What's KG.... explained by the candidate during NTT Viva.
St. Kabir's School of Education
St. Kabir's School of Education, Raipur is an authorised Centre of AIECCE, New Delhi. We offer NTT.
30/09/2024
NTT certificate and marksheet received.
The candidates appeared in May, 2024 examination.
Congratulations!
19/09/2024
When we learn,
We grow.
गणपती बाप्पा मोरिया,
अगले बरस तू जल्दी आ।
रायपुर में डीजे पर बैन लगाया गया।
सुप्रीम कोर्ट का आभार।
06/03/2024
Admission Open in NTT course.
NTT Exam will be held in May, 2024.
Check this out on Justdial! https://jsdl.in/RSL-HND1709733313
31/08/2023
NTT Course successfully completed.
Congratulations to all.
NTT is made compulsory by CBSE, New Delhi for the teachers of Pre-primary classes. Holy Academy is an authorised centre by AICCE, New Delhi for Nursery Teacher's Training. This course is available in Hindi and English medium.
We are running NTT course for last 7 years. Several teachers from big and small English medium schools have acquired NTT certificate and marksheet from Holy Academy. Admission Open...
08/08/2023
NTT
10/06/2023
25/07/2022
Admission notice
11/07/2022
Nursery Teacher's Training available
15/01/2022
*पतंगे उड़ाने का रोमांचक शौक*
बचपन के पारम्परिक खेल किसी प्रतियोगिता के जद्दोजहद और ऊहापोह का मोहताज नहीं हुआ करते। कंचे, लट्टू, गिल्ली डंडा, चिप चेंडुल और पतंग उड़ाने के खेल बचपन में खेले गए ऐसे खेल हैं जिसमें नियम स्वयं बनाने पड़ते हैं और नियमों का पालन करने ही करने होते है। जाने अंजाने ये खेल ऐसा बहुत कुछ बचपन में ही सीखा जाते है जो आगे चलकर बहुत काम आते हैं।
जैसे कंचे के खेल अचूक निशाने के लिए पारंगत करते है वैसे ही सभी खेलों की अपनी अलग ही महिमा होती है। पतंगबाजी की बात करें तो यह सदियों पुरानी दुनिया भर में लोकप्रिय खेल है। आसमान के अनछुए स्थान में हवा के रुख़ को भावना और पतंग के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करना बेहद रोमांचकारी होता है।
एक बालक के लिए पतंग उसके अरमानों की उड़ान के लिए जरूरी पंख जैसा होता है। किसी दुकान से पतंग खरीदते समय पतंग की बनावट परखना और अपनी परख को आसमान की कसौटी में परखना सपनों के साकार होने जैसा होता है। पतंग खरीदकर धागे से उसकी नेती बांधना भी गजब के मापन प्रणाली का हिस्सा होती है। दोहरे धागे से पतंग के बीच कि डंडी को एक बीता नापकर कसकर बांध दिया जाता है। फिर उतनी ही लम्बाई के उस धागे पर गठान लगा दी जाती है। अब उस गठान को पकड़ कर पतंग के तौल की जांच होती है कि इसका संतुलन हवा में बराबर बना रहे। असंतुलन की दशा में डंडी के पास आवश्यकता के अनुसार कुछ और गांठ जड़ दी जाती है। संतुलित पतंग के नेती को मंजे की चकरी से जोड़ दिया जाता है। लो भई, उड़ान की तैयारी हो गई।
इस बीच यह भी बता दें कि आजकल बाज़ार में मिलने वाली मंजे की चकरी पहले उपलब्ध होती थी। तब तो चकरी भी खुद को बनाना होता था और मंजा भी। किसी बढ़ाई के पास जाकर गुजारिश करने से वे चकरी यूं ही बना दिया करते थे। बांस की पतली डंडिया और दो गोल लकड़ी के छोटे छोटे डिस्क को एक एक्सल के साथ फिट करना भी बचपन में ही बच्चे सीख जाते थे वह भी बिना किसी की मदद लिए। मंजे की पैनापन का जुनून सब पर हावी हुआ करता था। हार्डवेयर की दुकान से सरेश लाकर घर के आंगन के चूल्हे में खौलते पानी से किसी पुराने टीन के डिब्बे में चिपचिपा सॉल्यूशन तैयार किया जाता था। इसकी असहनीय दुर्गन्ध के बावजूद इसे बनाना जरूरी होता था। ध्यान रखा जाता था कि घर के किसी भी बड़े सदस्य को इसकी भनक भी न लगने पाए। मंजा बनाने की प्रक्रिया अभी जारी है।
कांच की पुरानी शीशियां या बोतल का पाउडर बनाना भी कम जोखिम भरा नहीं होता था।
तब सिलबट्टे और खल बट्टे का स्थान मिक्सर ग्राइंडर ने नहीं लिया था। गोपनीय ढंग से कांच का पाउडर बनाया जाता था। फिर चिपचिपे सॉल्यूशन में इस पाउडर को मिलाया नहीं जाता था। 5 इंच लम्बे सुजे का जुगाड घर से और ब्रांडेड मजबूत सफेद धागे की रील बाज़ार मिल जाती थी। तीन-चार दोस्त पर्याप्त हुआ करते थे मंजे बनाने के लिए। एक ने धागे की रील सम्हाली, दूसरे ने धागे को सिरे से सूजे की आंख में डालकर सरेष के सॉल्यूशन में डुबोए रखा, तीसरे ने कांच पाउडर एक कागज के टुकड़े पर रख गीले धागे को इसके बीच से गुजरने दिया। 10 फीट दूर बैठकर चकरी में धीरे धीरे मंजा लपेटना चौथे ने शुरू किया। प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद नवनिर्मित मंजे की चकरी को आधे दिन के लिए धूप में सूखने दिया जाता था। शाम तक चकरी पतंग दोनों अपनी काबिलियत दिखाने उपलब्ध हो जाते थे। पतंगे उड़ाते इंडेक्स उंगली न जाने मंजे से कितनी बार जख्मी हुई होगी। लेकिन बचपन में पतंगबाजी के जुनून को जख्मी नहीं कर पाया।
कहते हैं मेहनत और लगन से किए गए कार्य का कोई सानी नहीं होता। आसमान पर दिखने वाले बच्चों के हर पतंग को फिर अपनी पतंग अपनी जद में लाने की कोशिशें करता और दूसरे पतंग की मंजे का स्पर्श पाते ही तेजी से अपने मंजे की ढील पाता। बस फिर क्या था, दो घंटे की कश्मकश के बाद दर्जनों पतंगों की आहुति लेने वाला अपना पतंग आसमान में अकेला रह गया। मंजे की अंतिम छोर तक पतंग को आसमान में उड़ने दिया। इतना दूर की आंखो से दिख पाना भी मुश्किल होने लगा।पतंगबाजी के सारे अरमान पूरे हो चुके थे। पूरी ऊंचाई पर ले जाने के बाद अंतिम छोर को चकरी से जुदा कर दिया। बचपन में पतंग उड़ाने के शौक का वह अंतिम दिन था। बरसों बाद बरबस ही बचपन की यादें आ गईं कल संक्रान्ति पर जब पतंग की डोर हाथों में आ गई।
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Raipur
492007