Feroz Gandhi Polytechnic , Raebareli

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नौकरी नौकरी नौकरी
07/06/2024

नौकरी नौकरी नौकरी

28/07/2023

दुनिया में वेश्यावृत्ति की उच्चतम दर वाले 10 देश:

1. थाईलैंड (बुद्ध)
2. डेनमार्क (ईसाई)
3. इटालियन (ईसाई)
4. जर्मन (ईसाई)
5. फ्रेंच (ईसाई)
6. नॉर्वे (ईसाई)
7. बेल्जियम (ईसाई)
8. स्पेनिश (ईसाई)
9. यूनाइटेड किंगडम (ईसाई)
10. फिनलैंड (ईसाई)

लेकिन भारत में हिंसा का कारण हिंदू धर्म को माना जाता है।😡

23/07/2023

*ताजमहल* जैसा मैंने पाया ( BARUN CHAKI)
(अंक - प्रथम)

ताजमहल पर मेरा आकर्षण पैदा हुआ जब ताजगंज के डीवाईएसपी श्री किशन सिंह यादव जी ने मुझसे कहा कि इसके छत के ऊपर चलोगे ? उस समय ताजमहल के छत जाने की चाबी ताज गंज चौकी मे रखी रहती थी।

दूसरा आकर्षण तब पैदा हुआ जब ताजमहल के अंदर एक कांस्टेबल ने, जादुई तरीके से मुझे दरजनो जगह ओम शब्द चित्रकारी के मार्फत लिखा हुआ दिखाया🥸

बात 1980 की है कानपुर में भातखंडे संगीत महाविद्यालय किदवई नगर में मैं लाइट म्यूजिक का अध्यापक हुआ करता था । विद्यालय के प्रबंधक, अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित डीवाईएसपी किशन सिंह यादव, (बॉडीबिल्डर) हुआ करते थे । , वह मुझसे कम से कम 10 साल बड़े थे परंतु मुझसे हमेशा मित्रवत बात करते, उनका मेरे ऊपर, मेरे फन के कारण अथाह प्रेम बरसता रहता था। संस्था में सर्वाधिक छात्र मेरे पास ही होते थे। मेरा एक आर्केस्ट्रा भी वहां चल रहा था। जिसमें दिवंगत राजू श्रीवास्तव कॉमेडियन, मेरा छात्र हुआ करता था। संस्थान मे मेरे अलावा बाद बाकी सभी बहुत ही प्रकांड विद्वान, जैसे पंडित दिनेश जी, देशपांडे जी, डॉक्टर सी एल त्रिपाठी जी, हरदयाल जी हुआ करते थे। मैं इन सबसे जूनियर था।

1983 में फिरोज गांधी पॉलिटेक्निक रायबरेली में मेरा ड्राइंग इंस्ट्रक्टर के तौर पर चयन हुआ और मैंने यहां की नौकरी छोड़ दी🙏
उधर सन 1984 मे डीवाईएसपी किशन सिंह यादव जी का तबादला आगरा में, ताज गंज में हो गया । उन्होंने मुझे अनेकों बार बुलाया कि आओ इंजीनियर साहब तुम्हें मैं ताजमहल का परिभ्रमण कराता हूं और यहां की रंगरलिया दिखाता हूं। ताजमहल मै क्या देखता, मुझे तो उनकी रंगरलिया वाली शब्द रसात्मक लगी। मुख्यता इसी कारण उनके कई बार अनुरोध पर मैं एक शनिवार के दिन सीधे आगरा पहुंचा और उनके थाने में हाजिर हो गया। डीवाईएसपी साहब मुझे देखते ही आनंदित हो गए और मुझे , बैठाकर तुरंत चाय पानी की व्यवस्था करवाई और फरमान सुना दिया की कम से कम तुम 4 दिन यहां रहना है। मैंने उनसे कहा कि मैं अधिक से अधिक 2 दिन रह सकता हूं क्योंकि नई नई नौकरी शुरुआत किया है खैर।
अब थाने की हालत देखिए 4-5 खतरनाक टाइप की औरते वहां खड़ी थी , यादव जी उनका झगड़ा निपटा रहे थे करीब आधे घंटे तक बहस करने के बाद वह सब चली गई। मैं भी अपना चाय पानी निपटा चुका था। तभी एक कांस्टेबल साइकिल से 7 कटोरे वाले बड़ा सा टिफिन लेकर के वहां पहुंच गए। यादव जी ने कहा कि आओ भोजन कर लेते हैं । तुम्हारे लिए स्पेशल ज्यादा खाना आज मंगवाया है। मैं समझ गया कि यह किसी के यहां से मुफ्त में आया होगा खैर मुझे इससे क्या एक कांस्टेबल बगल में बैठा था उसने कटोरा खोल के थाली वगैरा सब सजा दिया। एक कटोरी में आधा, केवल घी भरा हुआ था एक में पूरी चपाती ऊपर तक भरी हुई थी दाल था तो सब्जी थी सलाद था पूरा सात्विक भोजन। किशन सिंह यादव ने कहा आज मेरा व्रत रहता है नहीं तो तुम्हें मुर्गा शुरगा खिलाता। दो बड़ी-बड़ी मूली छिली हुई थी साथ में आचार भी था। मैंने विनम्रता में कहा यह मुर्गे से कम है क्या ?🤣मैंने छककर भोजन किया और वही उनके बेड पर सो गया।
शाम को 8:00 बजे करीब उन्होंने मुझे जगाया चलो तुम्हें ताजमहल घुमा लाते हैं । मैंने सोचा चलो रात में ही सही ताजमहल देख लेंगे क्योंकि इससे पहले मैंने रात में कभी ताजमहल नहीं देखा था ।

आम आदमी ताजमहल के गुंबद तक ही सीमित रहता लेकिन वास्तव में ताजमहल 42 एकड़ जगह में बसा हुआ है जिसके अंदर ताजगंज नहीं आता है। परिसर में असंख्य कमरे बने हुए हैं तथा 35 के करीब मकबरे है। आज के तारीख में ताजमहल को रोज 40000 करीब पर्यटको तक सीमित किया जा रहा है। महामारी के समय से लेकर 2022 तक जहां सारे पर्यटन केंद्र में , पर्यटको को सीमित कर दिया गया था तब भी ताजमहल ने 132 करोड़ रुपए कमाए।

29/04/2023

*रायबरेली पॉलिटेक्निक और मैं Barun Chaki*

( अंक 15)

*सीन नंबर* 06 INT.

*स्थान* पॉलिटेक्निक के भीतर का सीन, (चौरस्ता कैरिडोर गलियारा)

*समय* दोपहर का एक बजे

🎥 कैमरा पॉलिटेक्निक, के कैरिडोर चौराहे पर , क्रेन पर माउंट है, मिड रेंज मे फोकस और फ्रिज है।

*कैरिडोर चौराहे का विवरण* तत्कालीन

चौराहे से पूरब की तरफ लैब और मेकेनिकल कक्षाएं हैं, पश्चिम की तरफ स्टेनोग्राफी विभाग और लाइब्रेरी (वर्तमान में इलेक्ट्रिकल लैब) , चौराहे से दक्षिण की तरफ वर्कशॉप एवं फर्स्ट फ्लोर पर चढ़ने उतरने की सीमेंटेड सीढ़ी बनी हुई है । चौराहे से उत्तर दिशा में बाहर जाने का रास्ता।

कथानक का नायक वरुण चाकी, सीढ़ी से नीचे उतर रहे है कि तभी कैरीडोर चौराहे मे बघेल , मडराता हुआ नायक से पूछने लगता है

< बघेल >
(खिसियानी/ व्यंगात्मक हंसी करता हुआ)

*सर मेरे अटेंडेंस का क्या होगा ? मैं तो आपके क्लास में आया ही नहीं कभी*

< नायक >
(मन ही मन तिलमिला जाता है)

*ये तो तुम अपने के० पी० सिंह से पूछो*

नायक ने यह बात इस लिए कहीं, क्योंकि इससे पहले भी जब बघेल कोई बात करने आता तो, केपी सिंह का रेफरेंस लेकर के ही बात करता,
केपी सिंह ने यह कहा, केपी सिंह ने वह करने को कहा, फलाना फलाना ।
वह अपने को केपी सिंह का बहुत खास दिखाना चाहता था।

केपी सिंह वैसे भी मैकेनिकल विभाग मे सीनियर मोस्ट लेक्चरर थे (हमारे यहां एच ओ डी पद होता नहीं है हालांकि कई लोग अपने नाम के आगे एचओडी और कुछ तो वाइस प्रिंसिपल भी लिखा करते थे जबकि दोनों पद नहीं है🤣)

इस पर बघेल एकदम से गरम होकर कहने लगा
< बघेल >
*आप हमेशा केपी सिंह का नाम बीच मे क्यों ले आते हैं?*

और तभी बघेल अकस्मात🥸 नायक को एक तमाचा जड़ देता है ! ! ! !

🎥 कैमरा अब धीरे-धीरे क्लोजअप में आता है सीन को और ज्यादा वाइल्ड बनाने के लिए कैमरा डॉली और आर्क शॉट करता है सीन दोनो के चारों तरफ घूमने लगता है

*एक्शन*

बघेल के इस स्पर्धा पर नायक हतप्रभ तो होता है परंतु डरता नहीं है , क्योंकि वह ऐसे माहौल का पूर्व से ही अनुभवी रहता है।

फौरन ही वह एक लात चलाता है जो कि बघेल के पोते में सीधे जाकर लगता है, बघेल हैरान-परेशान कमर झुका कर के बैठ जाता है दर्द से बिलबिलाता रहता है


(दहाड़ता हुआ)

*मादरचो़़़़़़़़़*

*तुम्हारी मां चो़़़़ डालेंगे*

*भों़़़के तुम्हारी यह मजा़ल कि तुम मास्टर को मारोगे*

*सूअर के औलाद*

तब तक एक लाथ और जड़ता है

अब आप स्थिति समझिए पॉलिटेक्निक जैसे शिक्षण केंद्र में एक मास्टर खड़ा-खड़ा मां बहन की , अश्लील गाली बक रहा है चिल्ला रहा है और सामने उसके एक गुंडा झुक कर के बैठा हुआ है और मास्टर लात चला रहा है ।
पूरा कॉलेज अपने अपने कमरे से बाहर निकल आता है

🎥कैमरा अब पूरे कॉलेज को पैन कर रहा था हर दरवाजे से हर खिड़की से छात्र और बेचारे "मास्टरूवे" ताका झांकी कर रहे थे।

बघेल को यह कतई उम्मीद नहीं थी की मास्टर भी इस तरीके का हो सकता है। इससे पहले वह 9 स्टाफ को मार चुका था और सभी सर झुका कर के वहां से चले गए थे परंतु , दसवीं वाले में वह गच्चा खा गया
*सीन कट*

(सीन तो आगे और बढ़ेगा यह डायरेक्टर के ऊपर है परंतु व्यक्तिगत तौर पर मुझे यहां कुछ कहना भी है)

छात्रों की उद्दंडता देखिए कि तभी बगल के क्लासरूम से एक लंबा तगड़ा सा लड़का दौड़ता हुआ आता है और पीछे से मुझे पीठ पर घूंसा मार देता है। मुझे अभी पूरी तरीके से याद नहीं आ रहा है, शायद यह इलेक्ट्रॉनिक फाइनल ईयर का कोई संग्राम या फिर सागर जैसा नाम रहा, वह बघेल की मदद करने आया था। मैंने उसको जकड़ कर पकड़ लिया और उसका गला दबा लीया, परंतु तब तक बघेल उठ खड़ा हुआ था और स्वाभाविक है दोनों मुझ पर भारी पड़ने लगे।
मैं दोनों को लेकर के जमीन पर आ गया। परंतु तब तक हमारे ही बीच के बहादुर, गोपाल नारायण सिंह (स्वर्गीय) और बीसी गुप्ता जी ने मिलकर हम सब को छुड़ाया ।

मैं तब भी अनर्गल इन लोगों को गालियां बकता रहा। ये ससुरे इतने हतप्रभ थे यह पलट करके मुझे कुछ कह भी नहीं पा रहे थे।

स्वर्गीय बी सी गुप्ता बाद में , वर्षों तक हंस-हंसकर सुनाया करते थे चाकी की गुंडागर्दी हमने देखी है चौराहे में।

आनन फानन पूरे कॉलेज को बंद कर दिया गया। केपी सिंह तो पहले ही अपने चेंबर मे ताला लगाकर गायब हो चुके थे। अगला एक बार दिखा तक नहीं, जब कि उसी चौराहे पर, उनके चेंबर के सामने ही यह सारा कांड हो रहा था😝
कतिपय सीनियर लेक्चरर को छोड़ कर के, लगभग 20- 25 स्टॉफ (महिलाएं नहीं) उसी इंडस्ट्रियल थाने में गए और रिपोर्ट लिखवाया गया कि, बघेल और उस लड़के ने मिलकर के मुझे पीटा है।
इस हुजूम का नेतृत्व तत्कालीन पैदाइशी और जमीनी नेता पॉलिटेक्निक, के० के० भाई साहब (स्टोर अधिकारी, दिवंगत) कर रहे थे। संस्था को अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिया गया। बघेल और उसके चेले को बाद मे हॉस्टल से पकड़कर कोतवाली, उसके बाद जेल में डाल दिया गया।
इस कांड के बाद वह चेला इतना घबराया कि कभी मैं उसकी शक्ल फिर देख नहीं पाया।
यह शनिवार का किस्सा था अगले दिन रविवार होने के कारण मैं उसी दिन कानपुर के लिए रवाना हो गया। मैं थोड़ा अपने को असुरक्षित भी महसूस कर रहा था। परंतु एक बात मैं यह कहना चाहूंगा इस समाज में गीदड़ की संख्या जहां अधिक है वही इधर-उधर लुके छुपे बब्बर शेर भी रहते हैं।
इस घटना में जी० एन० सिंह और बी०सी० गुप्ता और बाद में के० के० भाई ने बब्बर शेर की भूमिका निभाई इसमें कोई शक नहीं।

गोपाल नारायण सिंह के बारे में थोड़ा बताना चाहूंगा। यह व्यक्ति संस्था नहीं पूरे शहर का इलेक्ट्रॉनिक्स के मामले में राजा हुआ करता था। शहर भर के तमाम इलेक्ट्रॉनिकस के दुकानदार इन के चेले हुआ करते थे। इनका सिद्धांत इतना सटीक होता था कि बड़े से बड़े इलेक्ट्रॉनिक फाल्ट में यह मात्र एक पेचकस लेकर पहुंचा करते थे और उसे ठीक कर दिया करते थे अंत तक मेरा करीबी मित्रों में से रहा। कॉलेज में कभी भी 12:00 बजे से पहले नहीं आया🤣
उस समय सबके घर में टेलीविजन , वीसीआर और इनवर्टर हुआ करता था इसलिए कॉलेज का पूरा स्टाफ इसका मुरीद था। गोपाल नारायण रात भर काम करता और सवेरे 12:00 बजे के बाद ऐलानिया कॉलेज में प्रवेश करता। कुछ-कुछ इसका चरित्र और दिनचर्या मेरे से मैच भी करता था हम दोनों ही प्राणी जीवन पर्यंत अपनी तनख्वाह से ज्यादा बाहर शहर से अपनी योग्यता से कमा लिया करते थे। जहां तक मेरे अपने हरामखोरी की बात थी तो मैं मंगलवार दोपहर को कॉलेज पहुंचता था और शुक्रवार दोपहर को कॉलेज से कानपुर के लिए रवाना हो जाया करता था🙃

धन्य हो बड़े भाई के० के० भाई साहब का अगले ने पूरी नेतागिरी की कमान संभाल ली संडे और मंडे 2 दिन लगातार यह लोग दरी बिछा कर बैठे रहे। उसी बीच यह कांड इतना ज्यादा फैल गया कि तत्कालीन माननीय संसद श्री अशोक सिंह जी पालीटेक्निक आए, उन्होंने शैलेंद्र सिंह को बुलवा करके , समस्त अध्यापकों से पैर पकड़ पकड़ के माफी मंगवाई और मंगलवार को जब मैं पहुंचा कॉलेज पूरा शांत था।

आंदोलन समाप्त हो चुका था। मैंने बड़े भाई के० के० की मदद से समस्त स्टाफ को बुलाकर एक बैठका किया, जिसमें लगभग समस्त स्टाफ उपस्थित रहे और पॉलिटेक्निक इतिहास का पहला यूनियन आई एम एफ की नींव डाली गई। इसके अध्यक्ष के०के० और सचिव आपका यह नाचीज वरुण चाकी चुना गया। आईएमएफ का फुल फॉर्म था इंस्ट्रक्टर मिनिस्ट्रियल स्टाफ एवं फोर्थ क्लास स्टाफ एसोसिएशन। इसमें हम लोगों ने लेक्चरर , वर्ग को अलग रखा।

02/04/2023

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शशि पाल शर्मा

25/03/2023

*रायबरेली, पॉलिटेक्निक और मैं*
( Barun Chaki )
(अंक 14)

*संपादकीय*

मेरा एक निवेदन पाठक वर्ग से है की, लेख से संबंधित समकालीन कोई भी अनुभव अगर आपके पास है, चाहे वह इस इतिहास के विपरीत में हो या पक्ष में , आप उसे इसी मंच पर या व्यक्तिगत मुझे पोस्ट जरूर करें।

मेरा अनवरत यह कहना है कि यह जो लेख मैं लिख रहा हूं, वह एकतरफा है । मैंने जो अनुभव किया वो मैं लिख रहा हूं । अत: किसी भी विषय या तत्व को मेरे अपने नजरिए से लिखा गया सत्य मानकर के ही पड़े🙏🏻

वर्ष 1974 में रायबरेली में आयोजित विकास प्रदर्शनी, इस क्षेत्र में तकनीकी विकास के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ। उसमें शामिल उद्योगपति और तकनीकी व्यक्ति, इतने प्रभावित हुए कि रायबरेली में पॉलिटेक्निक संस्थान शुरू करने का निर्णय लिया गया। तत्कालीन राज्यसभा सदस्य, श्री यशपाल कपूर इस उद्देश्य के लिए बनाए गए संघ के अध्यक्ष बने । *रायबरेली पॉलिटेक्निक एसोसिएशन* की छतरी के नीचे रायबरेली पॉलिटेक्निक की स्थापना 1975 में की गई थी। प्रथम सत्र का उद्घाटन इलाहाबाद पॉलिटेक्निक इलाहाबाद के, तत्कालीन प्रभारी कार्य मैनेजर, जमील अहमद ने 9.9.1975 को पदभार संभाला, और इस प्रकार इलाहाबाद से पहला बैच 1975 का शुभारंभ हुआ । तत्पश्चात रायबरेली में अमर सिंह की कोठी में (बस स्टेशन के करीब ) यह संस्था चलती रही। 1976 में रतापुर में स्थानीय गणमान्य व्यक्तित्व व उनके प्रयास से, जिसमें *श्रीमती सुनीता चौहान, माननीय अली अजहर नकवी, श्रीमती एस नैथन जी* व अन्य के प्रयास से रतापुर में जमीन आवंटन हुआ जिसकी आधारशिला तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा जी ने 1976 को रखा जो कि आज भी कॉलेज में लगा हुआ है।
संस्थान का नाम बदल कर, लगातार दो बार सांसद रहे मरहूम फिरोज गांधी जी के नाम पर फिरोज गांधी पॉलिटेक्निक रखा गया।
1980 तक के संस्थान अपने तरीके से चलता रहा शुरुआती दौर में इलाहाबाद में जाकर भी छात्र वर्कशॉप प्रैक्टिकल वगैरह करते रहे , बाद में कुछ लैब बगैरह अमर सिंह की कोठी में भी स्थापित की गई । इधर जमील साहब के नेतृत्व में संस्था का भवन भी बन के तैयार हो गया और नई नई मशीनें वगैरा भी स्थापित की गई संस्था अब पूर्ण तरीके से रायबरेली रतापुर में सुचारू रूप से चलने लगा । 1980 के आसपास संस्था में कुछ ऐसे लोग एडमिशन करके आ गए जिनके की सीधी भर्ती हुई, और जमील साहब के द्वारा ही इनका प्रवेश दिलाया गया । जिनमें शैलेंद्र सिंह उर्फ मुन्ना सिंह प्रमुख रहे । यह सुप्रसिद्ध समाजसेवी व बाहुबली धुन्नी सिंह वर्तमान मे दिवंगत के, दामाद ठाकुर परिहार जी का बड़ा बेटा हुआ करता था। परिहार जी एक अत्यंत सज्जन और जमीन से लगे हुए व्यक्ति थे, परंतु शैलेंद्र सिंह ने संस्था में आकर के पढ़ाई लिखाई न करके, अपने द्वितीय वर्ष में ही अध्यापकों के सामने, गलियारे में लाठी पटक कर के सब को चेतावनी दी कि " *अगर कौनो भोस...वाला हमै नकल करै मा रोहकिस, तो हम पंचै पीट डालब।* "

बस यही से संस्था की एकेडमिक और एडमिनिस्ट्रेशन की नीव हिलने लगी । बाद में इसका घनघोर प्रभाव 1987 तक रहा।
छात्रों का उपद्रव और टेरर अध्यापकों में इतना ज्यादा था, परीक्षा काल में छात्र रूम के अंदर गोल होकर के बैठकर नकल करते और इनविजीलेटर गलियारे में अपना चाय पानी पीते रहते थे व पहरा देते कि कहीं कोई आंतरिक या बाहरी उड़नदस्ता ना आ जाए। आंतरिक उड़नदस्ता उनसे तो छात्रों को क्या डरना परंतु जब बाहरी फ्लाइंग स्क्वायड आया करता था तो सीटी बजा दिया जाता। यही नहीं बल्कि कुछ इनविजीलेटर जो हमेशा छात्रों के पक्ष में रहते, सबसे पर्ची लेकर के किसी सुरक्षित स्थान पर रख देते थे। फ्लाइंग स्क्वायड जाने के बाद वही पुर्ची छात्रों को पुनः वापस कर दिया जाता।

इस बात की खबर लखनऊ बोर्ड तक थी। एक बार वहां से फ्लाइंग स्क्वायड का छापा पड़ा और लगातार 2 घंटे तक वह संस्थान में बैठी रही जिससे कि लड़के उनके जाने के बाद समय की कमी के कारण नकल न कर पाए ।
हमारे जैसे लोगों ने सोचा कि चलो यह अच्छा हुआ सारे के सारे शरारती लड़के फेल हो जाएंगे। फ्लाइंग स्क्वायड ने करीब ढाई घंटे का समय बिता करके संस्था से प्रस्थान किया, वह चले गए। इधर उनके जाने के बाद का खेल देखिए, यही छात्र पार्टी ने डिमांड किया कि 2 घंटा अधिक हम लोग को दिया जाए क्योंकि हम नकल नहीं कर पाए है हमारी कॉपीयां खाली है।

सभी छात्रों को 2 घंटा अलग से दिया गया । उनके परची वगैरा मुहैया कराए गए, ऑफिशियल टीम 2 घंटे के लिए अलग से बैठी रही कॉपी जमा करने में, इस प्रकार पूरा का पूरा संस्था इस अन्याय में शामिल रहा।
छात्र मंडली के अहम की पराकाष्ठा देखिए की 1986 में पेपर थोड़ा कठिन आने पर सारे सेकंड ईयर के लड़कों ने छात्र नेता के नेतृत्व में परीक्षा का बॉय कट कर दिया ।

कहते हैं पाप का घड़ा अपने आप फूटता है, वही हुआ । मजबूरन तत्कालीन प्रधानाचार्य श्री ब्रजरमण पांडे जी ने इसे स्वीकार कर लिया, जबकि लड़कों का इरादा कुछ और था परंतु वह सफल ना हो पाए और पूरा का पूरा संस्था सेकंड ईयर 1 साल बैक हो गया ।

प्रधानाचार्य पद का कार्यभार संभाले तत्कालीन ब्रज रमन पांडे जी को इन छात्रों ने कम परेशान नहीं किया , और मजे की बात देखिए किसी भी प्रवक्ता वर्ग ने, पांडे जी की मदद अथवा एकत्र होकर के छात्रों के विरुद्ध खड़े होने में कभी कोई रुचि नहीं दिखाई । बल्कि वह संस्था में इस तरह निर्विकार होकर घूमते कि जैसे उन्हें कुछ पता ही ना हो।

यहां पर एक बात मैं यह कहना चाहूंगा इस माहौल में भी कुछ छात्र बड़ी ईमानदारी से पढ़ाई लिखाई कर रहे थे । वे अध्यापकों एवं अन्य को सम्मान भी देते थे । परंतु इनकी संख्या 15% से ज्यादा नहीं था। उन्हीं में से एक मैकेनिकल छात्र *शशि पाल शर्मा* अपना संस्मरण मुझे बताते हैं की प्रधानाचार्य पांडे जी को जब छात्रों द्वारा कमरे में दरवाजा बंद कर दिया गया, इन्हीं मेधावी छात्रों द्वारा द्वारा फिर दरवाजे को खोला भी गया। परंतु समस्या यह होती थी कि जो लोग पढ़ाई लिखाई करते थे, उनको यह अराजक तत्व पढ़ने लिखने नहीं देते, बल्कि उनसे अपनी कॉपी बगैरा खुद लिखवाते । इन उपद्रव से मेधावी छात्र व्यथित थे।
एक बार छात्र जुलूस बनाकर के पांडे जी को पैदल, इंडस्ट्रियल थाने तक भी जबरदस्ती ले गए । संस्था से जुलूस बनाकर के इंडस्ट्रियल थाने तक पैदल ले गए, परंतु किसी भी तत्कालीन अध्यापक या अन्य वर्ग ने उनकी मदद नहीं किया ।

इधर टीचर लोगों की आपबीती सुनिए। वर्कशॉप सुपरिंटेंडेंट श्री बी सी गुप्ता जी हुआ करते थे। उनके वर्क शॉप के बाहर उनकी एक स्कूटर खड़ी रहती थी । लड़कों ने उसे गायब कर दिया। *शशि पाल* ने किस्सा सुनाया, स्पोर्ट्स में छात्र बघेल, थर्ड नंबर पर आया तो उसने कुर्सी उठा कर ए० के० गुप्ता को पूरे मैदान में दौड़ा दिया । बेचारे दहशत के मारे 6 महीने संस्थान में नहीं आए । डा० आर के पांडे जो मैथ्स के बहुत अच्छे अध्यापक हुआ करते थे, कानपुर से वीकली पैसेंजर रहे। शाम को एग्जामिनेशन समय पर, इन्हीं लड़कों ने रास्ते में उनके ऊपर चाकू लेकर हमला कर दिया, वो बाल-बाल बचे। बेचारे महीने भर संस्था में नहीं आए। अध्यापक यू० सी० पटवा एक दिन छात्र को थोड़ा डांट क्या दिए, रात में अमर सिंह के कोठी में जहां वह रहा करते थे, उनका दरवाजा पीटा गया और रात भर उनको धमकी और मां बहन की गाली सुनना पड़ा। मेरे एक मित्र अध्यापक जिनको इन्होंने बहस के दौरान नाक में घुसा मार दिया। फिर इन्हीं अध्यापकों में से एक मान्यवर के० पी० सिंह मरहूम, अगर किसी अध्यापक या फिर स्टाफ से नाराज हो गए तो लड़के जाकर उनको धमका आते।
यानी कि कहीं ना कहीं कोई न कोई अध्यापक और अन्य स्टाफ छात्रों के इन गुंडागर्दी का शिकार होता चला जा रहा था। परंतु यह लोग आपस में एकत्र होकर इसका विरोध करने की हिम्मत नहीं दिखा पा रहे थे, यहां तक कि पुलिस को भी कंप्लेंट करने की इनमे हिम्मत नहीं थी ।

आगे इन्होंने मेरे साथ क्या किया वह पढ़ें

20/03/2023

*रायबरेली पॉलिटेक्निक और मैं* ( Barun Chaki)

(अंक -13)

मैं दस्तखत करके और प्रधानाचार्य जी को एक हफ्ते की, अपने अस्वस्थ होने की छुट्टी का एप्लीकेशन दे कर के पिताजी के साथ कानपुर वापस लौट आया ।
मेरा मिशन पूरा हो चुका था अब कानपुर लौट कर के मैंने फिर से अपने पुराने सारे आय के स्रोतों को शुरू किया । मैंने तय कर लिया कि फिलहाल तो अभी मुझे रायबरेली मे नौकरी नहीं करनी है । एक तो वहां की अव्यवस्था दूसरा मुझे अब वहां जाने से डर भी लग रहा था क्योंकि मैं जान चुका था कि मैं किनसे पंगा ले रहा था ।

इधर लगभग 10 दिन बाद में एक पत्र प्रधानाचार्य के तरफ से मेरे घर मे भेजा गया कि
"आप अविलंब जॉइनिंग करें यहां पर आपके अनुपस्थिति के कारण छात्रों को पठन पाठन में नुकसान हो रहा है।"

उस समय फर्स्ट ईयर, सेकंड ईयर, थर्ड ईयर, तीनों मैकेनिकल ब्रांच में ड्राइंग हुआ करता था और इस प्रकार मेरे सप्ताह में 24 पीरियड हुआ करते थे, जो कि मेरे ना रहने के कारण खाली जा रहे थे । इस पर मैंने प्रधानाचार्य को जवाब में लिखा कि
"मेरी सुरक्षा की व्यवस्था किया जाए क्योंकि मुझे जान का खतरा है तभी मैं पढ़ाने आ सकता हूं।"

हफ्ते भर बाद अचानक मुन्ना सिंह, अपनी जीप गाड़ी में अपने चेलो को भर कर के कानपुर में मेरे घर हाजिर हो गया, इत्तेफाक से मैं वहां मिला नहीं । मैं उस समय कई और जगह इंगेज था और म्यूजिक स्कूल में भी पढ़ाया करता था। अगले ने घरवालों से मेरा लोकेशन लेकर के पूरे लाव लश्कर सहित किदवई नगर स्थित मेरे एक स्कूल में पहुंच गया परंतु मैं वहां से भी निकल चुका था दूसरे जगह पढ़ाने के लिए ।
इस प्रकार यह लोग खाली हाथ वापस लौट गए। रात को जब मैं घर लौटा मुझे पता चला कि "रायवरेली से पूरे लड़कों की फौज थी तुम्हें खोजने के लिए" तो मैं परेशान हो गया परंतु मेरे पिता श्री ने बताया "मुझे तो कोई खतरा नहीं लग रहा था बल्कि वो रिक्वेस्ट कर रहे थे कि आप पढ़ाने के लिए आ जाए आपको कोई तंग नहीं करेगा। "

परंतु मैं कहां जाने वाला था ! मैंने यह भी सोचा, जो कि स्वाभाविक भी था कि, अब की बार ये बुला करके कहीं किसी और जाल में ना फंसा रहे हो, फिर जब मैं रायबरेली में उनके एरिया में रहूंगा वह मेरे साथ कुछ भी कर सकते हैं।

प्रधानाचार्य पांडे जी का फिर से एक पत्र आया की आप यहां पूर्णतया सुरक्षित हैं, सुरक्षित वातावरण में आप रहेंगे बाद बाकी आपकी जान की गारंटी तो स्वयं डी एम भी नहीं ले सकते हैं . अगर नहीं आएंगे तो मजबूरन मुझे इसके लिए वैकल्पिक चुनाव करना पड़ेगा.

बात तो उनकी शत प्रतिशत सही थी।

अब मेरे लिए चिंता की बात थी.
एक बार मैं यह सोचता की इतनी अच्छी सरकारी नौकरी छोड़ दूं ? फिर यह भी सोच रहा था कि वहां जाकर के मेरे साथ क्या हो सकता है ? इसी उहापोह में में लगा था कि तभी मेरा एक निकट का मित्र बल्कि भाई ही समझे, दिवंगत सुमन लहरी ने मेरी मदद की. रायबरेली में उसका बहुत जान पहचान था
आखिरकार तमाम सोच विचार और योजना बनाने के बाद कानपुर से करीब 1 महीना 20 दिन पश्चात मैं रायबरेली के रवाना के लिए रवाना हुआ साथ में मेरा मित्र सुमन लहरी भी था.

उसने जाकर के मुझे वही प्रभु टाउन में पंडित प्रदीप त्रिवेदी उर्फ़ पप्पू भैया से मिलाया . यह त्रिवेदी परिवार उस समय रायबरेली में बड़ा प्रतिष्ठित परिवार हुआ करता था। पंडित पप्पू त्रिवेदी के घर का माहौल बिल्कुल जमींदार जैसा था. कितने लोग आ रहे हैं कितने लोग जा रहे हैं, इसका कोई हिसाब नहीं रहता और सभी बैठ करके चाय नाश्ता करके जाते. सुमन लहरी इनका विशिष्ट मित्र हुआ करता था. हम लोगों को त्रिवेदी जी ने अपने घर ही पर रहने के लिए व्यवस्था कर दिया। वही खाना खाओ नहाओ तो सारी व्यवस्था और बाद में पप्पू भैया ने स्वयं पॉलिटेक्निक मे जाकर के मुन्ना सिंह से हमारा सौहार्द पूर्ण वातावरण में बातचीत करवाया और इस तरह मैं पुनः कॉलेज में नियुक्त हो गया ।
बाद में पप्पू त्रिवेदी जी ने वहीं मुझे सेमरी कोठी में अपना एक खाली मकान दे दिया जिसमें मैं आगामी 19 वर्ष तक बिना किसी किराए के रहा।

मैं इसलिए इन बातो का जिक्र यहा पर कर रहा हूं कि, रायबरेली में इस तरीके के विशाल हृदय वाले लोग, पंडित लक्ष्मी नारायण मिश्र, पंडित प्रदीप कुमार त्रिवेदी, जो कि चुनाव के लिए भी लड़े थे ,आदरणीय अटल बिहारी जी के साथ एक ही मंच पर खड़े होकर के उन्होंने भाषण भी दीया। इनके विशाल ह्रदय और भलमनसाहत का वर्णन मैं क्या करूं! इस कलयुग में भी ऐसे लोग हैं यह कल्पना से परे है।

इसलिए मैं रायबरेली शहर के उन तमाम नागरिकों को जो कि आगे भी मेरे सुख-दुख में साथ रहे मैं उनका एहसान जीवन भर नहीं चुका सकता। किसी स्थान विशेष या संस्था को देखकर के किसी शहर के बारे में राय कायम करना उचित नहीं है। मेरे 36 साल के अध्यापन काल में रायबरेली शहर की किसी भी व्यक्ति ने मुझे कोई तकलीफ नहीं पहुंचाया बल्कि सम्मान और प्यार दिया, धन तो अलग से प्राप्त होता ही रहा। अतः मैं आज इस स्थिति में हूं कि रायबरेली और कानपुर दोनों में से किसी एक को अगर मुझे चुनना पड़ेगा तो मेरा तराजू रायबरेली वाले के तरफ झुक जाएगा । आज भी जब मैं कानपुर शहर में रहता हूं तो बात बात पर मेरे मुंह से रायबरेली शब्द निकल आता है और मेरे इष्ट मित्र इस पर हंसी करते हैं ।
सामंतवादी क्षेत्रों में अगर आप बहुत ज्यादा जिंदाबाद, मुर्दाबाद ना करें, तो उन तथाकथित सेकुलर शहरों से ज्यादा आराम से आप रहते हैं ऐसा मेरा व्यक्तिगत अनुभव है ।

मैं रेगुलर संस्था में जाने लगा.
संस्था में मेरा जो सबसे पहला परिचय और जिसने मेरे पीठ पर हाथ रखा वह थे दिवंगत रामजी श्रीवास्तव, मैकेनिकल इंस्ट्रक्टर ।

राम जी श्रीवास्तव लखनऊ से डेइली पैसेंजरी कर रहे थे. शुक्रवार को प्रायः वह घर चले जाते थे तो आते वही मंडे को दोपहर के बाद। मेरे साथ घटित घटनाओं एवं समस्याओं के समय यह लखनऊ में रहे, लेकिन आने के बाद, फिर पुलिस किस्सा सुनने के बाद यह इतना ज्यादा उत्साहित था कि, चलो मेरा एक दोस्त मुझे मिल गया, जो मेरे विचारों के अनुरूप है. क्योंकि तत्कालीन के पी सिंह महाराज इनको बहुत परेशान किया करते थे ।

इधर संस्था के तमाम नए-नए लोग छुप चुप करके ही सही, मुझसे आकर मिल करके मुझे आश्वासन, समर्थन दे रहे थे. मैं अनायास ही इनका एक बहादुर हीरो बन गया था जिनके आड़ में यह अपनी आवाज बुलंद करने की 'खाज' मिटा सकते थे😉

इन लोगों के पास , छात्र मुन्ना सिंह और उसके लगुओ- भगुवो द्वारा किया गया कुकृत्य के प्रति रोष तो था परंतु विरोध में खड़े होने के साहस में अभाव था. सब दहशत में रहते थे, अब उनको एक ऐसा व्यक्ति मिल गया जो इनके दुख तकलीफों के लिए सामने वाली पार्टी से भीड़ सकता है मैं इन लोगों के दबी हुई चेतना का बहुत बड़ा केंद्र था । सब अफवाहों के वजह से मुझे बहुत बड़ा शक्तिमान मान गए थे🤣

इनमें स्टोर कीपर,
दिवंगत के के महाराज ,उमेश चंद्र पटवा, श्री किशन शुक्ला, माता प्रसाद, स्थानीय जी एन सिंह जैसे लोग शामिल थे. यह सभी चतुर्थ श्रेणी ऑफिशियल स्टाफ और इंस्ट्रक्टर वर्ग से थे.
लेक्चरर वर्ग इनमें नहीं था। जबकि लेक्चरर वर्ग में छात्रों का अत्याचार ज्यादा था. आए दिन ये लोग अध्यापकों को मारपीट देते थे. छात्रों का आतंक उस समय संस्था में इतना अधिक था की मेरे जाने के पूर्व में यह 9 अध्यापकों को पीट चुके थे 1-2 अध्यापक तो लंबी छुट्टी पर घर चले गए थे . ऐसे माहौल में मेरे जैसे (लखैरा) अध्यापक की संस्था में एंट्री होती है🤣

क्रमशः

20/03/2023

रायबरेली पॉलिटेक्निक और मैं ( Barun Chaki)

(अंक 12)

अभी ,मैं प्रधानाचार्य जी के चेंबर के तरफ पैदल जा ही रहा था, साथ में मेरे लाव लश्कर भी थे, कि तभी शीर्णकाय, शक्ल से जवान भी नहीं - उम्र दराज भी नहीं , एक व्यक्ति पता नहीं कहां से लपकता हुआ मेरे पास आया

"बेटे क्या हुआ, बेटे क्या हुआ ?
देख बेटा मुझे बताएगा कि नहीं ? "

एक अजीब मसखरा सा व्यक्तित्व, बहुत ही साधारण फुल पैंट और फुलबाही का शर्ट पहने हुए, जिसके ऊपर की बटन गायब और बीच में एक दूसरे रंग का बटन लगा हुआ था मेरे आस-पास मरडराने लगा ।
मैंने थोड़ा अनइजी फील किया, यह कौन आके चपक रहा है मुझसे! फिर मुझे ध्यान में आया कि यह मेरे इंटरव्यू वाले दिन भी लड़कों के साथ आसपास टहल रहा था ।
यह महान व्यक्ति और कोई नहीं हमारे संस्था के नारद मुनि नाम से विभूषित, दिवंगत पंडित बी डी दुबे (वासुदेव दुबे) महाराज थे इनसे मेरा यह पहला चाक्षुष परिचय था ।

मेरे कुछ पाठक वर्ग ने मुझसे इनके बारे में भी लिखने को कहा था, तो मैं इनका अपने नजरिया से यहां परिचय कराना चाहूंगा, विशेषकर मेरे वह पाठक जो पॉलिटेक्निक से संबंधित नहीं है🙏🏻

दिवंगत पंडित बी डी दुबे को हमारे प्रथम प्रधानाचार्य, मरहूम जमील साहब संस्था में अपने साथ लाए थे।

यह अनुकंपा श्रेणी में आते हैं, जिन्होंने पूरे ठाठ के साथ फिरोज गांधी पॉलिटेक्निक में नौकरी किया, उचित योग्यता ना होने के बावजूद🤣
इन्होंने तत्कालीन प्रधानाचार्य जमील साहब की अनुगतता में अपना आधा जीवन व्यतीत किया, परंतु बाद में आए प्रधानाचार्य को इन्होंने कोई खास तवज्जो नहीं दिया ।

बड़ी मुश्किल से महाराज ने अंग्रेजी के दो चार शब्द रट रखे थे वही लिख पाते थे, दस्तखत में एक बी बनाकर लंबा लाइन खींच देते थे । शीट मेटल विभाग के वर्कशॉप इंस्ट्रक्टर हुआ करते थे ।

खासियत यह थी कि तत्कालीन डब्ल्यू एस स्वर्गीय विशेष चंद्र गुप्ता भी इनसे दबे हुए तथा दूरी बनाकर रखते थे ।
यह पूरी संस्था में केवल जमील साहब से ही डरते थे एवं जब जब जमील साहब इनसे कहते कि तुम अपनी सर्टिफिकेट लेकर आओ तो यह बहुत परेशान हो जाते थे । जमील साहब ने इनकी यह गोट पकड़ रखी थी, बल्कि दो बार तो ऐसा हुआ मेरे आंखों देखा किस्सा है🤣
इनके , किसी कूकृत्य से जमील साहब बहुत नाराज हो गए और कहा कि कहा
"दुबे तुम कल अगर अपनी सर्टिफिकेट लेकर नहीं आए तो तुम्हें नौकरी से निकाल दूंगा.
अब दुबे महाराज क्या करें ! कहीं से एक बहुत पुराना कागजात लेकर के पहले कोयला जलाकर धुएं में उसको आधे से अधिक काला किया फिर उसमें थोड़ा तेल लगा कर जमील साहब के सामने रख दिया । मैं वहीं बैठा हुआ था । उस कागज से मरे हुए चूहे की बदबू आ रही थी ।

जमील साहब अचानक चौंक कर खड़े हो गए मैं भी खड़ा हो गया, जमील साहब चिल्लाकर कहे "यह क्या बदतमीजी है?"
दुबे भी उसी तरह चिल्लाकर बोला " अरे आप ही ने तो कहा था, बड़ी मुश्किल से घर जाकर के बकसिया से ढूंढ कर के सर्टिफिकेट लेकर आया हूं "

"हठाओ इसे यहां से"

दुबे तुरंत सर्टिफिकेट उठाकर उल्टे पांव बैरंग वापस चल दिए, बाद में यू सी पटवा ( दिवंगत, फाउंड्री शॉप इंस्पेक्टर) ने मुझसे कहा इससे पहले यह बी सी गुप्ता के साथ भी यही कर चुका है । 🤣

वह जमाना कुछ और था इस तरह की चालाकियां और गलतियों को अधिकारी ओवरलूक कर देते थे। शायद इन्हीं विषयों को लेकर के कर्मचारियों का अधिकारी ब्लैकमेल भी करता रहा होगा🤔

दुबे की बात कहां तक कहू *हरि अनंत हरि कथा अनंता*

दुबे का अपना कोई निजी रहने का स्थान नहीं था वह दिन भर कॉलेज में रहता और रात को बस अड्डे के पास, अमर सिंह की कोठी के बरामदे में कोने के तरफ एक चारपाई इनकी परमानेंट पड़ी रहती थी उसी में जाके लेटते थे. वही हैंडपंप भी लगा था वहीं पर बाहर मैदान में शौचालय भी .
दुबे को जितना तनख्वाह मिलता था पूरा का पूरा वह अपने गांव प्रतापगढ़ भेज देता , अब पूरा महीना इनका उधार खाते में चलता था । उधारियों में उनके सबसे ज्यादा कॉलेज के छात्र होते थे ।

जिन छात्रों को पास होना होता था, या फिर प्रैक्टिकल में अधिक नंबर चाहिए होता था या फिर कॉलेज के किसी गेम में शामिल होना होता था या अन्य किसी फंक्शन में टूर वगैरह में अपना नाम, इस तरह तमाम छात्र छात्राओं के समस्याओं के समाधान करने में यह लगे रहते थे। इसके अलावा एकाथ संस्था के कर्मचारी भी इनके लपेटे में आ जाते थे ।

लेकिन मैंने पूरे जीवन में किसी भी व्यक्ति से अपने पैसे के लिए इनको तगादा करते हुए भी नहीं देखा । पूरा एक महीना इनका कॉलेज से इधर-उधर की जरायम पेशी में अपना इंवॉल्वमेंट होने के कारण उपरी इनकम होता रहता था उसी से सुनने में आता था कि यह पैसा भी वापस कर देते हैं । संस्था में छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा कार्यों में दुबे महाराज का इंवॉल्वमेंट जरूर रहता था।
फिरोज गांधी पॉलिटेक्निक में पूरे पूरे 16 घंटे की ड्यूटी करता था, शाम को रेलवे स्टेशन पर मिश्रा भोजनालय के बगल में परमा का होटल हुआ करता था । वेज और नॉनवेज दोनों वहां मिलते थे, मैं भी इस होटल में खाना खाता था। दुबे उस समय भांग की बूटी लगाकर के भोजन करने आता था, और बैठ कर के बड़े गंभीर मुद्रा में खाना खाता था। किसी से उस समय ज्यादा बातचीत भी नहीं करता । कभी अगले का हाथ प्लेट के ऊपर जाता कभी प्लेट से बाहर मेज पर चला जाता और इस तरह इनका रात्रि भोजन समाप्त होता उसके बाद सीधे अमर सिंह की कोठी

शैलेंद्र सिंह( दिवंगत स्वयंभू छात्र नेता) की टीम में दुबे महाराज, प्रमुख सलाहकार और खबरी हुआ करता था । इसके बदले मैं महीने भर का पॉकेट खर्चा भी यही उठाते थे।

प्रधानाचार्य जी बैठे हुए थे अपने कक्ष में।

चौंका मै इसलिए कि उनके सामने मेरे पिताश्री, अपने मित्र के साथ कुर्सी पर विराजमान थे। मुझ को देखते ही वह चहक उठे,
"यह क्या चला रहा है, मैं ना कहता था कि मेरा लड़का उस नेचर का है ही नहीं कि वह डर करके मैदान छोड़कर भाग जाए"

दरअसल हुआ यह था कि जब मैं संडे को घर नहीं पहुंचा पिताजी तुरंत कानपुर से जानकारी करने के लिए रायबरेली आ पहुंचे । उस समय फोन वगैरह तो होता नहीं था और इसी लिए मैं भी घर पर सूचना नहीं दे पाया था, इस पर स्वाभाविक ही था कि पिताजी को खोज खबर लेते हुए आना ही था ।
इधर पांडे जी ने उनको समझाया था कि लड़का आपका डर कर कानपुर चला गया है।
पिताश्री को पांडे जी की इस बात पर शक हो गया कि जरूर कुछ दाल में काला है क्योंकि बचपन से वह मेरा नेचर जानते थे कि मैं मैदान छोड़कर भागने वाला नहीं हूं . बस इसी बात को लेकर के वह प्रधानाचार्य से गरमा गरमी कर रहे थे, बात मान नहीं रहे थे और दोनों में यही बहस चल रही थी, कि तभी इंस्पेक्टर श्रीवास्तव ,

अंदर जाकर दहाड़े
"कहां है मुन्ना सिंह बुलाओ उसको'

मुन्ना सिंह वहां होता तो आता, मुझे आज भी याद है इंस्पेक्टर का वह रौद्र रूप । यही इंस्पेक्टर जो कि मुझे पहले तवज्जो ही नहीं दे रहा था पूरे स्टाफ के सामने पांडे जी को बताने लगा कि आपके कॉलेज में इसी कमरे में लड़के इनको देसी कट्टा दिखाकर के इस्तीफा लिखवाया है आपको पता है ?

पांडे जी ने कहा हा एक कागज मेरे पास आया तो है लेकिन उसका कोई मतलब नहीं होता है

इंस्पेक्टर फिर दहाड़ा "चाकी साहब आप यहा नौकरी करो देखते हैं आपके साथ कौन मादर... बदतमीजी करता है मैं उसकी टांगे चीर डालूंगा' ।
फिरोज गांधी पॉलिटेक्निक में इस तरीके का बहादुरी प्रदर्शन का यह प्रथम दृष्टांत था, क्योंकि लड़कों द्वारा इससे पूर्व की गई तमाम उत्पात और विशेषकर स्टाफ के साथ, किसी ने भी इस तरीके से प्रतिरोध नहीं किया हुआ था ।
स्टाफ बाहर खड़ा, इधर-उधर खड़ा हक्का-बक्का मुझको देखता रहा, कभी
मुझको तो कभी मेरे पिताश्री को तो कभी पुलिस को निहार रहा था .
प्रधानाचार्य जी ने रजिस्टर मंगवाया और गनीमत यह थी कि मेरे नाम के आगे कुछ क्रॉस वगैरह नहीं हुआ था , मैंने शनिवार और सोमवार, दी दिन का साइन किया, और इस प्रकार मेरे जीवन भर की तमाम फर्जी 'उपस्थिति हस्ताक्षर' 😉 का प्रथम चरण का, यह प्रारंभ था ।

अगले अंक में पढ़ें आगे की भयंकर समस्याएं🙏🏻

20/03/2023

रायबरेली, पॉलिटेक्निक और मैं ( Barun Chaki)

अंक 11

मैं जो भी लिख रहा हूं वह पूर्णतया सत्य संस्मरण है।
महान कवयित्री महादेवी वर्मा के शब्दों में, अनुभूति को शब्द द्वारा व्यक्त करना अत्यंत कठिन है। कलाकार बार-बार चेष्टा करता है और असफल होता है🤣

घटनाओं से इतर, अन्य विषयों पर राय पूर्णता मेरी निजी है एवं उनकी सामाजिक प्रमाणिकता का मैं कोई दंभ नहीं भरता. पाठकों के विचार निश्चय ही विभिन्न हो सकते हैं एवं उन पर समालोचना करना, उनका पूर्ण अधिकार है🙏🏻
मनुष्य के जीवन में समस्याएं निश्चय ही आती रहती है एवं प्रायः उस समय आपके निजी करीबी व्यक्ति भी मदद नहीं कर पाते हैं।
हमारे कम्युनिस्ट एवं नास्तिक विचारों वाले बंधु , मेरी इस बात को अक्षरश: नोट कर ले की ऐसे ही समय पर भगवत दर्शन होता है।

सीधी सी बात है कि अगर आप जिंदा है और स्वस्थ हैं, तो आप पर आए हुए समस्याओं का किसी न किसी रूप से निराकरण जरूर हुआ होगा, जिसको कि आप स्वयं अपने पुरुषार्थ से लाख प्रयत्न करने के बाद भी समाधान नहीं कर पा रहे थे 🙂
और ऐसे समय पर जरूर कोई मिरेकल या फिर , समझे तो दैवीय शक्ति द्वारा आपके समस्याओं को समाधान कर दिया जाता है ।
यह किसी भी रूप में हो सकता है । बस परखने की आपकी आत्मिक दृष्टि होनी चाहिए🙏🏻
यह सारी समस्याएं आपको अनुभवी एवं स्वावलंबी बनाता है । जिनके जीवन में कम समस्याएं आती हैं वह अपने को उतना ही ज्यादा असुरक्षित महसूस करते हैं।

परंतु आपके द्वारा ईमानदारी से प्रयास होना भी बहुत जरूरी होता है।

अब मैं जहां रायबरेली के पूरे समाज से हताश और निराश हो चुका था तभी कोतवाली गेट पर बुलेट मोटरसाइकिल मैं सवार, एक लहीम-सहीम सा दिखने वाला व्यक्ति अंगोछा डालें, सदरी पहनकर के दो-तीन लोगों के साथ कुछ आपसी विचार विमर्श कर रहे थे । उन्होंने मुझे ध्यान से देखा फिर अपने पास बुलाया
"क्या हुआ बच्चा? "

मैं बहुत ही बेचारा और असहाय अपने को दिखाता हुआ, करुण रस में अपनी पूरी गाथा अगले के सामने सुना दिया ।

पता नहीं क्यों मेरी छठी इंद्रिय, मुझसे यह कह रही थी कि इस शख्स से मुझे जरूर राहत मिलने वाली है।
यह व्यक्ति थे प्रभु टाउन के, पंडित लक्ष्मी शंकर मिश्र, नेता एवं सर्वमान्य समाजसेवी .

पंडित जी ने कहा बैठो मेरे गाड़ी के पीछे और अपने साथ के लोगों को छोड़कर के धड़धड़ाकर गाड़ी दौड़ा दिया शहर के बीच में, और कहा
"चलो तुमको मैं एसपी से मिलाता हूं."
मुझे और क्या चाहिए था, डूबने वाले को तिनके का सहारा, परंतु यह तो मुझे बहुत ज्यादा शक्तिमान व्यक्ति लग रहे थे।
अब भारतवर्ष के लिए मेरा गणित ठीक बैठ रहा था मुझे समझ में आ रहा था कि यह कोई बनाना रिपब्लिक नहीं है 🙏🏻 लेकिन अगले कि इस तरह की सहृदयता से मुझको थोड़ा बहुत आशंका भी हुआ, कि हो ना हो यह व्यक्ति भी तपा हुआ है, नहीं तो इतनी जल्दी मुझे लेकर एसपी से कैसे मिलाने को तैयार हो गया?
खैर जो भी हुआ हो

आगे की कहानी थोड़ा संक्षेप करना चाहूंगा पंडित लक्ष्मी नारायण मिश्र ने मुझे दो दिन बिना जान पहचान के अपने घर में सम्मान सहित रखा, खिलाया पिलाया और इस बीच उन्होंने मुझे तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट पुलक चटर्जी से भी मिलवाया । पंडित जी ने स्वयं जेल में बंद ठाकुर अखिलेश सिंह से भी मिल कर समस्या का बखान किया और उनसे आश्वासन प्राप्त किया, और मंडे को सवेरे मेरे प्रार्थना पत्र पर हरे रंग की कलम से इंडस्ट्रियल थाने को लिखा गया एसपी साहब का निर्देश एवं तदोपरी , लाल रंग की कलम से एसपी साहब को दिया गया डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट पुलक चटर्जी का ऑर्डर था ।

मैं 9:00 बजे के करीब करीब इंडस्ट्रियल थाने में पहुंचा वहां पर वही श्रीवास्तव जी 2-4 अन्य अधिकारियों के साथ बैठे हुए थे। मैंने अगले को जब अपना प्रेम पत्र दिखाया तो वह स्वयं ही कहने लगे कि
"मेरे पास वायरलेस से आपके बारे में खबर आ चुकी है चलिए हम लोग चलते आपके साथ कॉलेज, देखते हैं कौन मादर...आपको परेशान करता है"
थाने का माहौल पूरा चेंज हो चुका था सब जैसे मुझे मदद करने के लिए ही बैठे हुए थे।

थोड़ी देर बाद मै रिक्शे में ,और मेरे दाहिने बाएं दो दरोगा मोटरसाइकिल में और उनके पीछे चार कांस्टेबल साइकिल में, यह जुलूस लेकर के मैं पॉलिटेक्निक गेट के अंदर धड़ाधड़ता हुआ प्रिंसिपल रूम के सामने हाजिर हो गया। मैंने नोटिस किया कि आसपास के लोग जैसे कोई अजूबा हो गया हो, इस नजर से मुझे देख रहे हैं उन्हें उन्हें ऐसी स्थिति की कतई उम्मीद नहीं थी। परंतु प्रिंसिपल साहब के ऑफिस में जाने के बाद चौंकने की बारी अब मेरी रही 🫢🤣

क्रमशः

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