Paawan Bhajan Mandal,kalka

Paawan Bhajan Mandal,kalka CONTACT FOR" SAI BHAJAN SANDHYAS"

if anyone intrested can book our mandal for Sai bhajan sandhyas..for details can contact us on +91-9034617471,+91-9896745441,+91-9992405317.

27/06/2021

*पूजापाठ से जुड़ी हुईं महत्वपूर्ण बातें*

★ एक हाथ से प्रणाम नही करना चाहिए।

★ सोए हुए व्यक्ति का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए।

★ बड़ों को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर पर दाहिने हाथ से और उनके बांये पैर को बांये हाथ से छूकर प्रणाम करें।

★ जप करते समय जीभ या होंठ को नहीं हिलाना चाहिए। इसे उपांशु जप कहते हैं। इसका फल सौगुणा फलदायक होता हैं।

★ जप करते समय दाहिने हाथ को कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए।

★ जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्श कर नेत्रों से लगाना चाहिए।

★ संक्रान्ति, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्ध्या के समय तुलसी तोड़ना निषिद्ध हैं।

★ दीपक से दीपक को नही जलाना चाहिए।

★ यज्ञ, श्राद्ध आदि में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए, सफेद तिल का नहीं।

★ शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाना चाहिए। पीपल की सात परिक्रमा करनी चाहिए। परिक्रमा करना श्रेष्ठ है,

★ कूमड़ा-मतीरा-नारियल आदि को स्त्रियां नहीं तोड़े या चाकू आदि से नहीं काटें। यह उत्तम नही माना गया हैं।

★ भोजन प्रसाद को लाघंना नहीं चाहिए।

★ देव प्रतिमा देखकर अवश्य प्रणाम करें।

★ किसी को भी कोई वस्तु या दान-दक्षिणा दाहिने हाथ से देना चाहिए।

★ एकादशी, अमावस्या, कृृष्ण चतुर्दशी, पूर्णिमा व्रत तथा श्राद्ध के दिन क्षौर-कर्म (दाढ़ी) नहीं बनाना चाहिए ।

★ बिना यज्ञोपवित या शिखा बंधन के जो भी कार्य, कर्म किया जाता है, वह निष्फल हो जाता हैं।

★ शंकर जी को बिल्वपत्र, विष्णु जी को तुलसी, गणेश जी को दूर्वा, लक्ष्मी जी को कमल प्रिय हैं।

★ शंकर जी को शिवरात्रि के सिवाय कुमकुम नहीं चढ़ती।

★ शिवजी को कुंद, विष्णु जी को धतूरा, देवी जी को आक तथा मदार और सूर्य भगवानको तगर के फूल नहीं चढ़ावे।

★ अक्षत देवताओं को तीन बार तथा पितरों को एक बार धोकर चढ़ावे।

★ नये बिल्व पत्र नहीं मिले तो चढ़ाये हुए बिल्व पत्र धोकर फिर चढ़ाए जा सकते हैं।

★ विष्णु भगवान को चावल गणेश जी को तुलसी, दुर्गा जी और सूर्य नारायण को बिल्व पत्र नहीं चढ़ावें।

★ पत्र-पुष्प-फल का मुख नीचे करके नहीं चढ़ावें, जैसे उत्पन्न होते हों वैसे ही चढ़ावें।

★ किंतु बिल्वपत्र उलटा करके डंडी तोड़कर शंकर पर चढ़ावें।

★पान की डंडी का अग्रभाग तोड़कर चढ़ावें।

★ सड़ा हुआ पान या पुष्प नहीं चढ़ावे।

★ गणेश को तुलसी भाद्र शुक्ल चतुर्थी को चढ़ती हैं।

★ पांच रात्रि तक कमल का फूल बासी नहीं होता है।

★ दस रात्रि तक तुलसी पत्र बासी नहीं होते हैं।

★ सभी धार्मिक कार्यो में पत्नी को दाहिने भाग में बिठाकर धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न करनी चाहिए।

★ पूजन करनेवाला ललाट पर तिलक लगाकर ही पूजा करें।

★ पूर्वाभिमुख बैठकर अपने बांयी ओर घंटा, धूप तथा दाहिनी ओर शंख, जलपात्र एवं पूजन सामग्री रखें।

★ घी का दीपक अपने बांयी ओर तथा देवता को दाहिने ओर रखें एवं चांवल पर दीपक रखकर प्रज्वलित करें।

★ गणेशजी को तुलसी का पत्र छोड़कर सब पत्र प्रिय हैं। भैरव की पूजा में तुलसी स्वीकार्य नहीं है।

★ कुंद का पुष्प शिव को माघ महीने को छोड़कर निषेध है।

★ बिना स्नान किये जो तुलसी पत्र जो तोड़ता है उसे देवता स्वीकार नहीं करते।

★ रविवार को दूर्वा नहीं तोड़नी चाहिए।

★ केतकी पुष्प शिव को नहीं चढ़ाना चाहिए।

★ केतकी पुष्प से कार्तिक माह में विष्णु की पूजा अवश्य करें।

★ देवताओं के सामने प्रज्जवलित दीप को बुझाना नहीं चाहिए।

★ शालिग्राम का आवाह्न तथा विसर्जन नहीं होता।

★ जो मूर्ति स्थापित हो उसमें आवाहन और विसर्जन नहीं होता।

★ तुलसीपत्र को मध्यान्ह के बाद ग्रहण न करें।

★ पूजा करते समय यदि गुरुदेव,ज्येष्ठ व्यक्ति या पूज्य व्यक्ति आ जाए तो उनको उठ कर प्रणाम कर उनकी आज्ञा से शेष कर्म को समाप्त करें।

★ मिट्टी की मूर्ति का आवाहन और विसर्जन होता है और अंत में शास्त्रीयविधि से गंगा प्रवाह भी किया जाता है।

★ कमल को पांच रात,बिल्वपत्र को दस रात और तुलसी को ग्यारह रात बाद शुद्ध करके पूजन के कार्य में लिया जा सकता है।

★ पंचामृत में यदि सब वस्तु प्राप्त न हो सके तो केवल दुग्ध से स्नान कराने मात्र से पंचामृतजन्य फल जाता है।

★ शालिग्राम पर अक्षत नहीं चढ़ता। लाल रंग मिश्रित चावल चढ़ाया जा सकता है।

★ हाथ में धारण किये पुष्प, तांबे के पात्र में चन्दन और चर्म पात्र में गंगाजल अपवित्र हो जाते हैं।

★ पिघला हुआ घी और पतला चन्दन नहीं चढ़ाना चाहिए।

★ प्रतिदिन की पूजा में सफलता के लिए दक्षिणा अवश्य चढ़ाएं।

★ आसन, शयन, दान, भोजन, वस्त्र संग्रह, विवाद और विवाह के समयों पर छींक शुभ मानी गई है।

★ जो मलिन वस्त्र पहनकर, मूषक आदि के काटे वस्त्र, केशादि बाल कर्तन युक्त और मुख दुर्गन्ध युक्त हो, जप आदि करता है उसे देवता नाश कर देते हैं।

★ मिट्टी, गोबर को निशा में और प्रदोषकाल में गोमूत्र को ग्रहण न करें।

★ मूर्ति स्नान में मूर्ति को अंगूठे से न रगड़ें।

★ पीपल को नित्य नमस्कार पूर्वाह्न के पश्चात् दोपहर में ही करना चाहिए। इसके बाद न करें।

★ जहां अपूज्यों की पूजा होती है और विद्वानों का अनादर होता है, उस स्थान पर दुर्भिक्ष, मरण और भय उत्पन्न होता है।

★ पौष मास की शुक्ल दशमी तिथि, चैत्र की शुक्ल पंचमी और श्रावण की पूर्णिमा तिथि को लक्ष्मी प्राप्ति के लिए लक्ष्मी का पूजन करें।

★ कृष्णपक्ष में, रिक्तिका तिथि में, श्रवणादी नक्षत्र में लक्ष्मी की पूजा न करें।

★ अपराह्नकाल में, रात्रि में, कृष्ण पक्ष में, द्वादशी तिथि में और अष्टमी को लक्ष्मी का पूजन प्रारम्भ न करें।

★ मंडप के नव भाग होते हैं, वे सब बराबर-बराबर के होते हैं अर्थात् मंडप सब तरफ से चतुरासन होता है, अर्थात् टेढ़ा नहीं होता। जिस कुंड की श्रृंगार द्वारा रचना नहीं होती वह यजमान का नाश करता है।

★ पूजा-पाठ करते समय हो जाए कुछ गलती तो अंत में जरूर बोलें ये एक मंत्र

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन।
यत्पूजितं मया देव! परिपूर्ण तदस्तु मे॥

आप सभी को निवेदन है अगर हो सके तो और लोगों को भी आप इन महत्वपूर्ण बातों से अवगत करा सकते है🙏

24/11/2020

मुझे ठीक से याद नहीं है कि मैने कब पढा था *पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय *ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय*
अब पता लगा ये ढाई अक्षर क्या है-

ढाई अक्षर के ब्रह्मा
और ढाई अक्षर की सृष्टि।
ढाई अक्षर के विष्णु
और ढाई अक्षर की लक्ष्मी।
ढाई अक्षर के कृष्ण
और ढाई अक्षर की कान्ता।(राधा रानी का दूसरा नाम)

ढाई अक्षर की दुर्गा
और ढाई अक्षर की शक्ति।
ढाई अक्षर की श्रद्धा
और ढाई अक्षर की भक्ति।
ढाई अक्षर का त्याग
और ढाई अक्षर का ध्यान।

ढाई अक्षर की तुष्टि
और ढाई अक्षर की इच्छा।
ढाई अक्षर का धर्म
और ढाई अक्षर का कर्म।
ढाई अक्षर का भाग्य
और ढाई अक्षर की व्यथा।

ढाई अक्षर का ग्रन्थ,
और ढाई अक्षर का सन्त।
ढाई अक्षर का शब्द
और ढाई अक्षर का अर्थ।
ढाई अक्षर का सत्य
और ढाई अक्षर की मिथ्या।

ढाई अक्षर की श्रुति
और ढाई अक्षर की ध्वनि।
ढाई अक्षर की अग्नि
और ढाई अक्षर का कुण्ड।
ढाई अक्षर का मन्त्र
और ढाई अक्षर का यन्त्र।

ढाई अक्षर की श्वांस
और ढाई अक्षर के प्राण।
ढाई अक्षर का जन्म
ढाई अक्षर की मृत्यु।
ढाई अक्षर की अस्थि
और ढाई अक्षर की अर्थी।

ढाई अक्षर का प्यार
और ढाई अक्षर का युद्ध।

ढाई अक्षर का मित्र
और ढाई अक्षर का शत्रु।

ढाई अक्षर का प्रेम
और ढाई अक्षर की घृणा।

*जन्म से लेकर मृत्यु तक*
*हम बंधे हैं ढाई अक्षर में।*
*हैं ढाई अक्षर ही वक़्त में,*
*और ढाई अक्षर ही अन्त में।*
*समझ न पाया कोई भी*
*है रहस्य क्या ढाई अक्षर में।*

राधा रानी के एक बार नाम लेने की कीमत एक बार एक व्यक्ति था। वह एक संत जी के पास गया। और कहता है की संत जी, मेरा एक बेटा ह...
27/08/2020

राधा रानी के एक बार नाम लेने की कीमत

एक बार एक व्यक्ति था। वह एक संत जी के पास गया। और कहता है की संत जी, मेरा एक बेटा है। वो न तो पूजा पाठ करता है और न ही भगवान का नाम लेता है। आप कुछ ऐसा कीजिये की उसका मन भगवान में लग जाये।

संत कहते है ठीक है बेटा एक दिन तू उसे मेरे पास लेकर आ जा।
अगले दिन वो व्यक्ति अपने बेटे को लेकर संत के पास गया। अब संत जी उसके बेटे से कहते है की- बेटा, बोल राधे राधे !

वो कहता है की मैं क्यू कहूँ?
संत कहते है बेटा बोल-राधे राधे.!

वो इसी तरह से मना करता रहा और अंत में उसने कहा की मैं क्यू कहूँ राधे राधे!

संत जी ने कहा- जब तुम मर जाओगे और यमराज के पास जाओगे तब यमराज तुमसे पूछगे की कभी भगवान का नाम लिया कोई अच्छा काम किया। तब तुम कह देना की मैंने जीवन में एक बार श्री राधा रानी के नाम को बोला है। बस एक बार। इतना बताकर वह चले गए।

समय व्यतीत हुआ और एक दिन वो मर गया। यमराज के पास पहुंचा। यमराज ने पूछा-कभी कोई अच्छा काम किया है।
उसने कहा- हाँ महाराज, मैंने जीवन में एक बार श्री जी के , राधा जी के नाम को बोला है। आप उसकी महिमा बताइये।

यमराज सोचने लगा की एक बार नाम की महिमा क्या होगी? इसका तो मुझे भी नही पता है। यम बोले की चलो इंद्र के पास वो ही बतायेगे।
तो वो व्यक्ति बोला मैं ऐसे नही जाऊंगा पहले पालकी लेकर आओ उसमे बैठ कर जाऊंगा।

यमराज ने सोचा ये बड़ी मुसीबत है। फिर भी पालकी मंगवाई गई और उसे बिठाया। 4 कहार(पालकी उठाने वाले) लग गए। वो बोला यमराज जी सबसे आगे वाले कहार को हटा कर उसकी जगह आप लग जाइये।
यमराज जी ने ऐसा ही किया।

फिर सब मिलकर इंद्र के पास पहुंचे और बोले की एक बार श्री राधा रानी के नाम लेने की महिमा क्या है?
इंद्र बोले की महिमा तो बहुत है। पर क्या है ये मुझे भी नही मालूम। बोले की चलो ब्रह्मा जी को पता होगा वो ही बतायेगे।
वो व्यक्ति बोला इंद्र जी ऐसा है दूसरे कहार को हटा कर आप यमराज जी के साथ मेरी पालकी उठाइये।

अब एक ओर यमराज पालकी उठा रहे है। दूसरी तरफ इंद्र लगे हुए है। पहुंचे ब्रह्मा जी के पास। ब्रह्मा ने सोचा की ऐसा कौन सा प्राणी ब्रह्मलोक में आ रहा है की स्वयं इंद्र और यमराज पालकी उठा कर ला रहे है।

ब्रह्मा के पास पहुंचे। सभी ने पूछा की एक बार राधा रानी के नाम लेने की महिमा क्या है?

ब्रह्मा जी बोले की महिमा तो बहुत है पर वास्तविकता में क्या है ये मुझे भी नही पता। लेकिन हाँ भगवान शिव जी को जरूर पता होगा।
वो व्यक्ति बोला की तीसरे कहार को हटाइये और उसकी जगह ब्रह्मा जी आप लग जाइये।

अब क्या करते महिमा तो जाननी थी। पालकी की और और यमराज है, एक और इंद्र और पीछे ब्रह्मा जी है।

सब मिलकर भगवान शिव जी के पास गए। और भगवान शिव से पूछा की राधा जी के नाम की महिमा क्या है? केवल एक बार नाम लेने की महिमा आप कृपा करके बताइये।

भगवान शिव बोले की मुझे भी नही पता। लेकिन भगवान विष्णु जी को जरूर पता होगी।
वो व्यक्ति शिव से बोला की अब आप भी पालकी उठाने में लग जाइये। इस प्रकार ब्रह्मा, शिव , यमराज और इंद्र चारों उस व्यक्ति की पालकी उठाने में लग गए।

और विष्णु जी के लोक पहुंचे। और विष्णु से जी पूछा की एक बार राधा रानी के नाम लेने की महिमा क्या है।

विष्णु जी बोले अरे! जिसकी पालकी को स्वयं मृत्य का राजा यमराज, स्वर्ग का राजा इंद्र , ब्रह्म लोक के राजा ब्रह्मा और साक्षात भगवान शिव पालकी उठा रहे हो इससे बड़ी महिमा क्या होगी। जब आपने इसको पालकी में उठा ही लिया है। सिर्फ एक बार राधा रानी के नाम लेने के कारण तो अब ये मेरी गोद में बैठने का अधिकारी हो गया है।

प्रेम से कहिये- श्री राधे!! श्री राधे!!

भगवान कृष्ण ने स्वयं कहा है की जो केवल ‘रा’ बोलते है तो मैं सब काम छोड़ कर खड़ा हो जाता हु। और जैसे ही कोई ‘धा’ शब्द का उच्चारण करता है मैं उसकी और दौड़ लगा कर उसे अपनी गोद में भर लेता हूँ ।

जय जय श्री राधे। जय जय श्री राधे।।

24/08/2020
Ye 👆 Shaligram ( Narayan ) Shila hai Jaggannath madir me hai.Jab bhi kabhi dunia me Mahamari hoti hai ye bahar nikali ja...
09/06/2020

Ye 👆 Shaligram ( Narayan ) Shila hai Jaggannath madir me hai.Jab bhi kabhi dunia me Mahamari hoti hai ye bahar nikali jaati hai,

30/04/2020

ये बहुत लंबी कथा है
एक बार रावण ने बड़ी कठोर तपस्या की ब्रम्हा जी की और उनसे उसने पूछा कि
मेरी मृत्यु किस वंश के कारण होगी।
तब ब्रह्मा जी ने रावण से कहा था कि तुम को मारने वाला रघु वंश में उत्पन्न होगा। इस पर रावण ने विचार किया और सोचा क्यों ना राजा रघु को ही मार डाला जाए और रावण अपना पुष्पक विमान लेकर राजा रघु के पास आया।
उस समय राजा रघु यज्ञ कर रहे थे।
रावण ने राजा रघु से कहा मैं आप से युद्ध करना चाहता हूं अतः आप बताएं किस समय युद्ध करेंगे।
राजा रघु ने कहा मैं अभी यज्ञ कर रहा हूं, यज्ञ के बाद आप जैसा चाहो जहां चाहो युद्ध कर सकते हो चाहे आप यहां आकर युद्ध करो अथवा मैं आपके यहां आकर युद्ध करूंगा जैसी आपकी इच्छा।
रावण ने कहा ठीक है बाद में युद्ध करेंगे।
राजा रघु ने रावण से कहा आप हमें लंका का नक्शा दो जिससे हम वहां आ सके।
राजा रघु ने रावण से लंका का नक्शा लेकर खोलकर देखा और एक लकड़ी का टुकड़ा तोड़कर उस नक्शे में छोटी सी रेखा खींची और कहा यह लंका है और नक्शा रावण को वापस कर दिया।
रावण खुशी-खुशी लंका आया। लंका आकर देखा तो बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने देखा जिस जगह नक्शे में राजा रघु ने लकड़ी से रेखा खींची थी। वहां से लंका में पानी आ रहा है रावण ने पूरी सेना लगा दी पानी बंद करने में, पर वह पानी बंद नहीं हुआ।
रावण ज्ञानी तो था ही वह समझ गया कि राजा रघु से युद्ध करना कोई बच्चों का खेल नहीं है। अतः समझदारी दिखाते हुए वह फिर वापस गया और राजा रघु से मित्रता की और वचन लिया कि कभी भी अयोध्या की सेना या कोई राजा लंका पर आक्रमण नहीं करेगा। तब राजा रघु ने वचन देते हुए कहा था *रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाए पर वचन न जाए।*
और नीचे लिखा था लंका।
इस कारण भरत जी रामजी की सहायता के लिए नहीं गए थे।
और राम को भी वनवास लेकर एक तपस्वी के रुप में ही जाना पड़ा।

22/04/2020
21/04/2020

💥रावण के पैर के नीचे का आध्यात्मिक रहस्य 💥*

👉रामायण देख रहे हमारे कई पाठकों के कई प्रश्नों में से एक अहम प्रश्न है कि रावण का जब सिंघासन दिखाया जाता गई,तो रावण के पैरों के पास कोई लेटा रहता है, जिस पर रावण पैर रखता है, वो कौन है ? और रावण के पैरों के नीचे क्यो रहता है ?

तो आइए इस प्रश्न के उत्तर को शनि संहिता के अनुसार
जानने का प्रयास करते हैं ।

कथा के अनुसार लंका का राजारावण निःसंदेह एक महान योद्धा था। उसने अपने शासन में सातों द्वीपों को जीत लिया था। उसे ब्रह्मा का वरदान प्राप्त था। उसने देवताओं को परास्त किया और नवग्रह उसके राजसभा की शोभा बढ़ाते थे। यहाँ तक कि वो शनि के सर पर अपना पैर रख कर बैठा करता था। यहाँ तक कि उसने भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र को वापस लौटने पर मजबूर कर दिया था। उसका वीर रूप ऐसा था कि उसके साथ अपने अंतिम युद्ध करते समय स्वयं श्रीराम ने कहा था कि आज रावण जिस रौद्ररूप में है कि उसे पराजित करना समस्त देवताओं के साथ स्वयं देवराज इंद्र के लिए भी संभव नहीं है। अपने अहंकार के मद में रावण ने शनि लोक पर चढ़़ाई कर दी और शनिदेव को महाकाल सहित बंदी बना लिया । उसने दोनों को अपने कारावास/पैरों में उलटा लटका कर बंदी बना लिया। वे दोनों अश्रु्धारा बहाते हुए अपने प्रभु शिव का स्मरण करने लगे तब भगवान शिव अपने भक्तों की करुण पुकार सुनकर प्रकट हुए और दोनों को आश्वस्त किया कि वे शीघ्र ही हनुमान के रुप में उनका उद्धार करने आएगें । इ्धर जब रावण का अत्याचार बढ़ने लगा तो भगवान विष्णु ने उसका संहार करने के लिए राम के रुप में और लक्ष्मी ने पृथ्वीपुत्री सीता के रुप में अवतार लिया । कालांतर में जब राम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन करने हेतु वनवास लिया तो उनके साथ पृथ्वीपुत्री सीता व अनुज लक्ष्मण वन में रहने लगे।

एक दिन रावण की बहन शूर्पनखा वहां आई और अपनी राक्षसी माया फैला कर राम- लक्ष्मण को यु़द्ध के लिए प्रेरित किया । यु़द्ध में रावण के खर, दुषण व त्रिशिरा जैसे शुरमा मारे गए। बदले की भावना से रावण ने सीता का छल से अपहरण कर लिया और लंका में अशोक वाटिका में छुपाकर रख दिया। उन्हीं दिनों राम- लक्ष्मण की भेंट रुद्रावतार हनुमान से हुई और फिर सीता की खोज शुरु हुई। हनुमान सीता की खोज के लिए समुद्र पार करके लंका में प्रवेश किया और अशोक वाटिका में छुपाकर रखी सीता को खोज निकाला । सीता से मिलने के बाद हनुमान ने अशोक वाटिका फल खाने लगे और विनाश मचा दिया । हनुमान को रोकने के लिए रावण ने अपने पुत्र अक्षय कुमार को भेजा । लेकिन हनुमान ने अक्षय कुमार को मार डाला । अंत में मेघनाद ने हनुमान को ब्रह्रापाश में जकड़कर रावण के समक्ष उपसिथत कर दिया और रावण ने हनुमान जी की पूंछ में आग लगा दी । हनुमान जी ने अपनी पूंछ से लंका का वि्ध्वंस कर दिया । लेकिन हनुमान जी ने देखा लंका जलने पर भी श्याम वर्ण नहीं हुई । तभी उनकी दॄष्टि रावण के कारावास/पैरों में उलटे लटके शनिदेव पर पड़ी ।
तब शनिदेव ने अपनी व्यथा हनुमान जी को सुनाई और रावण ने उनकी शक्ति को भी कीलित कर दिया है। हनुमान जी ने शनिदेव को मुक्त कर उनकी शक्ति का उत्कीलन कर दिया ।

उलटि पलटि लंका सब जारि।

फिर तो हनुमान जी के प्रताप व शनिदेव की दॄष्टि पड़ने पर लंका जल कर राख हो गई।

इसके बाद राम- रावण यु़द्ध में रावण का अपने वंश सहित विनाश हो गया । बाद में हनुमान जी ने महाकाल और शनिदेवता को रावण के चंगुल से मुक्त करा दिया। हालांकि कुछ विद्वानों का मत है कि शनिदेव को संपूर्ण मुक्ति रावण की मृत्यु के बाद ही मिली थी ।

तब शनिदेव हनुमान जी से बोले , “हे महावीर ! मैं आपका सदा ऋणी रहुंगा।” तब हनुमान जी ने शनिदेव दिव्य दॄष्टि प्रदान कर अपने रुद्र रुप के दर्शन कराये। उस समय शनिदेव ने हनुमान जी के चरण पकड़ लिए और प्रेम के अश्रु बहाने लगे। शनिदेव ने हनुमान जी से कहा कि प्रभु मैं आपके भक्तों को कभी भी पीडि़त नहीं करुंगा । जो मनुष्य इस कथा पढ़ेगा या श्रवण करेगा, मैं सदा उसकी रक्षा करुंगा।

Address

Panchkula
133302

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Paawan Bhajan Mandal,kalka posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The School

Send a message to Paawan Bhajan Mandal,kalka:

Shortcuts

Share