Bal Vidya Mandir Gangaganj

Bal Vidya Mandir Gangaganj We are one of the best school in raebareli

03/09/2022

अलग अलग धातुओं/लिक्विड के मेल्टिंग पॉइंट , बोइलिंग पॉइंट अलग अलग होते हैं...अलग अलग मोटर साइकिल के इंजिनों के क्षमता अलग अलग CC की होती है..वैसा ही हर आदमी की ब्रेन कैपेसिटी का भी हाल है..हर आदमी के किसी डिसीजन को लेने के ट्रिगर अलग अलग होते हैं..

यही वजह है कुछ लोग ट्रैफिक में गाड़ी पर हल्का सा स्क्रैच लगते ही जूझने लगते हैं..कुछ तसल्ली से बात मैनेज कर जाते हैं...जीरा तेल में पड़ते ही चिलमिला जाता है वहीँ इलाइची और दालचीनी तसल्ली से फ्लेवर इनहेंस करती हैं...सबका अपना रोल है सबकी अपनी भूमिका है..

जो सामने युद्ध आ रहा है वहाँ पैदल बरछी/तलवार वाले भी चाहिए..घोड़ों पर बैठ कर हाथों में भाले लेके भेदने वाले भी चाहिए..हाथियों पर बैठ कर युद्ध संचालन करने वाले भी चाहिए...किसी भी युद्ध में इंडिविजुअल वीरता का अपना स्थान है..लेकिन साथ ही डिस्प्लीन की अपनी वरीयता है..

जोश और अनुभव का समन्वय है..जरूरी नहीं है कि ये सबको दिखे..या सब इस से सहमत हों..पर जिन्हे समझ आता है..... वो अपनी लीडरशिप में पैनापन लाएं.... वक़्त देखें और वक़्त के बहाव को समझे... सही समय पर सही शॉट का सेलेक्शन कर के जीवन का आनंद ले......
........ आगे का फिर कभी

14/06/2022

आखिर उम्र का वो दौर आ ही गया...
जिसके बारे में जब सुनते थे..
तो लगता था..
ऐसा कभी हमारे साथ तो हो ही नहीं सकता..

वही फील मानो आप बल्ला लेके खेलने गए हों..
और आपके पास 4 दोस्त न हों साथ खेलने के लिए..

अब दोस्त हैं जिनसे होली दिवाली व्हाट्सप्प पर फॉरवर्ड मैसेज के जरिये संवाद होता है...
फेसबुक पर आने वाले बर्थडे अलर्ट के बाद भी अब शायद ही किसी को विश करते हैं..

कहाँ वो ज़माना था जब अपने दोस्तों के घर लगे टेलीफोन के नंबर जुबानी याद रहते थे..
अब तो ये भी मुश्किल से याद रहता है कि कौन किस शहर में है..

ऐसा नहीं है कि वो बदल गए हैं और हम वैसे ही हैं..
बदल सब ही गए हैं..
पढ़े लिखे लोगों की भाषा में कुछ लोग इसे evolve होना भी कहते हैं..
तो कह सकते हैं कि थोड़ा थोड़ा हम सब ही इवॉल्व हो गए हैं..

अकेलापन By चॉइस हो तो बोझिल नहीं लगता..
लेकिन आप अपनी ये चॉइस हर किसी को समझा नहीं सकते..
खासकर उन साथियों को जो अचानक पुराने शहर में टकरा जाएँ तो पूरे उत्साह से आपसे मिलते हैं..
लेकिन अब आप शायद वो आदमी रह ही नहीं गए हो जिसे आपका वो दोस्त जाना करता था..

आप थोड़ी बहुत फॉर्मेलिटी वाली हंसी हँसते हो..
इधर उधर की कुछ बातें पूछ लेते हो..
ताकि उसे ये न लगे कि आप Connected फील नहीं कर रहे हो..
आप उस से नंबर भी एक्सचेंज करते हो..
व्हाट्सप्प पर पिंग करके Hi के बाद अपना नाम लिख कर छोड़ देते हो..
और फिर एक वायदा करके कि अगले त्यौहार पर सब स्कूल वाले दोस्त इकट्ठे बैठेंगे आप निकल लेते हो..

और निकलते ही २ मिनट के अंदर आपकी फॉर्मेलिटी वाली मुस्कान गायब हो जाती है..
और चेहरे पर वही गंभीर भाव वापस आ जाता है..

अंदर के इमोशंस के खत्म होने का दौर है ये..
न दर्द होता..न ख़ुशी होती..

घर के बड़े बुजुर्ग अब दुनिया से जाने लगे हैं..
जिंदगी अब अपने हर शेड के साथ आपके सामने है..

आप मन ही मन जानते हो..
कि अब लगभग हर सच्चाई से आपको जूझना ही पड़ेगा..

अब कोई बहाना नहीं है..
कोई झूठी दिलासा नहीं है कि सब ठीक हो जाएगा..
सब आपको ही ठीक करना है..
हर रोज अपने अंदर के एक इमोशन को खत्म करना है..
हर रोज थोड़ा और जिम्मेदार बनना है..

अब जब स्कूटर पर शहर घूमने निकलते हैं..
तो वहाँ बिताये जीवन के सारे अच्छे दिन फ़्लैश बैक में सामने ही दिखते जाते हैं..

और आप वही अकेले..थोड़ा मुस्कुराते हुए..
अंदर ही अंदर थोड़ा सुकून ढूंढ लेते हो..
अपने अंदर के उस हिस्से के लिए..
जो आज भी बच्चा ही है..
जिसे आज भी डर लगता है..
जिसे आज भी ख़ुशी होती है..
जिसे अब आपने अपने अंदर तक ही सीमित कर लिया है..

एक टफ चेहरे के साथ दुनिया को फेस करने के लिए....

14/06/2022

अब रात के वक़्त होने वाली बारिशें..
दिमागी उड़ान को वैसे नहीं छूती..
जैसे बचपन में गाँव के कच्ची छत वाले घर में छूती थीं..

एक कोना था जो हमेशा टपकता था..
और अगर कोई नयी जगह टपकने लगे तो..
फ़ौरन खोइया ओढ़ के..
छत पे जाके उस बल्ली के सहारे मिटटी डाली जाती थी..
उस दौर में छाते हर घर में कहाँ हुआ करते थे..

नानी हमेशा मना करती थी..
दरवाजे के बीच में खाट डाल के नहीं सोते..
अपशकुन होता है..

पर अंदर ही अंदर दिल करता था..
दरवाजे से आती ठडी हवा और पानी की फुहारों में
आधी चारपाई दरवाजे से बाहर निकाल के..
आकाशगंगा में देखें इंद्र देव के रथ को..

आकाशगंगा अक्सर दिख जाती थी
उन आसमानों में..
और नींद भी आती थी भरपूर..
बिना किसी बिजली के..
बिना किसी पंखे के

हैडफोन कान में लगा के..
रोज वही प्ले लिस्ट सुनते सुनते सो जाने के आदी तो हम अब हुए हैं..

27/06/2021

अनजान से डर..

जो हमारी जिंदगी में हमेशा हमारे साथ चलते हैं...
और उन काल्पनिक डरों से..
हम लड़ते हैं हर रोज..मन ही मन...

मैं बहुत ज्यादा ड्राइव नहीं करता...
लेकिन मन ही मन हमेशा लगता है कि मेरा झगड़ा होगा..
उस आदमी से जो टोल पर लाइन तोड़ के बीच में अपनी गाड़ी घुसाता है...
ये काल्पनिक लड़ाई मैं मन ही मन..
सैकड़ों बार लड़ चुका हूँ...

लेकिन कभी ऐसा हुआ नहीं है...

पर एक अनजान सा डर है...कि कभी तो ऐसा होगा..

एक सपना है जो बार बार मैं देखता हूँ...
और वो ये कि आज मेरा एग्जाम है..
और मैं कोई और सब्जेक्ट पढ़ आया हूँ..
या मेरी तैयारी बिल्कुल नहीं है..
ये सोचते सोचते मैं सपने में बहुत घबरा जाता हूँ...
इतना...कि सुबह उठने पर जब ये अहसास होता है..
कि ये एक सपना था...
मुझे बहुत सुकून महसूस होता है...

एक अनजान सा डर...

जब मुझे लगता है कि मैं किसी सोसाइटी में अपनी गाड़ी लेके घुसूंगा..
तो सिक्योरिटी गार्ड किसी बहाने से मुझे रोके रहेगा..
और मैं लड़ूंगा उस काल्पनिक लड़ाई को...
जो अभी तक मेरे साथ कभी हुई भी नहीं....

एक अनजान सा डर...

जब मुझे लगता है कि..
मेरे ऑफिस में मेरे खिलाफ साजिश रचने वालों पर..
जब मैं एक्शन लूंगा..
तो कहीं ऐसा तो नहीं उसके घर वाले भूखे मरने लगेंगे..
ये मैं सोचता हूँ...
लेकिन शायद वो नहीं...जो मेरे खिलाफ साजिश करते हैं..

एक अनजान सा डर..

जब मुझे लगता है कि..
भगवान ने मुझे एक आशीर्वाद देके भेजा है..
क्या उस आशीर्वाद के साथ..
मैं न्याय कर पा रहा हूँ...

ये सब सोचते सोचते हुए..छोटा बेटा मुस्कुरा के हाथ खोलके गोदी में चढ़ने को पास आ जाता है...

और मैं सोचता हूँ..

कि क्या ये भी इस दुनिया को ऐसे समझेगा..

जैसा मैं समझता हूँ....

15/04/2020

आजकल हर आदमी की फ्रेंड लिस्ट में दर्जन भर श्रीकृष्ण, दो दर्जन श्रीराम, सवा दर्जन भरत, आधा दर्जन हनुमान, एक पाव दर्जन दशरथ, ढाई दर्जन अर्जुन, पौने दर्जन रावण और दो दहाई कुम्भकर्ण मिल रहे हैं.. माहौल कत्तई वैदिक हो रखा है..
जीवन सदैव इतना ही सरल था.. खाओ, हरि सुमिरन करो.. और सो जाओ..
पंखा हाथ से झलने में दिक्कत थी.. स्विच बना दिया.. फिर बेड से उठकर स्विच दबाने में दिक्कत थी.. रिमोट बना दिया.. फिर रिमोट से उंगली दुखने लगी.. एलेक्सा आ गयी.. जब सब कुछ करने में इतनी दिक्कत ही थी तो आये क्यों इस दुनिया में.. सजीव क्यों बने.. रहते आत्मा बनके.. बिंदु रूप में परमात्मा रूपी पुञ्ज में विलीन.. अकर्मण्यता स्मार्टनेस नहीं हो सकती.. स्मार्टनेस वही है कि आबादी संसाधन में समन्वय बना रहे.. दुनिया चलती रहे.. मोहब्बत जिंदा रहे..
हमने अपनी पशुता को मार दिया.. फिर समाज के रूप में संगठित हुए.. समाज के मूल में करुणा थी, वरना जानवरों सा जीवन भी क्या बुरा था.. करुणा की रक्षा को धर्म बने.. धर्म ने खुद ही करुणा छोड़ दी और शोषण का पर्याय बन बैठे.. फिर बाजार आया.. और बाजार ही धर्म बन गया.. आँकड़े दौड़ने लगे, भावनाएँ शिथिल हो गईं.. समाज काहे का? फिर पशुता में क्या बुरा था.. नियति तुम्हारे समाज को थम पुकार चुकी है.. नियति के दरबार मे मानवता एक कटघरे में खड़ी है, मानव दूसरे कटघरे में.. नियति ने मानव से मानवता अलग करने वालों को ही परीक्षार्थी बनाया हुआ है.. कल तक रुपयों के अभाव में ऑपेरशन न करने वाले जान जोखिम में डाल के नियति के आदेश का अनुसरण कर रहे हैं.. कल तक जनता पे संताप बनी कानून व्यवस्था जनता के लिए नाखूनों पे खड़ी है... हजारों ट्रकों का अनाज बिना हाजमोला के डकार जाने वाले अन्नहंता दिनरात भूखहंता की परीक्षा दे रहे हैं.. नियति का न्याय यही है.. कल तक बेवजह यात्रा करने वाले घरों में कैद हैं.. ओवरहालिंग यही होती है.. चक्का को धुरी से निकाल के ग्रीस और बीयरिंग चेक कर लिया जाएगा.. नियति को लगेगा कि सब ठीक तो सब ठीक.. वरना जय श्री राम..

15/04/2020

संसाधनों का समुचित प्रयोग ही इस वक्त की लड़ाई है.. सत्तू अगर है तो चावल दाल अगले दिन के लिए काम देगा.. सब्जी रात में.. हरी न सही तो सूखी ही.. बच्चों व वृद्धों के पोषण का यथासंभव ख्याल रखें.. वक्त है बीत जाएगा.. बाहर घूमने का मन करे तो मोटरसायकिल पे कपड़ा मार लें.. फीलिंग आ जायेगी.. फिर भी नहीं आती है तो एक कंकड़ टायर में फंसा के उसे पेचकस या चक्कू से निकालने का यत्न करें.. खराब सड़क के लिए व्यवस्था को कोस भी सकते हैं..
घर मे कमरों का विन्यास रोज बदलें.. बेड-चौकी-कुर्सी-टेबल आदि को बदल बदल के हर संभावना का निष्पादन करें.. पक्ष- विपक्ष पर चर्चा करें.. हो सके तो तुलना के लिए नोट्स बनायें.. लूडो जरूर खेलें.. ऑनलाइन ही सही.. लगातार न जीतें.. हारते रहने पर जिजीविषा विद्यमान रहती है..
अच्छे अच्छे फलों की फ़ोटो डाउनलोड करें.. एक एक फल को 5 मिनट घूरें.. बीच-बीच मे आँख बंद करके उसके जायके का मानसिक आस्वादन करें..
पूजा पाठ बहुत जरूरी है.. अगर आप रामायण देख रहे हैं तो आपको पूजा करने की कोई जरूरत नहीं है.. लेकिन अगर नहीं देख रहे तो नहाने के बाद अगरबत्ती जरूर जलाएँ.. आँख बंद कर लें.. और डॉक्टर, सफाईकर्मी या पुलिसकर्मी जिसका ध्यान लगाना चाहें लगा सकते हैं.. खाद्यान्न और बैंक वाले देवी-देवताओं का ध्यान लगा सकते हैं..
जीवन अब तक आपका निष्प्रयोज्य था.. निरूद्देश्य था.. ज्यादातर लोग इतने व्यस्त थे कि इतने सुखद दिनों की कल्पना केवल रिटायरमेंट के बाद कर सकते थे.. आपको भरी जवानी में रिटायरमेंट का फील मिल रहा है.. आपकी हड्डियाँ चड़चड़ा नहीं रही हैं.. यौवन शेष है फिर भी आप सुकून में हैं.. रिटायरमेंट के बाद इज्जत कम हो जाती है.. लेकिन आपके इज्जत पानी मे भी कोई खास कमी नहीं है.. और क्या चाहिए?
समाज सेवा के लिए भी बहुत वक्त है.. आसपास के लोगों को सूखा अनाज पैसा आदि दान दीजिए.. लेकिन दूरी का खयाल रखना है.. ये वक्त भी गुजर जाएगा.. सतुआन और रंगाली बिहू की शुभकामनाएं..

04/09/2019

देखा जाय तो एक बगल में चाँद होगा एक बगल में रोटियाँ ही जीवन का पुरुषार्थ है.. इसके ऊपर आदमी जो भी करता है वो सब मिथ्या है.. पर सुनहरे चाँद के नीचे भादो की रात में जिले के सरकारी हस्पताल के परिसर में एक बगल में मरीज लिए एक बगल में ईंट के चूल्हे पर गाँव से लाये आटे की रोटियाँ सेकते परिवार को भी क्या ये गीत इतना ही सुहाता होगा? असली अर्थ दूसरी पंक्ति में है.. जब गरीब चाँद पे रोटी की चादर डाल के सोने की बात करता है.. चंद्रमा की सतह से चन्द्रयान सिर्फ 104 किलोमीटर दूर है.. और यहाँ नीचे डॉक्टर कहते हैं कि बिस्तर नहीं है.. कोई चाँद को खबर दो कि नीचे कितनी भसड़ है.. चाँद को लजवा दो, एक छोटा लकड़ी का मचान बनाओ, और रोटी को टेलिस्कोप टाइप में टाँग दो.. न चाँद को तुम देखो, न चाँद तुमको देखे.. बीच मे रोटी ग्रहण लगा दे.. सुनहरे चाँद पे स्वर्णिम इतिहास का साक्षी मत बनो तुम.. चारों तरफ चाँदनी आने दो बस चेहरे पे रोटी की छाया बनने दो.. शुतुरमुर्ग बन जाओ.. खतरा आने पे मुंडी लुकवा लो.. ये चंद्रयान सिर्फ उसके लिए है जो या तो आयुष्मान योजना का लाभार्थी है या तो पैसे वाला है.. तुम इसके बीच मे हो.. ठीक उस रोटी की तरह.. तुम्हारी गरीबी पर सवर्णता का धब्बा लगा है.. धब्बा चाँद पे भी है.. लेकिन तुम चाँद नहीं हो.. तुम रोटी हो.. अधजली धब्बे वाली.. इसलिए इस स्वर्णिम दूधिया रोशनी से दूर रहो.. रोटी की चादर डालो चाँद पे.. और सो जाओ..

13/09/2018

मानव शरीर यूं ही नहीं मिल जाता. मेरा मानना है कि हर किसी का जन्म एक बड़े काम को पूरा करने के लिए होता है. ऐसा ही किताबों में भी लिखा है. किताबों में ये भी लिखा है कि आदमी को सुबह 6 बजे जाग जाना चाहिए. ये पढ़कर मुझे समझ आया कि मेरा जन्म एक न एक दिन सुबह 6 बजे उठ जाने के लिए हुआ है. लेकिन अफसोस ये दुर्लभ घटना आज तक न घट सकी. मंगल धरती से हाथ मिलाकर चला गया. मामा मून, ब्लडी मून, सुपरमून-बैटमून जाने क्या-क्या हो गया. शनि ग्रह के छल्ले परांठे वाली गली तक आकर चाट चख गए, लेकिन मैं छः बजे न जाग सका.



मेरे माता-पिता ने भी चाहा था कि उनकी औलाद कभी सुबह 6 बजे उठ जाए. इसके लिए वो अलार्म वाली घड़ी लेकर आये. दुर्भाग्य देखिए, जिस अलार्म की आवाज़ सुनकर मुझे उठना था, जब वो बजता तो उसकी स्वर लहरियों में मुझे और मीठी नींद आने लग जाती. अलार्म की आवाज़ मेरे लिए वही काम करती है, जैसे आजकल मच्छरों के काम मच्छरमार अगरबत्तियां आ रही हैं.

भारत में टेलीकॉम क्रान्ति हुई, लगे हाथ टूजी घोटाला भी हुआ.वीरेंद्र सहवाग की मुठ्ठी के बाद हर हाथ फ़ोन पहुंचा और उसके अलार्म में मनचाही धुन लगाने की सुविधा भी. लेकिन अलार्म की वो धुन भी मुझे छः बजे न जगा सकी. मैं चुन-चुनकर ऐसी कर्कश रिंगटोन लगाता जो अलार्म में बजे तो मेरी रूह तक कांप जाए. हुई अंतरात्मा भी वैसे जाग जाए, जैसे गठबंधन के सही जोड़ीदार देख नीतीश कुमार की जाग जाया करती है. इनमें से कई रिंगटोन्स इतनी कर्कश थीं जिन्हें सुन मेरे अड़ोस-पड़ोस के मुर्गों ने बांग देना छोड़ दिया. मेरे घर के आसपास के तीन घरों तक गौरैया ने आना बंद कर दिया, कुछ पड़ोसी तो ये शिकायत भी करते हैं कि शायद उन्हीं कर्कश गानों के कारण हमारे अड़ोस-पड़ोस में सूरज की रोशनी भी पूरी शिद्द्त से नहीं आती. लेकिन ये सब करके भी मैं छः बजे न उठ सका. उन तमाम कर्कश गानों में मुझे संगीत सुनाई देने लगा और नींद गहराने लगी. आज की तारीख में मेरी फेवरेट सिंगर का नाम ढिंचैक पूजा है.

लेकिन इंटरनेट पैक की तरह ही हर चीज की एक लिमिट होती है. मुझे जल्द ही महसूस हुआ कि अगर मैंने समय से जागना शुरू नहीं किया तो मेरी हेल्थ पर असर पड़ेगा. हेल्थ की बात आते ही हिन्दुस्तानी आदमी की नींद टूट जाती है. हिन्दुस्तानी आदमी बीमारी की जांच कराने जाता है, बीमारी निकली तो होने वाले खर्चे के नाम पर दुखी जाता है. बीमारी न हुई तो दुखी हो जाता है कि जांच के पैसे बेवजह डूब गए. चार दिन की कोशिश के बाद मैं छः तो नहीं लेकिन सात बजे जागने में कामयाब हुआ. ठीक उसी शाम मैंने अमेरिका की (ऐसी यूनिवर्सिटियों जिनका नाम अक्सर हम याद नहीं रख पाते, में से एक ) यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट पढ़ ली. लिखा था, नींद पूरी न कर पाने वाले आदमी की ज़िंदगी बहुत ज़्यादा दिन नहीं चलती. अब देखिए, छः बजे या दस बजे जागने से ज़्यादा फ़र्क़ तो पड़ता नहीं. इत्ती छोटी सी बात के लिए मैं ज़िंदगी को तो दांव पर नहीं लगा सकता न? मुझे लगता है, शायद ही मैं कभी छः बजे जाग सकूं.
~ कटाक्ष, दैनिक भास्कर में

02/04/2018

अक्सर मजाक में बोल देते हैं
"लालटेन" है क्या !!!
लालटेन ही क्यों "ट्यूबलाइट" भी प्रचलित है।पर आज मैं बात सिर्फ लालटेन की करुँगी।
वैसे अब कौन इसके बारे में पढ़ना चाहता है, और कौन लिखना चाहता है ! पर अगर आप याद करेंगें तो एक छोटी सी कहानी आपकी भी इस लालटेन से जुड़ी होगी...कभी हमारे
घर के किसी कोने में एक जगह उसकी भी थी।
मेरे बचपन में दिन की शुरुवात घरों में अक्सर लालटेन को बंद कर उसके शीशे पर आई कारोच को साफ करने से होती थी।मैं भी घर की लालटेन को जलाना चाहती थी पर उम्र में छोटी होने की वजह से मुझे अक्सर उससे दूर रहने की हिदायत दी जाती।
कई बार शाम को फ्रॉक उठाकर मैं बाबा के पास बैठ जाती और उन्हें देखती ,कि कैसे वो लालटेन जलाते हैं,कैसे इसका शीशा लगाते हैं।हल्का- हल्का धुँआ निकलकर कैसे शीशा काला हो जाता है।
और वो मेरे लिए एक खेल बन गया था।पर वो खेल दूर रहकर सिर्फ देखने वाला था...उसको पास जाकर छूने का मतलब घर में किसी का थप्पड़ खाना था।फिर भी मैं अक्सर नजर छुपाकर शीशे की कारोच पर अपना नाम लिख देती या कोई आकृति बना देती।
मुझे बाबा की वो आवाज याद है जब वो बैठक से चिल्लाते " लालटेन जली या नहीं "???
ये घर का नियम था और इसका बिजली आने या ना आने से कोई सम्बन्ध नहीं था।घर में बना एक कोना कब "लालटेन वाली अलमारी" के नाम से प्रचलित हुआ मुझे भी नहीं पता ...
आज भी पुराने घर का रेनोवेशन हो गया , घर में कोई लालटेन नहीं पर वो अलमारी उसी नाम को सहेजे हुए है।
खैर वक़्त गुजरा और अगले दिन कक्षा 8 का पेपर था और मुझे आधी रात पढ़ना था।
पढ़ना कौन चाहता था !!
कई बार प्रार्थना करने पर भी उस दिन लाईट नहीं जा रही थी और मुझे पढ़ना पड़ रहा था।
किताबों पर लिखे अक्षरों से ज्यादा मैं लाइट जाने की प्रार्थना दोहरा रही थी।
और अचानक लाईट चली गयी।अँधेरा हो गया।
और मेरे मन में ख़ुशी का सूरज उगा था । "अब पढ़ना नहीं पड़ेगा " ये सोचकर मैंने किताबों को बंद करके रखा ही था कि कमरे के कुछ दूर से हल्की रोशनी मेरी तरफ आई और ठहर गई।
"लालटेन" लेकर मम्मी आयीं थी और ये सुझाव खडूस पापा का ही था जो अक्सर परीक्षा के समय मेरे साथ पूरी रात जागते।
लालटेन लाकर रख दी गयी और बिना कहे ही मैंने मुँह सिकोड़ते हुए किताबों को खोल लिया। लेकिनआँखों में गहरी नींद भरी थी।
उस हल्की पीली रोशनी ने धीरे -धीरे सफ़ेद शीशे को काला कर दिया और मेरी किताबों के अक्षर धुंधले हो गए।ये मेरे लिए एक मौका था जब मैं चुपके से रात के अंधेरे में लालटेन को जलाती उसके शीशे को साफ करती।गर्म शीशे पर करोच के ऊपर अपना नाम लिखती ।नींद उड़ गयी थी, किताबों से दूरी बना ली और मैं उस लालटेन से खेल रही थी ये भूलकर कि कल मेरा पेपर है।ये कितना सुकून वाला था।पहली बार खुद लालटेन जलाना।तेल भरना , शीशा लगाना।और फिर पढ़ना । अंदरूनी ख़ुशी ने पढ़ने का जज़्बा भी बढ़ा दिया था और अपने हाथों जलायी उस लालटेन की रोशनी में पढ़ने का कुछ और ही मजा था।जो बस मेरा मन समझ सकता था।
ये शायद एक अचीवमेंट था उस वक़्त।बहुत बड़ा अचीवमेंट, जिसकी खबर दूसरे दिन बाबा को जाकर सुनानी थी कि मैंने लालटेन जलाना सीख लिया था।
🙂

17/02/2018

#पहली नौकरी का सफर

*******************************

शहरों में आते हैं हम..

सद्दी के नए गुल्ले जैसे..

पहली नौकरी..नए रूम मेट,

और जिंदगी का चाय..परांठे..मैगी हो जाना..

बड़े शहरों के बड़े लोग मिलते हैं ऑफिस में..

कैब मिलतीं हैं..

ऑफिस के कैफेटेरिया की तारीफ़ हम अपनी माँ से फोन पर करते हैं..

ताकि वो और परेशान न हो..

कुछ वक़्त सब बहुत अच्छा सा लगता है..

हम शहर के सारे मॉल घूम लेते हैं..

पहली तनख्वाह पापा के हाथ रखने वाली फील भी ले लेते हैं..

पहला अप्प्रेजल ऐसे ही निकल जाता है..

पर हम खुश होते हैं..

फिर धीरे धीरे हमारे वो कपडे पुराने होने लगते हैं

जो नौकरी पे आने से पहले पापा ने दिलाये थे..

हमारे कुछ रूम मेट प्राइवेसी की दुहाई देके अलग फ्लैट में निकल लेते हैं..

आप किराया अफ़्फोर्ड नहीं कर सकते..

और ये बात अपने घर भी नहीं बता सकते..

क्यूंकि पिताजी के लाख मना करने के बावजूद

तुमने खुद ही अपने लिए ये नौकरी चुनी थी..

और कंपनी कितनी बड़ी है..लोग कितने अच्छे हैं जैसी बातें,

तुम उनके सामने अनेकों बार बखान कर चुके हो..

तुम एक सस्ती लोकलिटी में अपने लिए कमरा ढूंढते हो..

घर पर झूठे बहाने बनाते हो कि कैसे तुम्हारे दोस्तों को onsite जाना पड़ा..

और तुम्हें जल्द बाजी में ये सस्ता कमरा लेना पड़ा..

कॉलेज से निकल के तुम अपने पुराने दोस्त भूल गए थे..

अब तुम्हारे नए दोस्त तुम्हें भूल चुके हैं..

तुम्हारी सारी उम्मीदें..

अपने अगले अप्प्रेजल पर टिकी हैं..

तुम दिन रात मेहनत करते हो..

कई बार ऑफिस की कैब नहीं मिलती..

तुम शेयर्ड ऑटो की भीड़ में घर आते हो..

तुम्हारे कपडे अब भी वहीँ हैं जो तुम्हारे पिताजी ने नौकरी से पहले दिलाये थे..

चेहरे की चमक गायब रहने लगी है..आवाज में डर है..

लेकिन माँ के फ़ोन पर तुम पूरी कोशिश करके वो डर छुपाते हो..

अब तुम अपने घरवालों को अपने कमरे पे नहीं आने देते..

तुम्हें डर है तुम्हारा मजाक बन जाएगा..

तुम्हारे आस पास के अच्छे लोग..

अब अच्छे नहीं रह गए..

अब तुम समझने लगे हो कि कैसे वो एक दुसरे की टांग खींचते हैं..

चुगलियाँ कैसे चलती है..

हर कोई मैनेजर का ख़ास बना रहना चाहता है..

तुम कोशिश करना चाहते हो वो सब करने की..

पर धीरे धीरे तुम्हें इस जगह से नफरत होने लगती है..

तुम घर लौट जाना चाहते हो..पर लौट नहीं सकते..

अप्रेजल आके चला जाता है..

पर तुम्हारे हालात लगभग वही रहते हैं..

तुम कैट की तैयारी शुरू करते हो..

पर दो दिन बाद ही किताबे हमेशा के लिए बंद हो जाती हैं..

तुम CV अपडेट करके नयी नौकरी पा जाना चाहते हो..

पर तुम्हारे पास रेफरल नहीं है..

जैसे तैसे करके इंटरव्यू तक पहुँचते हो..

वहाँ अंग्रेजी कमजोर होने की वजह से मात खा जाते हो..

अब तुम लौट नहीं सकते..

तुम्हारी जिंदगी के सबसे प्रोडक्टिव साल..

तुमने एक झूटी चमक के पीछे भागते हुए निकाल दिए हैं..

अब यहां से वापस जाना संभव नहीं..

पर ये बात भी है..

कि अब तुम्हें आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता..

जब पीछे लौटने के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं..

तब एक असाधारण साहस अंदर पैदा हो जाता है..

जिस दौर से गुजर चुके हो..

अब उस से बुरा कुछ हो ही नहीं सकता..

अब तुम आगे बढ़ोगे..

और कुछ सालों में वैसे ही हो जाओगे..

जिनसे तुम्हें नफरत हो गयी थी..

22/01/2018

दूर किसी शहर में बैठे इलाहाबादी को अगर यूपी 70 की नंबर प्लेट लगी गाड़ी दिख जाए या फिर संगम किनारे रात भर रौनक की दुकान खोल बैठा माघ मेले के तस्वीरे - वक़्त की सुईया वापस के तरफ दौड़ने लगती है और यादों के खजाने की डेटा माइनिंग कर बचपन की एक अतरंगी तस्वीर खैच जाती है !!

किसी जादू की माफिक अपना शहर एक जिंदादिल मेले में तब्दील हो चुका होगा इस बरस फिर से ! रेत पर आशियाना और कल्पवास गुलज़ार ! लोहे के सड़क बिछ गई और बिजली के तार फिर से दौड़ पड़े है ! गंगा जमुनी किनारा बिजली के बल्ब पहिने एल्विस प्रेसली माफ़िक इतरा रहा होगा ! जनवरी के महीने के इस मेले पर अपना शहर एकदम वैसे ही इतराता है जैसे एक पंद्रह बरस के लड़के के हाथ मे नई नई बाइक की चाभी आ जाये !

बड़ी टेशन और परियाग ऐसे व्यस्त दिखते है जैसे घर मे कोई बारात आने वाली हो और तैयारी अभी अधूरी हो ! इलाहाबाद के तरफ दौड़ने वाली गाड़िया डाकिया माफ़िक एहसास के बेशुमार चिट्ठियां 211002 के पते पर पहुँचा रही होगी ! लोग रेल के डिब्बो में आस्था बोरियो में भरे सर रख कर प्रयाग स्टेशन पर फिर से उतर पैदल संगम तक का सफर तय कर रहे होंगे ! सर्द हवाओ के बीच त्रिवेणी के तट पर जिंदगी के महा उत्सव में फिर से सरीक होंगे ! उत्सवधर्मिता का चेन रिएक्शन चालू हो गया होगा !

बचपन में हम उसी भीड़ में शामिल होते चलकर बल्लियों के भूलभुलैये से होते हुए किनारे तक जाते पर गंगा नहाने में किस मासूम को दिलचस्पी होती भला,जल्दी से दो चार डुबकी मार चंदन माथे पर लगा कुम्भ मेले में संगम पर अपने हिस्से का अमृत दुसरो के हवाले कर हम तो उस तरफ मुड़ जाते जिधर जिंदगी ने रंग बिरंगा बाजार सजा रक्खा होता ! किले की दिलचस्प दीवारे,खिलौने की दूकान, खोमचे वाला, मौत का कुआँ, बासुरी और न जाने कितने रंग बिखरे हुए मिलते, रात में अपना ही शहर मानो नए कपड़े पहिने यू जगमगाता मिलता के पहिचाना मुश्किल होता ! लगता मेले की रेतीली भूलभुलैया में कुछ रोज के लिए लापता जाए बस !!

गंगा जमुना का बलुवा किनारा तब भी एक उत्सव था आज भी है, इलाहाबाद में घुसते ही पहली फुर्सत में सबसे पाहिले इस किनारे पर जाकर बैठ जाना ही अपना तीर्थ है गुरु आज भी !!

--नितिन यादव !!

15/01/2018

ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति से लेकर मानव विकास की अंतिम सीमा अर्थात ट्रैफिक जाम तक इंसान ने जितना ही सिस्टमैटिक बनने की कोशिश की वो उतना ही जटिल होता चला गया..
मेरे घर से परचून की दूकान का पैदल बीस मिनट का रास्ता था, पर मैंने तरक्की कर ली.. अब गाड़ी से पांच मिनट में ही पहुँच जाता हूँ, और पंद्रह मिनट पार्किंग की जगह खोजने में लग जाते हैं..
समय के साथ हम इतना तेज भाग रहे हैं कि कृतज्ञता को "थैंक यू" और विनय को "प्लीज" की बेड़ियों में बाँध के आगे बढ़ जाते हैं.. कस्बे से निकलते हुए मैंने चलती गाड़ी से बगल में चल रही एक बस े की एक फोटो खींचने की कोशिश की, फोटो क्लिक भी सही वक़्त पे हुई थी, पर मेरी गाड़ी इतनी तेज थी कि बस का बोनट कैमरे में आया.. थोड़ा आगे पीठ पे बस्ता टाँगे स्कूल ड्रेस पहने छोटा हाथी की छत पर बैठे एक प्यारे से बच्चे की फोटो लेने की दुबारा कोशिश की, अबकी बार क्लिक थोड़ा पहले ही किया था, फिर भी लम्हा पकड़ में नहीं आया.. शहर पहुँचते पहुँचते मुझे तत्वज्ञान हो गया कि लम्हों को कैद करना है तो अपनी स्पीड कम करो, या थोड़े समय के लिए ठहर जाओ..
हम जिस आने वाले कल के लिए आज बेतहाशा भाग रहे हैं वो भी आने वाले कल में आज ही होगा.. और हम जियेंगे भी उसे आज के ही अंदाज में.. मतलब अगर आज आपाधापी है तो कल भी होगी, आज नहीं है तो कल भी नहीं होगी.. रुको, थोड़ा ठहरो, देखो जिंदगी के फ्रेम में तस्वीरें कितनी फिट बैठती हैं..
मेरे बचपन के सारे दोस्त बिछड़ गये, और नए बनते गये.. नए भी कल पुराने हो जाएंगे और बिछुड़ जाएंगे क्योंकि मैंने मिलने के बाद बिछुड़ने की प्रक्रिया को प्राकृतिक नियम मान लिया है.. नहीं.. ऐसा नहीं है.. ऐसा अब तक इसलिए हुआ कि मुझे खुद ही नहीं पता था कि जिंदगी के किस चढ़ाव में गियर उतर रहा है और किस उतराव में गियर चढ़ रहा है.. मेरी भागती हुई स्पीड ही मेरे सारे दोस्तों की दोस्ती को खा गई.. ..पर इस माघ ऐसा नहीं होने देना है, चुन के कुछ पुराने बिछड़े दोस्तों के घर जाना है, भागती गाड़ी से नहीं, उतर के चाय की चुस्कियां लेते हुए बकैती करनी है..

Address

NH-24B Gangaganj Raebareli
Raebareli
229303

Telephone

9838324930

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Bal Vidya Mandir Gangaganj posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share

Category