Sojourn Institute

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A talk on the topic 'Origin of humankind and Yuval Noah Harari's blunt attempt to falsify history and science' was organ...
09/09/2023

A talk on the topic 'Origin of humankind and Yuval Noah Harari's blunt attempt to falsify history and science' was organised by Einstein Club at Sojourn Institute in Patna, on 6th September. Dr. Sunny Singh was the keynote speaker for this event. This event was attended by many students and science enthusiasts. A detailed report in English will be posted soon. Right now we are sharing the report in Hindi.

आईन्स्टीन क्लब द्वारा पटना के सोजॅर्न इंस्टिट्यूट पर ' मानव की उत्पत्ति और युवल नोआ हरारी की किताब द्वारा इतिहास और विज्ञान के मिथ्याकरण की भोथरी कोशिश' विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस व्याख्यान में मुख्य वक्ता के तौर पर डॉ. सनी सिंह को बुलाया गया था। व्याख्यान शुरू होने से पहले आकाश ने बच्चों को आईन्स्टीन क्लब के बारे में बताया और इसके साथ ही आज के समय में इस विषय पर परिचर्चा की ज़रुरत को रेखांकित किया। आज जिस प्रकार से लोगों की तर्कणा पर हमला किया जा रहा है और इतिहास और विज्ञान को विकृत करने की कोशिशें की जा रही हैं, ऐसे में यह ज़रूरी बन जाता है कि ऐसे विषयों पर व्याख्यान आयोजित करवाए जाएँ जिससे कि एक सही इतिहास दृष्टि और वैज्ञानिक समझ विकसित हो सके।
डॉ. सनी सिंह ने इस विषय पर बातचीत रखते हुए बताया कि किस प्रकार आज पाठ्यक्रमों से डारविन के उद्विकास की अवधारणा को हटाया जा रहा है और मिथकों को यथार्थ के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है। और हरारी की किताब भी वैज्ञानिक चेतना को कुन्द करने वाली व इतिहास का विकृतिकरण करने वाली किताबों में ही शामिल है। असल में यह लुगदी साहित्य के तौर पर मिलने वाली ऐसी बाज़ारू किताब है जो विज्ञान की अवधारणाओं को लोकप्रिय तरीक़े से प्रस्तुत करने का काम कर रही है, लेकिन इस लोकप्रियता के नाम पर हरारी ने जो पेश किया है वह ना सिर्फ़ यथार्थ के उलट है बल्कि प्रतिक्रियावादी विचारों को परोसने वाली किताबों का एक भद्दा नमूना है।
आगे डॉ. सनी सिंह बताते हैं कि किस प्रकार हरारी ने अपनी किताब सेपियन्स के ज़रिये आम छात्रों और लोगों के बीच मनाव की उत्पत्ति पर एक रहस्यवादी दृष्टिकोण को स्थापित करने का काम किया है।

यह किताब चार हिस्से में है - संज्ञानात्मक क्रान्ति, कृषि क्रान्ति, मानव जाति का एकीकरण और वैज्ञानिक क्रान्ति। इनमें से सिर्फ़ पहले हिस्से पर आज के इस व्याख्यान में बातचीत की गयी। पहले हिस्से में हरारी इंसान प्रजाति यानी होमो सेपियन्स को ही हत्यारे के रूप में स्थापित करने का काम करता है। वह बताता है कि उद्विकास की प्रक्रिया में होमो सेपियन्स अपने किस्म की अन्य प्रजातियों का क़त्ल कर के आगे विकसित हुए। इस प्रकार वह पूंँजीवादी गलाकाटू प्रतिस्पर्धा को मानव स्वभाव के रूप में प्रस्तुत करने का काम करता है।
अपने पहले अध्याय यानि ‘संज्ञानात्‍मक क्रान्ति’ के नाम पर हरारी मानव उद्भव में श्रम की भूमिका को न सिर्फ़ गोल कर जाता है बल्कि ‘’संज्ञानात्‍मक क्षमता’’ को इतिहास की उपज मानने की जगह एक आकस्मिकता मानता है। मस्तिष्क के विकास को इस प्रकार प्रस्तुत करता है जैसे कि इसका विकास सबसे बड़े रहस्यों में से एक है जिसे आज तक मानव सभ्यता पता नहीं कर पायी है। डॉ. सनी आगे बताते हैं कि हरारी मानव मस्तिष्क के विकास को किसी प्रकृति के रहस्य या ईश्‍वरीय चमत्‍कार की तरह प्रस्तुत करता है। और ऐसा करके वह एंथ्रोपोलॉजी के विज्ञान को उठा कर कचड़े की पेटी में फ़ेंक देता है।
डॉ. सनी बताते हैं कि असल में यह किताब न तो विज्ञान और न ही इतिहास पर कोई विमर्श प्रस्तुत करती है, यह एक ऐसा राजनीतिक विमर्श है जोकि मौजूदा व्यवस्था को जिसमें ऊँच-नीच है, शोषण-उत्पीड़न है, ग़रीबी - अमीरी है, सही ठहराने का काम करती है। आज एक प्रकार से तमाम रिसर्च और इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट में व अन्य नौकरियों में ख़ाली सीट पर भर्ती को लेकर छात्रों के बीच एक ऐसी प्रतिस्पर्धा खड़ी कर दी गई हैं जिसमें कि बच्चों के बीच आपसी सहयोग और मानवीय रिश्तों में दरारें पड़ रही है। यही आज के वक्त की सच्चाई है लेकिन असल में यह गलाकाटु प्रतिस्‍पर्द्धा पर आधारित एक ऐसी सामाजिक व्‍यवस्‍था के कारण पैदा हुआ है जोकि मुनाफ़े को केन्द्र में रख कर चल रहा है। लेकिन हरारी इसे ऐसे प्रस्तुत करता है जैसे कि स्वार्थ, व्‍यक्तिवाद, मुद्रा संस्‍कृति, गलाकाटु प्रतिस्‍पर्द्धा आदि ‘नैसर्गिक’ मानवीय गुण हों और इसकी वह एक भोंडी "ऐतिहासिक" व्याख्या भी प्रस्तुत कर देता है जिसमें वह पूरी मानवता को ही जन्‍मजात दोषी ठहरा देता है। वह मानव के उद्भव में आदिम पाप को खोज लेता है और इस प्रकार उसके द्वारा युद्ध, अन्याय, बर्बरता जैसी परिघटनाएं प्राकृतिक तौर पर ही नैसर्गिक मानवीय गुण बना दी जाती हैं। आज इस तरह की अवधारणा को प्रस्तुत करने का काम कई किस्म की हॉलीवुड व बॉलीवुड की फिल्‍में और सीरिज़ भी कर रही हैं।
वक्तव्य के अन्त में डॉ. सनी ने मानव के उद्भव की सही अवधारणा को समझाते हुए बताया कि किस प्रकार श्रम ने ही मानव को मानव बनाया। असल में हाथ श्रम का उत्‍पाद भी है और उसका अंग भी। आज वैज्ञानिक शोध यह सिद्ध करते हैं कि मानव के हाथ और अन्‍य प्राइमेट्स के हाथों में अन्‍तर बनावट से अधिक तंत्रिकाओं के विकास का है। मानव का हाथ उसकी चेतना से जुड़ा हुआ है। मनुष्‍य की मेहनत ने ही मनुष्‍य को गढ़ने का काम किया है। यह उसका सामाजिक व्‍यवहार था जो उसके शरीर को गढ़ रहा था। डॉ. सनी ने बताया कि 35 लाख साल पुराने हमारे पुर्खें आस्‍ट्रेलोपिथेकस आफ्रे़नस के जीवाश्‍म से यह पता चलता है कि उसके मष्तिष्‍क का आकार अभी केवल 400 मिलीलीटर था। अफ़्रीका में मिला ‘लुसी’ का जीवाश्‍म इसकी ताकीद करता है। इस वक्‍़त मानव ने पैरों पर खड़ा होकर चलना शुरू कर दिया था हालांँकि अभी तक उसने औजार बनाने नहीं शुरू किये थे। 25 लाख साल पहले मानव ने औजा़र का इस्‍तेमाल शुरू किया और इसी दौरान पाये जाने वाले जीवाश्‍म से यह पता चला कि मानव का मस्तिष्क 400 से बढ़ कर 800 मिलीलीटर हो गया था। यह असल में औजा़रों के इस्तेमाल से सम्भव हुआ। यही वह क़दम है जो मानव को जीव जगत से अलग कर देता है। होमो हैबिलिस से होमो इरेक्‍टस तक और उसके आगे आधुनिक मानव तक औजा़र बनाने की क्षमता विकसित होती है और उसका मस्तिष्क भी। उन्‍नत चेतस क्षमता श्रम की प्रक्रिया से विकसित होती है जिसकी ताकीद उन्‍नत्तर होते औजा़र करते हैं।
हरारी मानव के मानव बनने के लिए ज़िम्मेदार श्रम की प्रक्रिया को ग़ायब कर देता है और वह इसकी व्याख्या ‘’ज्ञान वृक्ष परिवर्तन’’ यानी ‘’आकस्मिक जेनेटिक म्यूटेशन्स’’ के ज़रिये करता है। इसपर चर्चा करते हुए डॉ. सनी ने बताया कि हरारी ने बड़ी चालाकी से मनुष्य के मनुष्य बनने की प्रक्रिया के भौतिक आधार को ही पूरे तरीक़े से ग़ायब कर दिया है। इसपर सही अवधारणा प्रस्तुत करते हुए डॉ. सनी सिंह बताते हैं कि मानव का उद्भव लैमार्क की तरह गर्दन ऊंँची करने वाले जिराफ़ के रूप में नहीं बल्कि श्रम करने वाले मानव द्वारा निर्मित पर्यावरण की मध्‍यस्‍तता में उद्विकास हुआ है। इंसान के पूर्वजों से इंसान ने काफ़ी हद तक शारीरिक विशेषताएँ तथा गुण हासिल कर लिए थे जो उसके विकास के लिए ज़रूरी थे। विकास मुख्यतः पेड़ों को छोड़ कर ज़मीन पर जाने से हुआ। ज़मीन पर उसके हाथ आज़ाद हो गए थे। आंँख और हाथों के बीच का भी बेहतर समन्वय विकसित हुआ जिससे वस्तुओं को छूने, आकार समझने व पकड़ने में आसानी हो गई। उसकी आँखें आसानी से दूरी माप सकती हैं और जटिल दिमाग़ व तंत्रिका तंत्र के कारण ही किसी वस्तु को हाथों में महसूस कर सकती है व आँखों द्वारा बनाए चित्र से मिलान कर सकती है। यही वह भौतिक ज़रूरत है जो इंसान को औज़ार बनाने के लिए चाहिए। औज़ार के साथ-साथ भाषा का उद्भव भी बेहद ज़रूरी था क्योंकि बिना एक-दूसरे से अनुभव साझा किए इंसान औज़ार जैसी रचना उस समय नहीं कर सकता था। यह चेतना का विकास ही इंसान को जानवरों से अलग करता है। कुछ वानर भी औज़ारों का इस्तेमाल कर सकते हैं परन्तु उनका यह इस्तेमाल बेहद सीमित होता है और ये जानवर किसी भी काम को करते हुए महज़ अपने दैनिक जीवन को जीते हैं और इन कार्यों को स्वभावतः व आदतन करते हैं, जैसे इंसान का बच्चा रोता है या आँखें झपकाता है, या जैसे दिल धड़कता है। घोंसला, छत्ता, शहद, बाँध, नाली से लेकर लोज तक बनाने वाले जानवरों से इंसान अलग है क्योंकि इंसान इन सभी कार्यों को पूर्वकल्पित योजना बनाकर अंजाम देता है यानी काम से पहले काम का विचार मौजूद होता है। इस प्रक्रिया को ही श्रम कहा जाता है। यह निश्चित ही इंसान का श्रम था जिसने इंसान को इंसान बनाया। श्रम यानी वह क्रिया है जिसमें इंसान अपनी मेहनत के उत्पाद की किसी न किसी हद तक पूर्वकल्पना करता है। श्रम ही वे अन्य चीज़ें पैदा करता है जो भौतिक तौर पर इंसान और जानवरों के बीच अन्तर पैदा करती है। गॉर्डन चाइल्ड के शब्दों में ‘इंसान ने ख़ुद को बनाया है।’ यह लामार्कियन पद्धति से चरित्र की आनुवांशिकी के हासिल किये जाने की प्रक्रिया नहीं थी बल्कि श्रमशील मानव का एक प्रक्रिया में चुना जाना था।

इस प्रकार मानव उद्भव की एक भौतिकवादी व्याख्या प्रस्तुत करते हुए डॉ. सनी सिंह ने बताया कि हरारी की सेपियन्स किताब वैज्ञानिक गुत्थियों को आसान शब्‍दों में ले जाने का दावा करते हुए असल में रहस्‍यवाद, धार्मिक पूर्वाग्रहों और मूर्खता को व्‍यापक स्‍तर पर फ़ैला रही हैं जिसपर आज हमें चेत जाने की ज़रूरत है। वक्तव्य का अन्त करते हुए क्लब के साथियों ने यह बताया गया कि सेपियन्स पुस्तक के अन्य भागों पर भी विस्तृत रूप से आगे चर्चा रखी जायेगी। क्लब द्वारा इतिहास और विज्ञान के विकृतिकरण और मिथ्याकरण के विरुद्ध ऐसे व्याख्यानों का सिलसिला जारी रहेगा।

03/09/2023
03/09/2023
17/06/2023

It has always been the goal of natural science to unravel the laws of nature and to develop an understanding of it. No doubt every concept that is formulated, every theory which is discovered and every invention done, ultimately has to serve the human race. 19th century was an era, where marvellous achievements were made in the various fields of natural science. Amongst all the discoveries done in that era, it was the path breaking works of Charles Darwin, which made us to understand how different organisms have evolved. Earlier, there were no logical explanations behind existence of different species but Darwin put forward an elegant idea to explain it based on his observations. Since, Darwin natural science has come a long way, many new theories explain about the natural world more elaborately. Further, the ideas of Darwin have been twisted and distorted to justify this very unjustified system, sociologist have coined the term Social Darwinism, to provide philosphical backing to this capitalist system. So, now a question arises infront of us, are the ideas of Darwin still relevant and moreover what they actually mean. In order to ponder on this question and understand the materialist idea of evolution, Scientists for Society is organising a talk on the topic *Darwin's legacy : The relevance of theory of evolution in the modern era*. Dr. Sunny Singh will be the keynote speaker for the aforementioned topic.
You all are requested to join this popular lecture.

25/04/2023

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