Rashtra Nirman Academy by jd school

Rashtra Nirman Academy by jd school We are teaching students for government preparation like sainik, navoday, NTSE and olympiad . We also help for those students who are poor.

08/07/2026

भारत में एक आम मिडिल-क्लास बाप की हैसियत का अंदाजा बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि इस बात से लगाया जाता है कि उसका बच्चा किस स्कूल में पढ़ता है।

अपनी जेब की औकात छोटी पड़ जाए तो मंजूर, लेकिन बच्चे के स्कूल का 'लोगो' शर्ट की जेब पर बड़ा चमकना चाहिए।

मैंने भी यही सोचकर, शहर के एक ठीक ठाक स्कूल में अपने बच्चों का दाखिला करवा दिया।

स्कूल चमचमाता था, फीस तगड़ी थी,
और अनुशासन बढ़िया था

हमें लगता था कि भारी-भरकम फीस दे रहे हैं तो पढ़ाई भी अव्वल ही होगी।
पर सच यह था कि अंदर सिर्फ "काम चलाऊ" पढ़ाई होती थी।
नाम बड़ा था, दर्शन छोटे थे।

पर समाज में कॉलर ऊंची रखने के लिए हम सब माता-पिता यह कड़वा घूंट पी रहे थे।

घर और हॉस्पिटल के चक्कर में, मैं कभी स्कूल की 'पैरेंट्स-टीचर मीटिंग' (PTM) में नहीं जा पाया। वह मोर्चा हमेशा मेरी पत्नी ही संभालती थी।

फिर एक दिन वो वाकया हुआ, जिसने स्कूल की उस ऊंची दीवार के पीछे का सच सामने ला खड़ा किया।

उस दिन PTM थी।

मेरी पत्नी समय की पाबंद है, लेकिन शहर के ट्रैफिक और घर के सौ कामों के फेर में उसे स्कूल पहुँचने में महज चार-पांच मिनट की देरी हो गई।

जब वह स्कूल के बड़े से हॉल के बाहर पहुँची, तो देखा कि सिर्फ वही नहीं, बल्कि करीब 12-14 और माता-पिता भी वहाँ खड़े थे।

गुनाह सिर्फ इतना था कि वे चार मिनट लेट थे।

सजा यह मिली कि उन्हें हॉल के अंदर जाने से रोक दिया गया, जैसे वे किसी इम्तिहान में फेल हो गए हों।

तभी वहां स्कूल की प्रिंसिपल साहिबा का आगमन हुआ।

कड़क मिजाज, चेहरे पर और आवाज में रौब।
उन्होंने आते ही उन सभी माता-पिता पर चिल्लाना और बुरी तरह डांटना शुरू कर दिया।

“आप लोग अपने बच्चों का भविष्य क्या बनाएंगे जब खुद वक्त के पाबंद नहीं हैं!"

हॉल के बाहर खड़े वो पढ़े-लिखे, संभ्रांत माता-पिता, कोई सरकारी मुलाजिम था तो कोई छोटा व्यापारी... सब सिर झुकाए चुपचाप वो जिल्लत सह रहे थे।

कोई कुछ नहीं बोला।
बोलते भी कैसे?
बच्चों के भविष्य का मामला था। सबको डर था कि कहीं बच्चे को स्कूल से न निकाल दिया जाए,

कहीं उसका साल न बर्बाद हो जाए। प्रिंसिपल से पंगा लेने की हिम्मत किसी में नहीं थी।

लेकिन मेरी पत्नी से यह अपमान बर्दाश्त नहीं हुआ।
उसने सीधे प्रिंसिपल को टोकते हुए कहा:

"मैडम! आप इस लहजे में और इस तरह गलत तरीके से हमसे बात नहीं कर सकतीं।
आपके स्कूल में अंदर पढ़ाई तो बराबर होती नहीं है,
और आप उल्टे हम माता-पिता को यहाँ खड़ा करके सुना रही हैं?"

वह अकेली आवाज एक चिंगारी थी। जैसे ही मेरी पत्नी ने यह बात कही,

वहां खड़े बाकी माता-पिता के सब्र का बांध भी टूट गया।
जो लोग अब तक डर के मारे सिर झुकाए खड़े थे,
वे सब एक सुर में चिल्ला उठे। सबने प्रिंसिपल को उनके स्कूल की ढीली पढ़ाई और ऊंची फीस का आइना दिखा दिया।

प्रिंसिपल मैडम एकदम अवाक रह गईं।
उनके पास कोई जवाब नहीं था, क्योंकि सच तो यही था कि स्कूल में पढ़ाई उतनी अच्छी नहीं थी

माता-पिता का वो सामूहिक गुस्सा देखकर उनके पैर पीछे खिंच गए।

उन्होंने तुरंत सबको हॉल के अंदर आने की इजाजत दे दी। उस दिन का मामला तो शांत हो गया,
लेकिन यह सिर्फ तूफान के आने से पहले की शांति थी।

कुछ दिनों बाद, हॉस्पिटल में काम करते हुए मेरे फोन की घंटी बजी।

स्क्रीन पर स्कूल का नंबर था। मुझे तुरंत प्रिंसिपल ऑफिस बुलाया गया था।

जब मैं धड़कते दिल के साथ प्रिंसिपल मैडम के केबिन में दाखिल हुआ, तो उन्होंने बड़ी संजीदगी से मुझसे कहा, "देखिए मिस्टर... आइंदा से स्कूल की किसी भी मीटिंग में आप खुद आएंगे। अपनी वाइफ को मत भेजिएगा।"

मैंने बात को आगे बढ़ाना ठीक नहीं समझा।

अपनी मध्यमवर्गीय समझदारी का इस्तेमाल करते हुए मैंने सर हिलाया और कहा, "ठीक है मैडम, आगे से मैं ही आऊंगा।"

लेकिन इसके बाद, जैसे मेरे बेटे पर स्कूल की 'विशेष नजर' हो गई। हर छोटी-छोटी बात पर मेरे फोन पर शिकायत आने लगी

मुझे बार-बार स्कूल के चक्कर काटने पड़ते। मैं जाता, हाथ जोड़कर मैडम से मिलता, बात रफा-दफा होती और मैं लौट आता।

फिर एक दिन एक बड़ा 'कांड' हो गया। स्कूल से बुलावा आया कि आपके लड़के ने बहुत बड़ी बदमाशी की है।
मैं घबराया हुआ प्रिंसिपल ऑफिस पहुँचा। वहां मेरा छठी क्लास का बेटा भी गुमसुम खड़ा था।

पता चला कि क्लास की मॉनिटर ने उसकी शिकायत क्लास टीचर से की थी, और बात प्रिंसिपल तक पहुँच चुकी थी।

प्रिंसिपल मैडम ने कड़क आवाज में मेरे बेटे से पूछा, "हाँ बताओ, तुमने क्या बदमाशी की है क्लास में?"

मेरे बेटे ने मासूमियत और पूरे आत्मविश्वास के साथ मैडम की तरफ देखा और बोला:

“मैडम, वो जो क्लास मॉनिटर है ना, वो लड़की... वो मेरी 'Enemy' (दुश्मन) है! वो मुझसे चिढ़ती है, इसीलिए मेरे खिलाफ झूठी शिकायत करती रहती है!"

छठी क्लास के बच्चे के मुंह से 'Enemy' शब्द सुनकर केबिन का वो तनावपूर्ण माहौल एक पल में पिघल गया।

कड़क मिजाज प्रिंसिपल मैडम के चेहरे पर एक गहरी और सच्ची मुस्कान तैर गई।

उन्होंने हंसते हुए मेरी तरफ देखा और कहा, "देखिए जरा इन बच्चों को... इस छोटी सी उम्र में ही इन्होंने अपने दुश्मन भी बना लिए हैं!"

मैंने माहौल को संभालते हुए तुरंत अपने बेटे को थोड़ा डांटा और कहा, "चलो, बहुत बातें हो गईं, मैडम के पैर छुओ, अपनी गलती की माफी मांगो और आशीर्वाद लो।"

मेरे बेटे ने झुककर प्रिंसिपल मैडम के चरण स्पर्श किए। मैडम ने मुस्कुराकर उसके सिर पर हाथ रखा और उसे माफ कर दिया। वह बात वहीं खत्म हो गई।

शायद वह घटना एक इशारा थी। अगले ही साल, मैंने अपने बच्चे का नाम उस स्कूल से कटवा दिया और उसे एक दूसरे स्कूल में शिफ्ट कर दिया।
अब तो मेरा लड़का बड़ा हो गया है

नए स्कूल में जाने के कुछ महीनों बाद, एक दिन घर पर बैठे-बैठे मैंने अपने बेटे को हंसते हुए पास बुलाया और पूछा, "अच्छा एक बात बता... उस दिन सच क्या था?
उस मॉनिटर लड़की ने झूठी शिकायत की थी या तूने सच में कुछ किया था?"

बेटा झेंपते हुए मुस्कुराया और धीमे से बोला, "पापा... वो... मैं सच में क्लास में मेज (डेस्क) के ऊपर कूद रहा था।"

मैं बस उसे देखता रह गया और हंस पड़ा।
बच्चे तो बच्चे ही होते हैं।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो पता चलता है कि वो प्रिंसिपल मैडम अब इस दुनिया में नहीं रहीं। जब उनके जाने की खबर मिली,
तो दिल में एक अजीब सी कसक उठी। स्वभाव की थोड़ी कड़क जरूर थीं,
लेकिन दिल की बुरी नहीं थीं। और सच कहूं तो,
बच्चों को संभालने के लिए स्कूल के मुखिया का थोड़ा कड़क होना जरूरी भी होता है।

हम मिडिल-क्लास लोग आज भी अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य की उम्मीद में, भारी बस्तों और मोटी फीसों के नीचे दबे, बस एक अदद 'अच्छे स्कूल' की तलाश में भटक रहे हैं।

28/06/2026
13/06/2026

*खतरनाक सर्वे रिपोर्ट*

*कुंवारेपन का विस्फोट, समाज अंधी दौड़ में कहाँ पहुँच रहा है ?*

अब वक्त आ गया है कि चीज़ों को मीठे शब्‍दों में कहना बंद किया जाए।
*दुनिया जिस महिला आज़ादी की जय-जयकार कर रही है, वही आज़ादी धीरे-धीरे *परिवार, रिश्तों,* और *सामाजिक संतुलन,* सब कुछ निगलने लगी है।
अंतरराष्ट्रीय सर्वे कहता है कि आने वाले कुछ वर्षों में *युवतियों में 45% तक विवाह से दूरी बना सकती हैं।* पहली नज़र में यह *प्रगति* लगती है, पर असल में यह *भविष्य के लिए एक टाइम-बम* है।
1.*कैरियर, पैसे और अकेलापन….यह कैसी प्रगति?*
आज की बेटी कलेक्टर डॉक्टर, इंजीनियर, सीए, टीचर उद्यमी, सब बन रही है। बहुत अच्छा। शानदार। पर क्या कैरियर पूरा जीवन है?
*जरा सोचे. पैसा साथी नहीं बनता। पद वृद्धावस्था में हाथ नहीं पकड़ता। मोबाइल और लैपटॉप बुढ़ापे में बात नहीं करते।* लेकिन समाज को इस सच्चाई से फर्क नहीं पड़ता, सबको दौड़ लगानी है।
2.*परिवार ढह रहे हैं…. कोई देख भी रहा है?*
कुँवारे लड़के बढ़ रहे हैं, अविवाहित युवतियाँ बढ़ रही हैं, जनसंख्या गिर रही है,
और *अकेलेपन उद्योग* (counsellor, therapy, depression pills) फल-फूल रहा है। पर हम फिर भी कहते हैं, *सब ठीक है, यह आधुनिकता है।* यह *आधुनिकता नहीं, धीमी मौत* है, परिवार, समाज और मानवीय संबंधों की।
3.*सर्वाधिक खतरनाक स्थिति..*
आज माता-पिता रिश्ता ढूंढते हैं, पर लड़की कहती है, *अभी नहीं।*
फिर *अभी नहीं* धीरे-धीरे *कभी नहीं* में बदल जाता है और जब एहसास होता है तो मेडिकल रिपोर्ट सामने होती है, हार्मोनल इश्यू, कंसिव न होना, मानसिक तनाव, अकेलापन। पर तब कौन जिम्मेदार? *कोई नहीं, क्योंकि फैसला स्वतंत्रता का था।*
4.*समाज के सफेदपोश लोग चुप क्यों हैं??*
क्योंकि सच्चाई बोलने से उन्हें आधुनिकता-विरोधी कहलाने का डर है। पर सच्चाई यह है कि अगर 21–25 की उपयुक्त उम्र में विवाह नहीं हुए तो समाज जल्द ही *दिसंबर की ठंडी रात जैसा सूना* हो जाएगा।
5.*अंतिम बात.*
प्रगति वो नहीं जो हमें अकेला कर दे। अगर हमारा भविष्य कुंवारा, अकेला और भावहीन होने वाला है, तो समाज के लिए यह गर्व की नहीं,*खतरे की घंटी है।*👉 “आप अपनी राय जरूर लिखें 🙏🙏

10/06/2026

ट्रंप चचा के टेबल पर सिर्फ हमारी विदेश नीतियाँ ही तय नहीं हो रहीं, बल्कि हमारी घरेलू नीतियों का निर्धारण भी व्हाइट हाउस में हो रहा है। ईरान युद्ध में हमने हर वह काम किया, जो अमेरिका ने कहा। कुछ काम अपनी ओर से खरखाहीं में भी किया, ताकि ट्रंप चचा खुश हों। ठकुरसुहाती उतने भर पर नहीं रुकी हुई है। हमारी सरकार ट्रंप चचा का सहलाने के चक्कर में अपने देशवासियों का ही तेल निकालने में जुटी हुई है। कैसे? इसके लिए आगे तभी पढ़िये, जब दिमाग नयी बातें और नये दृष्टिकोण को स्वीकारने में सक्षम बचा हुआ हो। यदि आपके लिए कोई व्यक्ति या कोई विचारधारा या कोई पार्टी देश से ऊपर है, आपको आगे नहीं पढ़ने की सलाह दी जाती है।

अभी देश में एक बड़ा मुद्दा है इथेनॉल। नहीं है तो इसे होना चाहिए। समझने में आसानी के लिए पहले कुछ फैक्ट्स:-

1:- पूरे देश में ई20 अनिवार्य हो चुका है। ई20 का मतलब तेल में 80% पेट्रोल और 20% इथेनॉल। एक्सपी95 और पावर95 जैसे महँगे ऑप्शंस में भी 20% इथेनॉल है। इथेनॉल नहीं चाहिए तो एकमात्र विकल्प 100 ऑक्टेन वाला पेट्रोल (जैसे एक्सपी100) है, जो बहुत कम उपलब्ध है और 150-160 रुपये लीटर है।
2:- सरकार ने ई22, ई25, ई27 और ई30 के मानक जारी कर दिये हैं। अभी कुछ पेट्रोल पंपों को कहा गया है कि वे ई20 के साथ ये विकल्प भी रखें।
3:- सरकार ने ई85 लॉन्च कर दिया है। इसमें पेट्रोल बस 15% है। बाकी 85% इथेनॉल है। इस साल के अंत तक 500 पंप और अगले साल के अंत तक 5,000 पेट्रोल पंप पर यह उपलब्ध कराने का लक्ष्य है। इसका दाम नॉर्मल पेट्रोल (मने 20% इथेनॉल वाले) से 20 रुपये कम है।
4:- सरकार ने डीजल में आइसोब्यूटेनॉल मिलाने की बात साफ कर दी है। पहले 5% की बात थी, फिर 10% की होने लगी, अब 15% की बात चल रही है। मतलब जैसे अभी नॉर्मल पेट्रोल में 20 इथेनॉल है, वैसे ही नॉर्मल डीजल में 15% आइसोब्यूटेनॉल मिला रहेगा।
5:- अभी तक बाजार में जो कारें या बाइक बिक रही हैं, उनमें ई20 से ऊपर का कोई भी ऑप्शन नहीं डाल सकते। 20% से ऊपर इथेनॉल इंजन नहीं झेल पायेगा। आगे इस तरह की कारें-बाइकें आ सकती हैं। हीरो ने स्प्लेंडर का और मारुति ने वैगनआर का फ्लेक्स इंजन अभी अनवील किया है। हो सकता है 1-2 महीने में ये शोरूम पर दिखने लगें। हो सकता है आगे और भी मॉडल आ जायें। इनमें ई20 से लेकर ई100 तक कुछ भी डाल सकते हैं।

सरकार ने देश भर में ई20 पेट्रोल को अनिवार्य करने की समयसीमा 2030 तय की थी। यह एक अघोषित नियम है कि सरकारी समयसीमा हमेशा आगे खिसकती है। इथेनॉल के मामले में यह परिपाटी चमत्कार की तरह टूट गयी। सरकार ने समयसीमा से 5 साल पहले 2025 में ही यह काम कर लिया। मजेदार बात ये है कि भारत ऐसा अकेला देश है, जिसने पूरे देश में ई20 को अनिवार्य कर दिया है। दुनिया के कई देश पेट्रोल में इथेनॉल मिला रहे हैं, लेकिन कहीं भी मिनिमम 20% इथेनॉल का कैप नहीं है। ग्लोबल स्टैंडर्ड ई10 का है। इससे अधिक ब्लेंड वाले पेट्रोल भी हैं, लेकिन ऑप्शनल हैं, मैंडेटरी नहीं। कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका जैसे विकसित देशों में कैप 10% इथेनॉल का है। इथेनॉल ब्लेंड में ब्राजील सबसे आगे था, लेकिन वहाँ भी कैप 18% का है। इससे ऊपर ई27 से ई85 तक ऑप्शनल है। मतलब कम से कम 20% की अनिवार्य ब्लेंडिंग सिर्फ और सिर्फ भारत में हो रही है। अब आगे की तैयारी है डीजल में आइसोब्यूटेनॉल मिलाने की। इसमें मजेदार बात है कि यह अब तक कोई देश नहीं कर रहा है। कहीं-कहीं ट्रायल चल रहे है। भारत में ट्रायल की जरूरत नहीं समझी जा रही है। सीधे 15% आइसोब्यूटेनॉल मिलाने की उसी तरह तैयारी है, जैसे पेट्रोल में 20% इथेनॉल हुआ है।

अब ये समझें हमलोग कि ये इथेनॉल और आइसोब्यूटेनॉल है क्या चीज? इन्हें कहा जाता है बायोफ्यूल या जैव ईंधन। पेट्रोल, डीजल, केरोसिन आदि कहे जाते हैं फॉसिल फ्यूल या जीवाश्म ईंधन। फॉसिल फ्यूल हजारों सालों में स्वत: बनते हैं। बायो फ्यूल की फैक्ट्री डाली जा सकती है। बायोफ्यूल अनाज, पराली आदि से बनाये जाते हैं। बायोगैस बनाने में गोबर यूज हो जाता है। भारत में अभी इथेनॉल बनाने में गन्ने के साथ मक्के और चावल के इस्तेमाल की भी मंजूरी दी जा चुकी है। आइसोब्यूटेनॉल में रॉ मटीरियल क्या होंगे, ये अभी सरकार ने अधिसूचित नहीं किया है, लेकिन संकेत से यही लग रहा है कि इथेनॉल की तरह इसमें भी गन्ने, मक्के और चावल की मंजूरी दे दी जायेगी।

यहाँ पर कुछ स्वाभाविक सवाल उठने चाहिए। क्या वजह है कि हम इथेनॉल और आइसोब्यूटेनॉल की खपत बढ़ाने को लेकर बहुत जल्दी में हैं? जिस काम को 2030 तक करने का टारगेट लेकर हम चल रहे थे, हमने उसे 2025 में ही क्यों लागू कर दिया? न्यूनतम 20% इथेनॉल किसी ने नहीं किया, हमने क्यों किया? डीजल में आइसोब्यूटेनॉल अबतक किसी ने नहीं मिलाया, इसका रियल यूजकेस डेटा मामूली है, फिर भी हम डीजल में 15% आइसोब्यूटेनॉल क्यों मिलाने जा रहे हैं? इन सवालों के जवाब अबतक समझ आ रहे थे कि इसमें गन्नाकरी ब्रो के हित सध रहे हैं। ब्रो अपने लौंडों का बिजनेस चमकाने के लिए देश को चूल्हे में झोंक रहा है। लेकिन इस जवाब के बाद कई नये सवाल बन जाते हैं। क्या इस सरकार में गन्नाकरी ब्रो इतना ताकतवर है कि अपनी मर्जी चला सके और दूसरे मंत्रालयों के कार्यक्षेत्र में सीधा दखल डाल सके? मुझे ऐसा नहीं लगता।

जवाब हमें आगे मिलेंगे कुछ आँकड़ों में। अभी पिछले सप्ताह गन्नाकरी ब्रो और एप्सटीन फाइल वाले मंत्रीजी, दोनों ने फिर से दावा किया कि भारत में अभी जितनी खपत है, उससे ज्यादा इथेनॉल बनाने की क्षमता है। यह बात सही भी लग रही है। जबसे गन्ने के अलावा मक्के और चावल से भी इथेनॉल बनाने की मंजूरी मिली है, कई राज्यों के इथेनॉल प्लांट आफत में फंस गये हैं। कारण है कि हर राज्य से इथेनॉल खरीदने का कोटा है। जिन राज्यों पर सरकार की कृपा है, वहाँ बहुत ज्यादा उत्पादन के बाद भी पूरा इथेनॉल सरकारी कंपनियाँ खरीद ले रही हैं। कुछ राज्यों में उत्पादन बहुत ज्यादा नहीं है, फिर भी उनके प्लांट से इथेनॉल नहीं खरीदे जा रहे हैं। हमारा बिहार भी ऐसा ही एक राज्य है। मतलब सरकार की यह बात मानी जा सकती है कि हम खपत से ज्यादा इथेनॉल का उत्पादन कर रहे हैं। अब अगर यह बात सच है, फिर हम अमेरिका से इथेनॉल क्यों खरीद रहे हैं? अमेरिकी ऊर्जा मंत्रालय के आँकड़े कहते हैं कि पिछले साल हमने अमेरिका से इथेनॉल खरीदने का रिकॉर्ड बना दिया। जनवरी से सितंबर तक में ही हमने अमेरिका से 35,39,000 बैरल इथेनॉल खरीदा। मतलब हर महीने 3,93,000 बैरल। अपनी सरकार यहाँ सफाई देती है कि अमेरिका से आने वाले इथेनॉल का सिर्फ इंडस्ट्रियल यूज होता है। उसे हम पेट्रोल में नहीं मिलाते। सरकार की इस सफाई से हमारे सवाल का जवाब नहीं मिलता कि जब आप खपत से अधिक उत्पादन घर में करने का दावा कर रहे हो, फिर इंडस्ट्रियल यूज के लिए भी हम अमेरिका से इथेनॉल क्यों खरीद रहे हैं? वो भी महँगा? भारत में जो इथेनॉल बन रहा है, वह अमेरिका से सस्ता है। हमारी जितनी खपत है, उससे अधिक उत्पादन है। फिर अमेरिका से इथेनॉल खरीदना संदेहास्पद नहीं है?

अब पिछले साल फरवरी में चलते हैं। जनवरी 2025 में ट्रंप चचा के शपथ लेते ही हमारे अमृतलाल व्हाइट हाउस जाने के लिए छटपटाने लगे थे। आनन-फानन में फरवरी में अमेरिका पहुँच गये थे। ट्रंप चचा से भरपूर बेइज्जती करवाने के बाद अमृतलाल जी ने 56 इंच की छाती ठोकते हुए अमेरिका से 500 बिलियन डॉलर की खरीद करने का वादा कर दिया था। अमृतलाल जी को लगा था इससे ट्रंप चचा खुश होंगे। चचा कितने खुश हुए, यह ऑपरेशन सिंदूर के बाद दुनिया ने देखा। लेकिन अमृतलाल की स्वामीभक्ति अप्रभावित है। हम सस्ता रूसी तेल छोड़कर महँगा अमेरिकी तेल खरीद रहे हैं। सस्ता रूसी गैस छोड़कर महँगा अमेरिकी गैस खरीद रहे हैं। हम बैंक से कर्जा लेकर इथेनॉल प्लांट लगाने वाले अपने उद्यमियों को उनके हाल पर छोड़कर अमेरिका से महँगा इथेनॉल खरीद रहे हैं। अमेरिका अभी आइसोब्यूटेनॉल का सबसे बड़ा उत्पादक है। संभव है हम आगे आइसोब्यूटेनॉल भी अमेरिका से खरीदें।

भारत और अमेरिका के बीच जिस ट्रेड डील पर बातचीत चल रही है, उसमें बायोफ्यूल एक बड़ा मुद्दा है। अमेरिका का दबाव है भारत ज्यादा से ज्यादा बायोफ्यूल खरीदे। अमेरिका में कृषि योग्य भूमि है 41 लाख वर्गकिलोमीटर। भारत का कुल क्षेत्रफल है 33 लाख वर्गकिलोमीटर। अमेरिका की आबादी है 35 करोड़। भारत की आबादी 150 करोड़। अमेरिका के पास खूब सारा सरप्लस अनाज है इथेनॉल-आइसोब्यूटेनॉल बनाने के लिए। भारत में इथेनॉल बनाने के लिए काफी सारा मक्का भी अमेरिका से आ रहा है। 2-4 साल पहले तक भारत मक्का एक्सपोर्ट करता था। इथेनॉल-आइसोब्यूटेनॉल बनाने में जिन फसलों का इस्तेमाल हो रहा है, तीनों पानी पीने के लिए कुख्यात हैं। हमारे पास दुनिया की करीब 20% आबादी है, लेकिन पीने-खेती करने लायक पानी सिर्फ 4%। जिस ब्राजील का उदाहरण बार-बार देते हैं उसकी आबादी है सिर्फ 22 करोड़ और उसके पास दुनिया का सबसे बड़ा वाटर रिसॉर्स है, करीब 12%। फिर भी उसे पानी के संकट सताने लगे हैं। भारत का क्या हो सकता है, ये जानने के लिए गूगल पर India Water Crisis सर्च कर लें।

लेकिन अमृतलाल को इन सबसे क्या! अमृतलाल वही काम करेगा, जिस काम के लिए उसे लाया और बनाया गया है। ट्रेड डील के बाद अब इथेनॉल पॉलिसी दूसरा ऐसा मुद्दा है, जिसकी तह में जाने पर मुझे राहुल गांधी की बात सही लग रही है- Our PM is compromised. गन्नाकरी ब्रो बस इस मौके का लाभ उठाकर पैसे बना रहा है। असली कलप्रिट हमारा अमृतलाल ही है।

(ट्रेड डील की बातें ऑफिशियली बाहर आने पर फिर से लिखूँगा इस विषय पर। डेढ़ किलोमीटर में लिखने के बाद भी बहुत बातें बची रह गयी हैं। इसे शेयर-कॉपी-पेस्ट करने की हमेशा की तरह खुली छूट रहेगी। विषय से बाहर की बकलोली करने या एआई से लिखवाकर स्पैम चिपकाने पर एंटरटेन करने की जगह ब्लॉक कर दिया जायेगा। पोस्ट का पोस्टर बनाया है चैटजीपीटी ब्रो ने।)

06/06/2026

सिस्टम को राम रहीम से दिक्कत नहीं है।
सिस्टम को आशाराम से दिक्कत नहीं है।
सिस्टम को कुलदीप सेंगर से दिक्कत नहीं है।

सिस्टम को पेपर लीक से दिक्कत नहीं है।
सिस्टम को बेरोजगारी से दिक्कत नहीं है।
सिस्टम को आत्महत्या करने वाले छात्रों से कोई दिक्कत नहीं है।

सिस्टम को खराब स्वास्थ्य व्यवस्था से कोई दिक्कत नहीं है।
सिस्टम को खराब शिक्षा व्यवस्था से कोई दिक्कत नहीं हैं।
सिस्टम को गंदे पानी पीते हुए लोगों से कोई दिक्कत नहीं है।

सिस्टम को दिक्कत है तो एक ऐसे शिक्षक से जो फ्री में बच्चों को पढ़ाता है।
लाखों गरीब बच्चों को कम फीस में पढ़ाता है।

कई सारे अस्पताल बनाए हैं जिसमें गरीब लोग कम पैसे में इलाज करवाते हैं।

और सिस्टम को दिक्कत इसलिए है क्योंकि वो दो कौड़ी के गोदी मीडिया को जो दिन रात सिस्टम के गुणगान गाते हैं, सिस्टम को बचाने में लगे रहते हैं उनको एक्पोज करता रहता है।

अगर आने वाले कुछ दिनों में गिरफ्तार होकर जेल चला जाए ना वो शिक्षक तो हैरान मत होना क्योंकि वो कट्टर मुस्लमान नहीं है।

और इस देश की दो कौड़ी की मीडिया व सिस्टम और सिस्टम के नफरती लोग सब दुश्मन हो चुके हैं उन लोगो के जो धर्म से ज्यादा अपने देश के प्रति जबाबदेह हैं और निकम्मी सरकारों से धर्म, जाति को छोड़कर गरीब और असहाय लोगो के लिये सवाल करते है ।
🤔🤭🤫

03/05/2026

देश में एक ऐसा वर्ग बन गया है जो कि #संस्कृत भाषा से तो शून्य हैं परंतु उनकी छद्म धारणा यह बन गयी है कि संस्कृत भाषा में जो कुछ भी लिखा है वे सब पूजा पाठ के मंत्र ही होंगे जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है।

देखते हैं -

*"चतुरस्रं मण्डलं चिकीर्षन्न् अक्षयार्धं मध्यात्प्राचीमभ्यापातयेत्।*
*यदतिशिष्यते तस्य सह तृतीयेन मण्डलं परिलिखेत्।"*

बौधायन ने उक्त श्लोक को लिखा है !
इसका अर्थ है -

यदि वर्ग की भुजा 2a हो
तो वृत्त की त्रिज्या r = [a+1/3(√2a – a)] = [1+1/3(√2 – 1)] a
ये क्या है ?

अरे ये तो कोई गणित या विज्ञान का सूत्र लगता है

शायद ईसा के जन्म से पूर्व पिंगल के छंद शास्त्र में एक श्लोक प्रकट हुआ था।हालायुध ने अपने ग्रंथ मृतसंजीवनी मे , जो पिंगल के छन्द शास्त्र पर भाष्य है ,
इस श्लोक का उल्लेख किया है -

*परे पूर्णमिति।*
*उपरिष्टादेकं चतुरस्रकोष्ठं लिखित्वा तस्याधस्तात् उभयतोर्धनिष्क्रान्तं कोष्ठद्वयं लिखेत्।*
*तस्याप्यधस्तात् त्रयं तस्याप्यधस्तात् चतुष्टयं यावदभिमतं स्थानमिति मेरुप्रस्तारः।*
*तस्य प्रथमे कोष्ठे एकसंख्यां व्यवस्थाप्य लक्षणमिदं प्रवर्तयेत्।*
*तत्र परे कोष्ठे यत् वृत्तसंख्याजातं तत् पूर्वकोष्ठयोः पूर्णं निवेशयेत्।*

शायद ही किसी आधुनिक शिक्षा में maths मे B. Sc. किये हुए भारतीय छात्र ने इसका नाम भी सुना हो , जबकि यह "मेरु प्रस्तार" है।
परंतु जब ये पाश्चात्य जगत से "पास्कल त्रिभुज" के नाम से भारत आया तो उन कथित सेकुलर भारतीयों को शर्म इस बात पर आने लगी कि भारत में ऐसे सिद्धांत क्यों नहीं दिये जाते।


*"चतुराधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम्।*
*अयुतद्वयस्य विष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाहः॥"*

ये भी कोई पूजा का मंत्र ही लगता है लेकिन ये किसी गोले के व्यास व परिध का अनुपात है। जब पाश्चात्य जगत से ये आया तो संक्षिप्त रुप लेकर आया ऐसा π जिसे 22/7 के रुप में डिकोड किया जाता है।

उक्त श्लोक को डिकोड करेंगे अंकों में तो कुछ इस तरह होगा-
(१०० + ४) * ८ + ६२०००/२०००० = ३.१४१६

*ऋगवेद में π का मान ३२ अंक तक शुद्ध है।*

*गोपीभाग्य मधुव्रातः श्रुंगशोदधि संधिगः |*
*खलजीवितखाताव गलहाला रसंधरः ||*

इस श्लोक को डीकोड करने पर ३२ अंको तक π का मान 3.1415926535897932384626433832792… आता है।


#चक्रीय_चतुर्भुज का क्षेत्रफल:

ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त के गणिताध्याय के क्षेत्रव्यवहार के श्लोक १२.२१ में निम्नलिखित श्लोक वर्णित है-

*स्थूल-फलम् त्रि-चतुर्-भुज-बाहु-प्रतिबाहु-योग-दल-घातस् ।*
*भुज-योग-अर्ध-चतुष्टय-भुज-ऊन-घातात् पदम् सूक्ष्मम् ॥*

अर्थ:

त्रिभुज और चतुर्भुज का स्थूल (लगभग) क्षेत्रफल उसकी आमने-सामने की भुजाओं के योग के आधे के गुणनफल के बराबर होता है तथा सूक्ष्म (exact) क्षेत्रफल भुजाओं के योग के आधे में से भुजाओं की लम्बाई क्रमशः घटाकर और उनका गुणा करके वर्गमूल लेने से प्राप्त होता है।

#ब्रह्मगुप्त_प्रमेय:

चक्रीय चतुर्भुज के विकर्ण यदि लम्बवत हों तो उनके कटान बिन्दु से किसी भुजा पर डाला गया लम्ब सामने की भुजा को समद्विभाजित करता है।

ब्रह्मगुप्त ने श्लोक में कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त किया है-

*त्रि-भ्जे भुजौ तु भूमिस् तद्-लम्बस् लम्बक-अधरम् खण्डम् ।*
*ऊर्ध्वम् अवलम्ब-खण्डम् लम्बक-योग-अर्धम् अधर-ऊनम् ॥*
(ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त, गणिताध्याय, क्षेत्रव्यवहार १२.३१)


#वर्ग_समीकरण का व्यापक सूत्र:

ब्रह्मगुप्त का सूत्र इस प्रकार है-

*वर्गचतुर्गुणितानां रुपाणां मध्यवर्गसहितानाम् ।*
*मूलं मध्येनोनं वर्गद्विगुणोद्धृतं मध्यः ॥*
ब्राह्मस्फुट-सिद्धांत - 18.44

अर्थात :

व्यक्त रुप (c) के साथ अव्यक्त वर्ग के चतुर्गुणित गुणांक (4ac) को अव्यक्त मध्य के गुणांक के वर्ग (b²) से सहित करें या जोड़ें। इसका वर्गमूल प्राप्त करें तथा इसमें से मध्य अर्थात b को घटावें।
पुनः इस संख्या को अज्ञात ञ वर्ग के गुणांक (a) के द्विगुणित संख्या से भाग देवें।
प्राप्त संख्या ही अज्ञात "त्र" राशि का मान है।

श्रीधराचार्य ने इस बहुमूल्य सूत्र को भास्कराचार्य का नाम लेकर अविकल रुप से उद्धृत किया —

*चतुराहतवर्गसमैः रुपैः पक्षद्वयं गुणयेत् ।*
*अव्यक्तवर्गरूपैर्युक्तौ पक्षौ ततो मूलम् ॥* -- भास्करीय बीजगणित, अव्यक्त-वर्गादि-समीकरण, पृ. - 221

अर्थात :-

प्रथम अव्यक्त वर्ग के चतुर्गुणित रूप या गुणांक (4a) से दोनों पक्षों के गुणांको को गुणित करके द्वितीय अव्यक्त गुणांक (b) के वर्गतुल्य रूप दोनों पक्षों में जोड़ें। पुनः द्वितीय पक्ष का वर्गमूल प्राप्त करें।

#आर्यभट्ट की ज्या (Sine) सारणी:

आर्यभटीय का निम्नांकित श्लोक ही आर्यभट की ज्या-सारणी को निरूपित करता है:

*मखि भखि फखि धखि णखि ञखि ङखि हस्झ स्ककि किष्ग श्घकि किघ्व ।*
*घ्लकि किग्र हक्य धकि किच स्ग झश ङ्व क्ल प्त फ छ कला-अर्ध-ज्यास् ॥*

#माधव की ज्या सारणी:

निम्नांकित श्लोक में माधव की ज्या सारणी दिखायी गयी है। जो चन्द्रकान्त राजू द्वारा लिखित *'कल्चरल फाउण्डेशन्स आफ मैथमेटिक्स'* नामक पुस्तक से लिया गया है।

*श्रेष्ठं नाम वरिष्ठानां हिमाद्रिर्वेदभावनः।*
*तपनो भानुसूक्तज्ञो मध्यमं विद्धि दोहनं।।*
*धिगाज्यो नाशनं कष्टं छत्रभोगाशयाम्बिका।*
*म्रिगाहारो नरेशोऽयं वीरोरनजयोत्सुकः।।*
*मूलं विशुद्धं नालस्य गानेषु विरला नराः।*
*अशुद्धिगुप्ताचोरश्रीः शंकुकर्णो नगेश्वरः।।*
*तनुजो गर्भजो मित्रं श्रीमानत्र सुखी सखे!।*
*शशी रात्रौ हिमाहारो वेगल्पः पथि सिन्धुरः।।*
*छायालयो गजो नीलो निर्मलो नास्ति सत्कुले।*
*रात्रौ दर्पणमभ्राङ्गं नागस्तुङ्गनखो बली।।*
*धीरो युवा कथालोलः पूज्यो नारीजरैर्भगः।*
*कन्यागारे नागवल्ली देवो विश्वस्थली भृगुः।।*
*तत्परादिकलान्तास्तु महाज्या माधवोदिताः।*
*स्वस्वपूर्वविशुद्धे तु शिष्टास्तत्खण्डमौर्विकाः।।*
(२.९.५)


#संख्या_रेखा की परिकल्पना (कॉन्सेप्ट्)

*"एकप्रभृत्यापरार्धसंख्यास्वरूपपरिज्ञानाय रेखाध्यारोपणं कृत्वा एकेयं रेखा दशेयं, शतेयं, सहस्रेयं इति ग्राहयति, अवगमयति, संख्यास्वरूम, केवलं, न तु संख्याया: रेखातत्त्वमेव।"*
Brhadaranyaka Aankarabhasya (4.4.25)

जिसका अर्थ है-

1 unit, 10 units, 100 units, 1000 units etc. up to parardha can be located in a number line. Now by using the number line one can do operations like addition, subtraction and so on.

ये तो कुछ नमूना हैं , जो ये दर्शाने के लिये दिया गया है कि संस्कृत ग्रंथो में केवल पूजा पाठ या आरती के मंत्र नहीं है बल्कि तमाम विज्ञान भरा पड़ा है।

दुर्भाग्य से कालांतर में व विदेशी आक्रांताओं के चलते संस्कृत का ह्रास होने के कारण हमारे पूर्वजों के ज्ञान का भावी पीढ़ी द्वारा विस्तार नहीं हो पाया और बहुत से ग्रंथ आक्रांताओं द्वारा नष्ट भ्रष्ट कर दिए गए ।
साभार --
*वन्दे संस्कृत मातरम्*

26/04/2026

रामचरितमानस में 14 प्रकार के व्यक्तियों को मरा हुआ माना है । कौनसे वो चौदह प्रकार के व्यक्ति है जो जीवित होते हुए भी मरे हुए है।
राम-रावण युद्ध चल रहा था, तब अंगद ने रावण से कहा- हे रावण! तू तो मरा हुआ है, मरे हुए को मारने से क्या फायदा?

रावण बोला– मैं जीवित हूँ, मरा हुआ कैसे?

अंगद बोले, सिर्फ साँस लेने वालों को जीवित नहीं कहते - साँस तो लुहार की धौंकनी भी लेती है!

कौल कामबस कृपिन विमूढ़ा।

अतिदरिद्र अजसि अतिबूढ़ा।।

सदारोगबस संतत क्रोधी।

विष्णु विमुख श्रुति संत विरोधी।।

तनुपोषक निंदक अघखानी।

जीवत शव सम चौदह प्रानी।।

१. कामवश: जो व्यक्ति अत्यंत भोगी हो, कामवासना में लिप्त रहता हो, जो संसार के भोगों में उलझा हुआ हो, वह मृत समान है। जिसके मन की इच्छाएं कभी खत्म नहीं होतीं और जो प्राणी सिर्फ अपनी इच्छाओं के अधीन होकर ही जीता है, वह मृत समान है। वह अध्यात्म का सेवन नहीं करता है, सदैव वासना में लीन रहता है।

२. वाममार्गी: जो व्यक्ति पूरी दुनिया से उल्टा चले, जो संसार की हर बात के पीछे नकारात्मकता खोजता हो, नियमों, परंपराओं और लोक व्यवहार के खिलाफ चलता हो, वह वाम मार्गी कहलाता है। ऐसे काम करने वाले लोग मृत समान माने गए हैं।

३. कंजूस: अति कंजूस व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जो व्यक्ति धर्म कार्य करने में, आर्थिक रूप से किसी कल्याणकारी कार्य में हिस्सा लेने में हिचकता हो, दान करने से बचता हो, ऐसा आदमी भी मृतक समान ही है।

४. अति दरिद्र: गरीबी सबसे बड़ा श्राप है। जो व्यक्ति धन, आत्म-विश्वास, सम्मान और साहस से हीन हो, वह भी मृत ही है। अत्यंत दरिद्र भी मरा हुआ है। गरीब आदमी को दुत्कारना नहीं चाहिए, क्योंकि वह पहले ही मरा हुआ होता है। दरिद्र-नारायण मानकर उनकी मदद करनी चाहिए।

५. विमूढ़: अत्यंत मूढ़ यानी मूर्ख व्यक्ति भी मरा हुआ ही होता है। जिसके पास बुद्धि-विवेक न हो, जो खुद निर्णय न ले सके, यानि हर काम को समझने या निर्णय लेने में किसी अन्य पर आश्रित हो, ऐसा व्यक्ति भी जीवित होते हुए मृतक समान ही है, मूढ़ अध्यात्म को नहीं समझता।

६. अजसि: जिस व्यक्ति को संसार में बदनामी मिली हुई है, वह भी मरा हुआ है। जो घर-परिवार, कुटुंब-समाज, नगर-राष्ट्र, किसी भी ईकाई में सम्मान नहीं पाता, वह व्यक्ति भी मृत समान ही होता है।

७. सदा रोगवश: जो व्यक्ति निरंतर रोगी रहता है, वह भी मरा हुआ है। स्वस्थ शरीर के अभाव में मन विचलित रहता है। नकारात्मकता हावी हो जाती है। व्यक्ति मृत्यु की कामना में लग जाता है। जीवित होते हुए भी रोगी व्यक्ति जीवन के आनंद से वंचित रह जाता है।

८. अति बूढ़ा: अत्यंत वृद्ध व्यक्ति भी मृत समान होता है, क्योंकि वह अन्य लोगों पर आश्रित हो जाता है। शरीर और बुद्धि, दोनों अक्षम हो जाते हैं। ऐसे में कई बार वह स्वयं और उसके परिजन ही उसकी मृत्यु की कामना करने लगते हैं, ताकि उसे इन कष्टों से मुक्ति मिल सके।

९. सतत क्रोधी: २४ घंटे क्रोध में रहने वाला व्यक्ति भी मृतक समान ही है। ऐसा व्यक्ति हर छोटी-बड़ी बात पर क्रोध करता है। क्रोध के कारण मन और बुद्धि दोनों ही उसके नियंत्रण से बाहर होते हैं। जिस व्यक्ति का अपने मन और बुद्धि पर नियंत्रण न हो, वह जीवित होकर भी जीवित नहीं माना जाता। पूर्व जन्म के संस्कार लेकर यह जीव क्रोधी होता है। क्रोधी अनेक जीवों का घात करता है और नरकगामी होता है।

१०. अघ खानी: जो व्यक्ति पाप कर्मों से अर्जित धन से अपना और परिवार का पालन-पोषण करता है, वह व्यक्ति भी मृत समान ही है। उसके साथ रहने वाले लोग भी उसी के समान हो जाते हैं। हमेशा मेहनत और ईमानदारी से कमाई करके ही धन प्राप्त करना चाहिए। पाप की कमाई पाप में ही जाती है और पाप की कमाई से नीच गोत्र, निगोद की प्राप्ति होती है।

११. तनु पोषक: ऐसा व्यक्ति जो पूरी तरह से आत्म संतुष्टि और खुद के स्वार्थों के लिए ही जीता है, संसार के किसी अन्य प्राणी के लिए उसके मन में कोई संवेदना न हो, ऐसा व्यक्ति भी मृतक समान ही है। जो लोग खाने-पीने में, वाहनों में स्थान के लिए, हर बात में सिर्फ यही सोचते हैं कि सारी चीजें पहले हमें ही मिल जाएं, बाकी किसी अन्य को मिलें न मिलें, वे मृत समान होते हैं। ऐसे लोग समाज और राष्ट्र के लिए अनुपयोगी होते हैं। शरीर को अपना मानकर उसमें रत रहना मूर्खता है, क्योंकि यह शरीर विनाशी है, नष्ट होने वाला है।

१२. निंदक: अकारण निंदा करने वाला व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जिसे दूसरों में सिर्फ कमियाँ ही नजर आती हैं, जो व्यक्ति किसी के अच्छे काम की भी आलोचना करने से नहीं चूकता है, ऐसा व्यक्ति जो किसी के पास भी बैठे, तो सिर्फ किसी न किसी की बुराई ही करे, वह व्यक्ति भी मृत समान होता है। परनिंदा करने से नीच गोत्र का बंध होता है।

१३. परमात्म विमुख: जो व्यक्ति ईश्वर यानि परमात्मा का विरोधी है, वह भी मृत समान है। जो व्यक्ति यह सोच लेता है कि कोई परमतत्व है ही नहीं; हम जो करते हैं, वही होता है, संसार हम ही चला रहे हैं, जो परमशक्ति में आस्था नहीं रखता, ऐसा व्यक्ति भी मृत माना जाता है।

१४. श्रुति संत विरोधी: जो संत, ग्रंथ, पुराणों का विरोधी है, वह भी मृत समान है। श्रुत और संत, समाज में अनाचार पर नियंत्रण (ब्रेक) का काम करते हैं। अगर गाड़ी में ब्रेक न हो, तो कहीं भी गिरकर एक्सीडेंट हो सकता है। वैसे ही समाज को संतों की जरूरत होती है, वरना समाज में अनाचार पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाएगा।

20/04/2026

एक फिजिक्स के प्रोफेसर ने कक्षा 6 से 12 NCERT की हिस्ट्री बुक्स के अध्ययन का निश्चय किया और उसने पाया कि लगभग 110 बातें ऐसी हैं जो संदिग्ध हैं...
NCERT की किताब में लिखा है कि दो सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक और इल्लतुतमिश ने वो मीनार बनवाया था। जिसे आज कुतुब मीनार कहा जाता है।
इस पर प्रोफेसर साहब ने RTI लगाया कि NCERT ने इस तथ्य को कहाँ से सत्यापित किया है? सत्यापित करने वाले लोग कौन थे?
इस पर NCERT की तरफ से उत्तर आया है कि, विभाग के पास कोई सत्यापित प्रति उपलब्ध नही है।
इस पुस्तक को प्रोफेसर मृणाल मिरी ने अनुमोदित किया था, जो नेशनल मोनिटरिंग कमेटी का हेड था।
मृणाल मीरी शिलांग का एक ईसाई है जिसे कांग्रेस ने 12 सालों तक राज्यसभा में नॉमिनेट किया था कांग्रेस राज के दौरान यह कई मलाईदार पदों पर था और कम्युनिस्ट चर्च के गठजोड़ से इसने भारतीय इतिहास में कई झूठे तथ्य जोड़ें जो आज भी बच्चों को पढ़ाएं जाते हैं जिसका कोई सुबूत किसी के पास नहीं है।

सोशल मीडिया पर दिन-रात, आठो प्रहर Narendra Modi से सवाल करने वाले #बौद्धिकों ने कभी National Council of Educational Research and Training - NCERT से सवाल किया? जीवन में कभी स्वयं #न्यायपालिका में संघर्ष किया?
पढ़िए! गुनिए!
एक फिजिक्स के प्रोफेसर ने कक्षा 6 से 12 NCERT की हिस्ट्री बुक्स के अध्ययन का निश्चय किया और उसने पाया कि लगभग 110 बातें ऐसी हैं जो संदिग्ध हैं...

NCERT की किताब में लिखा है कि दो सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक और इल्लतुतमिश ने वो मीनार बनवाया था। जिसे आज कुतुब मीनार कहा जाता है।

इस पर प्रोफेसर साहब ने RTI लगाया कि NCERT ने इस तथ्य को कहाँ से सत्यापित किया है? सत्यापित करने वाले लोग कौन थे?

इस पर NCERT की तरफ से उत्तर आया है कि, विभाग के पास कोई सत्यापित प्रति उपलब्ध नही है।

इस पुस्तक को प्रोफेसर मृणाल मिरी ने अनुमोदित किया था, जो नेशनल मोनिटरिंग कमेटी का हेड था।

मृणाल मीरी शिलांग का एक ईसाई है जिसे कांग्रेस ने 12 सालों तक राज्यसभा में नॉमिनेट किया था कांग्रेस राज के दौरान यह कई मलाईदार पदों पर था और कम्युनिस्ट चर्च के गठजोड़ से इसने भारतीय इतिहास में कई झूठे तथ्य जोड़ें जो आज भी बच्चों को पढ़ाएं जाते हैं जिसका कोई सुबूत किसी के पास नहीं है।

जैसे कक्षा 6, सामाजिक विज्ञान के पृष्ठ 46 पर ऋग्वेद के आधार पर भारत के बारे में लिखा है कि "आर्यों द्वारा कुछ लड़ाइयां मवेशी और जलस्रोतों की प्राप्ति के लिए लड़ी जाती थी। कुछ लड़ाइयां मनुष्यों को बंदी बनाकर बेचने खरीदने के लिए भी लड़ी जाती थीं।"

स्पष्ट है कि किताब लिखने वाला यह साबित करना चाहता है कि भारत में भी गुलाम प्रथा थी और मनुष्यों को खरीदने बेचने की जो बातें बाइबल और कुरान में हैं वे कोई नई नहीं हैं, बल्कि वैसा ही अमानवीय व्यवहार भारत में भी होता था।

ऐसे ही वे आगे लिखते हैं "युद्ध में जीते गये धन का एक बड़ा हिस्सा सरदार और पुरोहित रख लेते थे, शेष जनता में बांट दिया जाता था।" यहां भी मुहम्मद के गजवों को जस्टिफाई करने की भूमिका बनाई गई है।

आगे एक जगह लिखा है "पुरोहित यज्ञ करते थे और अग्नि में घी अन्न के साथ कभी कभी जानवरों की भी आहुति दी जाती थी।"

आगे पृष्ठ 60 पर लिखा है "खेती की कमरतोड़ मेहनत के लिए दास और दासी को उपयोग में लाया जाता था।"

तब उस प्रोफेसर ने पहले तो स्वयं अध्ययन किया, मेगस्थनीज की इंडिका आदि के आधार पर यह सिद्ध हुआ कि ये सब मनगढ़ंत लिखा जा रहा है, तब उन्होंने NCERT में RTI डाली कि इन बातों का आधार क्या है? आप हिस्ट्री लिख रहे हैं, रेफरेंस कहाँ हैं? ऋग्वेद की सम्बंधित ऋचाएं, अनुवाद बताया जाए और यदि नहीं है तो खंडन या सुधार किया जाए।

जानकर आश्चर्य होगा कि NCERT ने सभी 110 प्रश्नों का एक ही जवाब दिया कि हमारे पास इसका कोई प्रूफ नहीं है। इसके अलावा जवाब टालने और लटकाने का रवैया रखा। कई वर्ष ऐसे ही बीत गए। हारकर वे पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट में गये कि NCERT हमें इनका जवाब नहीं दे रही।

कोर्ट ने पिटीशन स्वीकार कर लिया और NCERT को जवाब देने के लिए कहा। तब NCERT ने कहा कि हमारी सभी पुस्तकों का लेखन जेएनयू के हिस्ट्री के प्रोफेसर ने किया है और हमने उन्हें जवाब के लिए कह दिया है। लगभग एक वर्ष बाद जेएनयू के लेखकों ने जवाब दिया कि हमने इन बातों के लिए ऋग्वेद के अनुवाद का सहारा लिया है।

ऋग्वेद में इंद्र को एक योद्धा बताया गया है और उसमें आये नरजित शब्द से यह साबित होता है कि वे लूटपाट करते थे और मनुष्यों को गुलाम बनाते थे।

इस पर इस प्रोफेसर ने संस्कृत के जानकारों को वे मंत्र बताए कि क्या इनका यही अर्थ होता है जो जेएनयू के प्रोफेसर ने किया है...

संस्कृत के विद्वानों ने एक स्वर में कहा कि जेएनयू वालों का अर्थ मनमाना, कहीं कहीं तो मूल कथ्य से बिल्कुल उलटा है। इस पर कोर्ट ने इन्हें पूछा कि क्या आप संस्कृत जानते हैं? आपने यह अनुवाद कहाँ से उठाया?

तो जेएनयू के कथित इतिहासकारों ने कहा कि वे संस्कृत का स भी नहीं जानते, उन्होंने एक बहुत पुराने अंग्रेज लेखक के ऋग्वेद के अनुवाद का इस्तेमाल किया है।

कोर्ट: "और जो आपने लिखा है कि लूट के माल को ब्राह्मण आदि आपस में बांट लेते थे, उसका आधार क्या है?"

जेएनयू: "चूंकि ऋग्वेद में अग्नि का वर्णन है और अग्नि को पुरोहित कहा गया है तो इसका अर्थ यही है कि जो जो अग्नि को समर्पित किया जा रहा है मतलब पुरोहित आपस में बांट रहे हैं।"

अब जेएनयू के इतिहासकारों और NCERT के इन तर्कों पर माथा पीटने के सिवाय कोई चारा नहीं है और वे शायद यही चाहते हैं कि हम माथा पीटते रहें...

NCERT आगे कक्षा 11 की हिस्ट्री में लिखती हैं "गुलामी प्रथा यूरोप की एक सच्चाई थी और ईसा की चतुर्थ शताब्दी में जबकि रोमन साम्राज्य का राजधर्म भी ईसाई था, गुलामों के सुधार पर कुछ खास नहीं कर सका।"

यहां NCERT के लिखने के तरीके से छात्र यह समझते होंगे कि ईसाई धर्म गुलामी के खिलाफ है। जबकि सच्चाई यह है कि एक चौथाई बाइबल इन्हीं बातों से भरी हुई है कि गुलाम कैसे बनाने, उनके साथ कितना यौन व्यवहार करना, उन्हें कब कब मार सकते हैं, वगैरह वगैरह।

सच्चाई यह है कि NCERT के 2006 के पाठ्यक्रम का एक मात्र उद्देश्य था हिन्दू धर्म को जबरदस्ती बदनाम करना, यानि जो नहीं है उसे भी हिंदुओं से जोड़कर प्रस्तुत करना और ईसाइयों की बुराइयों पर पर्दा डालकर भारत में उसके प्रचार के अनुकूल वातावरण बनाना।

सोनिया गांधी की तत्कालीन मंडली ने पूरी साजिश कर उक्त पाठ्यक्रम की रचना की थी और आज विगत 16 वर्ष से वही पुस्तकें चल रही हैं, एक अक्षर तक नहीं बदला गया।

और हां, उन प्रोफेसर का नाम आदरणीय नीरज अत्रि (Neeraj Atri) है, जिन्होंने कोर्ट में यह पिटीशन डाली थी, वे यूट्यूब पर हैं।

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