20/03/2023
रायबरेली पॉलिटेक्निक और मैं ( Barun Chaki)
(अंक 12)
अभी ,मैं प्रधानाचार्य जी के चेंबर के तरफ पैदल जा ही रहा था, साथ में मेरे लाव लश्कर भी थे, कि तभी शीर्णकाय, शक्ल से जवान भी नहीं - उम्र दराज भी नहीं , एक व्यक्ति पता नहीं कहां से लपकता हुआ मेरे पास आया
"बेटे क्या हुआ, बेटे क्या हुआ ?
देख बेटा मुझे बताएगा कि नहीं ? "
एक अजीब मसखरा सा व्यक्तित्व, बहुत ही साधारण फुल पैंट और फुलबाही का शर्ट पहने हुए, जिसके ऊपर की बटन गायब और बीच में एक दूसरे रंग का बटन लगा हुआ था मेरे आस-पास मरडराने लगा ।
मैंने थोड़ा अनइजी फील किया, यह कौन आके चपक रहा है मुझसे! फिर मुझे ध्यान में आया कि यह मेरे इंटरव्यू वाले दिन भी लड़कों के साथ आसपास टहल रहा था ।
यह महान व्यक्ति और कोई नहीं हमारे संस्था के नारद मुनि नाम से विभूषित, दिवंगत पंडित बी डी दुबे (वासुदेव दुबे) महाराज थे इनसे मेरा यह पहला चाक्षुष परिचय था ।
मेरे कुछ पाठक वर्ग ने मुझसे इनके बारे में भी लिखने को कहा था, तो मैं इनका अपने नजरिया से यहां परिचय कराना चाहूंगा, विशेषकर मेरे वह पाठक जो पॉलिटेक्निक से संबंधित नहीं है🙏🏻
दिवंगत पंडित बी डी दुबे को हमारे प्रथम प्रधानाचार्य, मरहूम जमील साहब संस्था में अपने साथ लाए थे।
यह अनुकंपा श्रेणी में आते हैं, जिन्होंने पूरे ठाठ के साथ फिरोज गांधी पॉलिटेक्निक में नौकरी किया, उचित योग्यता ना होने के बावजूद🤣
इन्होंने तत्कालीन प्रधानाचार्य जमील साहब की अनुगतता में अपना आधा जीवन व्यतीत किया, परंतु बाद में आए प्रधानाचार्य को इन्होंने कोई खास तवज्जो नहीं दिया ।
बड़ी मुश्किल से महाराज ने अंग्रेजी के दो चार शब्द रट रखे थे वही लिख पाते थे, दस्तखत में एक बी बनाकर लंबा लाइन खींच देते थे । शीट मेटल विभाग के वर्कशॉप इंस्ट्रक्टर हुआ करते थे ।
खासियत यह थी कि तत्कालीन डब्ल्यू एस स्वर्गीय विशेष चंद्र गुप्ता भी इनसे दबे हुए तथा दूरी बनाकर रखते थे ।
यह पूरी संस्था में केवल जमील साहब से ही डरते थे एवं जब जब जमील साहब इनसे कहते कि तुम अपनी सर्टिफिकेट लेकर आओ तो यह बहुत परेशान हो जाते थे । जमील साहब ने इनकी यह गोट पकड़ रखी थी, बल्कि दो बार तो ऐसा हुआ मेरे आंखों देखा किस्सा है🤣
इनके , किसी कूकृत्य से जमील साहब बहुत नाराज हो गए और कहा कि कहा
"दुबे तुम कल अगर अपनी सर्टिफिकेट लेकर नहीं आए तो तुम्हें नौकरी से निकाल दूंगा.
अब दुबे महाराज क्या करें ! कहीं से एक बहुत पुराना कागजात लेकर के पहले कोयला जलाकर धुएं में उसको आधे से अधिक काला किया फिर उसमें थोड़ा तेल लगा कर जमील साहब के सामने रख दिया । मैं वहीं बैठा हुआ था । उस कागज से मरे हुए चूहे की बदबू आ रही थी ।
जमील साहब अचानक चौंक कर खड़े हो गए मैं भी खड़ा हो गया, जमील साहब चिल्लाकर कहे "यह क्या बदतमीजी है?"
दुबे भी उसी तरह चिल्लाकर बोला " अरे आप ही ने तो कहा था, बड़ी मुश्किल से घर जाकर के बकसिया से ढूंढ कर के सर्टिफिकेट लेकर आया हूं "
"हठाओ इसे यहां से"
दुबे तुरंत सर्टिफिकेट उठाकर उल्टे पांव बैरंग वापस चल दिए, बाद में यू सी पटवा ( दिवंगत, फाउंड्री शॉप इंस्पेक्टर) ने मुझसे कहा इससे पहले यह बी सी गुप्ता के साथ भी यही कर चुका है । 🤣
वह जमाना कुछ और था इस तरह की चालाकियां और गलतियों को अधिकारी ओवरलूक कर देते थे। शायद इन्हीं विषयों को लेकर के कर्मचारियों का अधिकारी ब्लैकमेल भी करता रहा होगा🤔
दुबे की बात कहां तक कहू *हरि अनंत हरि कथा अनंता*
दुबे का अपना कोई निजी रहने का स्थान नहीं था वह दिन भर कॉलेज में रहता और रात को बस अड्डे के पास, अमर सिंह की कोठी के बरामदे में कोने के तरफ एक चारपाई इनकी परमानेंट पड़ी रहती थी उसी में जाके लेटते थे. वही हैंडपंप भी लगा था वहीं पर बाहर मैदान में शौचालय भी .
दुबे को जितना तनख्वाह मिलता था पूरा का पूरा वह अपने गांव प्रतापगढ़ भेज देता , अब पूरा महीना इनका उधार खाते में चलता था । उधारियों में उनके सबसे ज्यादा कॉलेज के छात्र होते थे ।
जिन छात्रों को पास होना होता था, या फिर प्रैक्टिकल में अधिक नंबर चाहिए होता था या फिर कॉलेज के किसी गेम में शामिल होना होता था या अन्य किसी फंक्शन में टूर वगैरह में अपना नाम, इस तरह तमाम छात्र छात्राओं के समस्याओं के समाधान करने में यह लगे रहते थे। इसके अलावा एकाथ संस्था के कर्मचारी भी इनके लपेटे में आ जाते थे ।
लेकिन मैंने पूरे जीवन में किसी भी व्यक्ति से अपने पैसे के लिए इनको तगादा करते हुए भी नहीं देखा । पूरा एक महीना इनका कॉलेज से इधर-उधर की जरायम पेशी में अपना इंवॉल्वमेंट होने के कारण उपरी इनकम होता रहता था उसी से सुनने में आता था कि यह पैसा भी वापस कर देते हैं । संस्था में छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा कार्यों में दुबे महाराज का इंवॉल्वमेंट जरूर रहता था।
फिरोज गांधी पॉलिटेक्निक में पूरे पूरे 16 घंटे की ड्यूटी करता था, शाम को रेलवे स्टेशन पर मिश्रा भोजनालय के बगल में परमा का होटल हुआ करता था । वेज और नॉनवेज दोनों वहां मिलते थे, मैं भी इस होटल में खाना खाता था। दुबे उस समय भांग की बूटी लगाकर के भोजन करने आता था, और बैठ कर के बड़े गंभीर मुद्रा में खाना खाता था। किसी से उस समय ज्यादा बातचीत भी नहीं करता । कभी अगले का हाथ प्लेट के ऊपर जाता कभी प्लेट से बाहर मेज पर चला जाता और इस तरह इनका रात्रि भोजन समाप्त होता उसके बाद सीधे अमर सिंह की कोठी
शैलेंद्र सिंह( दिवंगत स्वयंभू छात्र नेता) की टीम में दुबे महाराज, प्रमुख सलाहकार और खबरी हुआ करता था । इसके बदले मैं महीने भर का पॉकेट खर्चा भी यही उठाते थे।
प्रधानाचार्य जी बैठे हुए थे अपने कक्ष में।
चौंका मै इसलिए कि उनके सामने मेरे पिताश्री, अपने मित्र के साथ कुर्सी पर विराजमान थे। मुझ को देखते ही वह चहक उठे,
"यह क्या चला रहा है, मैं ना कहता था कि मेरा लड़का उस नेचर का है ही नहीं कि वह डर करके मैदान छोड़कर भाग जाए"
दरअसल हुआ यह था कि जब मैं संडे को घर नहीं पहुंचा पिताजी तुरंत कानपुर से जानकारी करने के लिए रायबरेली आ पहुंचे । उस समय फोन वगैरह तो होता नहीं था और इसी लिए मैं भी घर पर सूचना नहीं दे पाया था, इस पर स्वाभाविक ही था कि पिताजी को खोज खबर लेते हुए आना ही था ।
इधर पांडे जी ने उनको समझाया था कि लड़का आपका डर कर कानपुर चला गया है।
पिताश्री को पांडे जी की इस बात पर शक हो गया कि जरूर कुछ दाल में काला है क्योंकि बचपन से वह मेरा नेचर जानते थे कि मैं मैदान छोड़कर भागने वाला नहीं हूं . बस इसी बात को लेकर के वह प्रधानाचार्य से गरमा गरमी कर रहे थे, बात मान नहीं रहे थे और दोनों में यही बहस चल रही थी, कि तभी इंस्पेक्टर श्रीवास्तव ,
अंदर जाकर दहाड़े
"कहां है मुन्ना सिंह बुलाओ उसको'
मुन्ना सिंह वहां होता तो आता, मुझे आज भी याद है इंस्पेक्टर का वह रौद्र रूप । यही इंस्पेक्टर जो कि मुझे पहले तवज्जो ही नहीं दे रहा था पूरे स्टाफ के सामने पांडे जी को बताने लगा कि आपके कॉलेज में इसी कमरे में लड़के इनको देसी कट्टा दिखाकर के इस्तीफा लिखवाया है आपको पता है ?
पांडे जी ने कहा हा एक कागज मेरे पास आया तो है लेकिन उसका कोई मतलब नहीं होता है
इंस्पेक्टर फिर दहाड़ा "चाकी साहब आप यहा नौकरी करो देखते हैं आपके साथ कौन मादर... बदतमीजी करता है मैं उसकी टांगे चीर डालूंगा' ।
फिरोज गांधी पॉलिटेक्निक में इस तरीके का बहादुरी प्रदर्शन का यह प्रथम दृष्टांत था, क्योंकि लड़कों द्वारा इससे पूर्व की गई तमाम उत्पात और विशेषकर स्टाफ के साथ, किसी ने भी इस तरीके से प्रतिरोध नहीं किया हुआ था ।
स्टाफ बाहर खड़ा, इधर-उधर खड़ा हक्का-बक्का मुझको देखता रहा, कभी
मुझको तो कभी मेरे पिताश्री को तो कभी पुलिस को निहार रहा था .
प्रधानाचार्य जी ने रजिस्टर मंगवाया और गनीमत यह थी कि मेरे नाम के आगे कुछ क्रॉस वगैरह नहीं हुआ था , मैंने शनिवार और सोमवार, दी दिन का साइन किया, और इस प्रकार मेरे जीवन भर की तमाम फर्जी 'उपस्थिति हस्ताक्षर' 😉 का प्रथम चरण का, यह प्रारंभ था ।
अगले अंक में पढ़ें आगे की भयंकर समस्याएं🙏🏻