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अनुभव की सफेदी और इम्तिहान की कसौटी...आज मन थोड़ा भारी है, कई शिक्षक साथी, जो अपने करियर के उस पड़ाव पर हैं जहाँ से रिटायर...
09/02/2026

अनुभव की सफेदी और इम्तिहान की कसौटी...

आज मन थोड़ा भारी है, कई शिक्षक साथी, जो अपने करियर के उस पड़ाव पर हैं जहाँ से रिटायरमेंट की रेखा साफ़ दिखने लगी है, आज सीटेट (CTET) के केंद्रों पर कतारों में खड़े हैं। 45 से 55 साल की उम्र, आँखों पर चढ़ा चश्मा और सालों का तजुर्बा... लेकिन हाथ में वही ओएमआर शीट, जैसे सब कुछ शून्य से शुरू करना हो।
कुछ विचार जो साझा करना जरूरी हैं:
👉अनुभव बनाम पात्रता: जिस शिक्षक ने 25-30 साल तक हजारों बच्चों का भविष्य संवारा, क्या उनकी 'गुणवत्ता' को आज एक एलिजिबिलिटी टेस्ट से मापा जाना तर्कसंगत है? क्या दशकों का व्यावहारिक अनुभव एक थ्योरी पेपर से कमतर है?
👉समानता का सवाल: यदि गुणवत्ता (Quality) का पैमाना केवल पुनः परीक्षा ही है, तो क्या यह नियम अन्य सभी क्षेत्रों—चाहे वो प्रशासनिक सेवाएँ (PCS-J) हों, चिकित्सा (NEET) हो या तकनीकी क्षेत्र—वहाँ भी लागू होना चाहिए? क्या 50 की उम्र में हर पेशेवर को अपनी डिग्री फिर से प्रमाणित करनी होगी?
👉गरिमा का प्रश्न: एक शिक्षक समाज का मार्गदर्शक होता है। रिटायरमेंट के करीब पहुँचकर "नौकरी से बाहर" कर दिए जाने का डर दिखाकर परीक्षा दिलाना, उस पद की गरिमा के साथ न्याय नहीं है।

हम सुधार के विरोधी नहीं हैं...🙏🙏
शिक्षा में सुधार और नवीनता (Upgradation) जरूरी है, लेकिन इसके लिए ट्रेनिंग मॉड्यूल और वर्कशॉप बेहतर विकल्प हो सकते हैं, न कि सेवा के अंतिम वर्षों में 'करो या मरो' वाली परीक्षा।

आज जब कोई बुजुर्ग शिक्षक परीक्षा केंद्र में प्रवेश करता है, तो वो अकेला नहीं होता; उसके साथ उसका आत्मसम्मान और संघर्ष भी परीक्षा दे रहा होता है।

✍✍ प्राइवेट और सरकारी स्कूल के बच्चों में अंतर केवल स्कूल के वातावरण तक सीमित नहीं होता, बल्कि अभिभावकों की परवरिश में भ...
30/12/2025

✍✍ प्राइवेट और सरकारी स्कूल के बच्चों में अंतर केवल स्कूल के वातावरण तक सीमित नहीं होता, बल्कि अभिभावकों की परवरिश में भी फर्क होता है। स्कूल के अंदर का वातावरण अभिभावकों के हाथ में नहीं होता, लेकिन बच्चों को साफ-सुथरा रखना और सही यूनिफॉर्म देना सबसे पहले अभिभावकों की जिम्मेदारी होती है। जब अभिभावक अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन सही ढंग से करते हैं, तब शिक्षक भी विद्यालय 🏘के भीतर एक सहज और सकारात्मक वातावरण बनाने में सफल हो पाते हैं। उन्हें यह विश्वास होता है कि अभिभावक जागरूक हैं और बच्चों को सही ढंग से विद्यालय भेज रहे हैं, इसलिए अब उनकी भी जिम्मेदारी बनती है कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जाए और उनका समुचित विकास किया जाए। इसके साथ-साथ बच्चों में अनुशासन, नैतिक मूल्यों और एक अच्छे नागरिक के गुणों का विकास करना भी आवश्यक है, ताकि एक सुरक्षित और सशक्त समाज का निर्माण हो सके और हमारे देश का भविष्य उज्ज्वल बन सके।”💯✅📕
✍✍सिर्फ एक-दूसरे पर उँगली उठाने से शिक्षा का स्तर कभी नहीं सुधर सकता। यदि अभिभावक यह कहें कि शिक्षक विद्यालय में ठीक से नहीं पढ़ा रहे हैं और शिक्षक यह कहें कि अभिभावक बच्चों पर ध्यान नहीं देते, तो इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप से कोई समाधान नहीं निकलता। वास्तव में, शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए दोनों पक्षों का जागरूक होना आवश्यक है।💯✅📕
✍✍ किसी पर दोषारोपण करने के बजाय सुधार की दिशा में ध्यान आकर्षित करना अधिक उचित है। यह भी सत्य है कि एक अभिभावक होने के नाते सबसे पहली जिम्मेदारी अभिभावकों की होती है कि वे अपने बच्चों का सही ढंग से पालन-पोषण करें और उन्हें नियमित, अनुशासित रूप से विद्यालय भेजें। इसके बाद यदि कोई शिक्षक बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा या उचित व्यवहार नहीं देता है, तो अभिभावकों को उनसे प्रश्न पूछने और शिकायत करने का पूरा अधिकार है।💯✅📕
✍✍लेकिन जब तक अभिभावक स्वयं अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन नहीं करते, तब तक किसी दूसरे पर दोष लगाने का नैतिक अधिकार भी नहीं बनता। शिक्षक और अभिभावक, दोनों की जागरूकता और सहयोग से ही शिक्षा का स्तर सुधर सकता है।✍✍

20/07/2023

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