहाँ वर्णित परमात्मा को कविर्देव अर्थात् कबीर परमेश्वर कहा गया है।
इस प्रकार ऋग्वेद 9.96.17–20 को आधिकारिक वेबसाइट ने एक साथ कबीर परमेश्वर के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया है।
5. ऋग्वेद — मंडल 9, सूक्त 94, मंत्र 1
आधिकारिक वेबसाइट इस मंत्र में “कवियन्/कविः” शब्द की व्याख्या कबीर परमेश्वर के संदर्भ में करती है। वेबसाइट के अनुसार परमात्मा कवियों की तरह आचरण करते हुए पृथ्वी पर विचरण करते हैं और तत्वज्ञान बताते हैं।
इस संदर्भ में वेबसाइट विशेष रूप से बताती है कि मूल मंत्र में “कविः” शब्द दो बार आता है।
6. ऋग्वेद — मंडल 9, सूक्त 20, मंत्र 1
संत रामपाल जी महाराज की आधिकारिक पुस्तकों में इस मंत्र को भी कबीर परमेश्वर के प्रमाणों में रखा गया है। वेबसाइट के अनुसार इसमें परमात्मा को कविर्देव, रक्षक तथा ज्ञान देने वाला बताया गया है।
7. ऋग्वेद — मंडल 9, सूक्त 82, मंत्र 1–2
आधिकारिक वेबसाइट इन मंत्रों को भी कविर्देव के प्रमाणों में गिनती है। वेबसाइट के अनुसार यहाँ परमात्मा को साकार/मानव-सदृश और उच्च लोक में स्थित बताया गया है तथा कविर्वेदस्य आदि शब्दों को कविर्देव से जोड़ा गया है।
8. ऋग्वेद — मंडल 9, सूक्त 86, मंत्र 26–27
आधिकारिक वेबसाइट इन दोनों मंत्रों को भी कबीर परमेश्वर के प्रमाण के रूप में सूचीबद्ध करती है। इसके अनुसार परमात्मा ऊपर के लोक से गति करके पृथ्वी पर आते हैं और भक्तों को तत्वज्ञान देते हैं।
9. यजुर्वेद — अध्याय 5, मंत्र 32
यह सबसे स्पष्ट संदर्भों में से एक है जिसे आधिकारिक वेबसाइट स्वयं सीधे कबीर नाम से जोड़ती है।
संदर्भ: यजुर्वेद अध्याय 5, मंत्र 32
वेबसाइट में पद-विभाजन इस प्रकार दिया गया है:
कविरंघारिसि ... बम्भारिसि ...
वेबसाइट की व्याख्या:
कविर् = कबीर परमेश्वर
अंघ = पाप
अरि = शत्रु
असि = है
अर्थात वेबसाइट के अनुसार “कविर्” को कबीर परमेश्वर माना गया है, जो पापों का शत्रु/पाप-विनाशक है।
10. यजुर्वेद — अध्याय 29, मंत्र 25
यह भी अत्यंत महत्वपूर्ण संदर्भ है।
संदर्भ: यजुर्वेद अध्याय 29, मंत्र 25
समिद्धोऽअद्य मनुषो दुरोणे देवो देवान्यजसि जातवेदः।
आ च वह मित्रामहश्चिकित्वान्त्वं दूतः कविरसि प्रचेताः।।25।।
इस मंत्र में स्पष्ट रूप से “कविरसि” शब्द आता है।
संत रामपाल जी महाराज की वेबसाइट के अनुसार:
कविरसि = कविर्देव अर्थात् कबीर परमेश्वर
वेबसाइट इसका भावार्थ यह देती है कि पूर्ण परमात्मा तत्वज्ञान का संदेश लेकर प्रकट होते हैं।
11. यजुर्वेद — अध्याय 40, मंत्र 8
आधिकारिक वेबसाइट का एक और प्रमुख प्रमाण:
संदर्भ: यजुर्वेद अध्याय 40, मंत्र 8
इसमें आने वाला प्रमुख पद है:
कविर् मनीषी...
वेबसाइट के अनुसार “कविर्” का अर्थ कबीर परमेश्वर है और इस मंत्र में परमात्मा को सर्वज्ञ, स्वयंप्रकाशित तथा सृष्टि का रचनहार बताया गया है।
12. सामवेद — संख्या 822, उतार्चिक अध्याय 3, खंड 5, श्लोक 8
संदर्भ: सामवेद संख्या 822
उतार्चिक अध्याय 3, खंड 5, श्लोक 8
मनीषिभिः पवते पूर्व्यः कविर्नृभिर्यतः परि कोशां असिष्यदत्।
त्रितस्य नाम जनयन्मधु क्षरन्निन्द्रस्य वायुं सख्याय वर्धयन्।।8।।
इसमें स्पष्ट रूप से “कविर्” शब्द है।
आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार:
कविर् नृभिः = कबीर परमेश्वर मानव रूप धारण करके गुरु रूप में प्रकट होते हैं।
वेबसाइट आगे इसे तीन नामों के उपदेश से भी जोड़ती है।
13. सामवेद — संख्या 1400, उतार्चिक अध्याय 12, खंड 3, श्लोक 5
संदर्भ: सामवेद संख्या 1400
**उतार्चिक अध्याय 12, खंड 3, श्लोक 5
भद्रा वस्त्रा समन्या३वसानो महान् कविर्निवचनानि शंसन्।
आ वच्यस्व चम्वोः पूयमानो विचक्षणो जागृविर्देववीतौ।।5।।
इसमें “महान् कविर्” आता है।
संत रामपाल जी महाराज की वेबसाइट के भाष्य में:
महान् कविर् = महान कविर अर्थात् पूर्ण परमात्मा कबीर
बताया गया है।
14. अथर्ववेद — काण्ड 4, अनुवाक 1, मंत्र 7
यह भी वेबसाइट पर बहुत स्पष्ट रूप से कविर्देव = कबीर परमेश्वर के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
संदर्भ: अथर्ववेद काण्ड 4, अनुवाक 1, मंत्र 7
योऽथर्वाणं पित्तरं देवबन्धुं बृहस्पतिं नमसाव च गच्छात्।
त्वं विश्वेषां जनिता यथासः कविर्देवो न दभायत् स्वधावान्।।7।।
इसमें स्पष्ट शब्द है:
कविर्देवः
वेबसाइट के अनुसार कविर्देवः = कबीर परमेश्वर, और इसी मंत्र में उन्हें सर्व ब्रह्मांडों का रचनहार बताया गया है।
आधिकारिक वेबसाइट द्वारा दिए गए मुख्य संदर्भ — एक जगह
वेद संदर्भ मुख्य शब्द
ऋग्वेद मंडल 9, सूक्त 96, मंत्र 17 कविर्गीर्भिः, कविर्
ऋग्वेद मंडल 9, सूक्त 96, मंत्र 18 कवीनाम्
ऋग्वेद मंडल 9, सूक्त 96, मंत्र 19–20 वेबसाइट के भाष्य में कविर्देव
ऋग्वेद मंडल 9, सूक्त 94, मंत्र 1 कविः/कवियन्
ऋग्वेद मंडल 9, सूक्त 20, मंत्र 1 कविर्देव संबंधी व्याख्या
ऋग्वेद मंडल 9, सूक्त 82, मंत्र 1–2 कविर्देव संबंधी व्याख्या
ऋग्वेद मंडल 9, सूक्त 86, मंत्र 26–27 कविर्देव संबंधी व्याख्या
यजुर्वेद अध्याय 5, मंत्र 32 कविर्
यजुर्वेद अध्याय 29, मंत्र 25 कविरसि
यजुर्वेद अध्याय 40, मंत्र 8 कविर् मनीषी
सामवेद संख्या 822, उतार्चिक 3/5/8 कविर्
सामवेद संख्या 1400, उतार्चिक 12/3/5 महान् कविर्
अथर्ववेद काण्ड 4, अनुवाक 1, मंत्र 7 कविर्देवः
इनमें से ऋग्वेद 9.96.17–20, यजुर्वेद 29.25, सामवेद 1400 और अथर्ववेद 4.1.7 को आधिकारिक वेबसाइट ने एक साथ “कविर्देव (कबीर परमेश्वर)” के प्रमाणों के रूप में सूचीबद्ध किया है।