08/07/2026
भारत में एक आम मिडिल-क्लास बाप की हैसियत का अंदाजा बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि इस बात से लगाया जाता है कि उसका बच्चा किस स्कूल में पढ़ता है।
अपनी जेब की औकात छोटी पड़ जाए तो मंजूर, लेकिन बच्चे के स्कूल का 'लोगो' शर्ट की जेब पर बड़ा चमकना चाहिए।
मैंने भी यही सोचकर, शहर के एक ठीक ठाक स्कूल में अपने बच्चों का दाखिला करवा दिया।
स्कूल चमचमाता था, फीस तगड़ी थी,
और अनुशासन बढ़िया था
हमें लगता था कि भारी-भरकम फीस दे रहे हैं तो पढ़ाई भी अव्वल ही होगी।
पर सच यह था कि अंदर सिर्फ "काम चलाऊ" पढ़ाई होती थी।
नाम बड़ा था, दर्शन छोटे थे।
पर समाज में कॉलर ऊंची रखने के लिए हम सब माता-पिता यह कड़वा घूंट पी रहे थे।
घर और हॉस्पिटल के चक्कर में, मैं कभी स्कूल की 'पैरेंट्स-टीचर मीटिंग' (PTM) में नहीं जा पाया। वह मोर्चा हमेशा मेरी पत्नी ही संभालती थी।
फिर एक दिन वो वाकया हुआ, जिसने स्कूल की उस ऊंची दीवार के पीछे का सच सामने ला खड़ा किया।
उस दिन PTM थी।
मेरी पत्नी समय की पाबंद है, लेकिन शहर के ट्रैफिक और घर के सौ कामों के फेर में उसे स्कूल पहुँचने में महज चार-पांच मिनट की देरी हो गई।
जब वह स्कूल के बड़े से हॉल के बाहर पहुँची, तो देखा कि सिर्फ वही नहीं, बल्कि करीब 12-14 और माता-पिता भी वहाँ खड़े थे।
गुनाह सिर्फ इतना था कि वे चार मिनट लेट थे।
सजा यह मिली कि उन्हें हॉल के अंदर जाने से रोक दिया गया, जैसे वे किसी इम्तिहान में फेल हो गए हों।
तभी वहां स्कूल की प्रिंसिपल साहिबा का आगमन हुआ।
कड़क मिजाज, चेहरे पर और आवाज में रौब।
उन्होंने आते ही उन सभी माता-पिता पर चिल्लाना और बुरी तरह डांटना शुरू कर दिया।
“आप लोग अपने बच्चों का भविष्य क्या बनाएंगे जब खुद वक्त के पाबंद नहीं हैं!"
हॉल के बाहर खड़े वो पढ़े-लिखे, संभ्रांत माता-पिता, कोई सरकारी मुलाजिम था तो कोई छोटा व्यापारी... सब सिर झुकाए चुपचाप वो जिल्लत सह रहे थे।
कोई कुछ नहीं बोला।
बोलते भी कैसे?
बच्चों के भविष्य का मामला था। सबको डर था कि कहीं बच्चे को स्कूल से न निकाल दिया जाए,
कहीं उसका साल न बर्बाद हो जाए। प्रिंसिपल से पंगा लेने की हिम्मत किसी में नहीं थी।
लेकिन मेरी पत्नी से यह अपमान बर्दाश्त नहीं हुआ।
उसने सीधे प्रिंसिपल को टोकते हुए कहा:
"मैडम! आप इस लहजे में और इस तरह गलत तरीके से हमसे बात नहीं कर सकतीं।
आपके स्कूल में अंदर पढ़ाई तो बराबर होती नहीं है,
और आप उल्टे हम माता-पिता को यहाँ खड़ा करके सुना रही हैं?"
वह अकेली आवाज एक चिंगारी थी। जैसे ही मेरी पत्नी ने यह बात कही,
वहां खड़े बाकी माता-पिता के सब्र का बांध भी टूट गया।
जो लोग अब तक डर के मारे सिर झुकाए खड़े थे,
वे सब एक सुर में चिल्ला उठे। सबने प्रिंसिपल को उनके स्कूल की ढीली पढ़ाई और ऊंची फीस का आइना दिखा दिया।
प्रिंसिपल मैडम एकदम अवाक रह गईं।
उनके पास कोई जवाब नहीं था, क्योंकि सच तो यही था कि स्कूल में पढ़ाई उतनी अच्छी नहीं थी
माता-पिता का वो सामूहिक गुस्सा देखकर उनके पैर पीछे खिंच गए।
उन्होंने तुरंत सबको हॉल के अंदर आने की इजाजत दे दी। उस दिन का मामला तो शांत हो गया,
लेकिन यह सिर्फ तूफान के आने से पहले की शांति थी।
कुछ दिनों बाद, हॉस्पिटल में काम करते हुए मेरे फोन की घंटी बजी।
स्क्रीन पर स्कूल का नंबर था। मुझे तुरंत प्रिंसिपल ऑफिस बुलाया गया था।
जब मैं धड़कते दिल के साथ प्रिंसिपल मैडम के केबिन में दाखिल हुआ, तो उन्होंने बड़ी संजीदगी से मुझसे कहा, "देखिए मिस्टर... आइंदा से स्कूल की किसी भी मीटिंग में आप खुद आएंगे। अपनी वाइफ को मत भेजिएगा।"
मैंने बात को आगे बढ़ाना ठीक नहीं समझा।
अपनी मध्यमवर्गीय समझदारी का इस्तेमाल करते हुए मैंने सर हिलाया और कहा, "ठीक है मैडम, आगे से मैं ही आऊंगा।"
लेकिन इसके बाद, जैसे मेरे बेटे पर स्कूल की 'विशेष नजर' हो गई। हर छोटी-छोटी बात पर मेरे फोन पर शिकायत आने लगी
मुझे बार-बार स्कूल के चक्कर काटने पड़ते। मैं जाता, हाथ जोड़कर मैडम से मिलता, बात रफा-दफा होती और मैं लौट आता।
फिर एक दिन एक बड़ा 'कांड' हो गया। स्कूल से बुलावा आया कि आपके लड़के ने बहुत बड़ी बदमाशी की है।
मैं घबराया हुआ प्रिंसिपल ऑफिस पहुँचा। वहां मेरा छठी क्लास का बेटा भी गुमसुम खड़ा था।
पता चला कि क्लास की मॉनिटर ने उसकी शिकायत क्लास टीचर से की थी, और बात प्रिंसिपल तक पहुँच चुकी थी।
प्रिंसिपल मैडम ने कड़क आवाज में मेरे बेटे से पूछा, "हाँ बताओ, तुमने क्या बदमाशी की है क्लास में?"
मेरे बेटे ने मासूमियत और पूरे आत्मविश्वास के साथ मैडम की तरफ देखा और बोला:
“मैडम, वो जो क्लास मॉनिटर है ना, वो लड़की... वो मेरी 'Enemy' (दुश्मन) है! वो मुझसे चिढ़ती है, इसीलिए मेरे खिलाफ झूठी शिकायत करती रहती है!"
छठी क्लास के बच्चे के मुंह से 'Enemy' शब्द सुनकर केबिन का वो तनावपूर्ण माहौल एक पल में पिघल गया।
कड़क मिजाज प्रिंसिपल मैडम के चेहरे पर एक गहरी और सच्ची मुस्कान तैर गई।
उन्होंने हंसते हुए मेरी तरफ देखा और कहा, "देखिए जरा इन बच्चों को... इस छोटी सी उम्र में ही इन्होंने अपने दुश्मन भी बना लिए हैं!"
मैंने माहौल को संभालते हुए तुरंत अपने बेटे को थोड़ा डांटा और कहा, "चलो, बहुत बातें हो गईं, मैडम के पैर छुओ, अपनी गलती की माफी मांगो और आशीर्वाद लो।"
मेरे बेटे ने झुककर प्रिंसिपल मैडम के चरण स्पर्श किए। मैडम ने मुस्कुराकर उसके सिर पर हाथ रखा और उसे माफ कर दिया। वह बात वहीं खत्म हो गई।
शायद वह घटना एक इशारा थी। अगले ही साल, मैंने अपने बच्चे का नाम उस स्कूल से कटवा दिया और उसे एक दूसरे स्कूल में शिफ्ट कर दिया।
अब तो मेरा लड़का बड़ा हो गया है
नए स्कूल में जाने के कुछ महीनों बाद, एक दिन घर पर बैठे-बैठे मैंने अपने बेटे को हंसते हुए पास बुलाया और पूछा, "अच्छा एक बात बता... उस दिन सच क्या था?
उस मॉनिटर लड़की ने झूठी शिकायत की थी या तूने सच में कुछ किया था?"
बेटा झेंपते हुए मुस्कुराया और धीमे से बोला, "पापा... वो... मैं सच में क्लास में मेज (डेस्क) के ऊपर कूद रहा था।"
मैं बस उसे देखता रह गया और हंस पड़ा।
बच्चे तो बच्चे ही होते हैं।
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो पता चलता है कि वो प्रिंसिपल मैडम अब इस दुनिया में नहीं रहीं। जब उनके जाने की खबर मिली,
तो दिल में एक अजीब सी कसक उठी। स्वभाव की थोड़ी कड़क जरूर थीं,
लेकिन दिल की बुरी नहीं थीं। और सच कहूं तो,
बच्चों को संभालने के लिए स्कूल के मुखिया का थोड़ा कड़क होना जरूरी भी होता है।
हम मिडिल-क्लास लोग आज भी अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य की उम्मीद में, भारी बस्तों और मोटी फीसों के नीचे दबे, बस एक अदद 'अच्छे स्कूल' की तलाश में भटक रहे हैं।