30/01/2022
हीरा है सदा के लिए-
‘भारत का कोहिनूर’ प्रतियोगिता के फायनल राऊंड की तैयारियाँ चल रही थी। Mock interview के दौरान एक फायनालिस्ट से पूछा गया कि, “भारत का वर्णन यदि एक शब्द में करना हो तो आपके लिए वह शब्द कौनसा होगा?”
जवाब आया, “Home!”
देखा जाए तो हीरा भी तो एक आम पत्थर ही है। उसमें छिपा हुनर जब एक जानकार परखता है तब शुरू होता है एक सफर – मामुली पत्थर से एक बेश किमती हीरे तक का...
तराशे जाने की पीड़ा से गुजरकर जब वह सूरज की तरह एक-एक किरन को परावर्तीत करता है तो यह ‘प्रकाश का परबत’ आम से खास बन जाता है, ‘कोह-ई-नूर’ कहलाता है !
सुना है कि हमारे हिंदुस्तान का नायाब कोहिनूर कोई ले गया है.... किंतु दुख किस बात का जब हमारे पास ऐसे अनगिनत नायाब हीरे हैं! यह नायाब हीरे यानी हमारे राष्ट्र की संपत्ती-युवा।
जब देह, बुद्धी, मन तथा विचारों से सशक्त राष्ट्र निर्माण हेतु हमारी गौरवशाली परंपरा, हमारी विभिन्न भाषाएँ, अनेकविध लोककलाएँ, हमारे अर्थपूर्ण त्योहार, सिंधू सभ्यता से ले कर आजतक का हमारा सफर, हमारी राजनीति, हमांरे अधिकार और ज़िम्मेदारियाँ इन सारे ही पहलुओं को तराशा जाए तो क्या कहने!
ऐसेही तराशे गए एक अनमोल हीरे ने जब बड़ी स्थिरता के साथ उलझानेवाले सवाल का जवाब देते हुए भारत को ‘घर’ कहा तब हम स्तब्ध रह गए– वे थे हमारे फायनालिस्ट स्वस्ति जी।
जिज्ञासा में मिले प्लॅटफॉर्म का उन्होंने बखुबी से इस्तमाल किया। जिज्ञासाके 7 दालनो में से ‘भारत’ कक्ष से उनका लगाव शुरू से ही ज़्यादा रहा है। हवाई जहाज की जिज्ञासा केवल टेक्निकल ज्ञान तक सीमित न रही। राष्ट्र की एयर फोर्स में शामिल हर एक हवाई जहाज की पूरी जानकारी उन्हें ज़ुबानी याद होती गयी। इसी passion से जन्मा एक प्रोजेक्ट ‘जय हिंद की सेना’ प्रदर्शनी! रक्षा से संबंधित तीनों शाखाओं की पूरी जानकारी इस प्रदर्शनी से मिलती है। अपना passion अपने तक सीमित न रखते हुए, जिन बच्चों में यह चिंगारी दिखाई दी उन्हें भी स्वस्ति जी ने प्रशिक्षित किया। यह ज्ञान ऊपरी नहीं था। इसका अनुभव हमने अपनी नासिक ट्रीप के दौरान आर्मी की प्रदर्शनी देखते हुए किया। नासिक के में हमे गाईड नहीं मिल रहा था। तब वहाँ की तीन मंज़िला प्रदर्शनी के हर एक पहलु से हमें रूबरू करने का काम स्वस्ति जी ने किया था। तब उनकी उमर थी सिर्फ बारह साल। मुझे आज भी वह दिन याद है और वहाँ आर्मी के ही लोंगो द्वारा की गई स्वस्ति जी की सराहना भी याद है। हमारे लिए तो वे तभी से ‘भारत का कोहिनूर’ थे।
हर साल आयोजित इस प्रतियोगिता को स्वस्ति जी ने कभी गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन इस साल उन्होंने पूरी तैयारी के साथ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और परीक्षा के तीनों चरणों पर अव्वल आते हुए ‘भारत का कोहिनूर’ ख़िताब हासिल कर लिया।
कोई भी प्रतियोगिता जीतने का मज़ा तब आता है जब आपका प्रतिस्पर्धी भी तगडा हो...
फायनल में वेदिका और स्वस्ती के बीच में काटे की टक्कर रही और केवल 2 गुणों के फर्क से अंतिम विजय स्वस्ती की हुई।
वेदिका.... हमारे एक और नायाब हीरे की कहानी भी बहुत जल्द आपके साथ साझा करेंगे। फिलहाल भारत का पांचवा कोहिनूर मिलने की खुशी मनाते हैं और आशा करते हैं यह पाँचों अब बाक़ी कोहिनूरों को तराशेंगे।
अपने बच्चों को तो हम बखुबी जानते हैं और परख भी सकते हैं। लेकिन जब उनके लिए कोई पूरी तरह अपरिचित उन्हें परखे तो वह परख, असली परख होती है।
प्रतियोगिता तो केवल एक निमित्त होता है। यह मौका होता है खुद को जानने का, परखने का, मार्गदर्शन पाने का।
इस साल सौरभ जी और रुचिरा जी जैसे जानकार युवाओ द्वारा हमारे कोहिनूर परखे गए और उनका अनमोल मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ।
हम सौरभ जी और रुचिरा जी के हमेशा शुक्रगुजार रहेंगे।
जिज्ञासा होगी, तो ही ज्ञान मिलेगा, ज्ञान मिला तो लगाव बढ़ेगा, लगाव बढ़ेगा तो एहसास होगा और यह एहसास ही तो ज़रूरी है!
यह एहसास भी रहे ‘सदा के लिए।’
#भारत_का_कोहिनूर