Bihar Yoga Shiksha Samiti, PATNA

Bihar Yoga Shiksha Samiti, PATNA Bihar Yoga Shiksha Samiti [BYSS] Patna

योग का मतलब है जोड़ना, खुद में ऊर्जा को समाहित करनाशरीर, मन और आत्मा को मजबूत और खूबसूरत बनाना🙏🏻 #विश्व_योग_दिवस
21/06/2024

योग का मतलब है जोड़ना, खुद में ऊर्जा को समाहित करना
शरीर, मन और आत्मा को मजबूत और खूबसूरत बनाना🙏🏻
#विश्व_योग_दिवस

 #अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2024     " करो योग रहो निरोग"
21/06/2024

#अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2024
" करो योग रहो निरोग"

21/06/2024

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की शुभकामनाएं।
"करो योग रहो निरोग"

21/08/2023
𝘄𝗼𝗿𝗹𝗱 𝘆𝗼𝗴 𝗱𝗮𝘆योग दिवस विशेष (योग और योगासन)योग एक अति प्राचीन परम्परा है, जिसकी उत्पत्ति भारत देश से मानी जाती है। योग श...
23/06/2023

𝘄𝗼𝗿𝗹𝗱 𝘆𝗼𝗴 𝗱𝗮𝘆

योग दिवस विशेष

(योग और योगासन)

योग एक अति प्राचीन परम्परा है, जिसकी उत्पत्ति भारत देश से मानी जाती है। योग शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द "युज" से हुई है। ऐसा माना जाता है कि सबसे पहले योग की शुरुआत भगवान शिव ने की थी, इसलिए भगवान शिव को "आदियोगी" भी कहा जाता है। इसके बाद भगवान शिव ने सप्तऋषि को योग का ज्ञान दिया और बाद में ऋषियों द्वारा योग का प्रचार किया गया।
योग का शाब्दिक अर्थ है– संघ या जुड़ाव (जीवात्मा तथा परमात्मा का मिलन) । जो विद्या इस गुह्य ज्ञान को प्राप्त करने का मार्ग बतलाती हे, वह योगशास्त्र कहलाती है ।
योग एक विज्ञान है जिससे हम द्वैत में एकता लाते हैं। यह योग कहीं बिकता नहीं तो उसे प्राप्त करने का साधन केवल यही है, जिसका उपदेश आनन्दकन्द यदुचन्द नन्दनन्दन श्रीकृष्णचन्द्र ने श्रीमद्भागवतम, उद्धव गीता में,स्पष्ट रूप से योग की एक सरल परिभाषा इस प्रकार प्रदान करते हैं

एतावन योग आदिष्टो
मच्छ्यैः सनकादिभि:
सर्वतो मन आक्ष्य मय्य
अधावश्यते यथा

सनक-कुमार की अध्यक्षता में मेरे भक्तों द्वारा सिखाया गया योग, बस यह है मन को अन्य सभी वस्तुओं से हटाकर, उसे सीधे और उचित रूप से मुझ (भगवान कृष्ण) में लीन करना चाहिए।
- श्रीमद भागवतम 11.13.14

साथ ही, भगवद गीता में, भगवान कृष्ण अन्यत्र इस प्रकार कहते हैं

योगिनाम अपि सर्वेषाम
मद-गतेनान्तर-आत्मना
श्रद्धावान भजते यो माम
स मे युक्त-तमो मत:

सभी योगियों में, जो महान विश्वास के साथ हमेशा मुझ में रहता है, मेरे बारे में अपने भीतर सोचता है और मुझे पारलौकिक प्रेमपूर्ण सेवा प्रदान करता है - वह योग में मेरे साथ सबसे घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है और सबसे ऊंचा है। यही मेरा मत है।
- भगवद गीता 6.47

एक अन्य श्लोक में भी कहा गया है

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः ॥
( गीता ४।३४ )

अर्थात् उस योग साधन विधि को विनयपूर्वक विविध प्रकार के प्रश्नों द्वारा उस विषय के विशेषज्ञ गुरु से उनकी सेवा करते हुए समय-समय पर पूछते रहो वे तत्वदर्शी गुरुजन तुम्हें उदारता पूर्वक ज्ञान का उपदेश करेंगे ।

योगशास्त्र की निम्न सूक्ति योग का गूढ़ महत्व बताने के लिए पर्याप्त है

प्राणापाननाद-बिन्दुजीवात्म-परमात्मनाम्
मेलनाद घटते यस्मात्तस्माद् वै घट उच्यते ॥
आमकुम्भमिवाऽम्भःस्थं जीर्यमाणं सदा घटम् ।
योगानलेन संदाह्म घटशुद्धिं समाचरेत् ॥
हठयोगेन प्रथमं जीर्यमाणमिमां तनुम् ।
द्रढयन् सूक्ष्मदेहं वै कुर्याद् योगयुजः पुनः ॥
स्थूल सूक्ष्मस्य देहो वै परिणामान्तरं यतः ।
कादिवर्णान् समभ्यस्य शास्त्रज्ञानं यथाक्रमम् ॥ यथोपलभ्यते तद्वत् स्थूलदेहस्य साधनैः ।
योगेन मनसो योगो हठयोगः प्रकीर्तितः ॥
( योगशास्त्र )

प्राण, अपान, नाद, बिन्दु जीवात्मा और परमात्मा के मेल से उत्पन्न होने के कारण स्थूल शरीर का नाम घट है। जलमध्य स्थित आम कुम्भ की तरह शरीर रूपी यह घट सदा जीर्ण ही रहा करता है । इसलिए योगरूपी अनल के द्वारा दग्ध करके इस घट की शुद्धि करनी चाहिए। जीर्णभाव युक्त स्थूल शरीर को हठयोग के द्वारा दृढ़ करके सूक्ष्म शरीर को भी योगानुकूल किया जाता है । स्थूल शरीर सूक्ष्म शरीर का ही परिणाम मात्र है । इसलिए जिस प्रकार ककारादि वर्णों के अभ्यास द्वारा क्रमशः शास्त्र ज्ञान का लाभ होता है, उसी प्रकार जिन कौशलपूर्ण क्रियाओं के द्वारा प्रथमतः स्थूल शरीर को वश में लाकर क्रमशः सूक्ष्म शरीर पर आधिपत्य स्थापन पूर्वक चित्तवृत्ति का निरोध किया जा सकता है, उन साधनों को हटयोग की संज्ञा दी गयी है।

षट्कर्मासनमुद्राः प्रत्याहारश्च प्राणसंयमः ।
ध्यानसमाधी सप्तैवाङ्गानि स्युर्हठस्य योगस्य |
( योगशास्त्र )

षट्कर्म, आसन, मुद्रा, प्रत्याहार, प्राणायाम, ध्यान तथा समाकि ये हठयोग के सात अंग हैं ।

इनके अलावा योग के 4 प्रमुख मार्ग हैं, जिनसे मिलन प्राप्त किया जा सकता है:
(1) भक्ति योग - भगवान के प्रति प्रेम और भक्ति के माध्यम से
(2) कर्म योग - दूसरों की निस्वार्थ सेवा के माध्यम से
(3) ज्ञान योग - बुद्धि और ज्ञान के माध्यम से
(4) राजयोग - बाहरी और आंतरिक शरीर के वैज्ञानिक और व्यवस्थित अध्ययन के माध्यम से।

प्रख्यात वैदिक चिकित्सक और रसायन शास्त्र के प्रगाढ़ आचार्य, योग जनक “महर्षि पतञ्जलि” ने अष्टाङ्गयोग में 'योगचित्तवृत्तिनिरोधः' ( योग० पा० १ सू० २) चित्तवृत्ति निरोध को योग का प्रथम चरण माना है, अतएव इसका निर्वचन भी प्रथम पाद में किया है और उस योग का मार्ग निर्देश करते हुए उन्होंने लिखा है 'अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोध:'
(योग० पाद १ सू० १२) यह योग आत्म-साक्षात्कार का प्रथम सोपान है। महर्षि पतञ्जलि द्वारा उपदिष्ट अष्टाङ्गयोग ग्रन्थ योग विषयक महत्वपूर्ण निर्देश है।
इन अष्टांगों के नाम ये हैं-
१. यम २. नियम ३. आसन (विविध प्रकार के योगासन ). ४. प्राणायाम, ५. प्रत्याहार, ६. धारणा, ७. ध्यान ८. समाधि ।

(1) यम : ये 'नैतिक नियम' हैं जिनका पालन एक अच्छा और शुद्ध जीवन जीने के लिए किया जाना चाहिए। यम हमारे व्यवहार और आचरण पर ध्यान केंद्रित करते हैं । वे करुणा, अखंडता और दया की हमारी वास्तविक अंतर्निहित प्रकृति को सामने लाते हैं। 5 'संयम' से मिलकर बनता है:
सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय, अपरिग्रह

(2) नियम : ये वे 'नियम' हैं जिनका हमें आन्तरिक रूप से 'शुद्ध' होने के लिए पालन करने की आवश्यकता है। 5 अनुष्ठान हैं:
शुच,संतोष, तापस, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान

(3) आसन : आसनों की 2 विशेषताएं हैं सुख और स्थिरता। योग आसनो का अभ्यास लचीलापन और शक्ति बढ़ाता है, आंतरिक अंगों को स्फूर्ति प्रदान करता है, जीवन में सुधार करता है, मन को शांत करता है और शरीर को विषमुक्त करता है, ध्यान के अंतिम केंद्र बिंदु में मन मस्तिष्क को मुक्त करने के लिए आसनों के नियमित अभ्यास के माध्यम से शरीर को सुडौल, मजबूत और रोगमुक्त बनाना आवश्यक है। ऐसा माना जाता है कि 84 लाख आसन हैं, जिनमें से लगभग 200 का उपयोग आज नियमित अभ्यास में किया जाता है।

(4) प्राणायाम : प्राण का अर्थ है जीवन ऊर्जा और ' यम ' का अर्थ है नियंत्रण, प्राण (महत्वपूर्ण ऊर्जा या जीवन शक्ति) आंतरिक रूप से सांस से जुड़ा हुआ है। प्राणायाम का उद्देश्य मन को नियंत्रित करने के लिए सांस को नियंत्रित करना है ताकि अभ्यासी मानसिक ऊर्जा की उच्च अवस्था प्राप्त कर सके। सांस को नियंत्रित करके, व्यक्ति 5 इंद्रियों पर और अंत में मन पर महारत हासिल कर सकता है।
प्राणायाम के 4 चरण हैं:
साँस लेना ( पूरक ), साँस छोड़ना ( रेचक ), आंतरिक प्रतिधारण ( अन्तर कुम्भक ) और बाह्य प्रतिधारण ( बहार कुम्भक )।

(5) प्रत्याहार : बाहरी वस्तुओं के प्रति आसक्ति से इंद्रियों का हटना। हमारी अधिकांश समस्याएं - भावनात्मक, शारीरिक, स्वास्थ्य संबंधी - हमारे अपने मन का परिणाम हैं। इच्छा पर नियंत्रण पाकर ही व्यक्ति आंतरिक शांति प्राप्त कर सकता है।

(6) धारणा : एक बिंदु पर समर्पित होकर मन को शांत करना। एकाग्रता का एक अच्छा बिंदु ओम् या ओम का प्रतीक है।

(7) ध्यान : अंतर्मन से परमात्मा में केंद्रित होना ध्यान केंद्रित करना है। देवत्व पर ध्यान देकर, इसमें मनुष्य अभ्यासी स्वयं में दैवीय शक्ति के शुद्ध गुणों को आत्मसात करने की आशा करता है।

(8) समाधि : ध्यान का परमानंद बिंदु ,यह वास्तव में योग द्वारा पूर्ण रूप से परमात्मा के साथ परम मिलन है।

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च।।सुप्रभातम 🙏
25/11/2021

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च।।

सुप्रभातम 🙏

21/06/2020



21/06/2020

करोगे अगर योग
तो नहीं होगा कोई रोग

4 years old Maithili



21/06/2020



7 year old girl is giving YOGA TIPS ... Please watch the video, it will definitely help you and your kids in this pandemic of Coronavirus disease.

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21/06/2020

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