23/06/2026
❣️वंदना त्रिपाठी जी की कलम से ❣️
मुझे बेहद रोचक कहानी लगी
❣️❣️❣️❣️❣️❣️
"फादर्स डे पर बाप का बदला" 😂🥹
फादर्स डे वाले दिन सुबह-सुबह मैंने फेसबुक खोला।
दोस्त लोग अपने पिताजी के साथ फोटो डाल रहे थे।
कोई लिख रहा था— "मेरे पापा मेरे हीरो हैं..."
कोई लिख रहा था— "मेरे पापा मेरे सुपरमैन हैं..."
मैंने भी जोश में आकर पोस्ट डाल दी—
"मेरे पिता जी किसी भी फादर्स डे के मोहताज नहीं हैं। उनका जब भी दिल करता है, जूता उठाकर याद दिला देते हैं कि बाप-बाप होता है!" 🤣
पोस्ट वायरल हो गई।
हजारों लाइक।
सैकड़ों कमेंट।
मैं खुशी से फूला नहीं समा रहा था।
तभी दरवाजे पर आवाज आई—
"ओए लेखक साहब!"
मैंने बाहर देखा...
पिताजी मोबाइल हाथ में लिए खड़े थे।
और उनके चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी जिसे देखकर मेरी आत्मा तक कांप गई।
उन्होंने पूछा—
"बहुत बड़ा कॉमेडियन बन गया है तू?"
मैं समझ गया...
पोस्ट इनके हाथ लग गई है।
मैं भागने लगा।
लेकिन इस बार कुछ अजीब हुआ।
पिताजी ने जूता नहीं उठाया।
उन्होंने कहा—
"आज नहीं मारूंगा।"
मैंने राहत की सांस ली।
लेकिन मुझे क्या पता था कि असली खतरा अभी शुरू हुआ है।
शाम को घर में रिश्तेदार आ गए।
चाचा, ताऊ, मौसी, फूफा...
पूरा परिवार।
मैं सोच रहा था कोई पूजा-वूजा होगी।
तभी पिताजी कुर्सी पर खड़े हो गए।
और बोले—
"आज फादर्स डे है। और मेरे बेटे ने फेसबुक पर मेरे बारे में बहुत कुछ लिखा है। अब मेरी भी बारी है।"
मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।
उन्होंने अपना मोबाइल निकाला।
और बचपन की तस्वीरें दिखानी शुरू कर दीं।
पहली फोटो...
मैं नंगा बैठा हुआ था और सामने स्टील की थाली में मिट्टी खा रहा था।
पूरा घर हंस पड़ा।
मैंने कहा—
"पापा हटाइए ये!"
वो बोले—
"अभी तो शुरुआत है बेटा।"
दूसरी फोटो...
मैं पांच साल का था।
पड़ोस वाली पिंकी के साथ शादी-शादी खेल रहा था।
माथे पर लाल टीका।
गले में माला।
पिताजी बोले—
"ये हमारा बेटा है। पांच साल की उम्र में ही प्रेम विवाह कर चुका था।"
पूरा घर ठहाके मारकर हंस पड़ा।
मैं पसीना-पसीना हो गया।
फिर उन्होंने एक पुरानी कॉपी निकाली।
बोले—
"अब इसके बचपन की कविताएं सुनिए।"
मैंने सोचा कोई अच्छी कविता होगी।
लेकिन उन्होंने पढ़ना शुरू किया—
"चंदा मामा दूर के, पकौड़े बनाएं सूर के..."
पूरा घर हंस-हंसकर लोटपोट।
मैं शर्म से मर रहा था।
फिर अचानक पिताजी चुप हो गए।
उन्होंने कॉपी बंद कर दी।
और बोले—
"मजाक बहुत हो गया।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
मैंने पहली बार देखा...
उनकी आंखें हल्की सी भर आई थीं।
उन्होंने मेरी तरफ देखकर कहा—
"आज ये सब हंस रहे हैं ना... लेकिन इन्हें एक बात नहीं पता।"
"जब ये पैदा हुआ था तो अस्पताल में सिर्फ 1700 रुपये का बिल था... और मेरी जेब में 900 रुपये।"
सब चुप।
"मैंने अपनी घड़ी बेच दी थी।"
कमरे में सन्नाटा और गहरा हो गया।
उन्होंने आगे कहा—
"जब ये पांचवीं में फेल हुआ था... तो पूरी कॉलोनी इसे बेवकूफ कह रही थी।"
"लेकिन मैंने किसी को कुछ नहीं कहा।"
"रात को छत पर जाकर अकेले रोया था।"
मेरे गले में कुछ अटक गया।
उन्होंने मेरी तरफ देखा।
और मुस्कुराकर बोले—
"जब ये पहली बार नौकरी के लिए शहर गया था... तो स्टेशन से लौटते समय मैं बस में नहीं बैठा।"
"पूरे दस किलोमीटर पैदल चला।"
क्योंकि अगर बस में बैठता तो लोग पूछते—
'इतना उदास क्यों है?'
और मैं रो पड़ता।"
अब पूरे घर की आंखें नम थीं।
फिर उन्होंने जेब से कुछ निकाला।
एक छोटा सा टूटा हुआ प्लास्टिक का खिलौना।
मैं पहचान गया।
मेरी बचपन वाली लाल कार।
जो मैं पांच साल की उम्र में खो चुका था।
मैं हैरान रह गया।
"ये आपके पास कैसे है?"
पिताजी हंसे।
बोले—
"जिस दिन तू रो-रोकर इसे ढूंढ रहा था... उस दिन मुझे खेत में मिली थी।"
"सोचा था बड़ा होगा तो दूंगा।"
"लेकिन तू बड़ा हो गया... और मैं भूल गया।"
अब मैं खुद को रोक नहीं पाया।
मैं उठकर उनके गले लग गया।
पूरे घर के सामने।
पहली बार।
तभी पिताजी ने धीरे से मेरे कान में कहा—
"और सुन..."
मैंने कहा—
"जी पापा?"
उन्होंने मुस्कुराकर कहा—
"फेसबुक पर लिख देना... कि बाप सिर्फ जूता नहीं उठाता।"
"कभी-कभी पूरी जिंदगी उठा लेता है... ताकि बेटा गिर न जाए।"
बस...
उस दिन समझ आया कि बचपन में जिस जूते से मैं डरता था...
असल में वही जूता धूप में जलते पैरों पर चलकर मेरे लिए रोटी कमाने जाता था।
और जिस आदमी पर मैं मजाक करता था...
वो आदमी चुपचाप अपनी पूरी जिंदगी मेरी खुशियों के नाम लिख चुका था।
उस रात मैंने फेसबुक पर सिर्फ एक लाइन लिखी—
"बचपन में लगता था पापा मुझे जूते से चलाते हैं... आज समझ आया, वो खुद घिस गए ताकि मैं चल सकूं..." ❤️🥹
और यकीन मानिए...
उस पोस्ट पर सबसे पहला लाइक मेरे पिताजी का था। ❤️🙏🏻
Vandna Tripathi ✍️