31/10/2022
शायद आरू का विरोध के पीछे लोगो की मंशा पर प्रांत की संस्कृति से जुड़ी गायन को लेकर है । छठ मूल रूप से बिहार और उत्तर प्रदेश का पर्व है । लेकिन छत्तीसगढ में पिछले कुछ वर्षो से पर प्रांत के लोगो का नौकरी व्यवसाय करते हुवे बसना बढ़ गया है और वे अपने साथ अपने त्योहार और संस्कृति भी साथ में ले आए । उससे किसी को कोई परेशानी नहीं है और होनी भी नही चाहिए लेकिन अपनी संस्कृति और भाषा को छत्तीसगढ में स्थापित करना गलत है ।
भिलाई , दुरुग, बालोद , बिरगांव के कई शीतला तालाबों को छठ सरोवर नामकरण किया गया है क्या ये जायज है ? अरपा और खारुन नदियों के घाटों पर मांघी पुन्नी मेला की विस्थापित कर छठ आयोजन क्या जायज है ? राजिम पुन्नी के स्थान पर नकली कुंभ का आयोजन क्या जायज है ? तेलीन दाई तरिया तेलीबांधा को मरीन ड्राइव कहना क्या जायज है ? बिलई माता मंदिर धमतरी को विंध्यवासिनी कहना क्या जायज है ? बूढ़ा देव तरिया याने बूढ़ा तालाब को विवेकानंद सरोवर कहना क्या जायज है ? हमारे नौकरी , व्यवसाय , जल जंगल जमीन, और यहां तक की हमारे देवताओं के नाम बदले जा रहे हैं । कितना कुछ सहेंगे ? विरोध पराई संस्कृति का है । विरोध जबरन की थोपी गई छठ छुट्टी का है, विरोध छत्तीसगढ की अस्मिता के खिलाफ चलने वालों का है ।
इतना तो स्वाभिमान हर किसी के में होता है तो फिर छत्तीसगढ़िया लोगो ने अपने स्वाभिमान की खातिर विरोध कर दिया तो इसमें किसको पीड़ा हो रही है!!
एक छत्तीसगढ़िया की कलम से..