Kids Heaven Childcare & Learning School

Kids Heaven Childcare & Learning School Kids Heaven lays the foundation for intellectual, moral, emotional, physical and social, and competence in our students.

OUR COMMITMENT TO EXCELLENCE
Our commitment is based on the knowledge that children learn through play. We respect each child's uniqueness and allow them to grow at their own pace. We provide a safe and nurturing environment that allows children to develop in all areas: socially, emotionally, cognitively, linguistically and physically. Our goal is to install a joy in learning that each child will

carry throughout their life. OUR PHILOSOPHY
Love, Learning and Understanding, is the meaningful words that make us believe in the proper intellectual development of the child. It is on these three words that our Philosophy is based. At Kids Heaven, we believe that we need to be a vital extension of your family, sharing love and concern for your children and work together to build a foundation for their happiness and success. Our intent is to give back to childhood its inner calm and playfulness. Kids Heaven is intrinsically a space that has been well thought of both in its philosophy and methodology to bring about a radical change in the way childhood needs of children must be nurtured. A great amount of time, thought and research has gone into selecting/creating material and training staff. The idea being - to ensure that the philosophy and methodology mingle to a rhythm of a little one's needs to be loved and gently nudged to learn as they play.

02/01/2019
Kids Heaven Childcare & Learning School
13/01/2018

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08/06/2016

भूमण्डलीकरण का द्वन्द : गरीबी बनाम अमीरी 'गरीबी बनाम अमीरी' एवं 'ग्रामीण बनाम शहरी' की बहस बड़ी पुरानी है। सभ्यता के आरम्भ में यह गैप उतना नहीं रहा होगा, जितना समकालीन समाज में। कार्ल माक्र्स ने भी वर्ग-संघर्ष की अपनी परिभाषा प्रभु और सर्वहारा वर्ग या शोषक और शोषित के आधार पर ही दी। भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारत हजारों वर्ष से गाँवाें का देश रहा है। ग्राम्य व्यवस्था व राज्य व्यवस्था का यहाँ अद्भुत तादातम्य देखने को मिलता है। भारतीय ग्राम्य व्यवस्था पर कभी राजनीति हावी नहीं रही, इसलिए वह स्वायत्त रूप से चलती रही है। वक्त के साथ अनेक थपेड़ों ने भारतीय संस्कृति पर हमला किया पर ग्राम्य व्यवस्था ने हजारों वर्षों से इस संस्कृति की रक्षा की। तभी तो पाश ने अपनी कविता में लिखा कि भारत नाम दुष्यन्त के पुत्र भरत के नाम पर नहीं बल्कि उन भूमिपुत्रों के नाम पर पड़ा है, जो आज भी सूरज की परछाइयों से समय मापते हैं। शहरों का विकास भी ग्राम्य व्यवस्था के फलने-फूलने पर ही हुआ पर आजादी पश्चात गाँव व शहर के बीच का अन्तराल बढ़ता गया। गाँवों की कीमत पर शहर फलने-फूलने लगे और नतीजन गाँव गरीबों का जमावड़ा हो गया और शहर अमीरों का। इसी के साथ 'इण्डिया' बनाम 'भारत' का मुहावरा चल निकला। हमारा देश प्राकृतिक सम्पदाओं से भरपूर है और हमारे युवा मानव संसाधन के क्षेत्र में अमेरिका-ब्रिटेन जैसे विकसित देशों तक अपनी सफलता की पताका फहरा रहे हैं, फिर भी आम आदमी उपेक्षित है। गाँवों के कल्याण के लिए तमाम योजनाएं बनाई गई, पर राजनैतिक-प्रशासनिक इच्छाशक्ति के अभाव में वे अपने अंजाम तक नहीं पहुँच सकीं। 1962 में लोकसभा में गाजीपुर के सांसद विश्वनाथ सिंह गहमरी ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में व्याप्त गरीबी की दास्तान सुनाते हुए कहा कि वहाँ गरीब गोबर से अनाज का दाना निकाल कर खाने को मजबूर हैं, तो नेहरू की ऑंखें भी छलक आयी थीं। शायद इसी विडम्बना पर कविवर धूमिल ने लिखा था- ''भाषा में भदेस हूँ, कायर इतना कि उत्तर प्रदेश हूँ।'' प्रधानमंत्री रहते हुए राजीव गाँधी ने भी स्वीकारा था कि केन्द्र से भेजे गए एक रूपए में से मात्र 15 पैसा ही अंतिम व्यक्ति तक पहुँचता है। स्पष्ट है कि सारा धन भ्रष्टाचार के नाले में जा रहा है। आजादी पश्चात सरकारों की प्राथमिकता में शहरों का ही विकास रहा। गाँवों की कीमत पर शहरों को हर तरह की सुख-सुविधाओं से भरपूर करना एक तरह का आन्तरिक उपनिवेशवाद ही कहा जायेगा, जिसने तमाम समस्याओं को जन्म दिया। भूमण्डलीकरण के बहाने तमाम बहुराष्ट्रीय कम्पनियांँ गाँवों तक पहुँच रही हैं और परम्परागत कृषि व्यवस्था पर चोट कर रही हैं। जो किसान अपनी आजीविका के लिए कृषि कार्य करता था, उसे परम्परागत खेती छोड़कर बागवानी और अन्य नकदी फसलों की खेती करने के लिए लालच दिया जा रहा है। दूसरों के लिए ठेके पर खेती की इस प्रवृत्ति को बढ़ाने के कारण गेहूँ की पैदावार लक्ष्य से पीछे खिसकने लगी और नतीजन विदेशों से गेहँ का आयात हो रहा है। किसानों को अपनी मनपसन्द फसल उगाने की बजाय रिटेल स्टोरों में बेचने के लिए उत्पाद पैदा करने को कहा जा रहा है। ठेके पर लहलहाती फसल चौपट हो जाती है तो किसानों की पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं होता। विशेष आर्थिक क्षेत्र के नाम पर कम दामों में किसानों की जमीन लेकर एक तरह से उन्हें पलायन के लिए मजबूर किया जा रहा है। स्पष्ट है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए किसान नागरिक नहीं उपभोक्ता है। भूमण्डलीकरण के इस दौर में 'कल्याणकारी राज्य' की अवधारणा गौण होती गई। गाँवों में बसने वाले किसानों, मजदूरों, शिल्पकारों को सरकार ने उनके भाग्य पर छोड़ दिया। बढ़ती मंँहगाई और बेरोजगारी के बीच जैसे-जैसे अमीरी-गरीबी का फासला बढ़ता गया, वैसे-वैसे किसानों की आत्महत्या, भुखमरी से मौत और सामाजिक विषमता जैसी प्रवृत्तियाँ बढ़ती गर्इं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के ऑंकड़ों पर गौर करें तो देश में वर्ष 2002 तक औसतन हर 30 मिनट में एक किसान ने आत्महत्या की। वर्ष 2005 में 17131, वर्ष 2006 में 17060 तो 1997 से 2006 के बीच कुल 78737 किसानों ने आत्महत्या की। तस्वीर का सबसे दुखद पहलू तो यह है कि ज्यादातर आत्महत्या करने वाले किसान समृध्द प्रान्तों के हैं। अकेले महाराष्ट्र में वर्ष 1995 से अब तक 36428 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। ग्रामीण विकास मंत्रालय की ही एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग दो करोड़ लोग जमीन से बेदखल किये जा चुके हैं और इनमें से मात्र 54 लाख लोगों को ही पुर्नस्थापित किया गया है। 'स्पेशल इकानामिक जोन' किस प्रकार 'स्पेशल एलिमिनेशन जोन' में तब्दील हो रहे हैं, वह महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे 'सेज' राज्यों में किसानों की आत्महत्या में 6.2 फीसदी की वृध्दि स्वयमेव दर्शाती है।

18/05/2016

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