01/06/2020
#वर्तमान_भारतीय_शिक्षा_व्यवस्था
1858 में इंडियन एजुकेशन एक्ट बनाया। इसकी ड्राफ्टिंग लॉर्ड मैकाले ने की थी लेकिन ऐसा करने के पहले उसने यहां भारत की शिक्षा व्यवस्था का सर्वेक्षण करवाया। हालांकि उसके पहले भी कई अंग्रेजों ने भारत के शिक्षा व्यवस्था के बारे में अपनी रिपोर्ट दी थी। अंग्रेजों के दो अधिकारी थे। एक था जी. डब्ल्यू. लिटनर और दूसरा था थॉमस मुनरो। दोनों ने अलग-अलग समय में देश के अलग अलग इलाकों का सर्वे किया।
ये बात 1823 के आसपास की है। उत्तर भारत का सर्वे करने वाले लिटनर ने बताया कि यहां 97 प्रतिशत साक्षरता है। वहीं दक्षिण भारत का सर्वे करने वाले मुनरो ने बताया कि यहां तो 100% साक्षरता है।
लॉर्ड मेकाले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है तो पहले यहाँ की संस्कृति और वैदिक शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त करना होगा। उसकी जगह अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी। तभी इस देश में शरीर से हिंदुस्तानी लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे। जब इस देश की यूनिवर्सिटी से वे निकलेंगे तो हमारे हित में ही काम करेंगे। मैकाले अपनी बात को समझाने के लिए यहां एक मुहावरे का इस्तेमाल करता है कि जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले उसे पुरी तरह खोखला कर दिया जाता है। वैसे ही इसे भी खोखला करना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी। ऐसा करने के लिए उसने सबसे पहले सारे गुरुकुल को गैर कानूनी घोषित कर दिया। जब गुरुकुल गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता भी, जो समाज की तरफ से होती थी वह भी गैरकानूनी हो गई फिर संस्कृत को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया और इस देश के गुरुकुलों को ढूंढ़ ढूंढ़ कर उनमें आग लगा दी गई। उसमें पढ़ाने वाले गुरुओं को उसने मारपीट कर जेल में डाल दिया। सन 1850 तक इस देश में 7,32,000 गुरुकुल हुआ करते थे और उस समय इस देश में गांव थे 7,50,000। मतलब हर गांव में औसतन एक गुरुकुल। यह जो गुरुकुल थे वो आज की भाषा में हायर लर्निंग इंस्टीट्यूट हुआ करते थे। उन सब में 18 विषय पढ़ाए जाते थे और यह गुरुकुल भारतीय समाज के लोग मिलकर चलाते थे ना कि राजा महाराजा। इन गुरुकुल में सभी को समान शिक्षा निशुल्क रूप से दी जाती थी। इस तरह से सारे गुरुकुलों को खत्म कर दिया गया और अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया। जिसके लिए कोलकाता में पहला कान्वेंट स्कूल खोला गया। उस समय उसे फ्री स्कूल कहा जाता था। इसी कानून के तहत भारत में कोलकाता यूनिवर्सिटी, मुंबई यूनिवर्सिटी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गई। यह तीनों गुलामी के जमाने के यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में है। मैकाले ने अपने पिता को चिट्ठी लिखी थी। वह चिट्ठी बहुत ही मशहूर हुई थी। वह उसमें लिखता है कि इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे। इन्हें अपने देश के बारे में अपनी संस्कृति के बारे में, अपनी परंपराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा। इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे। जब ऐसे बच्चे होंगे तब इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाए लेकिन इस देश से अंग्रेजी अब कभी नहीं जाएगी और उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में आज साफ साफ दिखाई दे रही है।
उस एक्ट की महिमा देखिए कि हमें आज अपनी ही भाषा बोलने में शर्म आती है। अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रोब पड़ेगा। अरे हम तो खुद में हीन हो गए हैं। जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आ रही है उसका दूसरों पर क्या रोब पड़ेगा। लोगों का तर्क है कि अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है। दुनिया में 204 देश है और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में बोली पढ़ी और समझी जाती है। फिर यह कैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा है शब्दों के मामले में भी वह समृद्ध नहीं बल्कि एक दलित भाषा है। इन अंग्रेजों की जो बाईबिल है वह भी अंग्रेजी में नहीं थी। ना ही यीशु मसीह अंग्रेजी में बोलते थे। यीशु मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषाथी अरमेक। अरमेक भाषा की लिपि जो थी वह हमारे बांग्ला भाषा से मिलती जुलती थी। समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गई। संयुक्त राष्ट्र संघ जो अमेरिका में है वहां की भाषा भी अंग्रेजी नहीं है वहां का सारा काम फ्रेंच में होता है।
जो समाज अपनी मातृभाषा से कट जाता है उसका कभी भला नहीं होता और यही मैकाले की रणनीति थी जिसमें आज वह पूर्णतया सफल हो चुका है। आज हमारे अपने ही लोग यह कहने में बहुत ही गर्व अनुभव करते है कि "My Hindi is Too Weak."
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