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सबसे ख़तरनाक होता है,मुर्दा शांति से भर जाना,ना होना तड़प का, सब कुछ सहन कर जाना।सबसे ख़तरनाक होता है,तुम्हारे भीतर उठते हर...
24/07/2026

सबसे ख़तरनाक होता है,
मुर्दा शांति से भर जाना,
ना होना तड़प का, सब कुछ सहन कर जाना।

सबसे ख़तरनाक होता है,
तुम्हारे भीतर उठते हर सवाल का मर जाना।

सबसे ख़तरनाक होता है,
अपनी आँखों के सामने अपने सपनों को नीलाम होते देखना,
और ख़ून का पानी हो जाना।
अन्याय को ही अपनी नियति मानकर,
एक ठंडी मशीन की तरह, चुपचाप घर लौट आना।

सबसे ख़तरनाक होता है,
'गांधी' के सत्याग्रह को महज़ इतिहास की किताब में छोड़ देना,
और 'भगत सिंह' को सिर्फ एक तस्वीर मान लेना।
'आज़ाद' की गोलियों की गूंज का तुम्हारे कानों तक न पहुंचना,
और 'अशफ़ाक़' की शहादत का, तुम्हारे ज़मीर को न झकझोरना।
बिकती हुई डिग्रियां और छिनते हुए रोज़गार से,
बुरा है तुम्हारा वो सन्नाटा, जो सब कुछ मान लेता है।

सबसे ख़तरनाक होता है, विरोध की आग का बुझ जाना.

सबसे ख़तरनाक होता है, एक ज़िंदा नौजवान का...
सिर्फ एक मूक दर्शक बन जाना।
सबसे ख़तरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना।

17/07/2026

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06/07/2026
01/07/2026







30/06/2026

क्या एक लोकतांत्रिक देश में 'एनकाउंटर' न्याय का विकल्प हो सकता है?

हाल ही में बिहार में भरत तिवारी के पुलिस एनकाउंटर की घटना ने पूरे प्रदेश में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। विडंबना यह है कि इस बेहद गंभीर और संवैधानिक मुद्दे पर भी समाज दो खेमों में बंट गया है।
अगर आप सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं को ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि इस एनकाउंटर का समर्थन या विरोध कानूनी तर्कों के बजाय 'जाति' और 'राजनीतिक विचारधारा' के आधार पर हो रहा है। जो लोग सरकार के समर्थक हैं, वे इसे न्याय बताकर तालियां पीट रहे हैं और जो विरोधी हैं, वे इसका विरोध कर रहे हैं। लेकिन इस राजनीतिक और जातीय शोरगुल के बीच सबसे महत्वपूर्ण और मूल सवाल कहीं खो गया है।

सवाल यह है: क्या एक लोकतांत्रिक राज्य में, जहाँ 'कानून का शासन' (Rule of Law) स्थापित है, वहाँ पुलिस या राज्य की किसी मशीनरी द्वारा ऐसी कार्रवाई की जानी चाहिए? क्या पुलिस को एनकाउंटर का यह अघोषित अधिकार होना चाहिए?

अगर हम संविधान और व्यवस्था की बुनियादी समझ रखते हैं, तो इसका उत्तर है- बिल्कुल नहीं।
हमें यह समझना होगा कि व्यवस्था में अलग-अलग संस्थाओं की भूमिका क्या है:

पुलिस का कार्य: अपराध को रोकना, अपराधी को पकड़ना, सबूत इकट्ठा करना और उसे अदालत के सामने पेश करना।

न्यायपालिका का कार्य: साक्ष्यों की जांच करना और अपराध साबित होने पर अपराधी को दंडित करना।

यानि सजा देना पुलिस का कार्यक्षेत्र नहीं है। जब पुलिस खुद ही जज और जल्लाद की भूमिका निभाने लगे, तो वास्तव में यह कानून के शासन की विफलता का प्रतीक है।

कई बार यह भी देखने में आता है कि किसी बड़ी घटना के बाद आम जनता भी भावनाओं और अति-उत्साह में आकर 'तुरंत न्याय' (Instant Justice) के नाम पर एनकाउंटर की मांग करने लगती है। लेकिन हमें यह सोचना होगा कि यह मांग कितनी खतरनाक है। हर चीज़ की एक निर्धारित प्रक्रिया होती है।
अगर हम आज न्यायपालिका जैसी संस्थाओं को दरकिनार करके राज्य (State) या पुलिस को यह 'शॉर्टकट' अधिकार दे देते हैं, तो भविष्य में इसके बहुत भयंकर नुकसान होंगे। इतिहास गवाह है कि जब भी राज्य की मशीनरी के पास ऐसी असीमित और बेलगाम शक्ति आती है, तो उसका दुरुपयोग जरूर होता है। आज यह व्यवस्था किसी अपराधी पर लागू हो रही है, कल इसका दुरुपयोग आम नागरिकों के अधिकारों को कुचलने या व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने के लिए भी हो सकता है।
अपराधी चाहे कोई भी हो, उसे उसके किए की कड़ी से कड़ी सजा मिलनी ही चाहिए, लेकिन एक स्थापित कानूनी प्रक्रिया के तहत। 'एनकाउंटर' को न्याय मान लेना हमारे लोकतंत्र और नागरिकों की सुरक्षा के लिए एक खतरनाक परंपरा की शुरुआत है।
कानून का शासन ही एक सभ्य समाज की और हमारे अधिकारों की सबसे बड़ी गारंटी है। इसे कमजोर होने से बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है। आपका इस विषय पर क्या सोचना है?
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