13/09/2018
मानव शरीर यूं ही नहीं मिल जाता. मेरा मानना है कि हर किसी का जन्म एक बड़े काम को पूरा करने के लिए होता है. ऐसा ही किताबों में भी लिखा है. किताबों में ये भी लिखा है कि आदमी को सुबह 6 बजे जाग जाना चाहिए. ये पढ़कर मुझे समझ आया कि मेरा जन्म एक न एक दिन सुबह 6 बजे उठ जाने के लिए हुआ है. लेकिन अफसोस ये दुर्लभ घटना आज तक न घट सकी. मंगल धरती से हाथ मिलाकर चला गया. मामा मून, ब्लडी मून, सुपरमून-बैटमून जाने क्या-क्या हो गया. शनि ग्रह के छल्ले परांठे वाली गली तक आकर चाट चख गए, लेकिन मैं छः बजे न जाग सका.
मेरे माता-पिता ने भी चाहा था कि उनकी औलाद कभी सुबह 6 बजे उठ जाए. इसके लिए वो अलार्म वाली घड़ी लेकर आये. दुर्भाग्य देखिए, जिस अलार्म की आवाज़ सुनकर मुझे उठना था, जब वो बजता तो उसकी स्वर लहरियों में मुझे और मीठी नींद आने लग जाती. अलार्म की आवाज़ मेरे लिए वही काम करती है, जैसे आजकल मच्छरों के काम मच्छरमार अगरबत्तियां आ रही हैं.
भारत में टेलीकॉम क्रान्ति हुई, लगे हाथ टूजी घोटाला भी हुआ.वीरेंद्र सहवाग की मुठ्ठी के बाद हर हाथ फ़ोन पहुंचा और उसके अलार्म में मनचाही धुन लगाने की सुविधा भी. लेकिन अलार्म की वो धुन भी मुझे छः बजे न जगा सकी. मैं चुन-चुनकर ऐसी कर्कश रिंगटोन लगाता जो अलार्म में बजे तो मेरी रूह तक कांप जाए. हुई अंतरात्मा भी वैसे जाग जाए, जैसे गठबंधन के सही जोड़ीदार देख नीतीश कुमार की जाग जाया करती है. इनमें से कई रिंगटोन्स इतनी कर्कश थीं जिन्हें सुन मेरे अड़ोस-पड़ोस के मुर्गों ने बांग देना छोड़ दिया. मेरे घर के आसपास के तीन घरों तक गौरैया ने आना बंद कर दिया, कुछ पड़ोसी तो ये शिकायत भी करते हैं कि शायद उन्हीं कर्कश गानों के कारण हमारे अड़ोस-पड़ोस में सूरज की रोशनी भी पूरी शिद्द्त से नहीं आती. लेकिन ये सब करके भी मैं छः बजे न उठ सका. उन तमाम कर्कश गानों में मुझे संगीत सुनाई देने लगा और नींद गहराने लगी. आज की तारीख में मेरी फेवरेट सिंगर का नाम ढिंचैक पूजा है.
लेकिन इंटरनेट पैक की तरह ही हर चीज की एक लिमिट होती है. मुझे जल्द ही महसूस हुआ कि अगर मैंने समय से जागना शुरू नहीं किया तो मेरी हेल्थ पर असर पड़ेगा. हेल्थ की बात आते ही हिन्दुस्तानी आदमी की नींद टूट जाती है. हिन्दुस्तानी आदमी बीमारी की जांच कराने जाता है, बीमारी निकली तो होने वाले खर्चे के नाम पर दुखी जाता है. बीमारी न हुई तो दुखी हो जाता है कि जांच के पैसे बेवजह डूब गए. चार दिन की कोशिश के बाद मैं छः तो नहीं लेकिन सात बजे जागने में कामयाब हुआ. ठीक उसी शाम मैंने अमेरिका की (ऐसी यूनिवर्सिटियों जिनका नाम अक्सर हम याद नहीं रख पाते, में से एक ) यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट पढ़ ली. लिखा था, नींद पूरी न कर पाने वाले आदमी की ज़िंदगी बहुत ज़्यादा दिन नहीं चलती. अब देखिए, छः बजे या दस बजे जागने से ज़्यादा फ़र्क़ तो पड़ता नहीं. इत्ती छोटी सी बात के लिए मैं ज़िंदगी को तो दांव पर नहीं लगा सकता न? मुझे लगता है, शायद ही मैं कभी छः बजे जाग सकूं.
~ कटाक्ष, दैनिक भास्कर में