13/04/2023
अब जनक जी आत्मविश्वास और आत्म ज्ञान से परिपूर्ण होकर कहते हैं - “यथा प्रकाशयामी एकः देहम एनम यथा जगत। ऐतः मम जगत सर्वम्, अथवा न च किंचन॥” जैसे मैं ईश्वर का प्रतिरूप होकर अपने अस्तित्व को प्रकाशित करता हूँ ठीक वैसे ही इस सम्पूर्ण जगत् को भी मैं ही प्रकाशित करता हूँ। अतः मेरा शरीर ही सम्पूर्ण संसार है जो मेरी चेतना से जागृत प्रतीत होता है अथवा यदि दूसरे शब्दों में कहें तो इस संपूर्ण, जागृत, चेतन शक्ति के अतिरिक्त यह कुछ भी नहीं है।