09/09/2019
🌹 चौधरी शफात खान पहाट मेव (1920-1998)
चौधरी शफात खान पहाट मेव चौधरी धनदल खान जैलदार मादलका (deeg tehseel) जिला भरतपुर के साहबजादे थे. चौधरी सफात 1920 में पैदा हुए. इनकी पढ़ाई नगर और डीग में हुई और मैट्रिक इन्होंने 1936 में ब्रेन मेव हाई स्कूल Nuh से पास किया. Nuh स्कूल में वह तालीम एसोसिएशन के सदर भी रहे. चौधरी सफात ने BA, MA, LLB अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से करा. अलीगढ़ से वापसी पर 1944 में इन्होंने डीग में वकालत शुरू की साथ ही सियासत में दिलचस्पी लेने लगे. इनके वालिद धनदल खान जैलदार का रियासत भरतपुर की अहम शख्सियतों में नाम शुमार होता था. भरतपुर के महाराजा धनदल खान को चाचा कह कर पुकारते थे इनके एक साहबजादे साहब खान रियासत भरतपुर में रजिस्ट्रार थे.
भरतपुर के महाराजा ने सफात खान को रियासत में तहसीलदार और 6 महीने बाद मुल्ताजिम बनाने की पेशकश की जिसे शफात खान में मंजूर नहीं किया. चौधरी शफात खान एक आज़ाद ख्याल और कम्युनिस्ट रुझान के इंसान थे. चौधरी शफात खान गोत्र पाल कौमी मजहबी फिरका परस्ती से बुलंद ओ बाला थे बल्के गोत्र पाल और फिरकावारयत के सहारे सियासत करने वालों का मजाक उड़ाते थे. हिंदुस्तान की बेसतर रियासतों में कांग्रेश की हिमायत से प्रजा परिषद प्रजामंडल नामों से तहरीक आजादी की तंजीमे बनी हुई थी. भरतपुर में दूसरी रियासतों की तर्ज पर प्रजा परिषद कायम थी जो असल में कांग्रेस की कॉपी थी. महाराजा ने रियासत में एक नामजद असेंबली भी बना रखी थी जो भरतपुर के लालाओ, ब्राह्मणों के लिए कशिश का बाअस थी इसलिए इन्होंने आवामी हकूमत कायम कराने के लिए प्रजा परिषद के नाम से तहरीक चला रखी थी. भरतपुर के मेव प्रजा परिषद में शामिल नहीं थे बल्कि वह जेलदारो और नंबरदारो के जरिए महाराजा से वाबस्ता थे. चौधरी सफात खान महाराजा के खिलाफ किसी तहरीक के हक में नहीं थे उन्होंने प्रजा परिषद वालों पर जोर देकर कहा कि वह अपनी तहरीक को रियासत मैं इसलाह की हद तक महदूद करें और इंडियन नेशनल कांग्रेस या ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की सरगर्मियां से दूर रहे और महाराजा से आवामी हकूमत के कायम का मुतालबा करें. भरतपुर के महाराजा को चौधरी सफात खान की सियासी दिलचस्पी का इल्म हो गया था चुनांचे उन्होंने रातों-रात एक रिटायर्ड मुस्लिम सैयद मोहसिन रजा से भरतपुर में मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के क्याम का एलान करवा दिया और भरतपुर की जामा मस्जिद में जलसा करवा कर बनके रहेगा पाकिस्तान के नारे लगवा दिए मगर इस कांफ्रेंस का दायरा शहरी मुसलमानों तक सीमित था मेव आबादी में कोई भी तंजीम दाखिल नहीं हुई थी. मुस्लिम कांफ्रेंस के बाद प्रजा परिषद वाले भी हरकत में आ गए और उन्होंने जवाबी जलसा किया इस हाल में चौधरी सफात खान बेहद ही मायूस हुए क्योंकि महाराजा अपने खिलाफ चलने वाली तहरीक को हिंदू-मुस्लिम रंग दे कर सियासी फायदा उठाना चाह रहे थे.
पंडित किशन लाल जोशी चौधरी सफात खान के बचपन के दोस्त थे. चौधरी शफात खान के वालिद और किशन लाल जोशी की डीग में आढ़त की दुकान थी इस ताल्लुक से किशन लाल जोशी और चौधरी सफात खान एक साथ मिलकर काम करने लगे और दोनों ने तय किया कि भरतपुर में एक प्रेस की जाए और एक अखबार भी जारी किया जाए साथ ही किसानों में काम करने के लिए तमाम कमेटियों से अलग किसान कमेटी बनाकर काम शुरू किया जाए और प्रजा परिषद और मुस्लिम कॉन्फ्रेंस की फिरकावारियत से जनता को बचाया जाए. चुनांचे दोनों साहिबान में किसान कमेटी के नाम से काम शुरू कर दिया जिसका जनता में जल्द असर दिखना शुरू हुआ. इन दिनों बाकी दूसरी कमेटी के लोगों को किसान कमेटी के लोगों ने देहातों में जाने से रोक दिया मगर शहरों में किसान कमेटी का कोई असर नहीं था इस तरह भरतपुर के महाराजा की साजिश नाकाम हो गई. 27 दिसंबर 1945 को सफात खान के मकान पर प्रजा परिषद के लीडर फिर जमा हुए और जोशी साहब क्यादत वाली किसान कमिटी के सदस्य भी आ गए. दोनों जमातो के इत्तेहाद पर इत्तेफाक राय हो गया. 5 जनवरी 1946 को शफात खान, चौधरी खैराती नीमखेड़ा, चौधरी इस्माइल खंडेवला, चौधरी प्रताप ढाना, चौधरी उमराव जैलदार सीकरी के साथ भरतपुर गए वहां सैयद मोहसिन रजा के मकान पर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के वर्करों की मीटिंग बुलाई. चौधरी शफात खान और बाकी चौधरियों ने मुस्लिम कॉन्फ्रेंस वालों से कहा कि वह Ahle मेवात को भी मुस्लिम कांफ्रेंस में शामिल करें ताकि यह जमात जोर पकड़ सके इन लोगों ने सादगी से उनका मशवरा कबूल कर लिया चुनांचे फौरन ही मेवात की चार तहसील कामा, पहाड़ी, नगर, डीग मैं मुस्लिम कॉन्फ्रेंस की साख कायम हो गई और इसका एक आवामी जलसा भरतपुर की जामा मस्जिद में तलब किया गया इस तरह सूरत हाल बदल गई भरतपुर के महाराजा द्वारा कायम की गई मुस्लिम कॉन्फ्रेंस में मेव भी शामिल हो गए. इसके सदर चौधरी इस्माइल खंडेवला और जनरल सेक्रेटरी चौधरी अब्दुल रहीम एडवोकेट डीग मुंतखाब हुए. कॉन्फ्रेंस के बाद एक बड़ा जुलूस भरतपुर के बाजारों से निकाला गया और नारे लगाए गए "नहीं चलेगी मनमानी राजा हो या रानी". चौधरी सफात खान अगरचे मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के ohda से अलग थे इस जलसा के बाद इत्मीनान था कि अब सूरत हाल बदल जाएगी. मार्च के अव्वल में सफात खान के मकान पर फिर तीनों जमातो की मीटिंग हुई जिसमें प्रजा परिषद, मुस्लिम कॉन्फ्रेंस और किसान कमेटी किशन लाल जोशी के लीडरआन शरीक हुए. इसके बाद तहरीक ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया. इसके बाद महाराजा ने ताकत के इस्तेमाल की धमकियां देना शुरू कर दी और जेलद्वारों को जेलदारी से बर्खास्त करने की धमकी दी मगर अवाम और उनके नुमाइंदों पर इस धमकी का कोई असर नहीं पड़ा. जून 1946 को रात 10:00 बजे अचानक चौधरी शफात खान डीग में गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें सेवर जेल भेज दिया गया. सुबह जब लोगों को इलम हुआ तो पूरी रियासत भरतपुर में खलबली मच गई. शहरों कस्बों और भरतपुर शहर में हड़ताल हुई तीनों जमातो ने गिरफ्तारी के खिलाफ जुलूस निकाला जिस पर लाठीचार्ज हुआ और गिरफ्तारियां अमल में आई. बाबू राज बहादुर, सांवल प्रसाद, जुगल किशोर चौबे, मोहम्मद यूसुफ, मुजाहिर अली, और दूसरे लीडरआन गिरफ्तार हुए. फिर गिरफ्तारीओं का सिलसिला चल पड़ा और सेवर जेल भर गई. गिरफ्तारीओं के खिलाफ पूरी रियासत में जलसे हुए. पहाड़ी, सतवारी, सीकरी और नौगांवा हाथनगांव में बहुत बड़ा जलसा हुआ. गुडगांव के कांग्रेसी लीडरान डॉ कंवर मोहम्मद अशरफ, सैयद मुतलबी फरीदाबादी, चौधरी अब्दुल हई, जोकि शुरू से ही प्रजा परिषद तहरीक से हमदर्दी रखते थे और इसके जुलूसओं, प्रोग्राम में शामिल होते थे. जब भरतपुर रियासत में सुरताल ज्यादा खराब हुई और तमाम लीडर जेल में चले गए और बाकी लीडर किशन लाल जोशी के गिरफ्तारी वारंट जारी थे तब डॉक्टर अशरफ की अगुआई में भरतपुर महाराजा से बातचीत शुरू हुई और इन लोगों ने चौधरी सफात खान से जेल में मुलाकात की चुनांचे 2 मार्च 1947 को 9 महीना 2 दिन के बाद चौधरी सफात खान जेल से रिहा हुए. अभी बातचीत जारी थी और तमाम लीडर जेल से रिहा नहीं हुए थे के भरतपुर महाराजा ने अप्रैल में होडल में फसाद करवा दिए जहां बहुत सारे मुस्लिम कत्ल कर दिए गए. फिर नौगांवा पर हमला कराया इसके बाद तो पूरा अलवर, भरतपुर और गुड़गांव के चारों तरफ दंगा फसाद का सिलसिला शुरू हो गया और भरतपुर तहरीक खत्म हो गई. मुल्क बटवारे के समय चौधरी सफात खान ने पाकिस्तान हिजरत करना मुनासिब समझा पाकिस्तान पहुंचकर वह कसूर के पत्तोंकी में आबाद हुए. चौधरी सफात खान कुछ अरसा तक तहसीलदार भी रहे मगर मुलाज मत को छोड़कर सियासत में हिस्सा लेने लगे. चौधरी सफात खान के खानदान ने पाकिस्तान हिजरत नहीं कि वह भरतपुर में ही रहे. इनके अलावा उनके वालिद और तीन भाई रहमत खान, इनायत खान, साहब खान अपने गांव माडलका डीग भरतपुर में ही आबाद रहे. चौधरी अजमत खान जैलदार मल्हाका की शहजादी कबीरी चौधरी शफात खान के निकाह में थी. डीग में लक्ष्मण मंदिर के पास उनकी दुकान और मकान थे पाकिस्तान हिजरत करने से पहले वह वही रहते थे. शफात अहमद ने राजा अलवर के खिलाफ भी मेव कॉम को एकजुट किया था. 1932 की अलवर तहरीक में अलवर के राजा का पुरजोर विरोध किया था. जिसकी वजह से अलवर के राजा को देश निकाला दिया गया था और उनकी लंदन में मृत्यु हुई थी. शफात अहमद के भरतपुर रियासत के राजा बिजेंदर सिंह से अच्छे संबंध थे लेकिन 1947 आते-आते आपसी संबंध खराब हो गए. सफात अहमद वहां 1970 में नेशनल असेंबली का चुनाव जीते. जुल्फिकार अली भुट्टो सरकार में इनका बहुत बड़ा कद था. शफात अहमद ने वहां मेवातीयों को जमीन के अलॉटमेंट में बहुत बड़ा योगदान निभाया था.