तुम ढूँढोगे मुझे हजारों की भीड़ में गालिब, मैं वहाँ मिलूँगा जहाँ लोग मतलबी नहीं हुआ करते।
वाह रे कोरोना
Bastar mitra Foundationvedantaiit/pmt
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Our Vision:
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3.Group would look forward to leveraging the brand strength of its flagship comp
#पछतावा
तलाक होने के बाद एक #युवती ने दिल को छू लेने वाली बात कही है. मेरे पति से थोड़ी कहासुनी होने के बाद वो मुझे मायके लेने आए थे, लेकिन तब कुछ झूठे रिश्तेदारों और कुछ मायके के लोगों की बातों में आकर मैं साथ नहीं गई. उल्टा उनको दहेज के झूठे केस में धोखे से फंसा दिया.
पर अब 6 साल हो चुके हैं और मैं घर पर बैठी हूं, केस झूठे थे, तो मेरे पति बरी हो गए. उनकी दोबारा शादी हो गई. आज सोचती हूं मेरे पति लेने आए तब ही उनके साथ चली जाती तो आज मेरे भी एक दो बच्चे होते और मैं भी अपनी सहेलियों की तरह खुश होती अपने पति के संग.
साथ कोई नहीं देगा सलाह सब देंगे...
आखिर में आपकी ही जिंदगी तबाह हो जाएगी...
अगर कहासुनी हो जाती है तो रिश्तो को खत्म करने से अच्छा है दो-चार दिन रुठ जाए....💐💐🙏
*🙏🌹सुप्रभात*🌹🙏
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*_"रोग" अपनी "देह" में पैदा होकर भी हानि पहुंचाता है। और "औषधि" वन में पैदा होकर भी हमारा लाभ ही करती है।।_*
*_"हित" चाहने वाला पराया भी अपना हैं और अहित करने वाला अपना भी पराया है।_*
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*अपना और अपनों का ख्याल रखते हुए, कृपया घर पर ही सुरक्षित रहिए।*
*💐🌹 आपका दिन मंगलमय हो*💐💐
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हल खींचते समय यदि कोई बैल गोबर या मूत्र करने की स्थिति में होता था तो किसान कुछ देर के लिए हल चलाना बन्द करके बैल के मल-मूत्र त्यागने तक खड़ा रहता था ताकि बैल आराम से यह नित्यकर्म कर सके, यह आम चलन था । हमने (ईश्वर वैदिक) यह सारी बातें बचपन में स्वयं अपनी आंखों से देख हुई हैं। जीवों के प्रति यह गहरी संवेदना उन महान पुरखों में जन्मजात होती थी जिन्हें आजकल हम अशिक्षित कहते हैं। यह सब अभी 25-30 वर्ष पूर्व तक होता रहा।
उस जमाने का देशी घी यदि आजकल के हिसाब से मूल्य लगाएं तो इतना शुद्ध होता था कि 2 हजार रुपये किलो तक बिक सकता है। उस देशी घी को किसान विशेष कार्य के दिनों में हर दो दिन बाद आधा-आधा किलो घी अपने बैलों को पिलाता था।
टटीरी नामक पक्षी अपने अंडे खुले खेत की मिट्टी पर देती है और उनको सेती है। हल चलाते समय यदि सामने कहीं कोई टटीरी चिल्लाती मिलती थी तो किसान इशारा समझ जाता था और उस अंडे वाली जगह को बिना हल जोते खाली छोड़ देता था। उस जमाने में आधुनिक शिक्षा नहीं थी। सब आस्तिक थे। दोपहर को किसान जब आराम करने का समय होता तो सबसे पहले बैलों को पानी पिलाकर चारा डालता और फिर खुद भोजन करता था। यह एक सामान्य नियम था।
बैल जब बूढ़ा हो जाता था तो उसे कसाइयों को बेचना शर्मनाक सामाजिक अपराध की श्रेणी में आता था। बूढा बैल कई सालों तक खाली बैठा चारा खाता रहता था,मरने तक उसकी सेवा होती थी। उस जमाने के तथाकथित अशिक्षित किसान का मानवीय तर्क था कि इतने सालों तक इसकी माँ का दूध पिया और इसकी कमाई खाई है, अब बुढापे में इसे कैसे छोड़ दें, कैसे कसाइयों को दे दें काट खाने के लिए...? जब बैल मर जाता तो किसान फफक-फफक कर रोता था और उन भरी दुपहरियों को याद करता था जब उसका यह वफादार मित्र हर कष्ट में उसके साथ होता था। माता-पिता को रोता देख किसान के बच्चे भी अपने बुड्ढे बैल की मौत पर रोने लगते थे। पूरा जीवन काल तक बैल अपने स्वामी किसान की मूक भाषा को समझता था कि वह क्या कहना चाह रहा है।
वह पुराना भारत इतना शिक्षित और धनाढ्य था कि अपने जीवन व्यवहार में ही जीवन रस खोज लेता था।
वह करोड़ों वर्ष पुरानी संस्कृति वाला वैभवशाली भारत था,वह अतुल्य भारत था। उस अतुल्य भारत की परम्परा को निभाते हुये आज *पोला पर्व* के अवसर पर किसान/पशुपालक अपने बैलों को नहला धुला कर सजाकर बैलों के लिये विशेषकर बनाये गये पौष्टिक व्यंजन बनाकर खिलाते हैं। ऐसी है हमारी भारतीय संस्कृति जहां पालतू पशुओं के लिये भी पर्व मनाये जाते हैं।
*है न अतुल्य भारत*
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20/07/2016