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22/05/2020
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AMIT KR SINGH I am Amit Kumar, I am graduate from Baba Saheb Bhimrao Ambedkar University, Muzaffarpur, Bihar In Mathematics Hon's. In this time, I am preparing for Banking...
*🤜डोकलाम को चीन 🇨🇳ने बताया खुद का हिस्सा*
सिक्किम क्षेत्र में डोकलाम को लेकर गत दिनों लगातार 73 दिनों तक भारत और चीन के बीच गतिरोध होने के बाद चीन ने फिर से सीनाजोरी करना शुरू कर दिया है। डोकलाम में सडक़ चौड़ी करने और सेना बढ़ाने पर चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि डोकलाम चीन का हिस्सा है। ऐसे में वहां पर सेना की मौजूदगी विवाद का विषय नहीं होनी चाहिए। अपनी संप्रभुता की रक्षा करना उनका अधिकार है।
गौरतलब है कि चीन ने डोकलाम में उस जगह के पास बड़ी संख्या में अपने सैनिकों को तैनात कर रखा है जहां 73 दिन तक भारत और चीन की सेनाओं के बीच गतिरोध रहा था। इससे साफ जाहिर हो रहा है कि दोनों देशों की सेनाओं के बीच अभी भी तनाव कम नहीं हुआ है।
सूत्रों ने बताया कि डोकलाम में चीन अपने सैनिकों की संख्या धीरे धीरे बढ़ा रहा है। जिससे स्थिति और बिगड़ सकती है। हालांकि भारत की ओर से डोकलाम में किसी भी तरह की गतिविधि होने से इंकार किया गया है।
*👉ओखा और बेत द्वारका के बीच पुल का👌 शिलान्यास करने पहुंचे पीएम👏 मोदी*
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार से दो दिन के गुजरात दौरे पर हैं। आज प्रधानमंत्री ने अपनी यात्रा की शुरुआत गुजरात के प्रसिद्ध मंदिर द्वाराधीश के दर्शन के साथ की। राज्य में इसी साल विधानसभा चुनाव होने है। ऐसे में पीएम मोदी का यह दौरा कई मायनों में अहम है। प्रधानमंत्री बनने के बाद ये पहला मौका है जब नरेंद्र मोदी एक महीने के अंदर तीसरी बार गुजरात दौरे पर हैं। गुजरात पहुंचकर प्रधानमंत्री ने द्वारकाधीश मंदिर में पूजा-अर्चना की।
इसके बाद पीएम मोदी ने कहा कि पहले भारत सरकार का गुजरात के प्रति रवैया अच्छा नहीं था। उन्होंने आज द्वराका का नया मूड देखा है। चारो ओर उत्साह-उमंग, आपका ह्दय से अभिनंदन। पीएम मोदी शनिवार को ओखा और भेट द्वारका को जोडऩे वाले ब्रिज का शिलान्यास करेंगे।
पीएम मोदी करीब बीस दिन बार फिर से मिशन गुजरात को लेकर दो दिवसीय दौरे पर पहुंचे हैं। पीएम मोदी विधानसभा चुनाव के ऐलान से ठीक पहले गुजरात के वोटरों को लुभाने के लिए 5,825 करोड़ रुपये की परियोजनाओं का शिलान्यास भी करेंगे। इसके तहत चार राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं की आधारशिला रखी जाएगी। केंद्रीय सडक़ परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और सडक़ परिवहन और राजमार्ग राज्यमंत्री मनसुख एल. मंडाविया भी इस मौके पर प्रधानमंत्री के साथ होंगे।
*👉अमेरिका ने भारत🇮🇳 को 3-0 से हराया*
भारत में पहली बार आयोजित हो रहे फीफा अंडर 17 फुटबॉल विश्वकप में मेजबान भारत का पहला मुकाबला शुक्रवार रात को दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में अमेरिका से हुआ। इस मैच में मेजबान को 3-0 से हार का सामना करना पड़ा।
मैच में भारतीय टीम ने काफी संघर्ष किया, लेकिन अमेरिका के युवा खिलाड़ी उन पर भारी पड़े। अमेरिका के बेहद अनुभवी खिलाडिय़ों के सामने पहला फीफा वल्र्डकप खेल रहे भारतीय खिलाडिय़ों ने शानदार खेल दिखाया। भारत की तरफ से गोलकीपर धीरज और कोमल ने अपने प्रदर्शन से सभी का दिल जीत लिया।
अमेरिका ने पहले हाफ में एक गोल किया, जबकि दूसरे हाफ में दो गोल दागे। मैच का पहला गोल अमेरिका के कप्तान जोस सर्जेट ने 30वें मिनट में किया। दूसरे हाफ में 51वें मिनट में क्रिस डर्किन और 84वें मिनट में एंड्रयू कार्लेटोन ने गोल दागे।
अमेरिका ने पूरे मैच में भारत पर दबाव बनाए रखा। भारतीय खिलाडिय़ों ने भी कुछ करीबी मौके बनाए, लेकिन वह उन्हें गोल में तब्दील नहीं कर सके। इस ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम पहुंचे। उनके साथ खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ भी मौजूद थे। प्रधानमंत्री मोदी ने पूर्व भारतीय दिग्गज फुटबॉल खिलाड़ी पीके बनर्जी, बाइचिंग भूटिया, सुनील क्षेत्री सहित युवा फुटबॉल खिलाडिय़ों को भी सम्मानित किया।
*सामने😲 आई हनीप्रीत की 💃एक और पहचान*
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमती राम रहीम की करीबी हनीप्रीत को लेकर लगातार खुलासे हो रहे हैं। अब हनीप्रीत का एक तीसरा नाम भी सामने आया है। दावा किया जा रहा है कि गुरमीत राम रहीम के गोद लेने से पहले हनीप्रीत का नाम प्रियंका तनेजा था, लेकिन राम रहीम ने उसे गोद लेकर उसका नाम हनीप्रीत इंसा कर दिया।
प्रियंका के बाद अब हनीप्रीत के तीसरे नाम गुरलीन इंसा की चर्चा है। पुलिस जांच में पता चला है कि गुरलीन इंसा के नाम से उसके पास एक मोबाइल सिम था। हरियाणा पुलिस की एसआईटी इसकी जांच कर रही है।
बताया जा रहा है कि हनीप्रीत ने गुरलीन के नाम से एक फेसबुक आईडी भी बनाई थी, लेकिन इसकी कई जानकारियों को डिलीट कर दिया गया। पुलिस साइबर एक्सपर्ट से ये जांच करवाने में लगी है कि छिपने के दौरान हनीप्रीत ने फेसबुक ऑपरेट करने के साथ-साथ ऑडियो और वीडियो कॉल्स करने और इंटरनेट ऑपरेट करने के लिए गुरलीन इंसा के नाम से मोबाइल सिम लेकर पुलिस को धोखा देने की कोशिश तो नहीं की है। बता दें कि तीन अक्टूबर को हनीप्रीत सामने आई थी. पुलिस उसे गिरफ्तार करके पूछताछ कर रही है। पुलिस को उससे कई अहम सुराग मिले हैं।
*☢नकदी के जरिये कुपोषण से लड़ाई*
हाल ही में प्रकाशित राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकडे़ हमारा उत्साह नहीं बढ़ाते, खासकर तब, जब हम इनको भारत की आर्थिक प्रगति के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं। *🇮🇳भारत में प्रत्येक तीसरा⚫ शिशु कुपोषित है* और मातृत्व-काल की हरेक *🔴दूसरी 👩💼महिला* अनीमिया से ग्रसित है। और ऐसा तब है, जब हम कुपोषण से सभी मोर्चों पर लड़ रहे हैं- स्वास्थ्य के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के जरिये, स्वच्छता के मामले में स्वच्छ भारत मिशन के सहारे और पोषण के संदर्भ में समेकित बाल विकास सेवा की मुहिम से। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक औसत भारतीय अपनी आय क्षमता से लगभग 10 प्रतिशत कम अर्जित करता है, क्योंकि वह अपने शैशव काल में कुपोषित रह गया था। आधुनिक शोधों ने यह सिद्ध किया है कि जीवन के प्रारंभिक काल का कुपोषण व्यक्ति के मानसिक व शारीरिक विकास को अवरुद्ध करता है, जो जीवन-पर्यंत उसके सीखने की शक्ति, उसकी उत्पादकता और आय क्षमता को विपरीत रूप से प्रभावित करता है। *साफ है, एक कमजोर-कुपोषित कार्यबल की नींव पर एक श्रेष्ठ और उन्नत भारत की कल्पना बेमानी है।*
हमारे देश में कुपोषण से मुक्ति पाने के प्रयास विभिन्न योजनाओं के जरिये लक्षित परिवारों को खाद्यान्न या भोजन उपलब्ध कराने तक सीमित रहे हैं, चाहे वह सार्वजनिक वितरण प्रणाली से उचित मूल्य पर अनाज उपलब्ध कराना हो अथवा विद्यालयों में मिड-डे मील की व्यवस्था हो, या फिर आंगनबाड़ी केंद्रों के जरिये गर्भवती महिलाओं व नवजात शिशुओं को राशन, पंजीरी अथवा पके हुए भोजन मुहैया कराने की व्यवस्था।
यद्यपि हमारा खाद्यान्न एवं पोषण कार्यक्रम वैश्विक संदर्भ में सबसे व्यापक कार्यक्रमों में से एक है, मगर इसका परिणाम आशा के अनुरूप नहीं रहा है।
चूंकि कुपोषण एक छिपी हुई समस्या हैै, इसलिए इसके प्रति राजनीतिक व्यवस्था प्राय: उदासीन रही है। जागरूकता के अभाव में परिवारों द्वारा शिशुओं के पोषण और स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के लिए अपनी जीवनशैली व परिवेश में बदलाव लाने में आंशिक सफलता ही मिली है। ऐसे में, कुपोषण से लड़ाई के लिए अब नए प्रयोगों की आवश्यकता है।
*वैश्विक स्तर पर इन चुनौतियों का सामना करने के लिए सशर्त* नकदी हस्तांतरण (सीसीटी) एक प्रभावी विकल्प के रूप में उभरा है। ब्राजील और मैक्सिको जैसे देशों में इन कार्यक्रमों की सफलता इस बात का प्रमाण है कि ऐसे कार्यक्रम गरीबी उन्मूलन व असमानता दूर करने के सशक्त साधन हैं। इन कार्यक्रमों के सघन मूल्याकंन से यह भी साबित हुआ है कि इससे व्यवहार में अपेक्षित बदलाव आया है, जो कुपोषण जैसी समस्याओं से मुक्ति के लिए अति आवश्यक है। भारतीय परिवेश में भी ओडिशा के ‘ममता’ जैसे मिलते-जुलते कार्यक्रम में आशातीत परिणाम मिले हैं। इन साक्ष्यों के बावजूद वस्तु के रूप में सहायता के प्रति व्यापक समर्थन है। इसके लिए दक्षिणी राज्यों का उदाहरण दिया जाता है, जहां मिड-डे मील कार्यक्रम काफी सफल रहा है। किंतु इन कार्यक्रमों की कामयाबी में राज्यों की सामाजिक पूंजी की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। इसी पूंजी की असमानता के कारण सभी राज्यों में इसका क्रियान्वयन समान रूप से संभव नहीं हो सका है। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में हौसला पोषण योजना के शुरुआती मूल्याकंन से पता चलता है कि इसकी सफलता सीमित रही है, जिसका मुख्य कारण गर्भवती महिलाओं का कार्यक्रम में अपेक्षित संख्या में भागीदारी न करना है, क्योंकि वे आंगनबाड़ी केंद्रों में प्रतिदिन जाकर भोजन करना सही नहीं मानतीं।
हाल ही में बिहार के गया जिले में सर्शत नकदी हस्तांतरण की प्रभावशीलता का अध्ययन किया गया। बिहार बाल सहायता कार्यक्रम के माध्यम से यह काम हुआ। अध्ययन के चार विकास खंडों को चुना गया, जो सामाजिक व आर्थिक संकेतंकों के लिहाज से एक जैसे थे। दो विकास खंडों में अन्य लाभों के अलावा गर्भवती स्त्रियों को अपने पंजीकरण की तिथि से 30 माह तक हरेक महीने 250 रुपये (कुल 7,500 रुपये) कुछ शर्तों के साथ भुगतान किए गए। इसके अतिरिक्त अन्य सभी योजनाएं यथावत रखी गईं। ऐसा इसलिए किया गया, ताकि विकास खंडों के तुलनात्मक अध्ययन से यह स्पष्ट हो सके कि कुपोषण सूचकांकों में नकद भुगतान से कितना अंतर पड़ा? हमने नकद भुगतान के परिणामों को चार प्रमुख सवालों की कसौटी पर परखा- एक, क्या ये नकदी हस्तांतरण पोषण पर सकारात्मक असर डाल रहे हैं? दो, क्या नकदी का उपयोग निर्धारित प्रायोजन के लिए हो रहा है? तीन, क्या यह लाभ सही पात्र तक पहुंच रहा है? और चार, सेवाओं की उपलब्धता व लाभों का समग्र रूप से स्थिति बेहतर बनाने में मदद मिल रही है?
इस नए प्रयोग के परिणाम आश्चर्यजनक रूप से सकारात्मक दिखे। जिन विकास खंडों में नकद भुगतान किया गया, वहां के शिशुओं के कुपोषण में कमी की दर उन शिशुओं के मुकाबले पांच गुनी अधिक हुई, जहां सशर्त नकद राशि मुहैया
नहीं कराई गई थी। इसी प्रकार, नकदी मुहैया कराए गए विकास खंडों में गर्भवती स्त्रियों में अनीमिया की दर में दो वर्षों के भीतर लगभग 14 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई, जो कि राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि उपलब्ध राशि का इस्तेमाल गर्भवती स्त्रियों व माताओं ने अपने आहार के विविधीकरण के लिए किया। गर्भवती महिलाओं के आहार में दूध, हरी सब्जी, मांस, अंडे व चीनी की खपत में वृद्धि देखी गई। छह से आठ महीने की आयु के शिशुओं के लिए अपेक्षित आहार की शुरुआत की गई, ताकि उन बच्चों का सही दिमागी विकास हो सके। यह भी देखा गया कि नकद हस्तांतरण के कारण माताओं ने उन सारी शर्तों का पालन किया और उन सभी व्यावहारिक उपायों को अपनाया, जो उनके बच्चे के हित के लिए जरूरी था और उनके नियंत्रण में था।
स्पष्ट है, कुपोषण मुक्ति अभियान में सशर्त नकदी हस्तांतरण की अहम भूमिका हो सकती है, और राज्य सरकारों को इस विकल्प पर गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए, खासकर उन क्षेत्रों में, जहां की सार्वजनिक सेवाओं का रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं रहा है।(Hindustan )
*न्यायपालिका : नियुक्तियों में पारदर्शिता हो*
Article by (जाहिद खान)
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति, प्रोन्नति और स्थानांतरण में पारदर्शिता की तरफ कदम बढ़ाते हुए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने अपने सभी निर्णय और कार्यवाहियां सार्वजनिक करने का फैसला किया है। आगे से इन ऊपरी अदालतों के न्यायाधीशों की नियुक्ति, प्रोन्नति और स्थानांतरण के सभी मामले शीर्ष अदालत की वेबसाइट पर अपलोड किए जाएंगे। सर्वोच्च न्यायालय के तकरीबन 64 सालों के न्यायिक इतिहास में यह पहला मौका है, जब न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया सार्वजनिक की जाएंगी। सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठतम जजों के कॉलेजियम-प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के अलावा जस्टिस जे. चेल्मेश्वर, रंजन गोगोई, मदन लोकुर और कुरियन जोसेफ शामिल हैं-ने हाल ही में सर्वसम्मति से ये सभी निर्णय सार्वजनिक करने का फैसला लिया है। कॉलेजियम की बैठक में पारित प्रस्ताव में कहा गया है कि ‘‘इस पण्राली में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और इसके बाद भी गोपनीयता बनाए रखने के इरादे से कलेजियम द्वारा हाईकोर्ट के लिए पदोन्नति, जजों को स्थाई करने की पुष्टि, हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के पद पर पदोन्नति, चीफ जस्टिस और न्यायाधीशों के तबादले और सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति से संबंधित मामलों में सरकार के पास सिफारिश भेजने के बारे में अब से लिये गए सभी निर्णयों को इनके कारण बताते हुए इन्हें शीर्ष अदालत की वेबसाइट पर अपलोड किया जाएगा, क्योंकि प्रत्येक मामले में कॉलेजियम द्वारा विचार की गई सामग्री भिन्न होती है।’
न्यायिक नियुक्तियों, प्रोन्नति और स्थानांतरण में बेहतर पारदर्शिता सुनिश्चित करने और कॉलेजियम प्रणाली की विश्वसनीयता बरकरार रखने के लिए यह जरूरी भी था। कॉलेजियम ने इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए अदालत की वेबसाइट पर ‘‘कॉलेजियम रिजोल्यूशन’ नाम से एक अलग लिंक सृजित किया है, जिसमें कॉलेजियम ने बीते 3 अक्टूबर को केरल और मद्रास हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति के तीन प्रस्ताव जो सरकार को भेजे गए, वेबसाइट पर डाल दिए हैं। इसमें उम्मीदवारों के नामों पर की गई र्चचा, संबंधित हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट आए जजों से उनके बारे में ली गई राय और उम्मीदवारों के खुफिया ब्यूरो के मूल्यांकन को भी सार्वजनिक किया गया है। साल 1993 में संविधान पीठ के एक फैसले से अस्तित्व में आया कॉलेजियम, सर्वोच्च न्यायालय के पांच वरिष्ठ न्यायाधीशों का चयन मंडल होता है, जो उच्च अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति, प्रोन्नति और स्थानांतरण करता है, जिसमें सरकार का कोई दखल नहीं होता। इससे पहले, उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार राष्ट्रपति के पास था।
एक लिहाज से देखा जाए, तो इस नियुक्ति प्रक्रिया से शक्ति का विकेंद्रीकरण हुआ, लेकिन पहले के सिस्टम और बाद में कॉलेजियम सिस्टम दोनों में भी वक्त के साथ खामियां दिखने लगीं। चयनमंडल के अधिकार क्षेत्र की मौजूदा प्रक्रिया के दोषपूर्ण होने की सबसे गंभीर मिसाल पिछले कुछ सालों में पहले कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सौमित्र सेन और बाद में जस्टिस पीडी दिनकरन के रूप में हमारे सामने आई, जिन पर भ्रष्टाचार के इल्जाम में संसद में महाभियोग की प्रक्रिया भी चली। इसी परिप्रेक्ष्य में पहले संप्रग सरकार और बाद में राजग सरकार ने संविधान संशोधन विधेयक, राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) कानून 2014 और इससे जुड़े 99वें संविधान संशोधन कानून, 2014 के जरिए कॉलेजियम सिस्टम बदलने की कवायद की। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने लंबी सुनवाई के बाद अक्टूबर, 2015 में इस कानून को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था।
जाहिर है कि इस कानून के रद्द होने के बाद सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति और उनके स्थानांतरण की पुरानी कॉलेजियम व्यवस्था फिर से बहाल हो गई। अलबत्ता कानून रद्द करते वक्त अदालत ने इस बात को जरूर माना था कि कॉलेजियम सिस्टम में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए और सुधार की जरूरत है। साल 1993 में कॉलेजियम व्यवस्था के पक्ष में फैसला देने वाले सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व जज जस्टिस जेएस वर्मा और जस्टिस वीआर कृष्णा अय्यर से लेकर जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस चेल्मेश्वर आदि अब यह बात मानते हैं कि कॉलेजियम व्यवस्था की गंभीर समीक्षा की जरूरत है। इसमें पारदर्शिता, जवाबदेही, वस्तुनिष्ठता और विश्वसनीयता बढ़े, इसके लिए इसमें सुधार की जरूरत है।(RS)
11/09/2017
Good morning
तीन साल में मोदी जी ने दुनिया का चक्कर पूरा काट लिया है और निष्कर्ष निकला है कि धरती चपटी है एवं भक्त चौपट।
आरक्षण समर्थक के लिए
भक्तों विकास की लड़ाई लड़ने के लिए पार्टी की नहीं समाज की जरूरत होती है आप लोग यह जो पार्टी का ढोल बाजार है कृपया अपने पास ही रखें और समाज के लिए लड़ाई लड़े|
समाज में क्या कमी है हमारे सरकारी स्कूल कैसे चल रहे हैं हमारे गांव के कौन से लोग सरकारी योजनाओं से पीछे हैं इसके लिए हम जैसे युवाओं को आगे आना चाहिए यह पार्टी का झंडा लेकर आप लोग जो बहस करते हैं यह आपके जीवन को बहुत ही कठिन बनाएगा|
जय हिंद जय भारत
For a rational person who understands his purpose in life there can be no differentiation among people or any superiority among them.
29/01/2017
Life is not a music player to listen to your favorite songs. It is a radio, you must adjust yourself to every frequency & enjoy whatever comes in it. Good Morning & have a nice day!