05/04/2026
कोपी_ पेस्ट शानदार वकील साहब 🙏🙏**अनुबंध उपनल**
न भूतो न भविष्यति: धाकड़ नहीं, यह तो 'रंगा' निकले!
उत्तराखंड के इतिहास में ऐसा 'अद्भुत' दस्तावेज न कभी देखा गया, न सुना गया। यह अनुबंध नहीं, बल्कि आधुनिक लोकतंत्र का वह 'जादुई चिराग' है, जिसे रगड़ने पर जिन्न नहीं, बल्कि कर्मचारी की गर्दन पर लटकती तलवार बाहर आती है। लोग कह रहे थे कि यह 'धाकड़' सरकार का फैसला है, पर इसे गौर से पढ़ने पर समझ आता है कि यह तो विशुद्ध 'रंगा धाकड़' स्टाइल है—ऊपर से जनहित का मुलम्मा और अंदर से शोषण का पक्का इंतजाम।
इस अनुबंध की धारा 7 को तो स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाना चाहिए। इसमें साफ कहा गया है कि यह अनुबंध किसी भी प्रकार की 'समानता' (Equality) प्रदान नहीं करता। मतलब, संविधान चाहे चिल्लाता रहे कि 'सब बराबर हैं', पर उत्तराखंड का कार्मिक विभाग कह रहा है कि "बेटा, तुम हमारे आंगन के अछूत हो।" अगर तुमने साहब के बराबर हक मांगा, तो इसे 'अनुशासनहीनता' मानकर तुम्हारी छुट्टी कर दी जाएगी। यह धाक नहीं है, यह तो वह रंगबाजी है जहाँ राजा तय करता है कि प्रजा को सांस लेने का हक किस हद तक है।
सरकार ने 15 दिन की उपार्जित छुट्टी (Earned Leave) का दान दिया है, पर शर्त यह है कि उसे अगले साल नहीं ले जा सकते। यह वैसा ही है जैसे कोई आपसे कहे, "तुम्हें लड्डू तो देंगे, पर शर्त यह है कि इसे अभी खाओ, वरना हम छीन लेंगे।" कर्मचारी बेचारा सोचता है कि बीमार अगले साल पडूँ या इसी साल कोटा पूरा कर लूँ? 'रंगा' सरकार जानती है कि 'आउटसोर्स' वाले की नियति में आराम नहीं, सिर्फ काम और अपमान लिखा है।
मर्जी हमारी, मजबूरी तुम्हारी
अनुबंध में लिखा है कि सरकार जब चाहे आपका दफ्तर बदल सकती है या आपको कहीं भी 'समायोजित' कर सकती है, और आपको "कोई आपत्ति नहीं होगी"। मतलब, आपकी अपनी कोई मर्जी, कोई घर-परिवार, कोई जमीर नहीं है। आप वह सरकारी शतरंज़ के प्यादे हैं जिसे 'धाकड़' सरकार जहाँ चाहे पटक दे। और अगर आप बीमार पड़ गए, तो आपकी सेहत का फैसला डॉक्टर नहीं, सरकार की 'राय' करेगी। अगर सरकार को 'लगता' है कि आप बीमार हैं, तो बस आप बीमार हैं—यही अंतिम सत्य है।
एक महीने का 'सजा-ए-मौत' नोटिस
सरकार जब चाहे, बिना कारण बताए, एक महीने का नोटिस देकर या एक महीने का मानदेय देकर आपको सड़क पर ला सकती है। यह अनुबंध पत्र नहीं, बल्कि कर्मचारी के 'आत्मसम्मान का डेथ वारंट' है। इसमें 'कुशल' और 'अधिकारी' जैसे शब्दों का प्रयोग सिर्फ इसलिए किया गया है ताकि गुलामी थोड़ी ऊँचे दर्जे की लगे।
परसाई जी आज होते तो कहते— "उत्तराखंड के इस 'रंगा' मॉडल को देखो, जहाँ कर्मचारी को काम के बदले सम्मान नहीं, बल्कि 'अनुशासनहीनता' की धमकी दी जाती है।" यह 'धाक' जमाने वाली सरकार नहीं है, यह तो वह व्यवस्था है जो पसीने की कीमत को 'अस्थायी' अनुबंध की बेड़ियों में कसना जानती है। धन्य है वह 'रंगा' राज, जहाँ हक मांगना गुनाह है और गुलामी करना ही एकमात्र 'लोक सेवा' है।
लेखक:-
अधिवक्ता, मनीष पांडेय