15/04/2025
1959 में मुंबई के गिरगांव से शुरू हुई श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ की प्रेरणादायक यात्रा आज देशभर की लाखों महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास की मिसाल बन चुकी है। इस सहकारी संस्था की स्थापना सात साहसी और दूरदर्शी महिलाओं ने मिलकर की थी। इनमें अग्रणी नाम जसवंतीबेन जमनादास पोपट का है, जिन्होंने अपनी छह सहेलियों—पार्वतीबेन रामदास ठोडानी, उमजबेन नरनदास कुंडालिया, भानूबेन एन. टण्णा, लागूबेन अमृतलाल गोकणी, जयाबेन वी. विठलानी और दिवालीबेन लुक्का—के साथ मिलकर इस संस्था की नींव रखी।
शुरुआत बहुत ही साधारण थी। इन महिलाओं ने समाजसेवी छगनलाल करमशी पारेख से ₹80 का ऋण लेकर अपने घर के आंगन में पापड़ बनाने का कार्य आरंभ किया। पहले दिन मात्र चार पैकेट पापड़ बनाए गए, जिन्हें पास की एक दुकान पर बेचा गया। यह छोटा-सा कदम समय के साथ एक बड़ा आंदोलन बन गया, जिसने लिज्जत पापड़ को देश का एक भरोसेमंद और लोकप्रिय ब्रांड बना दिया।
आज लिज्जत पापड़ की 81 शाखाएं देशभर में सक्रिय हैं और यह संस्था 45,000 से अधिक महिलाओं को सम्मानजनक आजीविका उपलब्ध करवा रही है। संस्था की वार्षिक आय ₹1,600 करोड़ से अधिक हो चुकी है। केवल पापड़ ही नहीं, अब यह संस्था मसाले, गेहूं का आटा, चपाती और डिटर्जेंट जैसे उत्पादों का निर्माण भी कर रही है, जिससे इसकी पहुंच और प्रभाव दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
जसवंतीबेन पोपट के नेतृत्व में लिज्जत पापड़ केवल एक आर्थिक मॉडल नहीं, बल्कि महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण की प्रतीक बन चुकी है। उनके उत्कृष्ट योगदान को सम्मानित करते हुए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2021 में पद्मश्री से सम्मानित किया।
लिज्जत पापड़ की कहानी इस बात की गवाही देती है कि जब महिलाएं संगठित होकर दृढ़ निश्चय के साथ काम करती हैं, तो वे किसी भी बाधा को पार कर सकती हैं। यह यात्रा हर उस महिला को प्रेरित करती है जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपनों को साकार करने का हौसला रखती है। यह उदाहरण साबित करता है कि सामूहिक प्रयास, निरंतरता और साहस से कोई भी सपना हकीकत में बदला जा सकता है।