08/11/2025
भारत के पहले के नेताओं की राजनीति और आज के नेताओं की राजनीति में अंतर।
आज देश के नेताओं के भाषणों में देश के विकास, सामाजिक विकास, लोगों के विकास, आर्थिक विकास, जनता के प्रति व्यक्ति आय के विकास, बेरोजगारी की समस्या और पर्यावरण के विकास के मुद्दों को छोड़ कर एक नेता दूसरे नेता पर आरोप -प्रत्यारोप की राजनीति हो गयी है। इनके भाषणों में लोगों में नफरती भावना और जातिय हिंसा पैदा हो रही है।
पहले के नेता राजनीति को जनसेवा का मार्ग मानते थे, जबकि आज राजनीति अधिकतर सत्ता प्राप्ति का साधन बन गई है। हालांकि आज भी कुछ ईमानदार और जनता के हित में काम करने वाले नेता हैं, लेकिन उनकी संख्या पहले की तुलना में बहुत कम रह गई है।
🇮🇳 भारत की ऐसी राजनीति के प्रमुख कारण
1. शिक्षा की कमी:
देश में अब भी बहुत से लोग राजनीति की सही समझ नहीं रखते। जनता उम्मीदवारों को उनकी जाति, धर्म या छोटे-छोटे वादों के आधार पर वोट देती है, जिससे ईमानदार नेता पीछे रह जाते हैं।
2. धनबल और बाहुबल का प्रभाव:
आज चुनाव लड़ने के लिए बहुत पैसा चाहिए। इसलिए कई भ्रष्ट और ताकतवर लोग राजनीति में आ जाते हैं ताकि वे अपने स्वार्थ पूरे कर सकें।
3. जनता की निष्क्रियता:
पहले जनता राजनीति में सक्रिय भाग लेती थी, सवाल पूछती थी। अब अधिकांश लोग उदासीन हैं — वे केवल चुनाव के समय ही जागते हैं। इससे नेता जवाबदेह नहीं रहते।
4. परिवारवाद और पक्षपात:
कई राजनीतिक दलों में परिवारवाद (dynasty politics) का बोलबाला है। योग्य व्यक्ति को अवसर नहीं मिलता, जिससे नई सोच और ईमानदारी की कमी होती है।
5. विचारधारा की कमी:
आज राजनीति में स्थायी विचारधारा नहीं रही। दल और नेता समय व लाभ के अनुसार अपने विचार बदल लेते हैं।
6. भ्रष्टाचार और लालच:
सत्ता मिलने के बाद कई नेता जनता की सेवा भूल जाते हैं और निजी लाभ के लिए पद का दुरुपयोग करते हैं।
7. मीडिया और सोशल मीडिया का प्रभाव:
अब राजनीति में प्रचार और छवि निर्माण ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है, असली काम और नीतियाँ पीछे छूट जाती हैं।
🇮🇳 भारत की राजनीति ने शिक्षा को कैसे कमजोर किया है
1. शिक्षा पर राजनीतिक नियंत्रण:
भारत में शिक्षा का संचालन केंद्र और राज्य दोनों करते हैं। कई बार सरकारें शिक्षा नीति को राजनीतिक लाभ के लिए बदल देती हैं। इससे शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान और विकास नहीं, बल्कि वोट बैंक बनाना रह जाता है।
2. गुणवत्ता से ज़्यादा राजनीति पर ध्यान:
स्कूलों और विश्वविद्यालयों में नियुक्तियाँ कई बार राजनीतिक सिफ़ारिशों और भ्रष्टाचार के आधार पर होती हैं, जिससे योग्य शिक्षकों की कमी हो जाती है और शिक्षा की गुणवत्ता गिरती है।
3. छात्र राजनीति का दुरुपयोग:
कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति का उपयोग कुछ राजनीतिक दल अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए करते हैं। इससे पढ़ाई का माहौल बिगड़ता है और विद्यार्थियों में अनुशासन की कमी आती है।
4. नीतियों में अस्थिरता:
हर नई सरकार आने पर शिक्षा नीति बदल दी जाती है, जिससे लंबे समय तक स्थायी सुधार नहीं हो पाते।
5. शिक्षा बजट की उपेक्षा:
भारत के कुल बजट का बहुत छोटा हिस्सा शिक्षा पर खर्च किया जाता है। राजनीतिक प्राथमिकताओं में शिक्षा पीछे रह जाती है।
6. जाति और आरक्षण की राजनीति:
आरक्षण जैसी नीतियाँ शुरू में सामाजिक समानता के लिए थीं, लेकिन अब कई बार इन्हें राजनीतिक वोट पाने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जिससे शिक्षा में प्रतिस्पर्धा और गुणवत्ता प्रभावित होती है।