11/01/2026
प्रेरकवक्ता,शिक्षाविद,पर्यावरणप्रेमी,
जय श्री राम जय बालाजी
11/01/2026
10/01/2026
एक नगर में देवशक्ति नाम का राजा रहता था । उसके पुत्र के पेट में एक साँप चला गया था । उस साँप ने वहीं अपना बिल बना लिया था । पेट में बैठे साँप के कारण उसके शरीर का प्रति-दिन क्षय होता जा रहा था । बहुत उपचार करने के बाद भी जब स्वास्थ्य में कोई सुधार न हुआ तो अत्यन्त निराश होकर राजपुत्र अपने राज्य से बहुत दूर दूसरे प्रदेश में चला गया । और वहाँ सामान्य भिखारी की तरह मन्दिर में रहने लगा ।
राजा की पुत्रियां-
उस प्रदेश के राजा बलि की दो नौजवान लड़कियाँ थीं । वह दोनों प्रति-दिन सुबह अपने पिता को प्रणाम करने आती थीं । उनमें से एक राजा को नमस्कार करती हुई कहती थी—
“महाराज ! जय हो । आप की कृपा से ही संसार के सब सुख हैं ।” दूसरी कहती थी—-“महाराज ! ईश्वर आप के कर्मों का फल दे ।” दूसरी के वचन को सुनकर महाराज क्रोधित हो जाता था । एक दिन इसी क्रोधावेश में उसने मन्त्रि को बुलाकर आज्ञा दी—-“मन्त्रि ! इस कटु बोलने वाली लड़की को किसी गरीब परदेसी के हाथों में दे दो, जिससे यह अपने कर्मों का फल स्वयं चखे ।”
राजकुमारी से विवाह-
मन्त्रियों ने राजाज्ञा से उस लड़की का विवाह मन्दिर में सामान्य भिखारी की तरह ठहरे परदेसी राजपुत्र के साथ कर दिया । राजकुमारी ने उसे ही अपना पति मानकर सेवा की । दोनों ने उस देश को छोड़ दिया ।
थोड़ी दूर जाने पर वे एक तालाब के किनारे ठहरे । वहाँ राजपुत्र को छोड़कर उसकी पत्नी पास के गाँव से घी-तेल-अन्न आदि सौदा लेने गई । सौदा लेकर जब वह वापिस आ रही थी , तब उसने देखा कि उसका पति तालाब से कुछ दूरी पर एक साँप के बिल के पास सो रहा है । उसके मुख से एक फनियल साँप बाहर निकलकर हवा खा रहा था । एक दूसरा साँप भी अपने बिल से निकल कर फन फैलाये वहीं बैठा था ।
सांपो की बातचीत-
दोनों में बातचीत हो रही थी । बिल वाला साँप पेट वाले साँप से कह रहा था—-“दुष्ट ! तू इतने सर्वांग सुन्दर राजकुमार का जीवन क्यों नष्ट कर रहा है ?”
पेट वाला साँप बोला—-“तू भी तो इस बिल में पड़े स्वर्णकलश को दूषित कर रहा है ।”
बिल वाला साँप बोला—-“तो क्या तू समझता है कि तुझे पेट से निकालने की दवा किसी को भी मालूम नहीं । कोई भी व्यक्ति राजकुमार को उकाली हुई कांजी की राई पिलाकर तुझे मार सकता है ।”
पेट वाला सांप बोला, “तुझे भी तो गर्म तेल डालकर कोई भी मार सकता है । “
सांपो का अंत
इस तरह दोनों ने एक दूसरे का भेद खोल दिया । राजकन्या ने दोनों की बातें सुन ली थीं । उसने उनकी बताई विधियों से ही दोनों का नाश कर दिया । उसका पति भी निरोग हो गया; और बिल में से स्वर्ण-भरा कलश पाकर गरीबी भी दूर हो गई । तब, दोनों अपने देश को चल दिये । राजपुत्र के माता-पिता दोनों ने उनका स्वागत किया ।
08/01/2026
कन्धे पर कपड़े का थान लादे और हाट-बाजार जाने की तैयारी करते हुए नामदेव जी से पत्नि ने कहा- भगत जी! आज घर में खाने को कुछ भी नहीं है।
आटा, नमक, दाल, चावल, गुड़ और शक्कर सब खत्म हो गए हैं।
शाम को बाजार से आते हुए घर के लिए राशन का सामान लेते आइएगा।
भक्त नामदेव जी ने उत्तर दिया- देखता हूँ जैसी विठ्ठल जी की कृपा।
अगर कोई अच्छा मूल्य मिला,
तो निश्चय ही घर में आज धन-धान्य आ जायेगा।
पत्नि बोली संत जी! अगर अच्छी कीमत ना भी मिले,
तब भी इस बुने हुए थान को बेचकर कुछ राशन तो ले आना।
घर के बड़े-बूढ़े तो भूख बर्दाश्त कर लेंगे।
पर बच्चे अभी छोटे हैं,
उनके लिए तो कुछ ले ही आना।
जैसी मेरे विठ्ठल की इच्छा...ऐसा कहकर भक्त नामदेव जी हाट-बाजार को चले गए।
बाजार में उन्हें किसी ने पुकारा- वाह सांई! कपड़ा तो बड़ा अच्छा बुना है और ठोक भी अच्छी लगाई है।
तेरा परिवार बसता रहे।
ये फकीर ठंड में कांप-कांप कर मर जाएगा।
दया के घर में आ और रब के नाम पर दो चादरों का कपड़ा इस फकीर की झोली में डाल दे।
भक्त कबीर जी- दो चादरों में कितना कपड़ा लगेगा फकीर जी?
फकीर ने जितना कपड़ा मांगा,
इतेफाक से भक्त नामदेव जी के थान में कुल कपड़ा उतना ही था।
और भक्त नामदेव जी ने पूरा थान उस फकीर को दान कर दिया।
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दान करने के बाद जब भक्त नामदेव जी घर लौटने लगे तो उनके सामने परिजनो के भूखे चेहरे नजर आने लगे।
फिर पत्नि की कही बात,
कि घर में खाने की सब सामग्री खत्म है।
दाम कम भी मिले तो भी बच्चो के लिए तो कुछ ले ही आना।
अब दाम तो क्या,
थान भी दान जा चुका था।
भक्त नामदेव जी एकांत में पीपल की छाँव मे बैठ गए।
जैसी मेरे विठ्ठल की इच्छा।
जब सारी सृष्टि की सार पूर्ती वो खुद करता है,
तो अब मेरे परिवार की सार भी वो ही करेगा।
और फिर भक्त नामदेव जी अपने हरिविठ्ठल के भजन में लीन हो गए।
अब भगवान कहां रुकने वाले थे। भक्त नामदेव जी ने सारे परिवार की जिम्मेवारी अब उनके सुपुर्द जो कर दी थी।
अब भगवान जी ने भक्त जी की झोंपड़ी का दरवाजा खटखटाया।
नामदेव जी की पत्नी ने पूछा- कौन है?
नामदेव का घर यही है ना?
भगवान जी ने पूछा।
अंदर से आवाज आई... हां जी यही है, आपको कुछ चाहिये??
भगवान सोचने लगे कि धन्य है नामदेव जी का परिवार घर में कुछ भी नहीं है, फिर भी हृदय में देने की, सहायता की जिज्ञासा हैl
भगवान बोले... दरवाजा खोलिये,
लेकिन आप कौन?
भगवान जी ने कहा- सेवक की क्या पहचान होती है भगतानी?
जैसे नामदेव जी विठ्ठल के सेवक,
वैसे ही मैं नामदेव जी का सेवक हूl
ये राशन का सामान रखवा लो।पत्नि ने दरवाजा पूरा खोल दिया।
फिर इतना राशन घर में उतरना शुरू हुआ,
कि घर के जीवों की घर में रहने की जगह ही कम पड़ गई। इतना सामान! नामदेव जी ने भेजा है?मुझे नहीं लगता...पत्नी ने पूछा?
भगवान जी ने कहा- हाँ भगतानी! आज नामदेव का थान सच्ची सरकार ने खरीदा है।
जो नामदेव का सामर्थ्य था उसने भुगता दिया।
और अब जो मेरी सरकार का सामर्थ्य है वो चुकता कर रही है।
जगह और बताओ।
सब कुछ आने वाला है भगत जी के घर में।
शाम ढलने लगी थी और रात का अंधेरा अपने पांव पसारने लगा था।
सामान रखवाते-रखवाते पत्नि थक चुकी थीं।
बच्चे घर में अमीरी आते देख खुश थे।
वो कभी बोरे से शक्कर निकाल कर खाते और कभी गुड़।
कभी मेवे देख कर मन ललचाते और झोली भर-भर कर मेवे लेकर बैठ जाते।
उनके बालमन अभी तक तृप्त नहीं हुए थे।
भक्त नामदेव जी अभी तक घर नहीं आये थे,
पर सामान आना लगातार जारी था।
आखिर पत्नी ने हाथ जोड़ कर कहा- सेवक जी! अब बाकी का सामान संत जी के आने के बाद ही आप ले आना।
हमें उन्हें ढूंढ़ने जाना है क्योंकि वो अभी तक घर नहीं आए हैं।
भगवान जी बोले- वो तो गाँव के बाहर पीपल के नीचे बैठकर विठ्ठल सरकार का भजन-सिमरन कर रहे हैं।
अब परिजन नामदेव जी को देखने गये।
सब परिवार वालों को सामने देखकर नामदेव जी सोचने लगे, जरूर ये भूख से बेहाल होकर मुझे ढूंढ़ रहे हैं।
इससे पहले की संत नामदेव जी कुछ कहते उनकी पत्नी बोल पड़ी- कुछ पैसे बचा लेने थे।अगर थान अच्छे भाव बिक गया था,
तो सारा सामान संत जी आज ही खरीद कर घर भेजना था क्या?
भक्त नामदेव जी कुछ पल के लिए विस्मित हुए।
फिर बच्चों के खिलते चेहरे देखकर उन्हें एहसास हो गया,
कि जरूर मेरे प्रभु ने कोई खेल कर दिया है।
पत्नि ने कहा... अच्छी सरकार को आपने थान बेचा और वो तो सामान घर में भेजने से रुकता ही नहीं था।
पता नहीं कितने वर्षों तक का राशन दे गया।
उससे मिन्नत कर के रुकवाया- बस कर! बाकी संत जी के आने के बाद उनसे पूछ कर कहीं रखवाएँगे।
भक्त नामदेव जी हँसने लगे और बोले- ! वो सरकार है ही ऐसी।
जब देना शुरू करती है तो सब लेने वाले थक जाते हैं।
उसकी बख्शीश कभी भी खत्म नहीं होती।
वह सच्ची सरकार की तरह सदा कायम रहती है।
जय श्री कृष्णा 🙏
#आस्था_की_ताकत
08/01/2026
खून के रिश्ते भी कर्मों का परिणाम भोगने या देने के लिए जुड़े हैं,,
एक स्त्री थी जिसे 20 साल तक सन्तान नहीं हुई। कर्म संजोग से 20 वर्ष के बाद वो गर्भवती हुई और उसे पुत्र सन्तान की प्राप्ति हुई किन्तु दुर्भाग्यवश 20 दिन में वो सन्तान मृत्यु को प्राप्त हो गयी। वो स्त्री हद से ज्यादा रोई और उस मृत बच्चे का शव लेकर एक सिद्ध महात्मा के पास गई। महात्मा से रोकर कहने लगी 'मुझे मेरा बच्चा बस एक बार जीवित करके दीजिये, मात्र एक बार में उसके मुख से 'माँ' शब्द सुनना चाहती हूँ।' स्त्री के बहुत जिद करने पर महात्मा ने 2 मिनट के लिए उस बच्चे की आत्मा को बुलाया। तब उस स्त्री ने उस आत्मा से कहा-'तुम मुझे क्यों छोड़कर चले गए ? मैं तुमसे सिर्फ एक बार 'माँ' शब्द सुनना चाहती हूँ।'
उस आत्मा ने कहा-'कौन माँ? कैसी माँ! मैं तो तुमसे कर्मों का हिसाब-किताब करने आया था।' स्त्री ने पूछा-'कैसा हिसाब ! आत्मा ने बताया 'पिछले जन्म में तुम मेरी सौतन थी, मेरे आँखों के सामने मेरे पति को ले गई, मैं बहुत रोई तुमसे अपना पति माँगा पर तुमने एक न सुनी। तब मैं रो रही थी और आज तुम रो रही हो ! तब मेरा पति गया था, आज तुमने अपनी सन्तान खोई है। बस मेरा तुम्हारे साथ जो कर्मों का हिसाब था वो मैंने पूरा किया और मर गया।' इतना कहकर आत्मा चली गयी। उस स्त्री को झटका लगा। उसे महात्मा ने समझाया- 'देखो मैने कहा था न कि ये सब रिश्तेदार माँ, पिता, भाई, बहन सब कर्मों के कारण जुड़े हुए हैं। हम सब कमों का हिसाब करने आये हैं। यही हमारे रिश्तों की नियति है, इसलिए बस अच्छे कर्म करो ताकि हमें बाद में भुगतना ना पड़े।' वो स्त्री समझ गयी और अपने घर लौट गयी। अतः हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए।
#आस्था_की_ताकत
06/01/2026
जो पै जिय लज्जा नहीं, कहा कहौं सौ बार।
एकहु अंक न हरि भजे, रे सठ ‘सूर’ गँवार॥
~ सूरदास
#भक्ति
04/01/2026
सावित्रीबाई फुले,,
प्रथम महिला शिक्षिका।।
#शिक्षाकीताकत
03/01/2026
एक बार की बात है नारद जी विष्णु भगवानजी से मिलने गए। भगवान ने उनका बहुत सम्मान किया। जब नारद जी वापिस गए तो विष्णुजी ने कहा हे लक्ष्मी जिस स्थान पर नारद जी बैठे थे। उस स्थान को गाय के गोबर से लीप दो।
जब विष्णुजी यह बात कह रहे थे तब नारदजी बाहर ही खड़े थे। उन्होंने सब सुन लिया और वापिस आ गए और विष्णु भगवान जी से पुछा हे भगवान जब मै आया तो आपने मेरा खूब सम्मान किया पर जब मै जा रहा था, तो आपने लक्ष्मी जी से यह क्यों कहा कि जिस स्थान पर नारद बैठा था उस स्थान को गोबर से लीप दो।
भगवान ने कहा हे नारद मैंने आपका सम्मान इसलिए किया क्योंकि आप देव ऋषि है और मैंने देवी लक्ष्मी से ऐसा इसलिए कहा क्योंकि आपका कोई गुरु नहीं है।
आप निगुरे है। जिस स्थान पर कोई निगुरा बैठ जाता है वो स्थान गन्दा हो जाता है।
यह सुनकर नारद जी ने कहा हे भगवान आपकी बात सत्य है पर मै गुरु किसे बनाऊ?
नारायण बोले: हे नारद !धरती पर चले जाओ जो व्यक्ति सबसे पहिले मिले उसे अपना गुरु मानलो।
नारद जी ने प्रणाम किया और चले गए। जब नारद जी धरती पर आये तो उन्हें सबसे पहले एक मछली पकड़ने वाला एक मछुवारा मिला। नारद जी वापिस नारायण के पास चले गए और कहा महाराज वो मछुवारा तो कुछ भी नहीं जानता मै उसे गुरु कैसे मान सकता हूँ?
यह सुनकर भगवान ने कहा नारद जी अपना प्रण पूरा करो। नारद जी वापिस आये और उस मछुवारे से कहा मेरे गुरु बन जाओ। पहले तो मछुवारा नहीं माना बाद में बहुत मनाने से मान गया। मछुवारे को राजी करने के बाद नारद जी लौट कर भगवान के पास गए और कहा हे भगवान। मेरे गुरूजी को तो कुछ भी नहीं आता वे मुझे क्या सिखायेगे?
यह सुनकर विष्णु जी को क्रोध आ गया और उन्होंने कहा: हे नारद गुरु निंदा करते हो जाओ मै आपको श्राप देता हूँ कि आपको ८४ लाख योनियों में घूमना पड़ेगा।
यह सुनकर नारद जी ने दोनों हाथ जोड़कर कहा हे भगवान। इस श्राप से बचने का उपाय भी बता दीजिये। भगवान नारायण ने कहा इसका उपाय जाकर अपने गुरुदेव से पूछो। नारद जी ने सारी बात जाकर गुरुदेव को बताई। गुरूजी ने कहा ऐसा करना भगवान से कहना ८४ लाख योनियों की तस्वीरे धरती पर बना दे फिर उस पर लेट कर गोल घूम लेना और विष्णु जी से कहना ८४ लाख योनियों में घूम आया मुझे छमा कर दीजिए आगे से गुरु निंदा नहीं करूँगा।
नारद जी ने विष्णु जी के पास जाकर ऐसा ही किया उनसे कहा ८४ लाख योनिया धरती पर बना दो और फिर उन पर लेट कर घूम लिए और कहा नारायण मुझे छमा कर दीजिए आगे से कभी गुरु निंदा नहीं करूँगा। यह सुनकर विष्णु जी ने कहा देखा जिस गुरु की निंदा कर रहे थे उसी ने मेरे श्राप से बचा लिया। नारदजी गुरु की महिमा अपरम्पार है।
गुरु गूंगे गुरु बाबरे, गुरु के रहिये दास,
गुरु जो भेजे नरक को, स्वर्ग कि रखिये आस !
गुरु चाहे गूंगा हो, चाहे गुरु बावरा हो गुरु के हमेशा दास रहना चाहिए। गुरु यदि नरक को भेजे तब भी शिष्य को यह इच्छा रखनी चाहिए कि मुझे स्वर्ग प्राप्त होगा, अर्थात इसमें मेरा कल्याण ही होगा! यदि शिष्य को गुरु पर पूर्ण विश्वास हो तो उसका बुरा स्वयं गुरु भी नहीं कर सकते।
यह प्रसंग पंडित श्री धन्ने भगत ने एक साधारण पत्थर देकर कहा इसे भोग लगाया करो एक दिन भगवान कृष्ण दर्शन देंगे। उस धन्ने भक्त के विश्वास से एक दिन उस पत्थर से भगवान प्रकट हो गए। फिर गुरु पर तो वचन विश्वास रखने वाले का उद्धार निश्चित है।
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#आस्था_की_ताकत
03/01/2026
भारत देश का नामकरण
#भरत---- #भारत
शकुंतला की पावन कथा! #नीचे वही कथा सरल, प्रवाहपूर्ण और कहानी के रूप में प्रस्तुत है—ताकि पढ़ते समय रस बना रहे।
शकुंतला की पावन कथा-
प्राचीन काल में महर्षि विश्वामित्र कठोर तपस्या में लीन थे। उनके तप के प्रभाव से देवताओं का सिंहासन डगमगाने लगा। इंद्र को भय हुआ कि विश्वामित्र कहीं देवत्व न प्राप्त कर लें। उनकी तपस्या भंग करने के लिए इंद्र ने स्वर्ग की सुंदर अप्सरा मेनका को पृथ्वी पर भेजा।
मेनका ने अपने सौंदर्य और मधुर कला से विश्वामित्र की तपस्या भंग कर दी। समय के साथ दोनों के संयोग से एक कन्या ने जन्म लिया। किंतु मेनका का हृदय स्वर्ग की ओर आकृष्ट था। लोक-लाज और अपने दायित्वों के कारण उन्होंने उस नवजात शिशु को मालिनी नदी के तट पर छोड़ दिया और स्वर्ग लौट गईं।
वन में पड़ी उस नन्ही बालिका की रक्षा स्वयं प्रकृति ने की। पक्षियों ने उसे अपने पंखों से घेर लिया। संस्कृत में शकुंत का अर्थ पक्षी होता है—इसी कारण आगे चलकर उसका नाम शकुंतला पड़ा।
उसी समय महर्षि कण्व वहां से गुजर रहे थे। उन्होंने उस बालिका को देखा, करुणा से उनका हृदय भर आया। वे उसे अपने आश्रम ले आए और पुत्री समान प्रेम से उसका पालन-पोषण किया। आश्रम की शांत, पवित्र और प्रकृति-संलग्न वातावरण में शकुंतला एक सुशील, कोमल और तेजस्वी युवती बनी।
एक दिन हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत शिकार करते हुए कण्व आश्रम पहुंचे। वहीं उनकी भेंट शकुंतला से हुई। पहली ही दृष्टि में दोनों एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हो गए। परस्पर प्रेम से उन्होंने गंधर्व विवाह किया। दुष्यंत ने शकुंतला को एक अंगूठी स्मृति-चिह्न के रूप में दी और राज्य के कार्यों के लिए राजधानी लौट गए।
दुर्भाग्यवश, एक दिन ऋषि दुर्वासा आश्रम आए। ध्यानमग्न शकुंतला उनके आगमन पर उचित स्वागत न कर सकीं। इससे क्रोधित होकर दुर्वासा ने शाप दिया कि जिसके बारे में वह सोच रही हैं, वह उन्हें भूल जाएगा। शाप में यह भी कहा गया कि कोई स्मृति-चिह्न ही उस स्मरण को लौटा सकेगा।
समय आने पर शकुंतला अपने पुत्र भरत के साथ दुष्यंत के दरबार में पहुंचीं, किंतु शापवश राजा ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया। मार्ग में वह अंगूठी भी नदी में गिर चुकी थी। अपमानित और दुःखी होकर शकुंतला वन लौट गईं।
कुछ समय बाद एक मछुआरे को मछली के पेट से वही अंगूठी मिली। अंगूठी देखते ही दुष्यंत को सब स्मरण हो आया—प्रेम, विवाह और पुत्र। पश्चाताप से भरकर वे शकुंतला को खोजते हुए पहुंचे और पूरे सम्मान के साथ उन्हें और पुत्र भरत को राजमहल ले आए।
इसके बाद तीनों ने सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया। उनका पुत्र भरत एक महान, पराक्रमी और धर्मनिष्ठ राजा बना। उसी के नाम पर इस महान देश का नाम भारतवर्ष पड़ा।
यह कथा प्रेम, त्याग, धैर्य और धर्म की अमर मिसाल है—और इसी भाव को राजा रवि वर्मा ने अपनी प्रसिद्ध पेंटिंग में सजीव
किया है,,
#शकुन्तला
#अभिज्ञानशकुन्तलम
02/01/2026
शीर्षक: कर्म का फल किसे मिला? एक अद्भुत पौराणिक कथा 🕉️⚖️
एक प्रतापी राजा ने राजमहल के बगीचे में ब्राह्मण भोज का आयोजन किया। रसोइया खुले में भोजन पका रहा था।
उसी समय आकाश में एक चील, चोंच में सर्प दबाए उड़ रही थी। आत्मरक्षा में सर्प ने फन फैलाया और ज़हर उगल दिया। दुर्भाग्यवश, ज़हर की कुछ बूंदें नीचे पक रहे भोजन में गिर गईं।
न रसोइये को पता चला, न राजा को। वह ज़हरीला भोजन करने से सभी ब्राह्मणों की मृत्यु हो गई। एक साथ इतने ब्रह्महत्याओं का घोर पाप लगा!
🤔 अब यमराज/भगवान के सामने धर्मसंकट खड़ा हुआ कि इस पाप की सज़ा किसे मिले?
🔸 राजा को? (उसे पता नहीं था)
🔸 रसोइये को? (वह भी अनभिज्ञ था)
🔸 चील को? (वह तो अपना शिकार ले जा रही थी)
🔸 या सर्प को? (उसने आत्मरक्षा में ज़हर उगला)
फैसला रुका रहा...
कुछ समय बाद, कुछ नए ब्राह्मण उस नगर में आए और एक महिला से राजमहल का रास्ता पूछा। महिला ने रास्ता तो बताया, पर साथ में निंदा रस लेते हुए बोली- "जाइये, मगर संभलकर! वह राजा ब्राह्मणों को भोजन में ज़हर मिलाकर मार देता है।"
⚡ बस! भगवान ने तय कर लिया।
भगवान ने कहा- "इस पाप का फल इस महिला को मिलेगा।"
सब हैरान थे! वह महिला तो घटना के वक्त वहां थी भी नहीं।
तब भगवान ने कर्म का गूढ़ सिद्धांत समझाया:
"किसी भी कर्म (विशेषकर पाप) का आनंद जो सबसे ज्यादा लेता है, फल भी उसी को भुगतना पड़ता है। इस पूरी दुखद घटना में न राजा को आनंद आया, न रसोइये को, न चील-सर्प को। लेकिन इस महिला ने उस घटना की निंदा करके सबसे ज्यादा 'रस' लिया, इसलिए यह पाप की भागीदार बनी।"
📜 सार:-
कर्म का सिद्धांत बहुत सूक्ष्म है। हमारे शब्द, हमारे विचार और दूसरों के प्रति हमारी भावनाएं भी 'कर्म' ही हैं। दूसरों की बुराई या निंदा में जो रस हम लेते हैं, वह हमारे पापों का घड़ा भरता है।
इसलिए कहते हैं- जैसा दोगे, वैसा ही लौटकर आएगा। सकारात्मक सोचें, सकारात्मक बोलें। 🙏
30/12/2025
भक्त का ऋण और भगवान का संकोच: एक भावपूर्ण कथा
एक समय की बात है, एक परम संत थे। उनका पूरा जीवन भगवान के नाम-जप और सिमरन में ही बीत गया। उनकी भक्ति की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने आज तक भगवान से कभी कुछ नहीं माँगा। न धन, न यश, न मोक्ष—केवल निस्वार्थ भाव से (निष्काम भक्ति) वे निरंतर "राधे-राधे" और "हरि-नाम" का जाप करते रहते थे।
एक दिन उन भक्त के मन में वृंदावन जाकर श्री बांके बिहारी जी के दर्शन करने की इच्छा जागी। वे बड़े उत्साह के साथ मंदिर पहुँचे। मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ थी, जयकारे गूँज रहे थे। पर्दा खुला और सभी भक्त भाव-विभोर हो गए।
लेकिन यह क्या? जैसे ही उन संत ने गर्भगृह की ओर देखा, उन्हें वहाँ भगवान दिखाई ही नहीं दिए। सिंहासन खाली था।
वे घबरा गए। उन्होंने बगल में खड़े एक व्यक्ति को हिलाया और पूछा, "भैया! क्या आज ठाकुर जी का श्रृंगार नहीं हुआ? क्या वे अभी शयन में हैं? सिंहासन खाली क्यों है?"
उस व्यक्ति ने हैरानी से उनकी ओर देखा और कहा, "बाबा! आप कैसी बातें कर रहे हैं? सामने साक्षात बांके बिहारी जी अपनी टेढ़ी चितवन के साथ खड़े हैं। क्या आपको दिखाई नहीं दे रहे? अंधे हो क्या?"
संत ने दूसरे, तीसरे, चौथे व्यक्ति से पूछा। सबका यही उत्तर था—"भगवान तो सामने ही हैं।"
आत्मग्लानि और निराशा
अब उन भक्त का हृदय बैठ गया। वे सोचने लगे, "पूरी दुनिया को मेरे प्रभु दिख रहे हैं, केवल मुझे ही नहीं दिख रहे? अवश्य ही मैं बहुत बड़ा पापी हूँ। मेरे भजनों में कोई खोट है। जिस आँखों से मेरे आराध्य ही न दिखें, उन आँखों का और इस जीवन का मैं क्या करूँ?"
आत्मग्लानि इतनी बढ़ गई कि उन्होंने जीवन त्यागने का निर्णय ले लिया। आँखों में आँसू लिए, वे उल्टे पाँव यमुना जी की ओर चल पड़े ताकि जल समाधि ले सकें।
इधर अंतर्यामी प्रभु, जो अपने भक्त की हर सांस की खबर रखते हैं, वे सब देख रहे थे। भगवान तुरंत एक साधारण ब्राह्मण का वेश धारण कर मंदिर के बाहर बैठे एक कोढ़ी के पास पहुँचे।
उस कोढ़ी की दशा अत्यंत दयनीय थी। भगवान (ब्राह्मण वेश में) ने उससे कहा, "देख भाई! वो जो महात्मा अभी जा रहे हैं न, वे सिद्ध पुरुष हैं। उनके पुण्य का कोई पार नहीं है। यदि वे तुझे आशीर्वाद दे दें, तो तेरा कोढ़ अभी, इसी क्षण ठीक हो सकता है। जा, उन्हें रोक ले!"
जीवन की आस में वह कोढ़ी पूरी ताकत से दौड़ पड़ा। यमुना तट पर पहुँचकर उसने उन संत का रास्ता रोक लिया और उनके चरणों में गिर पड़ा।
कोढ़ी गिड़गिड़ाने लगा, "महाराज! मुझ पर दया करें। मुझे आशीर्वाद दे दीजिये ताकि मेरा शरीर ठीक हो जाए।"
संत, जो स्वयं आत्महत्या करने जा रहे थे, रुआँसे होकर बोले,
"भैया! मुझे छोड़ दे। मैं तो स्वयं बड़ा अभागा हूँ। मैं इतना बड़ा पापी हूँ कि मुझे आज मंदिर में भगवान तक के दर्शन नहीं हुए। मेरा आशीर्वाद तुझे क्या ही लगेगा?"
परंतु कोढ़ी ने पैर नहीं छोड़े। वह रोता रहा कि ब्राह्मण देवता ने कहा है, आप ही मुझे ठीक कर सकते हैं।
हारकर और पीछा छुड़ाने के लिए उन भक्त ने अनमने भाव से कह दिया, "जा भाई! भगवान तेरी इच्छा पूरी करें। श्री हरि तेरा कल्याण करें।"
जैसे ही संत के मुख से ये शब्द निकले, एक चमत्कार हुआ। कोढ़ी का शरीर कंचन जैसा चमकने लगा। उसका रोग क्षण भर में लुप्त हो गया।
संत यह देखकर स्तब्ध रह गए। "यह कैसे संभव हुआ? मैं तो पापी हूँ, फिर मेरी वाणी में इतना बल कैसे?"
वे अभी यह सोच ही रहे थे कि अचानक पूरा वातावरण सुगंधित हो गया और साक्षात श्री बांके बिहारी जी उनके सामने प्रकट हो गए। वही मोहिनी मूरत, वही मंद मुस्कान।
भक्त प्रभु को सामने देखकर रो पड़े और चरणों में गिर गए। उन्होंने सिसकते हुए पूछा, "प्रभु! यह आपकी कैसी लीला है? जब मैं मंदिर में दर्शन के लिए तरस रहा था, तब आप अंतर्ध्यान हो गए। और अब जब मैं मरने जा रहा था, तो आप यहाँ प्रकट हो गए? मुझसे ऐसा क्या अपराध हुआ था?"
भगवान ने अपने भक्त को उठाया, गले लगाया और जो उत्तर दिया, वह हर भक्त के हृदय को छू लेने वाला है।
भगवान बोले: "प्रिय भक्त! तुमने जीवन भर मेरा नाम जपा, मेरी सेवा की, परंतु बदले में कभी एक पैसे की भी चाह नहीं रखी। न सुख माँगा, न दुख मिटाने को कहा। तुम्हारी इस 'निष्काम भक्ति' के कारण मैं तुम्हारा बहुत बड़ा ऋणी (कर्जदार) हो गया था।"
प्रभु ने आगे कहा, "जिसका कर्ज देना हो, उसके सामने जाने में साहूकार को भी संकोच होता है। तुम्हारे पुण्य का बोझ मुझ पर इतना अधिक था कि मंदिर में मैं तुमसे आँखें नहीं मिला पा रहा था, मुझे शर्म आ रही थी कि मैं तुम्हें क्या मुँह दिखाऊँ? इसलिए मैं छिप गया था।"
"परंतु अभी, जब तुमने मेरे भेजे हुए उस कोढ़ी को अपने 'पुण्य-पुंज' में से आशीर्वाद दिया और उसकी बीमारी ठीक की, तो तुमने अपने पुण्यों का कुछ हिस्सा खर्च कर दिया। इससे मेरा 'ऋण' कुछ कम हुआ और मेरा संकोच मिट गया। इसीलिए अब मैं तुम्हारे सामने प्रकट हो सका हूँ।"
सच्ची भक्ति वह नहीं जो भगवान से "मांगने" के लिए की जाए। सच्ची भक्ति तो "देने" का नाम है। जब भक्त भगवान से कुछ नहीं मांगता, तो भगवान स्वयं उस भक्त के ऋणी हो जाते हैं और उसके अधीन हो जाते हैं।
> "चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
> जिसको कछु न चाहिए, वो ही शहंशाह॥"
जय श्री कृष्णा 🙏
28/12/2025
एक समय की बात है एक महात्मा अपने शिष्य के साथ घूमने के लिए निकले । महात्मा को इधर उधर की बातें करना बिल्कुल भी पसंद नहीं था । कम बोलना और शांत रहकर अपने काम से काम रखना महात्मा को पसंद था लेकिन उनका शिष्य बड़ा बातूनी था । वह सारा दिन इधर उधर की बातें ही किया करता था और दूसरों की बातों में उसे बहुत आनंद आता था ।
चलते-चलते जब महात्मा और उनका शिष्य एक तालाब के पास से गुजर रहे थे तो उन्होंने वहां एक मछुआरे को पानी में जाल डालें मछली पकड़ते हुए देखा । शिष्य को यह बात बहुत बुरी लगी और वह मछुआरे को अहिंसा परमो धर्म का उपदेश देने लगा लेकिन मछुआरा उसकी कोई बात समझने को तैयार नहीं हुआ । पहले मछुआरा शिष्य की बात को टालता रहा लेकिन जब शिष्य उसकी बात नहीं माना तो दोनों के बीच में लड़ाई झगड़ा शुरू हो गया ।
जब दोनों आपस में बहस कर रहे थे तो महात्मा आगे निकल गए था लेकिन जब महात्मा ने दोनों को आपस में झगड़ते हुए देखा तो वह वापस लौटे और शिष्य को अपने साथ चलने के लिए कहा और शिष्य का हाथ पकड़कर महात्मा उसको अपने साथ ले गए ।
महात्मा ने शिष्य को कहा बेटा हमारा काम तो सिर्फ समझाना है लेकिन भगवान ने हमें सजा देने के लिए धरती पर नहीं भेजा है । शिष्य ने कहा गुरुजी हमारे राजा को इस तरह के लोगों के लोगों के बारे में पता है जो इस तरह के बुरे कार्य करते हैं और ना ही वह इनको दंड देते हैं आखिर इस तरह के लोगों को सजा कौन देगा ।
शिष्य की बात सुनकर महात्मा ने कहा कि बेटा तुम परेशान मत हो इनको सजा देने वाली भी एक अलौकिक शक्ति इस दुनिया में है, जो सब कुछ जानती है । भगवान की नजर सब के ऊपर है और वह सब के कर्मों का हिसाब रखते हैं इसलिए तुम अभी चलो तुम्हारा उससे झगड़ा करने का कोई फायदा नहीं है ।
शिष्य गुरु जी की बात सुनकर संतुष्ट हो गया और उनके साथ चल दिया । इस बात को बीते हुए दो वर्ष का समय निकल चुका था । एक दिन महात्मा और उनका शिष्य फिर उसी नदी के पास से गुजर रहे थे । शिष्य भी दो साल पहले वाली मछुआरे वाली घटना भूल चुका था । वहां उन्होंने एक घायल सांप को देखा जो बहुत परेशानी में था । उस सांप को हजारों चीटियां नोच नोच कर खा रही थी ।
शिष्य ने यह दृश्य देखा तो उसका दिल करुणा से भर गया उससे यह सब देखा नहीं गया । वह सांप को बचाने के लिए जाने ही लगा था कि महात्मा ने उसका हाथ पकड़ लिया और उसको जाने से मना कर दिया । शिष्य ने गुरु से पूछा, आप मुझे सांप को बचाने के लिए क्यों नहीं जाने दे रहे ? महात्मा ने कहा, इस सांप को अपने कर्मों का फल भोगने दो अगर तुमने इस को बचाने की कोशिश की तो इस बेचारे को अगले जन्म में फिर यह दुख भोगने पड़ेंगे क्योंकि कर्म का फल सभी को भोगना पड़ता है ।
शिष्य ने महात्मा से पूछा कि गुरु जी इसमें ऐसा कौन सा कर्म किया है जो यह इतना भयंकर कष्ट भोग रहा है । महात्मा ने कहा कि यह वही मछुआरा है जिसको तुमने दो साल पहले मछलियों का ना मारने का उपदेश दिया था और वह तुम्हारे साथ लड़ने के लिए तैयार हो गया था । वह मछलियां हीं यह चीटियां है जो इसको नोच नोच कर खा रही है ।
शिष्य महात्मा की बात सुनकर हैरान हो गया और उसने महात्मा से पूछा कि गुरुजी यह तो बड़ा ही अजीब सा न्याय है । महात्मा ने कहा बेटा इस दुनिया में है स्वर्ग और नरक के सारे दृश्य मौजूद हैं । तुम्हें इस धरती पर हर जगह ईश्वर के न्याय के नमूने देखने को मिल सकते हैं इसलिए अपने कर्म को हमेशा याद रखना चाहिए क्योंकि सच यही है जो हम करेंगे वह एक दिन हमें भोगना ही पड़ेगा ।
महात्मा ने कहा कि हमारे जीवन का हर पल बहुत ही कीमती है इसलिए इस जीवन को बुरे कर्म करके बर्बाद नहीं करना चाहिए । शिष्य को गुरु जी की बात समझ में आ गई ।
शिक्षा : दोस्तों यदि हम अपने जीवन में बहुत ज्यादा अच्छे कर्म करते हैं तो उसी के फलस्वरूप भगवान हमारे साथ न्याय करेंगे इसलिए हमें जीवन में हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए,,