03/08/2021
By- K M Agarwal Sir संसद, सार्थक संवाद का सदन है या
प्रायोजित इवेंट-इवेंट खेलने का शो..?
संविधान मे संसद का वही स्थान है, जो शरीर मे आत्मा का। आत्मा का यहाँ अर्थ, लोगो के उन नुमाइन्दों से है ,जिनको लोगों ने चुना है,उनके हितों की रक्षा के प्रवक्ता के रूप मे । लोगों के हित सिर्फ अच्छी सड़क , मकान या बिजली से ही नहीं है , ये राष्ट्र के स्वाभिमान मे अभिव्यक्त होता है। मीराबाई चानू , पी वी सिन्धु जैसे लोगो की सफलता इस स्वाभिमान का जीवंत अक्स हैं । थोड़ा ओर गौर करें तो एक साथ पुरूष और महिला हाँकी टीमों का टोक्यो ओलंपिक मे सेमीफाइनल पहुंचना, स्वाभिमान के आनंद को आल्हादित करता है। पुरूष और महिला हाँकी टीमों की इस सफलता के पीछे जो शख्स रहा है वो आज भी मौन बैठा है , न गाल बजाई और न ट्वीट-ट्वीट खेला , एक राज्य का 5 वीं बार मुख्यमंत्री बना है ,वो भी पूरे 5-5 साल वाला कार्यकाल खत्म कर, जी हाँ नवीन पटनायक उड़ीसा के मुख्यमंत्री। वास्तव मे नायक हैं ,लोकतन्त्र का । संसद / विधानसभा मे प्रतिनिधि का क्या अर्थ होता है, उसके पर्याय हैं वो । पर संसद मे आजकल हो क्या रहा है ? लोकतन्त्र का भोंडा मज़ाक या यों कहें वो सिर्फ एक न्यूज मैकिंग की जगह हो गई है ? संसद के अंदर संवाद नहीं , बाहर धरना, प्रदर्शन और रैली यानि कालेज टाइप इवेंट।
पेगासस जासूसी कांड से जनता का क्या लेना-देना ? जिसकी हुई , उसे कोर्ट की राह पकड़नी थी , पर गए नहीं , क्यो ? साफ है ये प्रायोजित इवेंट है, और इवेंट करने वाले को, कराने वाले से माल मिलता है । जार्ज सोरोस जैसा जुआडी दुनियाभर मे पैसे के दम पर कई देशों मे, ये खेल करता रहता है । अखबार ,पत्रकार ,समाजसेवी ,लेखक ,तथाकथित बुद्दिजीवी और राजनैतिज्ञों को वो आराम से खरीद लेता है । भारत मे वो इसी का प्रयोग कर रहा है । पैसा क्या नहीं करा देता , हमारे देश मे , हम सबने कोरोना काल मे प्रायोजित विभीषिका मे भाग लेने वालों को देखा और सहा है । इसका असर देखिये जहां विपक्ष को संसद के भीतर मे संवाद के लिए अड़ना चाहिए, वो बाहर मे खड़ा न्यूज आइटम बन गया है ।
पर जरा सोचे किसका भला हो रहा है ? 19 जुलाई से शुरू हुए मॉनसून सत्र मे पिछले दो हफ्तों में 107 घंटे में से संसद में केवल 18 घंटे ही कार्यवाही चली है। गतिरोध के कारण चल रहे व्यवधानों के कारण 89 घंटे बर्बाद हो गए हैं।अब तक 133 करोड़ रुपये से अधिक की बर्बादी हुई है। ये राशि किसकी है , जनता की गाढ़ी कमाई की , कौन देगा इसका हिसाब ? मुफ्त खोरी की इजाजत क्यों हो सांसदों को ? लेकिन इससे भी अधिक आश्चर्य का विषय तो ये कि हमारे सांसदों की प्राथमिकता क्या है ? जिसदिन महाराष्ट्र के कोकण क्षेत्र मे गांवो और शहरों मे बाढ़ का तांडव था , महाराष्ट्र के सांसद , संसद मे बाढ़ पर नहीं , संसद भवन के सामने गांधीजी की मूर्ति के सामने पेगासस जासूसी पर धरना दे रहे थे । जिन्हे लोगो के लिए सदन के भीतर सरकार को मजबूर करना था, वो ' his master's voice' का काम कर रहे थे ।
संसद राजनैतिक दलों के दल-दल का मंच नहीं है , ये राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक है। संसद 'संवाद' का मंच है, तो 'सरोकार' का भी (लोगो से संबंधित कानून बनाने ), 'समाधान' का पटल ( राष्ट्र की समस्याओ का) है तो 'संस्कार' का भी ( भावी पीढ़ियों को सीखने का )। इस ज़िम्मेदारी को क्या पूरा कर रहे हैं सांसद ? जनता के लिए न्यूज मैकर नहीं, राष्ट्रीय स्वाभिमान का मंच बने संसद, ये सभी सांसदों की ज़िम्मेदारी है, और जो काम करता है वो अपने आप राष्ट्रीय गौरव का परचम फहराता है , ठेठ नवीन पटनायक शैली मे । इस शैली मे शालिनता है ,संस्कार भी और वो भी बिना इवेंट आइटम के , यही देश की जनता की अपेक्षा भी है, संसद से।