Bihar PCS Study With Diwakar

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10/11/2025

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Photos from Bihar PCS Study With Diwakar's post 10/11/2025

सन 1966 में केंद्र सरकार के पास बिहार के लोगों को भुखमरी से बचाने के लिए अनाज नहीं था।
आज देश के करीब 81 करोड़ लोगों को हर माह 5 किलो देने के लिए भरपूर अनाज मोदी सरकार के पास उपलब्ध है।आखिर क्यों ?कारण जान लीजिए।
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सुरेंद्र किशोर
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सन 1966-67 के बिहार के भीषण अकाल के संदर्भ में ब्रितानी अखबार ‘गार्जियन’ ने भी बिहार की खाद्य समस्या को विश्व संकट घोषित कर अमेरिका,सोवियत संघ व अन्य समृद्ध देशों का अंतःकरण जगाने की कोशिश की।
इस पर प्रतिष्ठित साप्ताहिक पत्रिका ‘दिनमान’ ने लिखा कि लेकिन अंतःकरण अब तक केवल कनाडा और आस्टे्रलिया का जागा है। कनाडा की संसद ने भारत-पाकिस्तान के अकालग्रस्त क्षेत्रों के लिए आपात्कालीन पैमाने पर अन्न भेजने का कानून पास कर दिया है। आस्ट्रेलिया सरकार ने भी भारत को डेढ़ लाख टन गेहूं भेजने का फैसला किया है।
याद रहे कि तब जो बिहार रिलीफ कमेटी बनी थी,उसके प्रधान सर्वोदय नेता जयप्रकाश नारायण थे।
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अकाल की विकरालता के बावजूद 5 नवंबर 1966 को तब की प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने पटना में पत्रकारों से कहा कि
‘‘बिहार सरकार ने (तब बिहार में कांग्रेस की ही सरकार थी।)बड़ी मात्रा में अनाज की मांग की है।पर,भारत सरकार के लिए यह संभव नहीं है कि पूरी मांग पूरी की जा सके।क्योंकि देश में अन्न की उपलब्धता की स्थिति ठीक नहीं है।
वैसे यथा संभव मदद हम करेंगे।’’
आजादी के बीस साल बाद भी भारत की सरकार भुखमरी से लोगों को बचाने की स्थिति में नहीं थी क्योंकि सरकार का अधिकांश धन भ्रष्टाचार में जा रहा था।पहला भ्रष्टाचार जीप घोटाला था जिसमें एक लाख 72 हजार पाउंड लूट लिया गया था।
इस घोटाले का दोष वी.के.कृष्ण मेनन पर डाला गया।किंतु असली दोषी कोई और था।
कौन था,उसके बारे में मेनन ने 1969 में अपने दुभाषिया और मेरे मित्र देवेंद्र नाथ को बताया था।तब मेनन मिदनापुर लोक सभा उप चुनाव लड़ने पश्चिम बंगाल आये थे।तब के प्रधान मंत्री नेहरू कहा करते थे कि भ्रष्टों पर कार्रवाई करने पर प्रशासन में पस्तहिम्मती आएगी।(-नेहरू के निजी सचिव एम.ओ.मथाई)
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सन 1963 में ही तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष डी.संजीवैया को इन्दौर के अपने भाषण में यह कहना पड़ा कि ‘‘वे कांग्रेसी जो 1947 में भिखारी थे, वे आज करोड़पति बन बैठे।’’
गुस्से में बोलते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने यह भी कहा था कि ‘‘झोपड़ियों का स्थान शाही महलों ने और कैदखानों का स्थान कारखानों ने ले लिया है।’’
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आजादी के तत्काल बाद ही डा.राम मनोहर लोहिया ने केंद्र सरकार को सलाह दी थी कि एक बड़ी योजना बनाकर देश के खेतों के लिए सिंचाई का प्रबंध कर देना चाहिए।तब अधिकांश भूमि वर्षा पर निर्भर थी।इसलिए पैदावार कम थी।
पर केंद्र सरकार ने उस सलाह पर ध्यान नहीं दिया।
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दूसरी ओर सरकारी धन किस तरह भ्रष्टाचार के कारण लगातार लूटे जा रहे थे,उसका प्रमाण 1985 में खुद प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने दिया।उन्होंने कहा कि हम दिल्ली से 100 पैसे भेजते हैं और उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही जनता तक पहुंच पाते हैं।बाकी बिचैलिए लूट लेते हैं।
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सन 2013-14 में भारत सरकार का कर राजस्व करीब 11 लाख करोड़ रुपए था जो अब बढ़कर करीब 30 लाख करोड़ रुपए है।
क्योंकि मनमोहन सिंह सरकार की अपेक्षा मोदी सरकार में भ्रष्टाचार कम हुआ है।हालांकि बंद नहीं हुआ है।
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चूंकि मोदी सरकार को अब पैसे की कमी नहीं है,इसलिए आम लोगों को सरकार तरह- तरह से आर्थिक मदद पहुंचा रही है।
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भारत सरकार इन दिनों हर माह देश के 81 करोड़ 35 लाख लोगों को प्रति व्यक्ति 5 किलोग्राम अनाज दे रही है।
बिहार सरकार की ओर से भी अन्य मदद इसके अलावा दी जा रही हैं।
चूंकि आम गरीब लोगों में नमक हराम लोगों की संख्या काफी कम होती हैं,बिहार विधान सभा चुनाव में ऐसी मदद का चुनावी लाभ सत्ताधारी दल को मिल रहा है।
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बिहार चुनाव में एन.डी.ए.की साफ बढ़त नजर आ रही है।
पहली बार अपना ऐसा आकलन टी.वी.-24 चैनल के संवाददाता राजीव रंजन ने सार्वजनिक रूप से लोगों को बताया था। राजीव रंजन पर ‘‘गोदी मीडिया’’का सदस्य होने का आरोप कोई नहीं लगाता। बिहार चुनाव परिणाम के बारे में मेरा आकलन भी यही है।
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नसीहत
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बिहार चुनाव नतीजा दलों को एक ठोस नसीहत देगा,यदि वे लेना चाहें।
जो दल जिस राज्य में सत्ता में हैं,ईमानदारी से वे कर वसूलें।
जरूरतमंद लोगों को तरह-तरह से राहत पहुंचाएं।
तब ऐसा होगा कि चुनाव हारने के बाद कोई बहाना बनाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।चुनाव जीत भी सकते हैं।
इस बीच बिहार चुनाव हारने वाले दल शोर जरूर मचाएंगे--वोट चोरी हो गई।राजग ने धार्मिक भावनाओं का शोषण किया।भारी धन राशि नाजायज तरीके से खर्च किया गया आदि आदि।
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वैसे नेता व दल को भी भारी सबक देगा बिहार चुनाव रिजल्ट--जो यह कहते रहे हैं कि विकास से वोट नहीं मिलते,बल्कि सामाजिक समीकरण से वोट मिलते हैं।
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9 नवंबर,25

01/11/2025

मोकामा का इंतकाम

पहले पूरा पोस्ट पढ़े फिर प्रतिक्रिया दें।

चार दिन पहले एबीपी न्यूज़ का पत्रकार मोकामा में एक व्यक्ति का इंटरव्यू कर रहा था " उस व्यक्ति के अनुसार अनंत सिंह की पत्नी जो राष्ट्रीय जनता दल से विधायक का चुनाव जीती थी उन्हें वह कोठे वाली बता रहा था, और उनके नाम के अंत में खातून लगा रहा था, और कह रहा था कि वह पश्चिम बंगाल के एक कोठे से आई हैं"

जो व्यक्ति यह प्रलाप कर रहा था वह कभी अनंत सिंह के ही बड़े भाई दिलीप सिंह के खिलाफ जेल में रहकर चुनाव लड़ा था और उस समय भी दिलीप सिंह राष्ट्रीय जनता दल के ही टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे, जो व्यक्ति इंटरव्यू दे रहा था उसके ऊपर कुल गंभीर 38 मुकदमे दर्ज थे, कभी वह मोकामा के टाल इलाके में आतंक का पर्याय रह चुका था। बीते हफ्ते से लगातार वह अनंत सिंह के ऊपर व्यक्तिगत भद्दे भद्दे कमेंट कर रहे थे।

कल टाल के इलाके में अनंत सिंह का तूफानी दौरा था जो की सुबह से ही 7:00 बजे से चल रहा था, दुलारचंद यादव ने अपने कई इंटरव्यू में यह कह चुके थे कि उन्हें टाल में आने दो तो वापस नहीं जाने देंगे, जो लोग यह कह रहे हैं कि दुलारचंद यादव राष्ट्रीय जनता दल के कार्यकर्ता थे, कुछ तो यहां तक कह रहे थे कि लालू के करिबो तो उन्हें बता दूं कि वह जनसुराज के प्रत्याशी पियूष प्रियदर्शी का प्रचार कर रहे थे और 10 दिनों के अंदर उनके जितने भी इंटरव्यू है वह सब पीयूष प्रियदर्शी के ही साथ है, अब राष्ट्रीय जनता दल इस मामले को हाईजैक करना चाह रहा है, लेकिन जो वीडियो प्राप्त हुए हैं उनसे उन्हें देखकर यह मालूम पड़ता है सुबह से ही जब अनंत सिंह टाल के इलाके में घूम रहे थे उसके पहले से ही उनके ऊपर हमले की तैयारी की गई थी, वीडियो में भी दिख रहा है की सबसे पहले उनकी ही गाड़ियों पर पत्थर फेके गए और उन्हें तोड़ा गया, तो मेरी समझ से यह हत्या नहीं दो गुटों की झड़प में क्रिया की प्रतिक्रिया है, इसमें किसी भी तरफ से जान तो जानी ही थी।

अपराधी अगर अपनी पसंदीदा पार्टी से चुनाव लड़ रहा हो तो उसके प्रति भारी सहानुभूति बन जाती है, और वह अपराधी नहीं एक आम नागरिक बन जाता है लेकिन वही अपराधी अगर दूसरी पार्टी से चुनाव लड़ रहा हो तो वह अपराधी नहीं नरसंहार करने वाला बन जाता है।

बिहार में अपराधियों को टिकट देना आम प्रचलन में है और सभी पार्टी की जरूरत भी होती है।
राष्ट्रीय जनता दल ने ADR के आंकड़ों के मुताबिक 76% अपराधियों को टिकट दिया है, जिसका नेतृत्व कर रहे हैं रीतलाल यादव जिनके ऊपर जीवन का पहला मुकदमा साइकिल छीनने का दर्ज हुआ था और आखिरी मुकदमा बिहार के होटल कारोबारी और उद्योगपतियों से रंगदारी मांगने का और लेने का दर्ज हुआ जिसके चक्कर में वह जेल में है और चुनाव लड़ रहें हैं, आरजेडी के पसंद वाले व्यक्तियों को वे अच्छे लगते हैं।

जनता दल यूनाइटेड 38% अपराधियों को टिकट दिया है, जिसका नेतृत्व कर रहे हैं अनंत सिंह, जो अभी कुछ दिन पहले ही जमानत पर आए हैं और वह भी एक ऐसे मामले में जो उनके ही विधानसभा के सोनू मोनू गैंग ने एक दलित परिवार के घर पर ताला मार दिया था और वही ताला अनंत सिंह खुलवाने गए थे तो वहां गोलीबारी हो गई थी इसमें अनंत सिंह पर केस हुआ था और वह जेल चले गए थे।

भाजपा जो चरित्र धोने का वाशिंग मशीन लिए चलती है उसके अंदर आंकड़ों के मुताबिक उसमें 56%परसेंट उम्मीदवार अपराधी हैं या यूं कह लीजिए कि 56% उम्मीदवार पूर्व अपराधी होते है।

अपनी पार्टी का अपराधी, अपनी बिरादरी का अपराधी सबको चहेता होता है, अगर अपराध का विरोध करना है अपराधी का विरोध करना है तो सभी प्रकार के अपराधियों का और सभी प्रकार के अपराध का विरोध करना सीखिए, अपनी पार्टी के अपराधी बाहुबली को आप टिकट दे रहे हैं और दूसरी तरफ के अपराधी और बाहुबली पर आप तंज कस रहे हैं ये अच्छाई किस प्रकार की !

तेजस्वी जी ने मोकामा में नारा दिया कि मैं कलम बांट रहा हूं, और टिकट किसे बांटा जिसने पूरे बिहार पूर्वांचल में AK 47 बांटा था, जिसके अपराध से तंग आकर उसके पिता ने आत्महत्या कर ली, उसके अपराध से तंग आकर उसके एक भाई ने आत्महत्या कर ली, ओवर स्पीड एक्सीडेंट में पुत्र की जान दिल्ली में चली गई, इसके पहले भी चुनाव में सजा पूरी कर चुके दोषसिद्ध अपराधी अशोक महतो की पत्नी को टिकट दिया था, इस चुनाव में भी दोषसिद्ध सजा पूरी कर चुके अपराधी सूरजभान की पत्नी को टिकट दिया, आप इस परंपरा को तोड़ सकते थे लेकिन आपने परंपरा जारी रखी, 20 साल से सूरजभान NDA के करीब रहे और 2 दिन में राष्ट्रीय जनता दल के मुरीद हो गए और टिकट लेकर भी चले आए।

जब अपराध का विरोध करना है तो अपराधी को संरक्षण और टिकट देना ही क्यों ? और ऐसे लोगों को अपनी जाति के अनुसार पसंद ही क्यों करना ? क्या उन लोगों ने जो हत्याएं की हैं वह हमारी अपनी जाति के हो जाएंगे तो उन हत्याओं को माफ कर दिया जाएगा, सबसे पहले तो अपराधी में जात देखना बंद करिए अपराधी में नेता ढूंढना बंद कर दीजिए, देखिएगा राजनीति में अपराधी आने ही बंद हो जाएंगे।

राजनीति में विरोध की भी एक मर्यादा होती है, शब्द चयन की भी एक अपनी सीमा होती है, एक अपराधी ने दूसरे अपराधी को मारा तो इसमें अपराधी ही मरा ! चाहे वह मरता चाहे यह मरता ! न अनंत सिंह सज्जन इंसान है न दुलारचंद यादव सज्जन इंसान थे, दोषी जो कोई भी हो उस पर कठोर कार्रवाई करनी चाहिए, बिहार में अपराध और अपराधी चाहे अपनी जाति के हो या दूसरी जाति के दोनों समाप्त होने चाहिए !

संयोग देखिए कि जिस पत्रकार के समक्ष उन्होंने अभद्र टिप्पणी की थी उसी पत्रकार ने उनकी हत्या की भी कवरेज की, एक बात मैं और बता दूं कि मैंने सच लिखने की कोशिश की है, न हीं मैं दुलारचंद यादव का विरोधी हूं और न हीं मैं अनंत सिंह का समर्थक हूं।

अपराध अपराधी दोनों समाप्त हो ! ना वह आपके सगे हैं ना हमारे सगे हैं !
अतुल सिंह
जौनपुर



28/10/2025

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Photos from Bihar PCS Study With Diwakar's post 25/10/2025

एक कल्पना कीजिए... तीसवर्ष का पति जेल की सलाखों के भीतर खड़ा है और बाहर उसकी वह युवा पत्नी खड़ी है, जिसका बच्चा हाल ही में मृत हुआ है...

इस बात की पूरी संभावना है कि अब शायद इस जन्म में इन पति पत्नी की भेंट न हो। ऐसे कठिन समय पर इन दोनों ने क्या बातचीत की होगी। कल्पना मात्र से आप सिहर उठे ना?
जी हाँ!!! मैं बात कर रहा हूँ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे चमकते सितारे विनायक दामोदर सावरकर की। यह परिस्थिति उनके जीवन में आई थी, जब अंग्रेजों ने उन्हें कालापानी (Andaman Cellular Jail) की कठोरतम सजा के लिए अंडमान जेल भेजने का निर्णय लिया और उनकी पत्नी उनसे मिलने जेल में आईं।

सशक्त ह्रदय वाले वीरसावरकर (Vinayak Damodar Savarkar) ने अपनी पत्नी से एक ही बात कही... “तिनके तीलियाँ बीनना और बटोरना तथा उससे एक घर बनाकर उसमें बाल बच्चों का पालन पोषण करना... यदि इसी को परिवार और कर्तव्य कहते हैं तो ऐसा संसार तो कौए और चिड़िया भी बसाते हैं ....
.अपने घर परिवार बच्चों के लिए तो सभी काम करते हैं। मैंने अपने देश को अपना परिवार माना है, इसका गर्व कीजिए.... इस संसार में कुछ भी बोए बिना कुछ उगता नहीं है। धरती से ज्वार की फसल उगानी हो तो उसके कुछ दानों को जमीन में गड़ना ही होता है। वह बीच जमीन में, खेत में जाकर मिलते हैं तभी अगली ज्वार की फसल आती है। यदि हिन्दुस्तान में अच्छे घर निर्माण करना है तो हमें अपना घर कुर्बान करना चाहिए। कोई न कोई मकान ध्वस्त होकर मिट्टी में न मिलेगा, तब तक नए मकान का नवनिर्माण कैसे होगा... ”. कल्पना करो कि हमने अपने ही हाथों अपने घर के चूल्हे फोड़ दिए हैं, अपने घर में आग लगा दी है. परन्तु आज का यही धुआँ कल भारत के प्रत्येक घर से स्वर्ण का धुआँ बनकर निकलेगा.... यमुनाबाई, बुरा न मानें, मैंने तुम्हें एक ही जन्म में इतना कष्ट दिया है कि “यही पति मुझे जन्म-जन्मांतर तक मिले” ऐसा कैसे कह सकती हो...” यदि अगला जन्म मिला, तो हमारी भेंट होगी... अन्यथा यहीं से विदा लेता हूँ... (उन दिनों यही माना जाता था, कि जिसे कालापानी की भयंकर सजा मिली वह वहाँ से जीवित वापस नहीं आएगा)।

अब सोचिये, इस भीषण परिस्थिति में मात्र 25-26 वर्ष की उस युवा स्त्री ने अपने पति यानी वीर सावरकर से क्या कहा होगा? यमुनाबाई (अर्थात भाऊराव चिपलूनकर की पुत्री) धीरे से नीचे बैठीं, और जाली में से अपने हाथ अंदर करके उन्होंने सावरकर के पैरों को स्पर्श किया। उन चरणों की धूल अपने मस्तक पर लगाई। सावरकर भी चौंक गए, अंदर से हिल गए... उन्होंने पूछा... ये क्या करती हो? अमर क्रांतिकारी की पत्नी ने कहा... “मैं यह चरण अपनी आँखों में बसा लेना चाहती हूँ, ताकि अगले जन्म में कहीं मुझसे चूक न हो जाए। अपने परिवार का पोषण और चिंता करने वाले मैंने बहुत देखे हैं, लेकिन समूचे भारतवर्ष को अपना परिवार मानने वाला व्यक्ति मेरा पति है... इसमें बुरा मानने वाली बात ही क्या है। यदि आप सत्यवान हैं, तो मैं सावित्री हूँ। मेरी तपस्या में इतना बल है, कि मैं यमराज से आपको वापस छीन लाऊँगी। आप चिंता न करें... अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें... हम इसी स्थान पर आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं...”।

क्या जबरदस्त ताकत है... उस युवावस्था में पति को कालापानी की सजा पर ले जाते समय, कितना हिम्मत भरा वार्तालाप है... सचमुच, क्रान्ति की भावना कुछ स्वर्ग से तय होती है, कुछ संस्कारों से..यह हर किसी को नहीं मिलती।

साभार



#बिहारराजनीति

25/10/2025

यह जो आदमी नीचे फोटो में देख रहे हो वो आपको गरीब भिखारी या बेघर लग रहा होगा लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है, ये गरीब, भिखारी या बेघर नहीं है, यह आदमी है: विश्व साहित्य का महाकाय "लियो टॉल्स्टॉय"।

टॉल्स्टॉय एक कुलीन रूसी थे जिनके पास एक बड़ी जागीर और बहुत बड़ी दौलत थी।
टॉल्स्टॉय ने अपनी सारी संपत्ति गरीबों और बेघरों को दे दी।

उन्होंने एक तपस्वी जीवन जिया।

उनके सबसे प्रसिद्ध कथनों में से हैं:

"मुझे अपने धर्म के बारे में मत बताओ, लेकिन मुझे तुम्हारे कार्यों में धर्म देखने दो।"

"तुम्हें दर्द महसूस होता है, तो तुम जीवित हो। लेकिन अगर तुम्हें दूसरों का दर्द महसूस होता है, तो तुम इंसान हो।"

#रूस — in India.

23/10/2025

भोजपुरी सिनेमा की शक्ल बिगाड़ दी गई

और तो और भाजपा इन C Type सबको टिकट देकर भारतीय संसद भवन को अपवित्र कर के रखा हुआ है।।
इतना सत्य है कि ये सब अपने दम पर चुनाव जीत कर के तो नहीं गए।
सिर्फ मोदी के नाम पर जीता है।
खैर इस सबसे देश का और देश की जनता को कोई भला हुआ तो बताना।।

#भोजपुरी


23/10/2025

ये पीला लिफाफा का कीमत ढाई से तीन करोड़ रुपया है. राजनीती की दुकान चलाना है. कीमत तो वसूलेंगे ना... वैसे ये शिक्षकों की बहाली में भी ऐसे ही खूब कमाये हैँ कुछ दिन के मंत्री बनने के समयकाल में ही....

एक शुभचिंतक ने मुझे कहा कि आप इस बार राजद पर भरोसा करके तो देखिये. वो जातिवाद की वजह से राजद पर बिलीव कर सकते हैँ. लेकिन जिन्होने लालू का जंगलराज देखा हुआ है, वो शायद इस जन्म में शायद ही राजद पर बिलीव कर सकेगा... आपको बताता चलूँगा कि मुझे राजद से भी दिल्ली प्रदेश प्रवक्ता का ऑफर आया था, जिसे मैंने ठुकराया क्यूंकि ये सिर्फ लूट खसोट के विजन से बनी पार्टी है. इनका समाज राष्ट्र और विकास से कोई तालमेल नहीं है

22/10/2025

भारतीय राजनीति का इससे बड़ा कोई जुमला नहीं हो सकता जो जुमला राजद के अध्यक्ष तेजस्वी यादव ने फेंका है। हर परिवार से एक सरकारी नौकरी का इतना बड़ा दावा करने से पहले कम से कम आंकड़े तो देख लेते! इतना बड़ा झूठ… इतना बड़ा फरेब… जनता की भावनाओं से खुलेआम खेलने का जैसे ठेका ही ले लिया गया हो। चुनाव आते ही कुछ नेता जनता को सपने दिखाने में इतने माहिर हो जाते हैं कि सच की ज़मीन पर खड़ा होकर कोई सवाल पूछ ही नहीं पाता। लेकिन आज हम वही करेंगे — इस “वादे” को आंकड़ों और तथ्यों के आईने में रखकर इसकी असलियत दिखाएंगे।

तेजस्वी यादव का वादा है कि अगर बिहार में उनकी सरकार बनी तो हर परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाएगी। बिहार में इस समय कुल आबादी है 13 करोड़ 43 लाख और परिवारों की संख्या है लगभग 2 करोड़ 97 लाख। यानी तेजस्वी यादव के वादे के हिसाब से उन्हें करीब 3 करोड़ सरकारी नौकरियां देनी होंगी। अब ज़रा हकीकत देखिए — फिलहाल बिहार में सरकारी नौकरियों में कार्यरत लोगों की संख्या सिर्फ 20 लाख के आसपास है। यानी जो वादा किया जा रहा है, उसके लिए वर्तमान से 14 गुना ज़्यादा नौकरियां पैदा करनी होंगी। क्या यह संभव है? बिल्कुल नहीं। यह तो वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति ₹100 जेब में लेकर 1000 लोगों को खाना खिलाने का वादा करे।

अब इस पर आर्थिक गणित समझ लीजिए। अगर तेजस्वी यादव की योजना को लागू किया जाए तो 2 करोड़ 76 लाख नई नौकरियों पर कम से कम 10,000 रूपये महीना वेतन भी दिया जाये यह सरकारी नौकरी की सबसे न्यूनतम कल्पना है, जबकि वास्तविक वेतन इससे बहुत ज्यादा होता है। लेकिन सिर्फ ₹10,000 मानकर भी सालाना खर्च आएगा ₹31,000 करोड़। और यह तब जब बिहार सरकार का कुल वार्षिक बजट ही मात्र ₹16,000 करोड़। यानी जितना पैसा बिहार के पास है, उससे दोगुना सिर्फ इन वादों को निभाने में उड़ जाएगा। न स्कूलों के लिए पैसा बचेगा, न अस्पतालों के लिए, न सड़क, न योजनाओं के लिए — सिर्फ सैलरी देने में ही सरकार का पूरा तंत्र ठप पड़ जाएगा। और फिर भी सैलरी पूरी नहीं होगी
इसका मतलब साफ है — यह वादा नीतिगत रूप से अव्यवहारिक है, आर्थिक रूप से असंभव है और जनता के साथ राजनीतिक छल ही नहीं बहुत बड़ा मजाक है। जनता के वोट को सरकारी नौकरी की मिठी गोली में लपेटकर निगलवाने की कोशिश है।

और यह बात किसी ईमानदार परिवार ने नहीं कही है। यह वही राजनीतिक परिवार कह रहा है जो खुद “Land for Jobs” यानी ज़मीन के बदले नौकरी देने के घोटाले में आरोपी है। तेजस्वी यादव, उनके माता-पिता राबड़ी देवी और लालू यादव, उनकी बहन मीसा भारती — सभी इस मामले में आरोपी हैं। पहले सौदा था जमीन के बदले नौकरी का, अब सौदा है वोट के बदले नौकरी का। पहले कहा गया — जमीन दो, नौकरी लो… और अब कहा जा रहा है — वोट दो, नौकरी लो। जनता की मेहनत, योग्यता और भविष्य को ठेके पर बेचने की यह नई बोली है।

अगर इस मॉडल को बाकी राज्यों ने भी अपनाना शुरू कर दिया तो सोचना चाहिए कि देश में क्या होगा। भारत में लगभग 30 करोड़ परिवार हैं। अगर हर राज्य यह कहने लगे कि हर परिवार को एक सरकारी नौकरी देंगे, तो 30 करोड़ नौकरियों की ज़रूरत पड़ेगी। केंद्र सरकार में अभी सिर्फ 47 लाख लोग नौकरी में हैं। इतनी बड़ी संख्या को सरकारी व्यवस्था में समेटना आर्थिक आत्महत्या होगी। इतना ही नहीं, हर परिवार में योग्य लोग नहीं होंगे, फिर भी नौकरी बांटी जाएगी। ऐसे में देश का प्रशासन ठप पड़ेगा, योग्यता और मेहनत पर पानी फिर जाएगा, और यह राष्ट्र की कार्यक्षमता पर सीधा प्रहार होगा।

बिहार जैसे राज्य में, जहां युवा पीढ़ी कड़ी मेहनत करके प्रतियोगी परीक्षाएं पास कर देशभर में नाम कमा रही है, वहां ऐसा वादा योग्यता पर एक सीधा तमाचा है। यह मेहनती युवाओं के हक को कुचलने की तैयारी है। जो बच्चे दिन-रात पढ़ाई कर रहे हैं, जो अपनी मेहनत और ज्ञान से नौकरी पाना चाहते हैं, उनके लिए यह संदेश है कि अब योग्यता नहीं, वोट सबसे बड़ा “मेरिट” होगा।

भारत में कोई ऐसा कानून नहीं है जो चुनावी वादों पर नेताओं को जवाबदेह ठहराए। एक प्राइवेट कंपनी अगर झूठा विज्ञापन देती है तो उस पर जुर्माना होता है, ग्राहक शिकायत करते हैं, लेकिन नेता अगर करोड़ों लोगों को झूठ बोल दें, तो भी कोई सज़ा नहीं। यही कारण है कि चुनाव में दो फार्मूले चल रहे हैं — जाति के नाम पर वोट बैंक बनाओ और मुफ्त की योजनाओं के नाम पर वोट बटोरो। यही फार्मूला आज तेजस्वी यादव ने अपनाया है।

जनता को अब समझना होगा। भावनाओं में बहकर वोट देना बंद करना होगा। हर वादे पर सवाल करना होगा — पैसा कहां से आएगा? योजना कैसे लागू होगी? पिछले वादे पूरे हुए या नहीं? जब जनता तर्क के साथ जवाब मांगेगी तो नेता भी जवाबदेह बनेंगे।

तेजस्वी यादव का “हर परिवार को सरकारी नौकरी” वाला वादा सिर्फ एक जुमला नहीं, यह भारतीय लोकतंत्र के साथ एक मज़ाक है। यह बिहार की मेहनती जनता के साथ धोखा है और देश की आर्थिक वास्तविकता पर एक ज़ोरदार तमाचा। अब वक्त है इस झूठ को पहचानने का, सवाल करने का और राष्ट्रहित में सोचने का।














19/10/2025

#गैलीलियो ने कहा था कि न कोई सूर्यास्त होता है, न कोई सूर्योदय। धारणा यह थी कि सूरज चक्कर लगाता है पृथ्वी के। और गैलीलियो ने कहा कि पृथ्वी चक्कर लगाती है सूरज के। बात ही बदल दी। सारी दुनिया मानती थी एक बात और गैलीलियो ने लिखी दूसरी ही बात।
महा निंदा हुई। कैथलिक पोप ने उसे रोम बुलाया और कहा, तुम माफी मांग लो। वह बूढ़ा हो चुका था--पचहत्तर साल का हो चुका था। बीमार था, बिस्तर से उसे घसीट कर लाया गया और कहा कि तुम क्षमा मांग लो, अन्यथा मरने के लिए तैयार हो जाओ।
गैलीलियो बड़ा समझदार आदमी रहा होगा। बहुत कम लोगों ने उसकी समझदारी की प्रशंसा की है। लोग समझते हैं वह कायर था, क्योंकि उसने क्षमा मांग ली। मैं ऐसा नहीं समझता, क्योंकि क्षमा उसने इस ढंग से मांगी कि वह कायरता नहीं बताती। वह उस आदमी की समझदारी बताती है। और वह उस आदमी की इतनी गहरी समझदारी बताती है कि पोप और उनका पूरा का पूरा मंडल जो निर्णायक बना बैठा था, उसकी मूर्खता सिद्ध होती है। गैलीलियो ने कहा कि आप कहें तो अभी क्षमा मांग लूं। मुझे क्या अड़चन है! अरे, मुझे लेना-देना क्या! मैं लिख दूंगा अपनी किताब में कि पृथ्वी चक्कर नहीं लगाती, सूरज ही चक्कर लगाता है।
पोप प्रसन्न हुआ, उसका मंडल प्रसन्न हुआ। गैलीलियो ने खड़े होकर कहा, लेकिन एक बात खयाल रहे, मेरे लिखने से कुछ भी न होगा। चक्कर तो पृथ्वी ही लगाती है। मैं लिख दूंगा, मुझे लिखने में कोई अड़चन नहीं। मैं क्यों झंझट में पडूं, मुझे क्या लेना-देना, पृथ्वी लगाए चक्कर कि सूरज लगाए चक्कर। मगर इतना मैं कहे देता हूं, मेरे लिखने से कुछ बदलाहट होगी नहीं, बात कुछ बनेगी नहीं। लाख मेरे जैसे गैलीलियो लिखते रहें कि सूरज चक्कर लगाता है, सूरज सुनेगा नहीं। और तुम सूरज को सजा भी नहीं दे सकते। तुम उसे अदालत में भी नहीं ला सकते। मैं तो घुटने टेक कर क्षमा मांगता हूं कि मुझे माफ कर दो। न मालूम किस पागलपन में मैंने यह बात लिख दी। सच्ची बातें कहनी ही नहीं चाहिए। सच्ची बातें कहने का परिणाम बुरा होता है, यह तो मैंने सुना था, आज देख भी लिया। मैं माफी मांगता हूं और मैं लिखता हूं कि सूरज चक्कर लगाता है। मगर फिर भी जाते-जाते मैं कह जाता हूं, ध्यान रखना, मेरी सूरज मानता नहीं, पृथ्वी मेरी मानती नहीं। चक्कर तो पृथ्वी ही लगाती है और लगाती रहेगी।
यह आदमी अदभुत सूझ-बूझ का आदमी रहा होगा। इसने क्या व्यंग्य किया, गहरा व्यंग्य किया! माफी भी मांग ली और उन बुद्धुओं को बुद्धू भी साबित कर दिया। लेकिन आज हम जानते हैं कि गैलीलियो सही था।
यह सनातन कथा है कि बहुत बार कांच कंचन होने का दावा करता है। और भीड़ को जंचती है यह बात, क्योंकि कांच सस्ता मिल जाता है, बिना कीमत चुकाए मिल जाता है।
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