11/01/2024
“ सच मानो प्रिय
इन आघातों से टूट- टूट कर
रोने में कुछ शर्म नहीं ,
कितने कमरों में बंद हिमालय रोते है।
मेजों से लग कर सो जाते कितने पठार
कितने सूरज गल रहे है अंधेरो में छिपकर
हर आंसू कायरता की खीझ नहीं होता। “
~ विजय देवनारायण साही
20/11/2023
31/08/2023
20/06/2023
16/04/2023
15/04/2023
13/04/2023
12/04/2023
06/04/2023
20/04/2022