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पंजाब केसरी लाला लाजपत राय / जन्म दिवस - 28 जनवरीपंजाब केसरी लाला लाजपत राय  भारतीय स्वतंत्रता अभियान के मुख्य नेता के र...
28/01/2022

पंजाब केसरी लाला लाजपत राय / जन्म दिवस - 28 जनवरी

पंजाब केसरी लाला लाजपत राय भारतीय स्वतंत्रता अभियान के मुख्य नेता के रूप में याद किये जाते है. लाल-बाल-पाल की त्रिपुटी में लाल मतलब लाला लाजपत राय ही है. लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी 1865 को धुडिके ग्राम में (मोगा जिला, पंजाब) हुआ.

वे आर्य समाज के भक्त और आर्य राजपत्र (जब वे विद्यार्थी थे तब उन्होंने इसकी स्थापना की थी) के संपादक भी थे. सरकारी कानून(लॉ) विद्यालय, लाहौर में कानून (लॉ) की पढाई पूरी करने के बाद उन्होंने लाहौर और हिस्सार में अपना अभ्यास शुरू रखा और राष्ट्रिय स्तर पर दयानंद वैदिक स्कूल की स्थापना भी की, जहा वे दयानंद सरस्वती जिन्होंने हिंदु सोसाइटी में आर्य समाज की पुनर्निर्मिति की थी, उनके अनुयायी भी बने. और भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस मे शामिल होने के बाद, उन्होंने पंजाब के कई सारे राजनैतिक अभियानों में हिस्सा लिया.

मई 1907 में अचानक ही बिना किसी पूर्वसूचना के मांडले, बर्मा (म्यांमार) से उन्हें निर्वासित (देश से निकाला गया) किया गया. वही नवम्बर में, उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत ना होने की वजह से वाइसराय, लार्ड मिन्टो ने उनके स्वदेश वापिस भेजने का निर्णय लिया. स्वदेश वापिस आने के बाद लाला लाजपत राय सूरत की प्रेसीडेंसी पार्टी से चुनाव लड़ने लगे लेकिन वहा भी ब्रिटिशो ने उन्हें निष्कासित कर दिया.

3 फ़रवरी, 1928 को साइमन कमीशन भारत पहुँचा, जिसके विरोध में पूरे देश में आग भड़क उठी। लाहौर में 30 अक्टूबर, 1928 को एक बड़ी घटना घटी, जब लाला लाजपत राय के नेतृत्व में साइमन कमीशन का विरोध कर रहे युवाओं को बेरहमी से पीटा गया। पुलिस ने लाला लाजपत राय की छाती पर निर्ममता से लाठियाँ बरसाईं। वे बुरी तरह घायल हो गए। इस समय अपने अंतिम भाषण में उन्होंने कहा था-

मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक चोट ब्रिटिश साम्राज्य के क़फन की कील बनेगी।

और इस चोट ने कितने ही ऊधमसिंह और भगतसिंह तैयार कर दिए, जिनके प्रयत्नों से हमें आज़ादी मिली। इस घटना के 17 दिन बाद यानि 17 नवम्बर, 1928 को लाला जी ने आख़िरी सांस ली और सदा के लिए अपनी आँखें मूँद लीं।

करिअप्पा थे आजाद सेना के पहले नायक, 1947 में किया था सेना का नेतृत्व.आजाद भारतीय सेना की कमान संभालने वाले कोडंडेरा मडप्...
28/01/2022

करिअप्पा थे आजाद सेना के पहले नायक, 1947 में किया था सेना का नेतृत्व.

आजाद भारतीय सेना की कमान संभालने वाले कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा (केएम करिअप्पा) का जन्म 28 जनवरी 1899 को हुआ था. करिअप्पा देश के पहले कमांडर-इन-चीफ थे.

उन्होंने 15 जनवरी 1949 को ब्रिटिश राज के समय के भारतीय सेना के अंतिम अंग्रेज शीर्ष कमांडर जनरल रॉय फ्रांसिस बुचर से यह पदभार ग्रहण किया था, उसी दिन को पूरा देश सेना दिवस के रूप में मनाता है. उन्होंने साल 1947 में हुए भारत-पाक युद्ध में पश्चिमी सीमा पर भारतीय सेना का नेतृत्व भी किया.

वे भारतीय सेना के उन दो अधिकारियों में शामिल हैं जिन्हें फील्ड मार्शल की पदवी दी गई. फील्ड मार्शल सैम मानेकशा दूसरे ऐसे अधिकारी थे, जिन्हें फील्ड मार्शल की रैंक दी गई थी. करिअप्पा को 'कीपर' के नाम से पुकारा जाता था. वह फील्ड मार्शल के पद पर पहुंचने वाले इकलौते भारतीय हैं. फील्ड मार्शल और बाद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने अयूब खान ने 1946 में उनके तहत काम किया.

पानीपत का तीसरा युद्ध अहमद शाह अब्दाली और मराठा सेनापति सदाशिव राव भाऊ के बीच 14 जनवरी 1761 को वर्तमान पानीपत के मैदान म...
14/01/2022

पानीपत का तीसरा युद्ध अहमद शाह अब्दाली और मराठा सेनापति सदाशिव राव भाऊ के बीच 14 जनवरी 1761 को वर्तमान पानीपत के मैदान मे हुआ जो वर्तमान समय में हरियाणा में है। इस युद्ध मे दोआब के अफगान रोहिला और अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने अहमद शाह अब्दाली का साथ दिया। इस युद्ध में मराठा के लगभग सभी छोटे-बड़े सरदार मारे गए इस संग्राम पर टिप्पणी करते हुए जेएन सरकार ने लिखा है इस देशव्यापी विपत्ति में संम्भवत महाराष्ट्र का कोई ऐसा परिवार नही होगा जिसका कोई भी सदस्य मारा न गया हो !

*मकर सक्रांति : हवा में वासंती महक खेतों में नई फसल*भारतीय तत्ववेत्ताओं ने जीवन को इसी रूप में परिभाषित किया है। रस यानी...
14/01/2022

*मकर सक्रांति : हवा में वासंती महक खेतों में नई फसल*

भारतीय तत्ववेत्ताओं ने जीवन को इसी रूप में परिभाषित किया है। रस यानी आनन्द-उल्लास, उमंग। इसीलिए देव संस्कृति में पवार्ें का सृजन किया गया जो लोकजीवन को देवजीवन की ओर उन्मुख करते हैं। मकर संक्रान्ति ऐसा ही एक लोकपर्व है। सूयार्ेपासना के इस पर्व पर वैदिक चिंतन कहता है कि हम सबको सविता देवता को नमन और उनकी आराधना इसलिए करनी चाहिए क्योंकि वे समूची प्रकृति का केन्द्र हैं। हम धरतीवासियों को जीवन व शक्तियां उन्हीं से ही प्राप्त होती हैं। वे हमारे सभी शुभ व अशुभ कमार्ें के प्रत्यक्ष साक्षी हैं। सूर्य उपासना की यह वैदिक परम्परा सदियों से कायम है। जीवंतता से भरे इस ऋतु पर्व की लौकिक व पारलौकिक, दोनों रूपों में विशिष्ट महत्ता है, साथ ही देशभर में इसे मनाने के रंग भी निराले हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में इसे अनूठे अंदाजों और नामों से मनाया जाता है।
*ऋतु परिवर्तन का पर्व*

कालचक्र की गणना के अनुसार यह पर्व नववर्ष के प्रथम माह में प्राय: 14 या 15 जनवरी को मनाया जाता है। आमतौर पर भारतीय पंचांग की तिथियां चन्द्रमा की गति से निर्धारित होती हैं, किन्तु मकर संक्रान्ति ऐसा पर्व है जो सूर्य की गति से निर्धारित होता है। एक रोचक जानकारी के अनुसार राजा हर्षवर्धन के समय में यह पर्व 24 दिसंबर को पड़ा था। उसके बारे में विख्यात है कि वह साल भर जो कुछ अपने कोष में संचित करता था, वह इस अवसर पर प्रयाग के संगम तट पर आकर दान कर देता था। इसी तरह अकबर के शासनकाल में मकर संक्रांति की तिथि 10 जनवरी थी और छत्रपति शिवाजी के समय 11 जनवरी। लगभग 80 वर्ष पूर्व यह पर्व 12-13 जनवरी को पड़ता था जो विषुवतों के अग्रगमन के कारण अब 14-15 जनवरी को पड़ने लगा है। इसी गति परिवर्तन के कारण 2016 में मकर संक्रान्ति 15 जनवरी को मनाई गई थी।

*मकर संक्रान्ति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्द्ध*

(दक्षिणायण) में यानी हमसे दूर होता है। इस दिन यह धनु राशि से मकर राशि में संक्रमण कर उत्तरी गोलार्द्ध (उत्तरायण) में प्रवेश कर हमारे निकट आ जाता है। फलत: अधिक मात्रा में सूर्य की ऊर्जा मिलने से जीव जगत में सक्रियता बढ़ जाती है। इसे आलोक पर्व भी कहा जाता है। वैदिक साहित्य में उत्तरायण का 'देवयान' यानी देवताओं का दिन और दक्षिणायन का 'पितृयान' यानी देवताओं की रात्रि के रूप में उल्लेख है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार इस शुभ मुहूर्त में देहत्याग करने वालेे जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं। इसी कारण महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिये इस पुण्य दिवस का चयन किया था। इसी दिन गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जा मिली थीं। इस दिन यज्ञ में दिये हव्य व दान को ग्रहण करने देवगण धरती पर आते हैं। तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गई है। कहा जाता है कि इस दिन सूर्य भगवान अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उनके घर जाते हैं। चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, इसलिए इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना गया।
लौकिक दृष्टि से विचार करें तो ऋतु परिर्वतन का यह उत्सव नई फसलों के आगमन व नववर्ष की खुशी में भी मनाया जाता है। मकर संक्रान्ति यानी पृथ्वी पर अच्छे दिनों का शुभारम्भ। खरमास के समापन के साथ इस दिन से वसंत ऋतु की शुरुआत हो जाती है। पौष माह में रुके हुए विवाह, गृह निर्माण आदि मंगल कार्य इस दिन से पुन: होने लगते हैं। यह स्नान पर्व मूल रूप से ऋतु चक्र परिवर्तन और नयी कृषि उपज से जुड़ा है। इस अवसर पर सूर्यदेव की कृपा से धरती हम सबके भरण-पोषण के लिए अपनी कोख से नवान्न का उपहार देती है। नया साठी धान, नयी उड़द की दाल, गन्ना व उससे निर्मित नया गुड़, तिल व सरसों के साथ ज्वार, बाजरा व मक्के की नयी फसलों की पैदावार पर किसानों के चेहरों की खुशी देखते बनती है। इस खुशी में देश के अन्नदाता मकर संक्रान्ति का पर्व मनाकर भगवान सूर्य को धन्यवाद देने के साथ उनसे अनुकम्पा का आशीर्वाद मांगते हैं।
हमारे देश के विभिन्न प्रान्तों में इस त्योहार को मनाने के जितने रूप प्रचलित हैं, उतने किसी अन्य पर्व के नहीं। कहीं लोहड़ी, कहीं खिचड़ी, कहीं पोंगल, कहीं संक्रान्ति और कहीं उत्तरायणी आदि।

*खिचड़ी: स्नान-दान का पर्व*

उत्तर प्रदेश, बिहार व मध्य प्रदेश में मकर संक्रान्ति का पर्व मुख्य रूप से स्नान-दान व नई फसल की खिचड़ी के साथ मनाया जाता है। तीर्थराज प्रयाग में गंगा, यमुना व सरस्वती के संगम पर लगने वाले एक माह के माघ मेले की शुरुआत मकर संक्रान्ति से ही होती है। इस दिन खिचड़ी का भोग लगाया जाता है और गुड़, तिल, रेवड़ी, गजक आदि का प्रसाद बांटा जाता है। श्रद्धालुजन इस दिन संगम स्नान व सूर्य को अर्घ्य देकर सुपात्रों व गरीबों को खिचड़ी, तिल व ऊनी वस्त्र दान देते हैं। इस पर्व की महत्ता के बारे में मानसकार गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है-
माघ मकर गति जब रवि होई।
तीरथपति आवहू सब कोई।।
प्रयाग यानी संगम। संगम सिर्फ नदियों का ही नहीं, विज्ञान और धर्म, विचार और कर्म, संन्यासी और गृहस्थ तथा धर्मसत्ता, राजसत्ता और समाज सत्ता का संगम। एक दौर था जब यह संगम पर्व ऐसा ही था। बिना बुलाये, बिना निमंत्रण भेजे सभी मकर संक्रान्ति पर आ जुटते थे संगम तट पर। यह संगम पर्व प्रयाग किनारे ही क्यों? जानकार कहते हैं, प्रयाग की विशेष भौगोलिक स्थिति के कारण। कहा जाता है कि मकर संक्रान्ति के समय प्रयाग के संगम क्षेत्र में विशिष्ट आकाशीय नक्षत्रों से निकलने वाली तरंगों का यहां स्नान-दान करने वाले व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। कहते हैं कि मकर संक्रान्ति के दिन खिचड़ी बनाने की परम्परा बाबा गोरखनाथ ने उत्तर प्रदेश के गोरखनाथ मंदिर से शुरू की। बताते हैं, मोहम्मद खिलजी के आक्रमण के समय नाथपंथियों को युद्ध के दौरान भोजन बनाने का समय न मिलने से अक्सर भूखे रहना पड़ता था। तब इस समस्या का हल निकालने के लिए एक दिन बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जी को एक साथ पकाने की सलाह दी। झटपट बन जाने वाला यह व्यंजन काफी पौष्टिक और स्वादिष्ट था। इससे शरीर को तुरंत ऊर्जा मिलती थी। उन्होंने इस व्यंजन को नाम दिया—खिचड़ी। भोजन की समस्या हल हो जाने से उन्होंने खिलजी की सेना को भी हरा दिया। तब से गोरखपुर स्थित बाबा गोरखनाथ धाम में मकर संक्रान्ति के दिन खिचड़ी भोज की परम्परा शुरू हुई।

*लोहड़ी : नयी फसल का उत्सव*

पंजाब, हरियाणा व हिमाचल में मकर संक्रान्ति की पूर्व संध्या पर लोहड़ी का त्योहार नयी फसल के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। पंजाबियों के लिए लोहड़ी खास महत्व रखती है। लोहड़ी से कुछ दिन पहले से ही छोटे बच्चे लोहड़ी के गीत गाकर लोहड़ी के लिए लकडि़यां व उपले इकट्ठे करने लगते हैं। लोहड़ी की रात खुले स्थान में पवित्र अग्नि जलाते हैं तथा परिवार और आस-पड़ोस के लोग मिलकर आग के किनारे घेरा बना उसकी परिक्रमा करते हैं, लोकगीत गाते हुए नये धान के लावे के साथ खील, मक्की, गुड़, रेवड़ी, मूंगफली आदि उस पवित्र अग्नि को अर्पित करते हैं। पंजाबियों में नववधू या और बच्चे की पहली लोहड़ी बहुत विशेष होती है।
इस त्योहार के पीछे एक रोचक ऐतिहासिक कथा भी है। कहा जाता है कि पुराने समय में सुंदरी एवं मुंदरी नाम की दो अनाथ लड़कियां थीं। उनके चाचा ने राज्य के सूबेदार का कृपापात्र बनने के लिए उन्हें उसे भेंट कर दिया। राज्य में दुल्ला भट्टी नाम का एक नामी डाकू था, जो अमीरों व घूसखोरों से धन लूटकर गरीबों की मदद किया करता था। जब उसके कानों तक यह बात पहुंची तो उसने दोनों लड़कियों को उन जालिमों से छुड़ाकर दो अच्छे लड़के देखकर उनकी शादी कर दी। दुल्ला भट्टी ने खुद ही पिता के रूप में उन दोनों का कन्यादान किया। जल्दी-जल्दी में शादी की धूमधाम का इंतजाम भी न हो सका सो दुल्ले ने उन लड़कियों की झोली में एक सेर शक्कर डालकर उनको विदा कर दिया। तभी से उसकी याद में यह त्योहार मनाया जाने लगा।

*पोंगल: नये साल का आगाज*

पोंगल तमिलनाडु में मनाया जाने वाला प्रमुख त्योहार है। चार दिन के इस दिन पर्व के साथ तमिलनाडुवासियों के नये साल का आगाज होता है। पोंगल का शाब्दिक अर्थ है मिट्टी के चूल्हे पर पकाना। पहले दिन लोग सुबह सूयार्ेदय से पहले उठकर अपने घर से पुरानी व अनुपयोगी चीजों को जलाते हैं। उसके बाद घर में साफ-सफाई कर विधि-विधान से वर्पा व कृषि के देवता इंद्र की पूजा करते हैं। भोग प्रसाद के रूप में भगवान इंद्र को समर्पित इस पहली पोंगल को 'भोगी पोंगल'कहते हैं। दूसरी पोंगल 'सूर्य पोंगल' कहलाती है। इस दिन लोग मिट्टी के बर्तन में नये धान और गन्ने के रस या गुड़ से एक खास खीर बनाते हैं। पोंगल तैयार होने के बाद सूर्य देव की पूजा की जाती है और भोग लगाया जाता है। इस दिन नए धान से बना खाना खाया जाता है, जिसमें मीठी खिचड़ी खास होती है। यह खिचड़ी एक नये मटके में नये चावल व गुड़ और ताजे दूध से बनाई जाती है। तीसरी पोंगल को 'मट्टू पोंगल' कहा जाता है। तमिल समाज में मट्टू बैल को भगवान शंकर का वाहन माना जाता है। कथा है कि भगवान शिव के एक प्रिय शिष्य को एक भूल के कारण बैल बनना पड़ा। भगवान शंकर ने उसे पृथ्वी पर रहकर मानव समाज के लिए अन्न पैदा करने में सहायक बनने को कहा। तब से बैल रूपी नंदी पृथ्वी पर रहकर कृषि कार्य में मानव की सहायता कर रहे हैं। इस दिन किसान अपने गाय व बैलों को स्नान कराकर उन्हें खूब सजाते हैं, फिर उनकी पूजा करते हैं। चौथे पोंगल को तिरुवल्लूर या 'कन्या पोंगल' कहते हैं। इस दिन घर को आम्र पल्लव व नारियल पत्रों से सजाया जाता है। घर के मुख्य द्वार पर रंगोली बनायी जाती है। लोग नये कपडे़ पहनते हैं और दोस्तों व रिश्तेदारों के यहां मिठाई और पोंगल बना कर भेजते हैं, नये साल की खुशियां मनाते हैं। कृषक वर्ग इस दिन से नई फसल की कटाई शुरू कर देता है।
केरल में भगवान अयप्पा की सबरीमाला की वार्षिक तीर्थयात्रा की अवधि मकर संक्रान्ति के दिन ही समाप्त होती है। कर्नाटक में भी मकर-संक्रांति त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है। इस मौके पर बैलों और गायों को सुसज्जित कर उनकी शोभा यात्रा निकाली जाती है। नये परिधान में सजे नर-नारी, ईख, सूखे नारियल और भुने चने के साथ एक दूसरे का अभिवादन करते हैं।

*तिल-गुड़ की संक्रान्ति*

महाराष्ट्र व राजस्थान में यह पर्व तिल-गुड़ की संक्रान्ति के रूप में मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस दिन विवाहित महिलाएं तिल, गुड़, कपास, तेल, रोली और हल्दी आदि शुभ वस्तुएं एक-दूसरे को भेंट करती हैं। लोग एक दूसरे को तिल गुड़ देते हैं और बोलते हैं, 'तिल-गुड़ लो-मीठा-मीठा बोलो'।
राजस्थान में यह पर्व आशीर्वाद प्राप्ति दिवस के रूप में मनाया जाता है। सुहागिनें अपने सास-ससुर व बड़े-बुजुगोंर् को भेंट देकर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। इसी तरह गुजराती समाज भी संक्रान्ति पर्व को शुभ दिवस के रूप में मनाता है। इस अवसर पर जगह-जगह पतंगबाजी प्रतियोगिताएं होती हैं।
इस त्योहार के पीछे एक रोचक ऐतिहासिक कथा भी है। कहा जाता है कि पुराने समय में सुंदरी एवं मुंदरी नाम की दो अनाथ लड़कियां थीं। उनके चाचा ने राज्य के सूबेदार का कृपापात्र बनने के लिए उन्हें उसे भेंट कर दिया। राज्य में दुल्ला भट्टी नाम का एक नामी डाकू था, जो अमीरों व घूसखोरों से धन लूटकर गरीबों की मदद किया करता था। जब उसके कानों तक यह बात पहुंची तो उसने दोनों लड़कियों को उन जालिमों से छुड़ाकर दो अच्छे लड़के देखकर उनकी शादी कर दी। दुल्ला भट्टी ने खुद ही पिता के रूप में उन दोनों का कन्यादान किया। जल्दी-जल्दी में शादी की धूमधाम का इंतजाम भी न हो सका सो दुल्ले ने उन लड़कियों की झोली में एक सेर शक्कर डालकर उनको विदा कर दिया। तभी से उसकी याद में यह त्योहार मनाया जाने लगा।

*पोंगल: नये साल का आगाज*

पोंगल तमिलनाडु में मनाया जाने वाला प्रमुख त्योहार है। चार दिन के इस दिन पर्व के साथ तमिलनाडुवासियों के नये साल का आगाज होता है। पोंगल का शाब्दिक अर्थ है मिट्टी के चूल्हे पर पकाना। पहले दिन लोग सुबह सूयार्ेदय से पहले उठकर अपने घर से पुरानी व अनुपयोगी चीजों को जलाते हैं। उसके बाद घर में साफ-सफाई कर विधि-विधान से वर्पा व कृषि के देवता इंद्र की पूजा करते हैं। भोग प्रसाद के रूप में भगवान इंद्र को समर्पित इस पहली पोंगल को 'भोगी पोंगल'कहते हैं। दूसरी पोंगल 'सूर्य पोंगल' कहलाती है। इस दिन लोग मिट्टी के बर्तन में नये धान और गन्ने के रस या गुड़ से एक खास खीर बनाते हैं। पोंगल तैयार होने के बाद सूर्य देव की पूजा की जाती है और भोग लगाया जाता है। इस दिन नए धान से बना खाना खाया जाता है, जिसमें मीठी खिचड़ी खास होती है। यह खिचड़ी एक नये मटके में नये चावल व गुड़ और ताजे दूध से बनाई जाती है। तीसरी पोंगल को 'मट्टू पोंगल' कहा जाता है। तमिल समाज में मट्टू बैल को भगवान शंकर का वाहन माना जाता है। कथा है कि भगवान शिव के एक प्रिय शिष्य को एक भूल के कारण बैल बनना पड़ा। भगवान शंकर ने उसे पृथ्वी पर रहकर मानव समाज के लिए अन्न पैदा करने में सहायक बनने को कहा। तब से बैल रूपी नंदी पृथ्वी पर रहकर कृषि कार्य में मानव की सहायता कर रहे हैं। इस दिन किसान अपने गाय व बैलों को स्नान कराकर उन्हें खूब सजाते हैं, फिर उनकी पूजा करते हैं। चौथे पोंगल को तिरुवल्लूर या 'कन्या पोंगल' कहते हैं। इस दिन घर को आम्र पल्लव व नारियल पत्रों से सजाया जाता है। घर के मुख्य द्वार पर रंगोली बनायी जाती है। लोग नये कपडे़ पहनते हैं और दोस्तों व रिश्तेदारों के यहां मिठाई और पोंगल बना कर भेजते हैं, नये साल की खुशियां मनाते हैं। कृषक वर्ग इस दिन से नई फसल की कटाई शुरू कर देता है।
केरल में भगवान अयप्पा की सबरीमाला की वार्षिक तीर्थयात्रा की अवधि मकर संक्रान्ति के दिन ही समाप्त होती है। कर्नाटक में भी मकर-संक्रांति त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है। इस मौके पर बैलों और गायों को सुसज्जित कर उनकी शोभा यात्रा निकाली जाती है। नये परिधान में सजे नर-नारी, ईख, सूखे नारियल और भुने चने के साथ एक दूसरे का अभिवादन करते हैं।

*तिल-गुड़ की संक्रान्ति*

महाराष्ट्र व राजस्थान में यह पर्व तिल-गुड़ की संक्रान्ति के रूप में मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस दिन विवाहित महिलाएं तिल, गुड़, कपास, तेल, रोली और हल्दी आदि शुभ वस्तुएं एक-दूसरे को भेंट करती हैं। लोग एक दूसरे को तिल गुड़ देते हैं और बोलते हैं, 'तिल-गुड़ लो-मीठा-मीठा बोलो'।
राजस्थान में यह पर्व आशीर्वाद प्राप्ति दिवस के रूप में मनाया जाता है। सुहागिनें अपने सास-ससुर व बड़े-बुजुगोंर् को भेंट देकर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। इसी तरह गुजराती समाज भी संक्रान्ति पर्व को शुभ दिवस के रूप में मनाता है। इस अवसर पर जगह-जगह पतंगबाजी प्रतियोगिताएं होती हैं।

*उत्तरायणी : बेगार प्रथा से मुक्ति*

उत्तराखण्ड में मकर संक्रांति का पर्व उत्तरायणी के नाम से मनाया जाता है। पर्वतीय अंचल में इस पर्व से गहरी जनआस्था जुड़ी हुई है। 14 जनवरी, 1921 को उत्तरायणी के दिन कुमाऊंवासियों ने क्रूर गोरखा शासन और अंग्रेजी राज की दमनकारी कुली बेगार प्रथा के काले कानून के खिलाफ क्रांति का बिगुल बजाकर हमेशा के लिए दासत्व से मुक्ति पाई थी। इस बड़े घटनाक्रम को उत्तराखंड की 'रक्तहीन क्रांति' की संज्ञा दी जाती है। पर्वतीय समाज में यह पर्व 'घुघुतिया' के रूप में भी मनाया जाता है जिसमें गुड़ व आटे के विशेष प्रकार के व्यंजन बनाकर कौवे न्यौते जाते हैं। इस मौके पर उत्तराखंड में लगने वाले दो मेले पूरे देश में विख्यात हैं-एक बागेश्वर (कुमाऊं) का उत्तरायणी मेला और दूसरा उत्तरकाशी (गढ़वाल) का माघ मेला।

*नेपाल में मकर संक्रान्ति की धूम*

पड़ोसी राष्ट्र नेपाल में भी मकर संक्रान्ति को माघ संक्रान्ति व सूयार्ेत्तरायण पर्व के रूप में खूब हषार्ेल्लास से मनाया जाता है। यह स्थानीय या दिग्री समुदाय का प्रमुख पर्व माना जाता है। इस दिन नेपाल में सार्वजनिक छुट्टी होती है। नेपाल के बाकी समुदाय भी इस दिन देवघाट व त्रिवेणी मेला आदि में स्नान कर दान-पुण्य करते हैं और तिल, घी, शर्करा और कन्दमूल खाकर धूमधाम से मकर संक्रान्ति मनाते हैं।

*गंगासागर में स्नान और सूर्य को अर्घ्य*

बंगाल के गंगासागर में मकर संक्रान्ति के दिन एक विशाल मेला लगता है। इस दिन गंगासागर में स्नान-दान के लिये लाखों लोगों की भीड़ होती है। स्नान के पश्चात यहां तिल दान करने की परम्परा है। कहा जाता है कि यहीं पर गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं। मोक्ष प्राप्ति की विशेष मान्यता के कारण कहा जाता है ''सारे तीरथ बार बार, गंगासागर एक बार।'' पूवार्ेत्तर राज्य असम में मकर संक्रान्ति को माघ-बिहू अथवा भोगाली-बिहू के नाम से मनाया जाता है। यहां किसानों के इस त्योहार पर नयी फसल की कटाई का उत्सव परम्परागत नृत्य संगीत के साथ मनाया जाता है।

*महिदपुर के सेनानी अमीन सदाशिवराव**बलिदान दिवस - 7 जनवरी 1858* 1857 का स्वाधीनता संग्राम भले ही सफल न हुआ हो; पर उसने सि...
07/01/2022

*महिदपुर के सेनानी अमीन सदाशिवराव*
*बलिदान दिवस - 7 जनवरी 1858*

1857 का स्वाधीनता संग्राम भले ही सफल न हुआ हो; पर उसने सिद्ध कर दिया कि देश का कोई भाग ऐसा नहीं है, जहां स्वतन्त्रता की अभिलाषा न हो तथा लोग स्वाधीनता के लिए मर मिटने का तैयार न हों।
मध्य प्रदेश में इंदौर और उसके आसपास का क्षेत्र मालवा कहलाता है। 1857 में यह पूरा क्षेत्र अंग्रेजों के विरुद्ध दहक रहा था। यहां का महिदपुर सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र था। इसलिए अंग्रेजों ने यहां छावनी की स्थापना की थी, जिसे ‘यूनाइटेड मालवा कांटिनजेंट, महिदपुर हेडक्वार्टर’ कहा जाता था।

इंदौर में नागरिकों ने जुलाई 1857 में जैसा उत्साह दिखाया था, उसका प्रभाव महिदपुर छावनी के सैनिकों पर भी साफ दिखाई देता था। वे एकांत में इस बारे में उग्र बातें करते रहते थे। यह देखकर अंग्रेजों ने बड़े अधिकारियों तथा अपने खास चमचों को सावधान कर दिया था।

छावनी में भारतीय सैनिकों के कमांडर शेख रहमत उल्ला तथा उज्जैन स्थित सिंधिया के सरसूबा आपतिया की सहानुभूति क्रांतिकारियों के साथ थी। महिदपुर के अमीन सदाशिवराव की भूमिका भी इस बारे में उल्लेखनीय है। उन्होंने क्रांति के लिए बड़ी संख्या में सैनिकों की भर्ती की तथा उन्हें हर प्रकार का सहयोग दिया। अंग्रेज चौकन्ने तो थे; पर उन्हें यह अनुमान नहीं था कि अंदर ही अंदर इतना भीषण लावा खौल रहा है।

8 नवम्बर, 1857 को निर्धारित योजनानुसार प्रातः 7.30 बजे दो हजार क्रांतिकारियों ने ऐरा सिंह के नेतृत्व में मारो-काटो का उद्घोष करते हुए महिदपुर छावनी पर हमला बोल दिया। इन सशस्त्र क्रांतिवीरों में उज्जैन व खाचरोद की ओर से आये मेवाती सैनिकों के साथ ही महिदपुर के नागरिक भी शामिल थे। यह देखकर छावनी में तैनात देशप्रेमी सैनिक भी इनके साथ मिल गये।

अंग्रेज अधिकारी सावधान तो थे ही, अतः भीषण युद्ध छिड़ गया; पर भारतीय सैनिकों का उत्साह अंग्रेजों पर भारी पड़ रहा था। कई घंटे के संग्राम में डा0 कैरी, लेफ्टिनेंट मिल्स, सार्जेण्ट मेजर ओ कॉनेल तथा मानसन मार डाले गये। मेजर टिमनिस की पत्नी को उसके दर्जी ने अपनी झोंपड़ी में छिपा लिया, इससे उसकी जान बच गयी। इस युद्ध में भारतीय वीरों का पलड़ा भारी रहा। जो अंग्रेज अधिकारी बच गये, उन्हें इंदौर के महाराजा तुकोजीराव होल्कर ने शरण देकर उनके भोजन तथा कपड़ों का प्रबन्ध किया।

परन्तु संगठन एवं कुशल नेतृत्व के अभाव, अधूरी योजना तथा समय से पूर्व ही विस्फोट हो जाने के कारण 1857 का यह स्वाधीनता संग्राम सफल नहीं हो सका। धीरे-धीरे अंग्रेजों ने फिर से सभी छावनियों पर कब्जा कर लिया। जिन सैनिकों ने अत्यधिक उत्साह दिखाया था, उन्हें नौकरी से हटा दिया। कुछ को जेलों में ठूंस दिया तथा बहुतों को फांसी पर लटकाकर पूरे देश में एक बार फिर से आतंक एवं भय का वातावरण बना दिया।

महिदपुर के इस संघर्ष में यद्यपि जीत भारतीय पक्ष की हुई और अंग्रेजों को मैदान छोड़कर भागना पड़ा; पर अंग्रेजो की तरह ही बड़ी संख्या में भारतीय सैनिक भी वीरगति को प्राप्त हुए। आगे चलकर इस युद्ध के लिए वातावरण बनाने में मुख्य भूमिका निभाने वाले अमीन सयाजीराव भी गिरफ्तार कर लिये गये। अंग्रेजों ने उन्हें देशभक्ति का श्रेष्ठतम पुरस्कार देते हुए सात जनवरी, 1858 को तोप के सामने खड़ाकर गोला दाग दिया।

वीर अमीन सयाजीराव की देह एवं रक्त का कण-कण उस पावन मातृभूमि पर छितरा गया, जिसकी पूजा करने का उन्होंने व्रत लिया था

*परमवीर चक्र लांस नायक अल्बर्ट एक्का / बलिदान दिवस 3 दिसंबर 1971*गोलियों की बौछार में फौलाद सा अडिग 1971 के भारत-पाकिस्त...
03/12/2021

*परमवीर चक्र लांस नायक अल्बर्ट एक्का / बलिदान दिवस 3 दिसंबर 1971*

गोलियों की बौछार में फौलाद सा अडिग

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तान बुरी तरह पराजित हुआ था। उसके 94 हजार युद्धबन्दी बकरियों की तरह से मिमियाते हुए हमारे वीर जवानों के सामने सर झुकाए खड़े थे। इस शानदार जीत का श्रेय हमारे उन रणबांकुरों को जाता है, जिन्होंने युद्ध क्षेत्र में अपनी जान की परवाह किए बिना दुश्मन को मार भगाना ही अपना परम ध्येय समझा। 1971 के युद्ध के एक ऐसे ही रणबांकुरे थे लांसनायक अल्बर्ट एक्का। बीस वर्ष की अवस्था में 27 दिसम्बर, 1962 को बिहार रेजीमेन्ट में भर्ती होने वाले इस वीर सेनानी को 1968 में ब्रिगेड आफ द गाड्र्स की 14वीं बटालियन में भेज दिया गया था। 14 गार्ड्स को पूर्वी सेक्टर में अगरतल्ला से 6.5 किलोमीटर पश्चिम में गंगासागर में पाकिस्तान की रक्षा पंक्ति पर कब्जा करने का आदेश मिला। दुश्मन ने इस पोजीशन की मजबूत मोर्चाबन्दी कर रखी थी। भारत के लिए इस पोजीशन पर नियंत्रण करना बहुत आवश्यक था, क्योंकि अखौरा पर कब्जा करने के लिए इसका काफी महत्व था। लांस नायक अल्बर्ट एक्का पूर्वी मोर्चे पर गंगासागर में दुश्मन की रक्षा पंक्ति पर हमले के दौरान "बिग्रेड आफ द गार्ड्स बटालियन' की बाईं अग्रवर्ती कम्पनी में तैनात थे।
इन्होंने देखा कि पाकिस्तानी सैनिक भारतीय सैनिकों पर लाइट मशीनगन से गोलियों की बौछार कर रहे हैं। इनका धैर्य जवाब दे गया तो इन्होंने अकेले ही पाकिस्तानी बंकर पर धावा बोल दिया। उन्होंने बन्दूक से दो पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया, इसके बाद पाकिस्तानी मशीनगनें खामोश हो गयीं।

यद्यपि इस कार्रवाई में वह गम्भीर रूप से घायल हो गए थे। किन्तु उन्होंने इसकी चिन्ता नहीं की और अपने साथियों सहित आगे बढ़ने लगे। शत्रु के अनेक बंकर नष्ट करते हुए वह पाकिस्तानी पोजीशन पर कब्जा करते हुए आगे बढ़ते चले गए। किन्तु हमारे सैनिक अपने लक्ष्य के अनुसार उत्तरी किनारे पर पहुंचे ही थे कि पाकिस्तानी सैनिकों ने एक सुरक्षित भवन की दूसरी मंजिल से गोलियों की बौछार शुरू कर दी। इस गोलीबारी में हमारे कुछ सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए और बाकी आगे नहीं बढ़ सके। एक बार फिर से अल्बर्ट एक्का ने साहसिक कार्रवाई करने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने घावों और दर्द की चिन्ता नहीं की और रेंगते हुए उस भवन तक जा पहुंचे। और धीरे से उसके पास बने बंकर के एक छेद से हथगोला दाग दिया, जिससे एक पाकिस्तानी सैनिक मर गया और दूसरा घायल हो गया। परन्तु इतना ही पर्याप्त नहीं था, क्योंकि पाकिस्तानी मशीनगन गोलियों की बौछार कर ही रही थी। अल्बर्ट एक्का के शरीर से रक्त बह रहा था फिर भी वह सांप की तरह पेट के बल रेंगते-रेंगते एक बंकर में घुस गए और अपनी बन्दूक से एक पाकिस्तानी तोपची को मार डाला। उसके बाद हमारे सैनिक निर्भय होकर आगे बढ़ने लगे। युद्ध क्षेत्र में 3 दिसम्बर, 1971 को इस वीर योद्धा की आंखें सदा के लिए मूंद गयीं। इस परम योद्धा का जन्म 27 दिसम्बर, 1942 को बिहार के रांची जिले के जारी गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम जूलियस एक्का और माता का नाम मरियम एक्का था.

हॉकी के जादूगर
03/12/2021

हॉकी के जादूगर

*डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति -  जन्म दिन 3 दिसम्बर 1884*डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भारतीय स्वाधीनता आंदोलन क...
03/12/2021

*डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति - जन्म दिन 3 दिसम्बर 1884*

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से थे जिन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में प्रमुख भूमिका निभाई. उन्होंने भारतीय संविधान के निर्माण में भी अपना योगदान दिया था. राष्ट्रपति होने के अतिरिक्त उन्होंने स्वाधीन भारत में केन्द्रीय मन्त्री के रूप में भी कुछ समय के लिए काम किया था. पूरे देश में अत्यन्त लोकप्रिय होने के कारण उन्हें राजेन्द्र बाबू कहकर पुकारा जाता था।

3 दिसंबर अमर क्रांतिकारी खुदीराम बोस जयंतीआजादी की लड़ाई का इतिहास क्रांतिकारियों के त्याग और बलिदान के अनगिनत कारनामों स...
03/12/2021

3 दिसंबर अमर क्रांतिकारी खुदीराम बोस जयंती

आजादी की लड़ाई का इतिहास क्रांतिकारियों के त्याग और बलिदान के अनगिनत कारनामों से भरा पड़ा है. क्रांतिकारियों की सूची में ऐसा ही एक नाम है खुदीराम बोस का, जो शहादत के बाद इतने लोकप्रिय हो गए कि नौजवान एक खास किस्म की धोती पहनने लगे, जिनकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था!
भारतीय स्वाधीनता संग्राम की क्रांतिकारी धारा में त्याग और बलिदान का जज्बा पैदा करने और देश में आजादी के लिए जान न्यौछावर करने का साहस भरने वाले प्रथम सेनानी खुदीराम बोस माने जाते हैं.
उनकी शाहदत ने हिंदुस्तानियों में आजादी की जो ललक पैदा की, उससे स्वाधीनता आंदोलन को नया बल मिला.
खुदीराम का जन्म तीन दिसंबर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में त्रैलोक्यनाथ बोस के घर हुआ था. खुदीराम को आजादी हासिल करने की ऐसी लगन लगी कि नौवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़कर वह स्वदेशी आंदोलन में कूद पड़े. इसके बाद वह रिवोल्यूशनरी पार्टी के सदस्य बने और वंदेमातरम लिखे पर्चे वितरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. सन् 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में चले आंदोलन में भी उन्होंने बढ़ चढ़ कर भाग लिया. उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के चलते 28 फरवरी 1906 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन वह कैद से भाग निकले. लगभग दो महीने बाद अप्रैल में वह फिर से पकड़े गए. 16 मई 1906 को उन्हें रिहा कर दिया गया.
06 दिसंबर 1907 को खुदीराम ने नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन पर हमला किया, परंतु गवर्नर बच गया. सन् 1908 में खुदीराम ने दो अंग्रेज अधिकारियों वाट्सन और पैम्फायल्ट फुलर पर बम से हमला किया, लेकिन वे भी बच निकले. खुदीराम बोस मुजफ्फरपुर के सेशन जज किंग्सफोर्ड से बेहद खफा थे, जिसने बंगाल के कई देशभक्तों को कड़ी सजा दी थी. उन्होंने अपने साथी प्रफुल चंद चाकी के साथ मिलकर किंग्सफोर्ड को सबक सिखाने की ठानी. दोनों मुजफ्फरपुर आए और 30 अप्रैल 1908 को सेशन जज की गाड़ी पर बम फेंक दिया, लेकिन उस गाड़ी में उस समय सेशन जज की जगह उसकी परिचित दो यूरोपीय महिलाएं कैनेडी और उसकी बेटी सवार थीं. किंग्सफोर्ड के धोखे में दोनों महिलाएं मारी गईं, जिसका खुदीराम और प्रफुल चंद चाकी को काफी अफसोस हुआ. अंग्रेज पुलिस उनके पीछे लगी और वैनी रेलवे स्टेशन पर उन्हें घेर लिया. अपने को पुलिस से घिरा देख प्रफुल चंद चाकी ने खुद को गोली से उड़ा लिया, जबकि खुदीराम पकड़े गए. मुजफ्फरपुर जेल में 11 अगस्त 1908 को उन्हें फांसी पर लटका दिया गया. उस समय उनकी उम्र सिर्फ 19 साल थी।

3 दिसंबर 1971 को भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हुआ था। इस युद्ध के नतीजे में पाकिस्तान से बांग्लादेश आजाद हुआ और ए...
03/12/2021

3 दिसंबर 1971 को भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हुआ था। इस युद्ध के नतीजे में पाकिस्तान से बांग्लादेश आजाद हुआ और एक नया राष्ट्र बना।

*भोपाल गैस कांड इतिहास की भयंकर त्रासदी - 2-3  दिसम्बर 1984 की रात*भोपाल गैस त्रासदी, मानव इतिहास में अबतक विश्व की सबसे...
03/12/2021

*भोपाल गैस कांड इतिहास की भयंकर त्रासदी - 2-3 दिसम्बर 1984 की रात*

भोपाल गैस त्रासदी, मानव इतिहास में अबतक विश्व की सबसे भयावह और दर्दनाक ओद्योगिक त्रासदी में से एक है. त्रासदी के पीड़ितों के लिए ये एक ऐसा जख्म है जो आज भी लोगों के जेहन में ताजा है. 2 - 3 दिसंबर, 1984 की रात को भोपाल में यूनियन कार्बाइड की फैक्टरी से निकली कम से कम 30 टन अत्यधिक जहरीले गैस मिथाइल आइसोसाइनेट ने हजारों लोगों की जान ले ली थीं. उस सुबह यूनियन कार्बाइड के प्लांट नंबर 'सी' में हुए रिसाव से बने गैस के बादल को हवा के झोंके अपने साथ बहाकर ले जा रहे थे और लोग मौत की नींद सोते जा रहे थे.

मुंबई में वर्ष 2008 में 26 नवंबर को हुए आतंकवादी हमले में 26 विदेशी नागरिकों सहित 166 लोगों की मौत हो गई थी। पाकिस्तान स...
26/11/2021

मुंबई में वर्ष 2008 में 26 नवंबर को हुए आतंकवादी हमले में 26 विदेशी नागरिकों सहित 166 लोगों की मौत हो गई थी। पाकिस्तान से आए 10 आतंकवादियों के साथ सुरक्षा बलों की मुठभेड़ करीब 60 घंटे तक चली थी। देश के इतिहास में 26/11 मुंबई हमला सबसे भयावह आतंकी हमला था।

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