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अपना_GURUKuL
In page.. हम इस पेज में आपको संसारी ज्ञान की बातें बताएंगे जो आपके हर पहलू में काम आएगा..!!
09/01/2024
_"भागवत गीता यथारूप"_
*अध्याय 1: कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षण*
*श्लोक 32-35 :*
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा |
येषामर्थे काड्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च || ३२ ||
त इमेSवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च |
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः || ३३ ||
मातुलाः श्र्वश्रुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा |
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोSपि मधुसूदन || ३४ ||
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते |
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीति स्याज्जनार्दन || ३५ ||
*भावार्थ :*
_*हे गोविन्द! हमें राज्य, सुख अथवा इस जीवन से क्या लाभ! क्योंकि जिन सारे लोगों के लिए हम उन्हें चाहते हैं वे ही इस युद्धभूमि में खड़े हैं | हे मधुसूदन! जब गुरुजन, पितृगण, पुत्रगण, पितामह, मामा, ससुर, पौत्रगण, साले तथा अन्य सारे सम्बन्धी अपना धन एवं प्राण देने के लिए तत्पर हैं और मेरे समक्ष खड़े हैं तो फिर मैं इन सबको क्यों मारना चाहूँगा, भले ही वे मुझे क्यों न मार डालें? हे जीवों के पालक! मैं इन सबों से लड़ने को तैयार नहीं, भले ही बदले में मुझे तीनों लोक क्यों न मिलते हों, इस पृथ्वी की तो बात ही छोड़ दें | भला धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें कौन सी प्रसन्नता मिलेगी?*_
*तात्पर्य :*
अर्जुन ने भगवान् कृष्ण को गोविन्द कहकर सम्बोधित किया क्योंकि वे गौवों तथा इन्द्रियों कि समस्त प्रसन्नता के विषय हैं | इस विशिष्ट शब्द का प्रयोग करके अर्जुन संकेत करता है कि कृष्ण यह समझें कि अर्जुन की इन्द्रियाँ कैसे तृप्त होंगी | किन्तु गोविन्द हमारी इन्द्रियों को तुष्ट करने के लिए नहीं हैं | हाँ, यदि हम गोविन्द कि इन्द्रियों को तुष्ट करने का प्रयास करते हैं तो हमारी इन्द्रियाँ स्वतः तुष्ट होती हैं | भौतिक दृष्टि से, प्रत्येक व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को तुष्ट करना चाहता है और चाहता है कि ईश्र्वर उसके आज्ञापालक की तरह काम करें | किन्तु ईश्र्वर उनकी तृप्ति वहीँ तक करते हैं जितनी के वे पात्र होते हैं – उस हद तक नहीं जितना वे चाहते हैं | किन्तु जब कोई इसके विपरीत मार्ग ग्रहण करता है अर्थात् जब वह अपनी इन्द्रियों कि तृप्ति कि चिन्ता न करके गोविन्द कि इन्द्रियों की तुष्टि करने का प्रयास करता है तो गोविन्द की कृपा से जीव की सारी इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं | यहाँ पर जाति तथा कुटुम्बियों के प्रति अर्जुन का प्रगाढ़ स्नेह आंशिक रूप से इन सबके प्रति उसकी स्वभाविक करुणा के कारण है | अतः वह युद्ध करने के लिए तैयार नहीं है | हर व्यक्ति अपने वैभव का प्रदर्शन अपने मित्रों तथा परिजनों के समक्ष करना चाहता है किन्तु अर्जुन को भय है कि उसके सारे मित्र तथा परिजन युद्धभूमि में मारे जायेंगे और वह विजय के पश्चात् उनके साथ अपने वैभव का उपयोग नहीं कर सकेगा | भौतिक जीवन का यह सामान्य लेखाजोखा है | किन्तु आध्यात्मिक जीवन इससे सर्वथा भिन्न होता है | चूँकि भक्त भगवान् कि इच्छाओं की पूर्ति करना चाहता है अतः भगवद्-इच्छा होने पर वह भगवान् की सेवा के लिए सारे एश्र्वर्य स्वीकार कर सकता है किन्तु यदि भगवद्-इच्छा न हो तो वह एक पैसा भी ग्रहण नहीं करता | अर्जुन अपने सम्बन्धियों को मारना नहीं चाह रहा था और यदि उनको मारने की आवश्यकता हो तो अर्जुन की इच्छा थी कि कृष्ण स्वयं उनका वध करें | इस समय उसे पता नहीं है कि कृष्ण उन सबों को युद्धभूमि में आने के पूर्व ही मार चुके हैं और अब उसे निमित्त मात्र बनना है | इसका उद्घाटन अगले अध्यायों में होगा | भगवान् का असली भक्त होने के कारण अर्जुन अपने अत्याचारी बन्धु-बान्धवों से प्रतिशोध नहीं लेना चाहता था किन्तु यह तो भगवान् की योजना थी कि सबका वध हो | भगवद्भक्त दुष्टों से प्रतिशोध नहीं लेना चाहते किन्तु भगवान् दुष्टों द्वारा भक्त के उत्पीड़न को सहन नहीं कर पाते | भगवान् किसी व्यक्ति को अपनी इच्छा से क्षमा कर सकते हैं किन्तु यदि कोई उनके भक्तों को हानि पहुँचाता है तो वे क्षमा नहीं करते | इसीलिए भगवान् इन दुराचारियों का वध करने के लिए उद्यत थे यद्यपि उन्हें क्षमा करना चाहता था |
🪈🪈 RADHE RADHE🪈🪈
08/01/2024
_"भागवत गीता यथारूप"_
*अध्याय 1: कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षण*
*श्लोक 31 :*
न च श्रेयोSनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे |
न काड्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च || ३१ ||
*भावार्थ :*
_*हे कृष्ण! इस युद्ध में अपने ही स्वजनों का वध करने से न तो मुझे कोई अच्छाई दिखती है और न, मैं उससे किसी प्रकार कि विजय, राज्य या सुख की इच्छा रखता हूँ |*_
*तात्पर्य :*
यह जाने बिना कि मनुष्य का स्वार्थ विष्णु (या कृष्ण) में है सारे बद्धजीव शारीरिक सम्बन्धों के प्रति यह सोच कर आकर्षित होने हैं कि वे ऐसी परिस्थितियों में प्रसन्न रहेंगे | ऐसी देहात्मबुद्धि के कारण वे भौतिक सुख के कारणों को भी भूल जाते हैं | अर्जुन तो क्षत्रिय का नैतिक धर्म भी भूल गया था | कहा जाता है कि दो प्रकार के मनुष्य परम शक्तिशाली तथा जाज्वल्यमान सूर्यमण्डल में प्रवेश करने के योग्य होते हैं | ये हैं – एक तो क्षत्रिय जो कृष्ण की आज्ञा से युद्ध में मरता है तथा दूसरा संन्यासी जो आध्यात्मिक अनुशीलन में लगा रहता है | अर्जुन अपने शत्रुओं को भी मारने से विमुख हो रहा है – अपने सम्बन्धियों कि बात तो छोड़ दें | वह सोचता है कि स्वजनों को मारने से उसे जीवन में सुख नहीं मिल सकेगा , अतः वह लड़ने के लिए इच्छुक नहीं है, जिस प्रकार कि भूख न लगने पर कोई भोजन बनाने को तैयार नहीं होता | उसने तो वन जाने का निश्चय कर लिया है जहाँ वह एकांत में निराशापूर्ण जीवन काट सके | किन्तु क्षत्रिय होने के नाते उसे अपने जीवननिर्वाह के लिए राज्य चाहिए क्योंकि क्षत्रिय कोई अन्य कार्य नहीं कर सकता | किन्तु अर्जुन के पास राज्य कहाँ है? उसके लिए तो राज्य प्राप्त करने का एकमात्र अवसर है कि अपने बन्धु-बान्धवों से लड़कर अपने पिता के राज्य का उत्तराधिकार प्राप्त करे जिसे वह करना नहीं चाह रहा है | इसीलिए वह अपने को जंगल में एकान्तवास करके निराशा का एकांत जीवन बिताने के योग्य समझता है |
🙏JAI_SHREE_RADHE🙏
30/12/2023
हम सभी हिन्दुओ का 2023 का ऐ दुसरा कामयाबी...
🚩🚩जय_श्री_राम 🚩🚩
29/12/2023
_"श्रीमद् भागवतम"_
*स्कन्ध 11 : सामान्य इतिहास*
*अध्याय 7 : भगवान कृष्ण उद्धव को निर्देश देते हैं*
*श्लोक : 4*
यर्ह्येवायं मया त्यक्तो लोकोऽयं नष्टमङ्गल: ।
भविष्यत्यचिरात्साधो कलिनापि निराकृत: ॥ ४ ॥
*अनुवाद :*
_*हे साधु उद्धव, निकट भविष्य में मैं इस पृथ्वी को त्याग दूंगा। तब, कलियुग से अभिभूत होकर, पृथ्वी सभी धर्मपरायणता से रहित हो जाएगी।*_
*तात्पर्य :*
भगवान कृष्ण की योजना थोड़े विलंब के बाद उद्धव को अपने शाश्वत निवास में वापस लाने की थी। उद्धव के असाधारण आध्यात्मिक गुणों के कारण, भगवान उन्हें अन्य संत व्यक्तियों के बीच अपने संदेश का प्रचार करने में संलग्न करना चाहते थे जो अभी तक शुद्ध भक्ति सेवा के स्तर तक उन्नत नहीं हुए थे। हालाँकि, भगवान ने उद्धव को आश्वासन दिया कि वह एक क्षण के लिए भी भगवान के सानिध्य से वंचित नहीं रहेंगे। इसके अलावा, क्योंकि उद्धव अपनी इंद्रियों के पूर्ण स्वामी बन गए थे, वे कभी भी भौतिक प्रकृति के तीन गुणों से पीड़ित नहीं होंगे। इस प्रकार, उद्धव को भगवान के पास वापस लाने से पहले, भगवान ने उन्हें एक विशिष्ट गोपनीय मिशन को पूरा करने का अधिकार दिया।
जहां भी भगवान के व्यक्तित्व की सर्वोच्च स्थिति को मान्यता नहीं दी जाती है, वहां बेकार मानसिक अटकलें बहुत प्रमुख हो जाती हैं, और सही वैदिक ज्ञान सुनने का सुरक्षित और निश्चित मार्ग मानसिक मनगढ़ंत स्थिति से ढक जाता है। वर्तमान समय में, विशेषकर पश्चिमी देशों में, वस्तुतः सैकड़ों और हजारों विषयों पर लाखों पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं; फिर भी मानसिक भ्रम के इस प्रसार के बावजूद लोग मानव जीवन के सबसे बुनियादी मुद्दों, अर्थात्, मैं कौन हूं, के बारे में पूरी तरह से अज्ञान में हैं। मैं कहाँ से आया हूँ? मेँ कहाँ जा रहा हूँ? मेरी आत्मा क्या है? ईश्वर क्या है?
भगवान श्रीकृष्ण असंख्य मनमोहक लीलाओं के भंडार हैं, और इस प्रकार वे असंख्य प्रकार के आनंद के स्रोत हैं। वस्तुतः वह अनन्त सुख का सागर है। जब शाश्वत आत्मा भगवान की प्रेमपूर्ण सेवा से मिलने वाले संवैधानिक आनंद से वंचित हो जाती है, तो वह भौतिक प्रकृति से अभिभूत और भ्रमित हो जाता है। वह असहाय होकर भौतिक इंद्रियतृप्ति का पीछा करता है, यह सोचता है कि एक भौतिक वस्तु अच्छी है और दूसरी बुरी, और क्या अच्छा है और क्या बुरा है, इसके बारे में अपना आकलन लगातार बदलता रहता है। इस प्रकार उसे कोई शांति या खुशी नहीं मिलती, वह लगातार चिंता में रहता है और जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और बीमारी के रूप में प्रकृति के क्रूर नियमों द्वारा बार-बार पीटा जाता है।
इस प्रकार बद्ध आत्मा कलियुग में जन्म लेने के लिए उपयुक्त उम्मीदवार बन जाती है, जो दुर्भाग्य का प्रतीक है। कलियुग में जीव, जो पहले से ही इतने सारे कष्ट झेल रहे हैं, निर्दयता से एक-दूसरे के खिलाफ हो जाते हैं। कलियुग में मानव समाज अत्यधिक हिंसक हो गया है, और लोग करोड़ों निर्दोष प्राणियों को काटने के लिए बूचड़खाने खोलते हैं। बड़े पैमाने पर युद्धों की घोषणा की जाती है, और लाखों मनुष्य, यहाँ तक कि महिलाएँ और बच्चे भी तुरंत नष्ट हो जाते हैं।
जब तक जीव भगवान के व्यक्तित्व की सत्ता को नहीं पहचानता, वह माया या भौतिक भ्रम के चंगुल में एक असहाय शिकार बना रहता है। वह खुद को माया से मुक्त करने के लिए विभिन्न समाधान बनाता है , लेकिन ये समाधान स्वयं माया की रचनाएं हैं और इस प्रकार संभवतः बद्ध आत्मा को मुक्त नहीं कर सकते हैं। वास्तव में, वे केवल उसके संकट को बढ़ाते हैं। अगले श्लोक में, भगवान कृष्ण विशेष रूप से उद्धव को कलियुग से बचने और घर वापस जाने, भगवान के पास वापस जाने की चेतावनी देते हैं। हममें से जो पहले ही कलियुग में जन्म ले चुके हैं, उन्हें भी इस सलाह पर ध्यान देना चाहिए और पूर्ण ज्ञान के आनंदमय जीवन के लिए भगवान के शाश्वत निवास पर वापस जाने के लिए तुरंत सभी आवश्यक कदम उठाने चाहिए। भौतिक संसार कभी भी सुखी स्थान नहीं है, विशेषकर कलियुग के भयावह दिनों में।
28/12/2023
_"भागवत गीता यथारूप"_
*अध्याय 1: कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षण*
*श्लोक 21-22 :*
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थाप्य मेSच्युत |
यावदेतान्निरिक्षेSहं योद्धुकामानवस्थितान् || २१ ||
कैर्मया सह योद्ध व्यमस्मिन्रणसमुद्यमे || २२ ||
*भावार्थ :*
_*अर्जुन ने कहा - हे अच्युत! कृपा करके मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में ले चलें जिससे मैं यहाँ युद्ध की अभिलाषा रखने वालों को और शस्त्रों कि इस महान परीक्षा में, जिनसे मुझे संघर्ष करना है, उन्हें देख सकूँ |*_
*तात्पर्य :*
यद्यपि श्रीकृष्ण साक्षात् श्रीभगवान् हैं, किन्तु वे अहेतुकी कृपावश अपने मित्र कि सेवा में लगे हुए थे | वे अपने भक्तों पर स्नेह दिखाने में कभी नहीं चूकते इसीलिए अर्जुन ने उन्हें अच्युत कहा है | सारथी रूप में उन्हें अर्जुन की आज्ञा का पालन करना था और उन्होंने इसमें कोई संकोच नहीं किया, अतः उन्हें अच्युत कह कर सम्बोधित किया गया है | यद्यपि उन्होंने अपने भक्त का सारथी-पद स्वीकार किया था, किन्तु इससे उनकी परम स्थिति अक्षुण्ण बनी रही | प्रत्येक परिस्थिति में वे इन्द्रियों के स्वामी श्रीभगवान् हृषीकेश हैं | भगवान् तथा उनके सेवक का सम्बन्ध अत्यन्त मधुर एवं दिव्य होता है | सेवक स्वामी की सेवा करने के लिए सदैव उद्यत रहता है और भगवान् भी भक्त कि कुछ न कुछ सेवा करने के लिए सदैव उद्यत रहता है और भगवान् भी भक्त कि कुछ न कुछ सेवा करने कि कोशिश में रहते हैं | वे इसमें विशेष आनन्द का अनुभव करते हैं कि वे स्वयं आज्ञादाता न बनें अपितु उनके शुद्ध उन्हें आज्ञा दें | चूँकि वे स्वामी हैं, अतः सभी लोग उनके आज्ञापालक हैं और उनके ऊपर उनको आज्ञा देने वाला कोई नहीं है | किन्तु जब वे देखते हैं की उनका शुद्ध भक्त आज्ञा दे रहा है तो उन्हें दिव्य आनन्द मिलता है यद्यपि वे समस्त परिस्थितियों में अच्युत रहने वाले हैं |
भगवान् का शुद्ध भक्त होने के कारण अर्जुन को अपने बन्धु-बान्धवों से युद्ध करने कि तनिक भी इच्छा न थी, किन्तु दुर्योधन द्वारा शान्तिपूर्ण समझौता न करके हठधर्मिता पर उतारू होने के कारण उसे युद्धभूमि में आना पड़ा | अतः वह यह जानने के लिए अत्यन्त उत्सुक था कि युद्धभूमि में कौन-कौन से अग्रणी व्यक्ति उपस्थित हैं | यद्यपि युद्धभूमि में शान्ति-प्रयासों का कोई प्रश्न नहीं उठता तो भी वह उन्हें फिर से देखना चाह रहा था और यह देखना चाह रहा था कि वे इस अवांछित युद्ध पर किस हद तक तुले हुए हैं |
27/12/2023
जय_श्री_राम 🚩🚩
26/12/2023
ाँ_अम्बिके...
🙏....रात्रि आरती से पुर्व तस्वीर.....🙏
26/12/2023
ाँ_अम्बिके ...
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