Khushi Bal Pratiyogita 10+2 Coaching centre

Khushi Bal Pratiyogita 10+2 Coaching centre

Share

Education

01/04/2026

अपने उज्जवल भविष्य, शानदार रिजल्ट एवं पूर्ण सफलता के लिए अवश्य पधारें।
Admission is going on

Photos from Khushi Bal Pratiyogita 10+2 Coaching centre's post 01/04/2026

अपने उज्जवल भविष्य, शानदार रिजल्ट एवं पूर्ण सफलता के लिए अवश्य पधारें।
Admission is going on

27/03/2026
27/03/2026

Admission is going on

Photos from Bal vidya niketan online classes's post 14/04/2022
13/11/2021

राजेन्द्र चोल की गंगा यात्रा
**********************
दक्षिण के प्रतापी राजा राजेन्द्र चोल (प्रथम) ने गंगा की यात्रा की। उन्होंने भागलपुर की उत्तरवाहिनी गंगा से जल उठाया और अपनी राजधानी के समीप बनाए गए सरोवर में डलवाए। उसका नाम #चोलगंगा दिया और अपनी पदवी #गंगईकोंडन धारण की।

इस बात को कभी विस्तार से नहीं बताया गया कि आखिर उस काल में बंगाल की राजनैतिक स्थिति क्या थी और चोल द्वारा यह यात्रा क्यों की गई थी।

कुछ इतिहासकार यह तर्क देते हैं कि गंगा यात्रा कर जल लाकर शिवगंगा को समर्थ करने हेतु राजेन्द्र चोल ने यह यात्रा की तो कुछ इतिहासकार कहते हैं कि अपने भगिना (भांजा) राजराजा नरेंद्र की मदद करने के लिए उनका यह सैन्य अभियान था। राखालदास बनर्जी का कहना है कि सेनवंश को बंगाल की गद्दी पर बैठाने के लिए यहां आए। जबकि सत्यता कुछ और थी।

राजराजा चोल के पुत्र #राजेन्द्र_चोल (प्रथम) सन 1014 में गद्दी पर बैठे। इसके 12वें वर्ष में तिरुमाला पर्वत के 'श्री कुंडवई जिनालय' पर एक शिलालेख खुदवाया। यहां जिनालय नाम से किसी को जैन सम्प्रदाय का बोध नहीं होना चाहिए। जिनालय का अर्थ ईश्वर का निवास स्थान है। इस जिनालय पर अंकित शिलालेख में इस गंगा-यात्रा का क्रम उपलब्ध है।

पूर्वी चालुक्य साम्राज्य से होते हुए वे 'कलिंग' पहुंचे। वहां से 'ओडा विषय' (उड़ीसा) पहुंचे। वहां गोदावरी नदी को पार किया। यहां के 'कोसल' स्टेट में पहुंचे तो #ब्राह्मणों की बहुत बड़ी फौज सामने थी। (इस जगह की पहचान भुवनेश्वर के रूप में हुई है। वे यहां बिना संघर्ष किए आगे बड़े।) वहां से 'दंडभुक्ति' पहुंचे। दंडभुक्ति के राजा धर्मपाल को हराकर आगे बढ़े। वहां की सीमा पार कर 'दक्षिण राढ़'/राधा राज्य के शासक राणासुर (सूर वंशी) से संघर्ष किया। यह बंगाल का क्षेत्र था जहां वर्षा का अंत नहीं था। वहां से आगे बढ़कर गोविंदचंद्र (चंद्र वंशी) के राज्य पर चढ़ाई की। गोविंद हतभाग्य रहे किन्तु उनके हाथी बहुत शक्तिशाली और समझदार थे। वहाँ से आगे बढ़ने पर महिपाल (पाल वंशी) की सेना से भयंकर युद्ध हुआ। 'उत्तर राढ़'/ राधा का पूर्वी क्षेत्र कीमती मोतियों वाले समुद्र तक था। उसकी सीमा गंगा को छूती थी। तत्पश्चात गंगा नदी तक पहुंचकर उसका जल संग्रह किया और उच्छिष्ट तीर्थों में उसका जल छिड़का।

इस यात्रा क्रम में राजेंद्र चोल के साथ बड़ी सेना थी। इसका अर्थ है कि यह सैन्य अभियान था। वह अपनी महत्वाकांक्षा के साथ यहां आए थे किन्तु पुण्यसलिला गंगा की पवित्र अविरल धारा देखकर विजय से उल्लासित होकर लौट गए। उनका विजय अभियान महिपाल के ध्येय को तोड़ना था। इसलिए समुद्रविजयी सेनाधिपति होने के बाद भी वे गंगा के उत्तरी प्रक्षेत्र में गंगा को लांघकर नहीं गए। उनके लिए गंगा को लांघना बड़ी बात नहीं थी। बड़ी बात कि महिपाल का क्षेत्र गंगा के पार नेपाल तक था। अब सवाल है कि महिपाल ही निशाने पर क्यों?

पालवंश के प्रतापी राजाओं में महिपाल (ई. 978- 1030) का नाम भी आता है। महिपाल का विजय अश्व कोई रोक नहीं पाता था। कहते हैं कि उसने वाराणसी तक अपना साम्राज्य विस्तार कर लिया था। उसके साम्राज्य में बौद्ध संप्रदाय का #तंत्रयान चरम पर था। महिपाल ने ओदंतपुरी (बिहारशरीफ) का विस्तार किया, नालंदा में एक विशाल बौद्ध मंदिर बनवाया, सोमपुर व त्रिकाटक महाविहार में तंत्रयान के साधकों के लिए निर्माण कार्य कराए। तिब्बत में तंत्रयान की संवृद्धि हेतु यहां से आचार्य भी भेजे। आचार्य पिंदो ने इनके कार्यों से प्रसन्न होकर अपनी पुस्तक ' #कालचक्रतंत्र' की रचना का आधा अंश ही इन्हें दे दिया है जिसकी चर्चा तिब्बती इतिहासकार लामा #तारानाथ ने भी की है। विदित हो कि इसी आक्रमण के समय अतीश दीपंकर भागकर श्रीविजय (जावा-सुमात्रा) पहुंच गए। इन्हीं महिपाल के पुत्र नयपाल की आर्थिक सहायता से #अतीश तिब्बत पहुंचे।

ऐतिहासिक सूत्र बताते हैं कि चोल के आक्रमण से पूर्व महिपाल ने खड्ग-बल से उत्तरी और दक्षिणी राढ़ पर अधिकार कर लिया था जिस पर चंद्र और सूर वंशियों का शासन था। लेकिन ये दोनों वंश इन क्षेत्रों के छोटे-छोटे भाग पर उस समय अधिकार जमाए हुए थे। इन दोनों हिस्सों को मिलाकर बंगाल प्रांत (वर्तमान बिहार- बंगाल- बांग्लादेश) का 97 प्रतिशत भूभाग था।

राजेन्द्र चोल पारंपरिक #शिवभक्त थे। महिपाल के निर्बाध बढ़ते कदमों को रोकने हेतु वे भागलपुर तक चढ़ आए। यह विजय यात्रा थी न कि तीर्थयात्रा। अगर यह तीर्थ यात्रा होती तो वे विशाल सेना और अय्यन राजेंद्रन जैसे सेनापति लेकर नहीं आते। सनातन धर्म में तीर्थयात्रा के समय किसी प्रकार का अस्त्र-शस्त्र रखना निषेध है। लाठी भी सहारे के लिए रखी जाती है, न कि किसी के ऊपर बरसाने के लिए। दूसरी बात कि चोलगंगा सरोवर खोदे जाने के बाद वे यहां नहीं आए। प्रसंग मिलता है कि यहां से जल लेकर जाने के बाद उन्होंने चोलगंगा खुदवाया। इसके उपरांत 'गंगईकोंडचोल' की उपाधि विजयस्वरूप धारण की। तिरुवलंगाडू अभिलेख इस बात की पुष्टि करते हैं कि राजेन्द्र चोल ने 'गंगा-जलमयं जयस्तंभम्' का विनिर्माण चोलगंगा के रूप में किया। यह विजय स्तंभ की परंपरा का विजय सरोवर था। संभवतः यह इतिहास में अनूठा था।

अब समझने की बात है कि बंगदेशम में वे तीन राजाओं को पराजित करते हैं। पहला राणासुर, दूसरा गोविंदचंद्र और तीसरा महिपाल। उपरोक्त शिलालेख में तीन क्षेत्र का नाम भी है। ये क्रमशः पहला तक्कणा लाडम, दूसरा उथीरा लाडम और तीसरा संगुकोट्टम। कुछ इतिहासकारों ने इसे समझने में गलती की। तक्कणा लाडम को दक्षिण लता यानी गुजरात कह दिया है। सोचने वाली बात है कि उड़ीसा और बंगाल के मध्य गुजरात कहाँ आता है? वस्तुतः यह दक्षिण राढ़ है। इसी तरह उथीरा लाडम उत्तर राढ़ है। विदित हो कि यही राढ़ 'राधा' नाम से ज्ञात है। यहीं के ब्राह्मण और कायस्थ #राढ़ी नाम से ज्ञात हैं।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि 1024 में बंगाल पर चोल आक्रमण के उपरांत उनके साथ आए कर्नाटक के कुछ योद्धा यहां बस गए। बाद में मिथिला पर उन्होंने ही राज किया जिन्हें 'कर्णाटवंशी' कहा गया। इसी वंश में राजा हरिसिंह देव पैदा हुए जिन्होंने मिथिला में पंजी प्रथा चलाई। हालांकि, मिथिला में इससे पहले भी यह प्रथा होने की जानकारी मिलती है।

अब सवाल है कि भागलपुर के इलाके में ही चोल आए? यात्रा पथ पर गौर करें तो पाएंगे कि जिन मार्गों से चोल आए उन स्थानों पर चोलों के नाम से दंतकथाएं हैं। देवघर (झारखंड) में एक पहाड़ी को 'चोल पहाड़ी' कहा जाता है। कहा जाता है कि यहां चोल सेना रुकी हुई थी। मन्दार हिल के नीचे पत्थर का एक मजबूत भवन है जिसे चोलों द्वारा बनाए जाने की चर्चा मिलती है। कहा जाता है कि यहां के पुष्करणी सरोवर में स्नान के उपरांत उन्हें कुष्ठ रोग से मुक्ति मिली थी। इसी तरह बराकर (आसनसोल) के समीप के पुराने लोग भी चोलों के आगमन और ठहराव की कहानियां सुनाते हैं। दंतकथाएं इतिहास के स्रोतों का मामूली आधार मानी जाती हैं अतएव इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। इस आधार पर माना जा सकता है कि राजेन्द्र चोल की यात्रा का पथ मंदार पर्वत होते हुए उत्तरवाहिनी गंगा तक था जिसका अंत भागलपुर में होता है।

* उदय शंकर झा 'चंचल'

Want your school to be the top-listed School/college in Purnea?

Click here to claim your Sponsored Listing.

Location

Category

Telephone

Address


Lalganj Bajar, Rupauli
Purnea