07/05/2026
“एक वक़्त था…
जब निकाह में सुन्नत की खुशबू होती थी…
सादगी होती थी…
हया होती थी…
दुआएँ होती थीं…
और आज…?
रुसूम के नाम पर
ग़ैर महरम के सामने हंसी-मज़ाक…
नाच…
गाने…
वीडियो…
सोशल मीडिया की नुमाइश…
दुल्हन बेटी कम…
content ज़्यादा बन गई…
कभी सोचा…?
जिस बेटी को पर्दे में रखना था
आज उसी की वीडियो लाखों लोगों तक पहुँच रही है…
शैतान गुनाह को अचानक नहीं लाता…
पहले उसे ‘रिवाज’ बनाता है…
फिर ‘मस्ती’…
फिर इंसान को गुनाह महसूस होना भी बंद हो जाता है…
हल्दी की रसम को ही देख लो जो कुछ उसके नाम पर हो रहा है…
क्या सच में अल्लाह को पसंद होगा?
कल यही शादी
अगर सुन्नत के तरीक़े पर हो
तो उसमें बरकत उतरती है…
और जब शादी की शुरुआत ही
बेहयाई और दिखावे से हो
तो फिर सुकून क्यों मिलेगा…?
अभी भी वक़्त है…
शादी को आसान बनाओ…
सुन्नत वाला बनाओ…
क्योंकि सबसे ख़ूबसूरत निकाह
वो है जिसमें अल्लाह की नाराज़गी नहीं…
बल्कि रहमत उतरती हो…”