Dr. Shivendra Kumar Kashyap

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अब जनक जी आत्मविश्वास और आत्म ज्ञान से परिपूर्ण होकर कहते हैं - “यथा प्रकाशयामी एकः देहम एनम यथा जगत। ऐतः मम जगत सर्वम्,...
13/04/2023

अब जनक जी आत्मविश्वास और आत्म ज्ञान से परिपूर्ण होकर कहते हैं - “यथा प्रकाशयामी एकः देहम एनम यथा जगत। ऐतः मम जगत सर्वम्, अथवा न च किंचन॥” जैसे मैं ईश्वर का प्रतिरूप होकर अपने अस्तित्व को प्रकाशित करता हूँ ठीक वैसे ही इस सम्पूर्ण जगत् को भी मैं ही प्रकाशित करता हूँ। अतः मेरा शरीर ही सम्पूर्ण संसार है जो मेरी चेतना से जागृत प्रतीत होता है अथवा यदि दूसरे शब्दों में कहें तो इस संपूर्ण, जागृत, चेतन शक्ति के अतिरिक्त यह कुछ भी नहीं है।

जनक जी बड़े ध्यान और आग्रहपूर्वक अष्टावक्र जी की बातें सुन रहे हैं। अब उन शब्दों के अर्थ को कोई ठीक से समझ जनक जी की तरह ...
09/04/2023

जनक जी बड़े ध्यान और आग्रहपूर्वक अष्टावक्र जी की बातें सुन रहे हैं। अब उन शब्दों के अर्थ को कोई ठीक से समझ जनक जी की तरह उन पर मनन करे तो जीवन का मार्ग बदल जाये, सारा परिणाम शिष्य की पात्रता पर निर्भर है। जनक जी कहते हैं - "सचमुच आज आन्तरिक प्रकाश जाग रहा है और यह प्रबलता से अनुभूति हो रही है कि मैं हर दोष से रहित, पूर्णतः शान्त, परम ज्ञान का जागृत स्वरुप हूँ, हर शोक, सन्देह, रोग-शोक से परे। मैं इस पञ्च तत्वों में बंधी प्रकृति से भी पूर्णतः मुक्त हूँ। मुझे यह आश्चर्य है कि इतने समय से मैं स्वयं को अज्ञान के अन्धकार में डूबा बेचारा मनुष्य समझता रहा, आखिर मैं ऐसे ठगा कैसे गया ? अहम् निरञ्जनः शान्तो बोधोहं प्रकृतेः परः। एतावन्तं अहम् कालं मोहनेव विडम्बितः।" अब जिसके भाग्य में है वो तो जागने को तत्पर हुआ पर यह संयोग भी सबके भाग्य में कहाँ !

अष्टावक्र जी कहते हैं - "एकं सर्वगतं व्योम, बहिरन्तर्यथा घटे। नित्यं निरंतर ब्रह्म, सर्वभूतगणे तथा।" जिस प्रकार भूमि पर ...
07/04/2023

अष्टावक्र जी कहते हैं - "एकं सर्वगतं व्योम, बहिरन्तर्यथा घटे। नित्यं निरंतर ब्रह्म, सर्वभूतगणे तथा।" जिस प्रकार भूमि पर रखे एक घड़े में भी वही आकाश विद्यमान होता है जो ऊपर अनन्त दूरी तक सर्वत्र फैला होता है, ठीक उसी प्रकार नित्य-निरन्तर अनन्त ब्रह्म भी समस्त घटों (शरीरों) में स्थित होता है। समस्त ब्रह्माण्ड पिण्डों में ही समाया होता है। तभी तो प्राच्य ऋषियों ने कहा - अहम् ब्रह्मास्मि। सो जनक ! कभी स्वयं को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से कम मत आँकना।"

अष्टावक्र जी आनन्द में मग्न हैं - "हे जनक ! एक बड़े रहस्य की बात समझाता हूँ जो बड़ी सहज है पर सबके समझ में शीघ्र नहीं आती।...
05/04/2023

अष्टावक्र जी आनन्द में मग्न हैं - "हे जनक ! एक बड़े रहस्य की बात समझाता हूँ जो बड़ी सहज है पर सबके समझ में शीघ्र नहीं आती। जिसने भी आकार ले लिया उसे कभी स्थिर समझने की भूल मत करना क्योंकि आकार को तो मिटना ही है। आकारं अनृतं विद्धि, निराकारं तू निश्चलं। साकार ब्रह्म में रमने वाले क्षण-क्षण मिटते ब्रह्माण्ड के आभाष से द्रवित होने को अभिशप्त हैं वहीं निराकार अनन्त चेतना के आभाष से आलोकित आत्मा अक्षुण्ण, अपरिमित आनन्द से आप्लावित रहती है, सदा संतृप्त। आकृतियों में मत उलझना जनक, यही इस भवसागर से सहजता से पार हो जाने का सरल सूत्र है। एतत तत्वोपपदेशेन न पुनर्भव सम्भवः।"

निरपेक्षो निर्विकारो निर्भरः शीतलाशयः। अगाध बुद्धिः अक्षुब्दः चिन्मात्र वासनः। अष्टावक्र जी समझाते हैं - "हे जनक ! संसार...
04/04/2023

निरपेक्षो निर्विकारो निर्भरः शीतलाशयः। अगाध बुद्धिः अक्षुब्दः चिन्मात्र वासनः।
अष्टावक्र जी समझाते हैं - "हे जनक ! संसार भले तुम्हें घेरने को प्रयासरत हो पर तुम सदा निरपेक्ष हो। भूख-प्यास तुम्हें घेरती है पर ये तो प्राण के धर्म हैं। मन के धर्म हैं शोक और मोह जो तुम्हें घेरते हैं। सूक्ष्म देह के धर्म हैं जन्म और मरण जो तुम्हें प्रभावित करने का प्रयत्न करते हैं। पर जनक ! इनमें से कोई तुम्हारी अनन्त चेतना के धर्म नहीं है अतः तूम इन सभी छः से निरपेक्ष हो। जायते, अस्ति, वर्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, विनश्यति अर्थात जो जन्मता है, स्थित है, बढ़ता है, परिणाम को प्राप्त होता है, क्षण-क्षण में क्षीण हुआ जाता है और अन्ततः नष्ट हो जाता है। यही सभी शरीरी का धर्म है, देह का धर्म है, पर हे जनक ! तू इस अनन्त यात्रा का यात्री न कभी जन्मा, न बढ़ा, न क्षीण हुआ, न किसी परिणाम को प्राप्त हुआ और न ही कभी नष्ट होगा। तू अगाध चैत्यन्य बुद्धिरूप इन विकारों से उठ केवल निर्मल और अनन्त चैतन्य में ही निष्ठा रख।"

त्वया व्याप्तं इदं विश्वं, त्वयि प्रोतं यथार्थतः। हे जनक ! यह सम्पूर्ण संसार स्वयं में कुछ नहीं है। तू चेतन स्वरुप ही आद...
03/04/2023

त्वया व्याप्तं इदं विश्वं, त्वयि प्रोतं यथार्थतः।
हे जनक ! यह सम्पूर्ण संसार स्वयं में कुछ नहीं है। तू चेतन स्वरुप ही आदि है, उत्स है, केन्द्र है, कारण है, सत्य है, सार है। तू चेतनस्वरूप है तो ही सारा संसार है। यह सम्पूर्ण विश्व तो तुझमें ही व्याप्त है, तेरे चेतन रूप धागे में यह सारा ब्रह्माण्ड पिरोया है। तू ही केन्द्र है और तू ही कारण है अतः तू स्वयँ को निर्भर या आश्रित मत समझ, तू संसार से नहीं है बल्कि संसार ही तुझसे है, ये समझ। परिस्थिति, परावलम्बन, परतन्त्रता जैसे तत्व तेरे अंदर व्याप्त जलते-बुझते कण हैं और तू इन सब से ऊपर असीमित, अलौकिक, अनिर्वचनीय, अगाध, अपार है। हे जनक ! तू कभी इतना नासमझ ना हो कि स्वयँ को क्षणभंगुर (क्षणों में नष्ट होने वाला) क्षेपकों (अवयव) का क्षत्रप (दास) समझने लगे।

जनक अष्टावक्र जी के चुभने वाले वचन से आहत होकर कहते हैं - "प्रभु ! प्रारम्भ से ही इस शरीर से बंधा, इस बन्धन को ही सत्य स...
02/04/2023

जनक अष्टावक्र जी के चुभने वाले वचन से आहत होकर कहते हैं - "प्रभु ! प्रारम्भ से ही इस शरीर से बंधा, इस बन्धन को ही सत्य समझने वाला, इस शरीर के सुख के लिये ही जीने वाला, दुनिया के सम्बन्धों को निर्वाह करने में ही अपनी सारी शक्ति-क्षमता लगाने वाला मैं और मेरा मन कैसे समझे और माने कि बाहर दिखने वाला संसार सब भ्रम है, मिथ्या है, छलावा है और सत्य कुछ और ही है। यदि मैं स्वयँ को इन समस्त द्वन्दों के परे स्थिर और एकात्म चेतना मान भी लूँ तो भी नित परिवर्तित हो रहे दुनिया के समीकरण से अपना मन मुक्त कैसे रखूँ ?" जनक जी आतुर होकर आग्रह करते हैं - "हे महाराज ! आप यदि इस तथ्य और सत्य को बार-बार बतायें तो शायद मेरा मन इसे समझ पाये।"
और अष्टावक्र जी हँसते हैं - "और मार्ग क्या है पुत्र ? समझना तो पड़ेगा ही, मानना तो पड़ेगा ही, तू भ्रम और अन्धकार में भला कब तब डूबा रहेगा और यदि ऐसा ही रहा तो कभी उस परम शान्ति, मुक्ति और सहज सुख का आभाष कैसे कर पायेगा जिस निमित्त इस धरती पर आया है ? क्या इस सांसारिक माया से प्राप्त कृत्रिम एवं क्षणिक सुख-दुःख, हर्ष-सन्ताप को सत्य मान उसे भोगने और सहने में ही तू पूरा जीवन व्यर्थ कर देगा ? "देहाभिमानपाशेन चिरं बद्ध: असि पुत्रः" - पुत्र ! तू इस देह के अभिमान के बन्धन में न जाने कब से उलझा है। "बोधः अहम्" - तू कह और मान कि तू जलता हुआ वह ज्ञान है जिसकी ज्योति कभी मन्द हो ही नहीं सकती। "ज्ञान खड्गेन तत निष्कृत्य सुखी भव" - अपने अंतर के ज्ञान से इस माया के कठिन और भटकाने वाले बन्धन को सहजता से काट दे और अनावश्यक द्वंदों से मुक्त होकर सुखी हो।"

अष्टावक्र जी कहते हैं - यह निर्लिप्तता का, मुक्ति का, ईश्वरत्व का द्वार बड़ा संकरा है, बड़ा सूक्ष्म है । इसमें से या तू ...
30/03/2023

अष्टावक्र जी कहते हैं - यह निर्लिप्तता का, मुक्ति का, ईश्वरत्व का द्वार बड़ा संकरा है, बड़ा सूक्ष्म है । इसमें से या तू जायेगा या तेरा अहंकार । अब एकदम छन के निकलना है तो इस गलतफहमी से मुक्त हो जा कि तू बड़ा धनाढ्य है, विद्वान है, सज्जन है, प्रसिद्ध है, लोकप्रिय है, प्रभावी है, अपने पद-प्रतिष्ठा की सारी ऐंठ यहीं गला-भुला दे। सब यहीं छन जाने दे, छोड़ दे, पिघल जाने दे । तभी तेरा वास्तविक, निर्मल, चैतन्य स्वरूप भारहीन होकर बिना दुविधा के उस परमात्म तत्व के सम्मिलन का आनन्द ले पायेगा । उससे पूर्व तो तेरे अनर्गल बोझों की सड़न ही तुझे सत्य समझ आयेगी । “अहं आभासः इति भ्रमम अथ, त्वम् कूटस्थम बोधम अद्वैतम आत्मानम परिभावये । “

अष्टावक्र जी जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं, जनक जी का ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण जगती का ज्ञान का मार्ग प्रशस्त होता जाता है।  बन्ध...
29/03/2023

अष्टावक्र जी जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं, जनक जी का ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण जगती का ज्ञान का मार्ग प्रशस्त होता जाता है। बन्धन से मोक्ष का मार्ग बताते हुए अष्टावक्र जी अचानक कहते हैं - " हे जनक ! ये बन्धन और मोक्ष दोनों ही गलत हैं, काल्पनिक हैं, अवास्तविक हैं। मुक्ति कैसी और किससे मुक्ति ? जनक ! बन्धन कहीं है ही नहीं फिर मुक्ति या मोक्ष का प्रश्न ही कहाँ से उत्पन्न हुआ ?" कहते हैं - "आत्मा साक्षी विभु पूर्णः, एकः मुक्तः चित अक्रियः। असङ्गः निःस्पृहः शान्तः, भ्रमात संसारवान इव।" कहते हैं - "हे जनक ! जो हम वास्तव में हैं उसमें न बंध है न मोक्ष है, हो ही नहीं सकता क्योंकि हम एकदम पूर्ण हैं, एक हैं, सदा सर्वदा से पूर्णतः मुक्त, असंग, शान्त, निस्पृह। जब रिक्तता ही नहीं है तो शेष-अशेष का कोई प्रश्न ही नहीं है। जो भी बन्धन प्रतीत होता है वह स्वयँ को समझने और पहचानने के अभाव से है। जो संसार को ही सार समझने लगते हैं सारा भ्रम उन्हें ही है। भ्रमात संसारवान इव।"

अष्टावक्र जी कहते हैं - "देह का मोह और अभिमान ही सबसे बड़ा बन्धन है क्योंकि अपने को अपने चर्म से जोड़ कर देख कर सोचने वाले...
25/03/2023

अष्टावक्र जी कहते हैं - "देह का मोह और अभिमान ही सबसे बड़ा बन्धन है क्योंकि अपने को अपने चर्म से जोड़ कर देख कर सोचने वाले कहते हैं - "देहोहं", वे जाति-वर्ण आदि देह के धर्मों को भी अपनी आत्मा में मानने की भूल करते हैं। वहीं देहाभिमान से मुक्त प्राणी सन्तापहीन और मुक्त भाव से उद्घोष करते हैं - ना मैं शरीर हूँ, ना इस शरीर से जुड़ा इसका रंग हूँ ना ही इसका वर्ण या इसकी तथाकथित जाति हूँ। उस परम चेतना का ना कोई रंग है, ना वर्ण है ना जाति। "शुद्धोहं, बुद्धोहं, तत्वोहं, निरंजनोहं, निरकारोहं, निर्विकल्पोहं", मैं पूर्णतः शुद्ध, बुद्ध, तत्त्वरूप, निरंजन, निराकार, निर्विकल्प परम चेतना हूँ।"

अष्टावक्र जी की गति बड़ी गहन है । उनके शब्द सीधे और स्पष्ट है । वे न अधिक समझाने का प्रयास करते हैं न अधिक उदाहरण देते ह...
23/03/2023

अष्टावक्र जी की गति बड़ी गहन है । उनके शब्द सीधे और स्पष्ट है । वे न अधिक समझाने का प्रयास करते हैं न अधिक उदाहरण देते हैं । स्पष्ट कहते हैं - जैसा मानोगे वैसे ही हो जाओगे, स्वयं को मुक्त समझो तो तुम्हें संसार की कोई परिस्थिति बाँध नहीं पायेगी और वहीं स्वयं को बंधा हुआ और निरुपाय मानो तो संसार की कोई शक्ति तुम्हें मुक्ति नहीं दे
पायेगी । इसी श्लोक में आगे कहते हैं - किंवदन्तीय सत्येयं, या मति सा गतिर्भवेत । सत्य ही कहा है कि जैसी मति होगी वैसी ही गति हो जायेगी ।

राजा जनक की समस्याओं और शंकाओं का अंत नहीं पर हर दुविधा के साथ गुरु कृपा बढ़ती जाती है । जनक चिन्तित हैं कि गुरु-कृपा अन...
22/03/2023

राजा जनक की समस्याओं और शंकाओं का अंत नहीं पर हर दुविधा के साथ गुरु कृपा बढ़ती जाती है । जनक चिन्तित हैं कि गुरु-कृपा अनुरूप परम चेतना में कैसे बने रहें ! मन चलायमान है, संसार की ओर ही भागता है, भौतिक सुख-संपन्नता को ही तरसता है, मान-सम्मान के लिये आतुर होता है, क्ष्ण-क्षण गिरता-उठता है ।

अष्टावक्र जी जनक की दुविधा सुन कर हँसते हैं - “मुक्ताभिमानी मुक्तो ही, बद्धो बद्धाभिमानी अपि ।”
जो मन से मुक्त होने हेतु संकल्पित है उन्हें मुक्त होने से भला कौन रोकेगा । पर यदि तुम अपने बन्धन को ही अपना सबसे बड़ा सच मानते रहोगे तो तुम क्षण - क्षण अपने बन्धनों में डूबे रहने हेतु बाध्य हो जाओगे । जनक ! तुम्हारी नियति पूर्णतः तुम पर ही निर्भर है ।

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G. B. Pant University Of Ag. And Tech
Pantnagar
263145

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