BAHUGUNA'S ODALIGAON

BAHUGUNA'S ODALIGAON कोई भी संस्कृति परम्परा या प्रथा तभी जीवित रहती है जब एक पीढ़ी उन्हें अगली पीढ़ी को हस्तान्तरित करती

जब तक कोई अपने अंदर के आयाम नहीं खोज लेता, उसका मनुष्य रूप में जन्म लेना व्यर्थ है। खाने, सोने, पैदा करने और मरने के लिए हमें मनुष्य का रूप लेने की आवश्यकता नहीं है यह सब कुछ तो कोई भी जीव-जंतु मनुष्य से बेहतर कर सकता है। रैंडी पाश ने लिखा है “आखिर जिंदगी पैदा हो जाने और मरने के बीच धुंधलके में भटकते रहने का नाम नहीं है। अलबत्ता हम यह जानें कि हमारे पास वह क्या है जिसके लिए हम जी रहे हैं और दूसरों

को दे सकते हैं। आज तक हमने जो भी सोचा व किया है, क्या उसमें कुछ ऐसा कीमती है जो हमारे बाद भी रहना चाहिए”

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