Nation Builders Academy Hajipur Gola Rafiganj

Nation Builders Academy Hajipur Gola Rafiganj रफीगंज का सबसे अच्छा स्कूल आपके बच्चों का भविष्य है Nation Builders Academy Hajipur Gola Rafiganj

19/01/2026

**कहानी: अपनी पहचान समझना ज़रूरी है**

एक गाँव में एक बतख और एक मुर्गी बहुत अच्छे दोस्त थे। दोनों हमेशा साथ रहते, साथ खेलते और साथ ही दाना चुगते थे। बतख को तालाब से बहुत लगाव था, जबकि मुर्गी को आँगन और खेतों में घूमना अच्छा लगता था।

एक दिन बतख तालाब के किनारे पहुँची। पानी देखकर उसका मन खुश हो गया। उसने बिना देर किए तालाब में छलांग लगा दी और मज़े से तैरने लगी। कभी दाएँ, कभी बाएँ—पानी में उसे बड़ी मस्ती आ रही थी।

किनारे खड़ी मुर्गी यह सब देख रही थी। उसे लगा, “अगर बतख इतना मज़ा कर रही है, तो मैं भी कर सकती हूँ।” बिना सोचे-समझे मुर्गी ने भी तालाब में छलांग लगा दी। लेकिन तैरना उसे आता नहीं था। थोड़ी ही देर में वह डूबने लगी और घबराकर चिल्लाने लगी।

बतख ने तुरंत उसे देखा और पास आकर किसी तरह मुर्गी को बाहर निकाला। मुर्गी काँप रही थी। थोड़ी देर बाद वह बोली,
“मुझसे बड़ी गलती हो गई। मैंने तुम्हारी नकल की, लेकिन यह नहीं सोचा कि मैं कौन हूँ और क्या कर सकती हूँ।”

बतख मुस्कराई और बोली,
“हर किसी की अपनी क्षमता होती है। जो काम मैं कर सकती हूँ, ज़रूरी नहीं तुम भी वही कर सको।”

उसी समय वहाँ कुछ लोग बात कर रहे थे कि कैसे एक आदमी ने रील बनाकर रातों-रात पैसा कमा लिया। यह सुनकर कई लोग बिना सोचे-समझे वही करने लगे, लेकिन ज़्यादातर लोग सफल नहीं हो पाए।

मुर्गी को समझ आ गया कि जीवन में सिर्फ दूसरों की नकल करना सही नहीं है। किसी भी काम को करने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि हमारी रुचि, हमारी क्षमता और हमारी पहचान क्या है।

**सीख:**
दूसरों की सफलता देखकर आँख मूँदकर नकल नहीं करनी चाहिए। कोई भी काम करने से पहले यह ज़रूर देखना चाहिए कि हम कौन हैं और हम क्या कर सकते हैं। अपनी पहचान समझकर किया गया प्रयास ही सच्ची सफलता दिलाता है।

03/01/2026
14/12/2025

जापान में शिक्षकों की सम्मानजनक स्थिति से भारत को सीख

जापान एक ऐसा देश है जहाँ शिक्षकों को समाज में बहुत ऊँचा स्थान प्राप्त है। वहाँ शिक्षकों को 'सेंसेई' कहकर संबोधित किया जाता है, जो न केवल स्कूल में बल्कि समाज के हर क्षेत्र में सम्मान का प्रतीक है। जापानी संस्कृति में शिक्षक को ज्ञान का स्रोत और मार्गदर्शक माना जाता है। लोग शिक्षकों के सामने झुककर अभिवादन करते हैं और उनकी बात को पूरी गंभीरता से सुनते हैं। जापान में शिक्षक पेशा अत्यधिक प्रतिष्ठित है, जहाँ शिक्षकों की सैलरी अच्छी होती है और समाज उन्हें डॉक्टरों या नेताओं के समकक्ष मानता है। इस सम्मान के कारण जापानी शिक्षा प्रणाली विश्व स्तर पर उत्कृष्ट है, क्योंकि शिक्षक पूरे मन से बच्चों को पढ़ाते हैं और बच्चे भी शिक्षकों का आदर करते हैं।

दूसरी ओर, भारत में शिक्षकों का सम्मान पहले की तरह नहीं रहा। प्राचीन काल में गुरु को देवतुल्य माना जाता था, लेकिन आज कई जगहों पर शिक्षकों को कम वेतन, अधिक कार्यभार और कम सम्मान मिलता है। इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है और बच्चे अनुशासनहीन हो जाते हैं। भारत को जापान से सीखना चाहिए कि शिक्षकों को समाज में ऊँचा दर्जा देकर ही राष्ट्र का भविष्य मजबूत बनाया जा सकता है।

इसलिए, भारत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई भी नेता या नौकरशाह बनने से पहले जापान की इस शिक्षक-सम्मान की संस्कृति से परिचित हो। उन्हें समझना चाहिए कि शिक्षक समाज की रीढ़ हैं और उनका सम्मान पूरे देश की प्रगति का आधार है। यदि हम ऐसा करेंगे, तो भारत भी शिक्षा के क्षेत्र में विश्व गुरु बन सकता है।

13/12/2025

बिहार का श्रम बल भागीदारी दर: एक विरोधाभास और उसकी वास्तविकता

भारत एक विविधतापूर्ण अर्थव्यवस्था वाला देश है, जहां विभिन्न राज्यों की आर्थिक स्थिति और श्रम बाजार में बड़ा अंतर देखने को मिलता है। बिहार, जो देश की सबसे घनी आबादी वाले राज्यों में से एक है, अक्सर चर्चा का विषय बनता है जब बात श्रम बल भागीदारी दर (Labour Force Participation Rate - LFPR) की होती है। पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) 2023-24 के अनुसार, बिहार का LFPR लगभग 41-43% के आसपास है, जबकि राष्ट्रीय औसत 58-60% है। यह आंकड़ा देखकर एक विरोधाभास उभरता है: बिहार में स्थानीय स्तर पर श्रम भागीदारी कम क्यों है, जबकि पूरे भारत में फैक्टरी, निर्माण और अन्य मजदूरी कार्यों में बिहारी मजदूरों की संख्या सबसे अधिक मानी जाती है?

सबसे पहले, LFPR को समझना जरूरी है। LFPR वह प्रतिशत है जो काम करने वाली आयु (15 वर्ष से ऊपर) के लोगों में से बताता है कि कितने लोग श्रम बल में हैं – यानी या तो नौकरी कर रहे हैं या नौकरी की तलाश में हैं। PLFS के नवीनतम आंकड़ों (जुलाई 2023-जून 2024) के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर LFPR 60.1% है, जिसमें पुरुषों का 78.8% और महिलाओं का 41.7% है। बिहार में यह दर कम होने की मुख्य वजहें हैं: राज्य में कृषि पर अत्यधिक निर्भरता (लगभग 50% कार्यबल कृषि में), महिलाओं की कम भागीदारी (ग्रामीण क्षेत्रों में भी कम), शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, तथा स्थानीय स्तर पर औद्योगिक रोजगार का अभाव। बिहार की अर्थव्यवस्था में निर्माण और सेवा क्षेत्र का योगदान बढ़ रहा है, लेकिन फैक्टरी-आधारित उद्योग अभी भी कमजोर हैं।

यह विरोधाभास इसलिए है क्योंकि LFPR राज्य-आधारित सर्वे पर निर्भर करता है, जो व्यक्ति की **निवास स्थान** (usual residence) पर आधारित होता है। अगर कोई व्यक्ति 6 महीने से अधिक समय बाहर रहता है, तो उसे गंतव्य राज्य के LFPR में गिना जाता है, न कि बिहार के। नतीजतन, बिहार में युवा पुरुषों की संख्या कम दिखती है, जिससे राज्य का LFPR और नीचे चला जाता है। लेकिन ये प्रवासी बिहारी ही भारत की औद्योगिक रीढ़ हैं। बड़ी आबादी (लगभग 13 करोड़) होने से कुल श्रमिकों की संख्या में बिहार ऊपरी स्थानों पर रहता है।

08/11/2025

शिक्षा का तीन पीढ़ियों को लाभ

शिक्षा वह दीपक है जो न केवल व्यक्ति को, बल्कि पूरी पीढ़ियों को प्रकाशित करता है। जब आप स्वयं पढ़ते हैं, तो लाभ केवल आपको मिलता है – बेहतर नौकरी, आत्मविश्वास और ज्ञान। लेकिन जब आपके बच्चे (दूसरी पीढ़ी) शिक्षित होते हैं, तो लाभ पूरे परिवार और रिश्तेदारों तक फैलता है। घर में समृद्धि आती है, स्वास्थ्य सुधरता है और सामाजिक स्तर ऊँचा होता है।

सबसे बड़ा चमत्कार तीसरी पीढ़ी में होता है। जब आपके पोते-पोतियाँ पढ़ते हैं, तो लाभ पूरी जाति, समुदाय और समाज को मिलता है। गरीबी कम होती है, नवाचार बढ़ता है और राष्ट्र मजबूत बनता है। सोचिए, आप किस पीढ़ी में हैं? यदि आप पहली पीढ़ी हैं, तो आज से शुरुआत करें!
आज अधिकांश लोग खुद अशिक्षित हैं और बच्चों को भी ठीक से नहीं पढ़ाते। घरेलू झगड़े, आर्थिक तंगी या जागरूकता की कमी इसके कारण हैं।

परिणाम? समाज पिछड़ता रहता है, अपराध बढ़ते हैं और अवसर खो जाते हैं। बिना शिक्षा के समुदाय कैसे आगे बढ़ेगा?

शिक्षा से ही समाज की नींव मजबूत होती है। हर व्यक्ति को अपनी पीढ़ी से शुरुआत करनी चाहिए – खुद पढ़ें, बच्चों को प्रोत्साहित करें और समुदाय में जागरूकता फैलाएँ। तभी तीन पीढ़ियों का सपना साकार होगा!

मुश्किलों में छिपी सफलता की चिंगारी: आगे बढ़ने की प्रेरणाजीवन एक अनंत यात्रा है, जहाँ हर मोड़ पर चुनौतियाँ और मुश्किलें ...
19/10/2025

मुश्किलों में छिपी सफलता की चिंगारी: आगे बढ़ने की प्रेरणा

जीवन एक अनंत यात्रा है, जहाँ हर मोड़ पर चुनौतियाँ और मुश्किलें हमारा इंतजार करती हैं। अक्सर देखा गया है कि जब जीवन कठिनाइयों से भरा होता है और व्यक्ति घबराता नहीं है, तो उसके अंदर एक ऐसी चिंगारी और शोला पैदा होता है जो न केवल खुद को रोशन करता है, बल्कि आस-पास के लोगों को भी मजबूर कर देता है कि वे नजर उठाकर देखें। यह चिंगारी साहस, दृढ़ता और संघर्ष की उपज है, जो व्यक्ति को सामान्य से असाधारण बना देती है। लेकिन यहीं पर एक बड़ी समस्या आती है – इंसान इस प्रारंभिक सफलता को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानकर रुक जाता है। जबकि सच्ची सफलता तो निरंतर प्रयास, आगे बढ़ने और दूसरों को प्रेरित करने में निहित है।

मानव इतिहास गवाह है कि महान उपलब्धियाँ हमेशा कठिनाइयों की कोख से जन्मी हैं। जब जीवन में तूफान आते हैं, तो कमजोर व्यक्ति घबरा जाते हैं और पीछे हट जाते हैं, लेकिन जो दृढ़ होते हैं, वे इन तूफानों को अवसर में बदल देते हैं। उदाहरण के लिए, महात्मा गांधी का जीवन देखें – ब्रिटिश शासन की जंजीरों में जकड़े भारत में उन्होंने अहिंसा की चिंगारी जलाई, जो पूरे विश्व को मजबूर कर दिया कि वे भारत की ओर देखें। इसी प्रकार, थॉमस एडिसन ने हजारों असफलताओं के बाद बल्ब का आविष्कार किया। उनकी असफलताएँ नहीं, बल्कि उनसे सीखी गई दृढ़ता ने दुनिया को रोशन किया।

यह चिंगारी पैदा होने का कारण है व्यक्ति का अटूट विश्वास और घबराहट से मुक्ति। जब मुश्किलें आती हैं, तो मस्तिष्क में रचनात्मकता जागृत होती है, नए विचार जन्म लेते हैं और व्यक्ति की क्षमताएँ उभरकर सामने आती हैं। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब यह चिंगारी व्यक्ति को अहंकार में डुबो देती है। वह सोचता है कि अब सब कुछ हासिल हो गया है, और आगे की मेहनत की जरूरत नहीं। यह रुकावट सफलता की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है, क्योंकि जीवन स्थिर नहीं है – यह गतिशील है।

अक्सर लोग प्रारंभिक सफलता को अंतिम मंजिल मान लेते हैं।

लाल बहादुर शास्त्री: एक भूले हुए नायक की यादभारत का इतिहास महान व्यक्तियों से भरा पड़ा है, जिन्होंने राष्ट्र की सेवा में...
03/10/2025

लाल बहादुर शास्त्री: एक भूले हुए नायक की याद

भारत का इतिहास महान व्यक्तियों से भरा पड़ा है, जिन्होंने राष्ट्र की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया। इनमें से दो प्रमुख नाम हैं- महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री। दोनों का जन्मदिन एक ही तारीख, यानी 2 अक्टूबर को मनाया जाता है। जहां महात्मा गांधी का जन्म 1869 में हुआ था, वहीं लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 1904 में। यह संयोग है कि दो ऐसे महापुरुष, जिन्होंने भारत की आजादी और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, एक ही दिन जन्मे। लेकिन अफसोस की बात है कि सरकारी कैलेंडर में इस दिन को केवल 'गांधी जयंती' के नाम से छुट्टी के रूप में दर्ज किया जाता है। परिणामस्वरूप, अधिकांश लोग गांधीजी के बारे में तो अच्छी तरह जानते हैं, लेकिन शास्त्रीजी के योगदान को कम ही याद करते हैं। क्या यह उचित है कि हम एक महान नेता की महानता और सेवा को नजरअंदाज कर दें?

महात्मा गांधी को 'राष्ट्रपिता' कहा जाता है, और उनका जन्मदिन पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। स्कूलों में कार्यक्रम होते हैं, भाषण दिए जाते हैं, और अहिंसा तथा सत्य के सिद्धांतों को याद किया जाता है। लेकिन इसी दिन जन्मे लाल बहादुर शास्त्री को उतना महत्व नहीं मिलता। शास्त्रीजी भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने 1964 से 1966 तक देश का नेतृत्व किया। उनका जीवन सादगी, ईमानदारी और समर्पण का प्रतीक था। वे एक गरीब परिवार से थे, लेकिन अपनी मेहनत और बुद्धिमत्ता से ऊंचाइयों तक पहुंचे। स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने गांधीजी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। जेल गए, आंदोलनों में भाग लिया, और देश की आजादी के लिए संघर्ष किया। प्रधानमंत्री बनने के बाद, उन्होंने 'जय जवान, जय किसान' का नारा दिया, जो आज भी प्रासंगिक है। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान, उन्होंने देश को एकजुट किया और सैनिकों तथा किसानों को प्रोत्साहित किया। उनकी नेतृत्व क्षमता ने भारत को मजबूत बनाया।

सरकारी कैलेंडर में केवल गांधी जयंती का उल्लेख होने से एक असंतुलन पैदा होता है। बच्चे और युवा पीढ़ी गांधीजी के बारे में तो पढ़ते हैं, लेकिन शास्त्रीजी के बारे में जानकारी सीमित रह जाती है। स्कूलों के पाठ्यक्रम में गांधीजी पर विस्तार से चर्चा होती है, जबकि शास्त्रीजी का जिक्र अक्सर संक्षिप्त होता है।

**हर बड़ा सपना और उसकी सच्ची सफलता**हर इंसान के दिल में एक बड़ा सपना होता है। वह चाहता है कि वह जीवन में कुछ ऐसा करे, जो...
18/09/2025

**हर बड़ा सपना और उसकी सच्ची सफलता**

हर इंसान के दिल में एक बड़ा सपना होता है। वह चाहता है कि वह जीवन में कुछ ऐसा करे, जो उसे औरों से अलग बनाए, जो उसे "बड़ा" बनाए। लेकिन सवाल यह है कि "बड़ा" बनने का असली मतलब क्या है? क्या यह सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धियां, धन, या प्रसिद्धि है? या फिर इसके पीछे कुछ और गहरा अर्थ छिपा है? सच्चाई यह है कि असली महानता तब हासिल होती है, जब आप न केवल खुद को ऊंचा उठाते हैं, बल्कि दूसरों को भी सशक्त बनाते हैं, उनकी जिंदगी में रोशनी लाते हैं। क्योंकि, जैसा कि कहा जाता है, "अंधों की दुनिया में आप कितना भी अच्छा बन जाएं, आपकी मेहनत तब तक बेकार है, जब तक आप दूसरों की आंखों में रोशनी न ला दें।"

**सपनों का पीछा और उसका अर्थ**

हर व्यक्ति अपने सपनों को साकार करने की इच्छा रखता है। कोई डॉक्टर बनना चाहता है, कोई उद्यमी, तो कोई समाज सुधारक। लेकिन सपने सिर्फ व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं तक सीमित नहीं होने चाहिए। सच्चा सपना वह है, जो न केवल आपकी जिंदगी को बदल दे, बल्कि दूसरों की जिंदगी को भी बेहतर बनाए। जब आप अपने सपनों को दूसरों की प्रगति से जोड़ते हैं, तब वह सपना और भी अर्थपूर्ण हो जाता है। उदाहरण के लिए, एक शिक्षक जो अपने छात्रों को पढ़ाता है, न केवल अपनी आजीविका कमाता है, बल्कि समाज के भविष्य को आकार देता है। एक उद्यमी जो रोजगार के अवसर पैदा करता है, वह न केवल अपनी सफलता की कहानी लिखता है, बल्कि दूसरों के लिए भी अवसरों के द्वार खोलता है।

**दूसरों को सशक्त बनाना: असली महानता**

सच्ची महानता का आधार दूसरों को सशक्त बनाना है। अगर आप अपने आसपास के लोगों को प्रेरित करते हैं, उनकी मदद करते हैं, और उन्हें अपने सपने पूरे करने के काबिल बनाते हैं, तो आपकी सफलता का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे एक दीया जलाना, जो न केवल अपने आसपास की जगह को रोशन करता है, बल्कि उसकी लौ से कई और दीये जलाए जा सकते हैं।

उदाहरण के तौर पर, हम भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारकों को देख सकते हैं। महात्मा गांधी ने न केवल देश को आजादी दिलाने का सपना देखा, बल्कि उन्होंने लाखों लोगों को सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित किया। उनकी शिक्षाएं आज भी लोगों को प्रेरणा देती हैं। इसी तरह, डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने जीवन में न केवल स्वयं को शिक्षित और सशक्त किया, बल्कि दलितों और वंचितों के लिए शिक्षा और समानता का रास्ता खोला। उनकी मेहनत ने लाखों लोगों की जिंदगी में रोशनी लाई।

**अंधों की दुनिया में रोशनी लाने का महत्व**

"अंधों की दुनिया में आप कितना भी अच्छा बन जाएं, आपकी मेहनत बेकार है" – यह कथन गहरा अर्थ रखता है। अगर आपकी सफलता केवल आपके लिए है, और उसका लाभ समाज को नहीं मिलता, तो वह अधूरी है। एक व्यक्ति की सच्ची काबिलियत तब सामने आती है, जब वह दूसरों को भी अपने साथ उठाता है। समाज में कई लोग अवसरों, शिक्षा, या प्रेरणा की कमी के कारण पीछे रह जाते हैं। ऐसे में, यदि आप उनकी आंखों में रोशनी ला सकते हैं – यानी उन्हें प्रेरणा, शिक्षा, या अवसर दे सकते हैं – तो आपकी सफलता का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।

उदाहरण के लिए, एक सफल व्यवसायी जो अपने कर्मचारियों को प्रशिक्षण देता है, उनकी स्किल्स को बढ़ाता है, और उन्हें बेहतर जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है, वह न केवल अपने व्यवसाय को बढ़ाता है, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव भी लाता है। यह रोशनी फैलाने का काम है, जो उसकी सफलता को और भी मूल्यवान बनाता है।

16/09/2025

**उन लोगों के लिए कामयाब बनो जो तुम्हें नाकामयाब देखना चाहते हैं**

जीवन में कई बार हम ऐसे लोगों से मिलते हैं जो हमारी सफलता को संदेह की नजरों से देखते हैं या हमें नाकामयाब देखना चाहते हैं। ये लोग हमारे रास्ते में बाधाएँ डाल सकते हैं, लेकिन यही वह अवसर है जहाँ हमें अपनी ताकत और दृढ़ संकल्प को साबित करना होता है।

सफलता का असली मोल तब समझ आता है जब हम उन लोगों के सामने अपनी उपलब्धियों को साकार करते हैं जो हम पर विश्वास नहीं करते। उनकी नकारात्मकता को हमें प्रेरणा के रूप में लेना चाहिए। हर बार जब कोई कहता है कि "तुम यह नहीं कर सकते," हमें अपने लक्ष्यों की ओर और तेजी से बढ़ना चाहिए। कठिन परिश्रम, आत्मविश्वास और लगन से हम उन सभी बाधाओं को पार कर सकते हैं जो हमारे रास्ते में आती हैं।

सच्ची कामयाबी यह नहीं कि लोग आपकी तारीफ करें, बल्कि यह है कि आप उन लोगों को गलत साबित करें जो आपकी क्षमताओं पर शक करते हैं। इसलिए, अपने सपनों को हकीकत में बदलें, मेहनत करें और उन लोगों के लिए कामयाब बनें जो कभी नहीं चाहते थे कि आप सफल हों। उनकी नकारात्मकता को अपनी प्रेरणा बनाएँ और दुनिया को दिखाएँ कि आपमें वह ताकत है जो असंभव को संभव बना सकती है।

**बुलंदियों के सितारे जब आकाश में चमकने लगते हैं, तो समझ लीजिए कि आपकी मेहनत रंग लाई है। एक बदलाव का परवाना आया है!**जी ...
16/08/2025

**बुलंदियों के सितारे जब आकाश में चमकने लगते हैं, तो समझ लीजिए कि आपकी मेहनत रंग लाई है। एक बदलाव का परवाना आया है!**

जी हाँ, हम बात कर रहे हैं **नेशन बिल्डर्स एकेडमी, हाजीपुर गोला** की, जिसने सीमित संसाधनों और कम समय में हजारों लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाई। उन माता-पिता के सपनों को साकार किया, जो अपने बच्चों के लिए सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थान की तलाश में थे।

अब उन्हें विश्वास हो चला है कि कोई है, जो उनके बच्चों का भविष्य संवारेगा, उनकी तकदीर बदलेगा। एक नया समाज, उम्मीद की रोशनी से जगमगाएगा।

**नेशन बिल्डर्स एकेडमी** – जहाँ सपने हकीकत बनते हैं, और भविष्य उज्ज्वल होता है!

**बदलते भारत की तस्वीर – एक प्रेरणादायक पहल**आज का भारत न सिर्फ तकनीक, विज्ञान और विकास के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है, ब...
31/05/2025

**बदलते भारत की तस्वीर – एक प्रेरणादायक पहल**

आज का भारत न सिर्फ तकनीक, विज्ञान और विकास के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक नई तस्वीर पेश कर रहा है। "बदलते भारत की तस्वीर" अब सिर्फ ऊँची इमारतों और डिजिटल क्रांति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन छोटे-छोटे प्रयासों में भी झलकती है जो समाज के प्रति हमारी ज़िम्मेदारियों को दर्शाते हैं।

ऐसी ही एक सराहनीय पहल **Nation Builders Academy** के बच्चों ने दिखाई। भीषण गर्मी में जब तापमान लगातार बढ़ रहा है और चारों ओर लू चल रही है, तब नन्हे-मुन्ने मासूम पक्षी भी प्यास से व्याकुल हो उठते हैं। इन्हीं निरीह पक्षियों की पीड़ा को समझते हुए अकादमी के बच्चों ने उनके लिए एक छोटा लेकिन बहुत महत्वपूर्ण कदम उठाया। बच्चों ने अपने हाथों से **बर्ड फीडर** (पक्षियों के लिए जलपात्र व दाना पात्र) बनाए और उन्हें अपने आस-पास के पेड़ों पर टांग दिया।

इन बर्ड फीडरों में पानी और अनाज भरकर वे यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि गर्मी से बेहाल पक्षियों को राहत मिले और उन्हें प्यास से निजात मिले। यह कार्य न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक प्रयास है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि भारत का भविष्य संवेदनशील, जागरूक और जिम्मेदार हाथों में है।

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HAJIPUR GOLA WARD NO-03
Rafiganj

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