देववाणी संस्कृतं "Devvani Sanskritam"

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10/09/2023
17/07/2023
15/07/2023
15/07/2023
08/07/2023
30/03/2023

ओम्कारे ममलेश्वरम् ---
नर्मदा नदी के पावन तट पर मध्य भारत में स्थित ओम्कारेश्वर मंदिर शिवभक्तों का अत्यंत प्रिय तीर्थस्थल है। नर्मदा नदी के कई भागों में प्रवाहित होने के कारण नदी के मध्य एक द्वीप जैसा बनता है जिसे मान्धाता द्वीप या शिवपुरी कहते हैं। यहाँ ज्योतिलिंग दो स्थानों पर ओम्कारेश्वर एवं अमरेश्वर के रूपमें स्थित है। राजा मान्धाता ने तप कर भगवान शिव को प्रसन्न कर उन को वहीं लिंग रूप में स्थित होने का वर पाया। भोलेनाथ की अनगढ़ प्रतिमा है यहाँ पर।
एक पौराणिक मान्यता के अनुसार विंध्य पर्वत ने ओम्कारेश्वरकी पूजा की। भगवान शिव प्रसन्न हुए तब मान्धाता ने भगवान शिव को यंत्र रूप में वहीं विराजित रह कर सृष्टि के कल्याण की कामना की। सच्चे भक्तों को भगवान कभी निराश नहीं करते
वे आज भी लोककल्याण कारक के रूप में विराजमान हैं यहाँ पर और सच्चे भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। कार्तिक मास की पूर्णिमा और शिवरात्रि पर यहाँ विशाल मेले का आयोजन होता है।
क्रमशः

30/03/2023

उज्ज्यिनीम् महाकालम्---
कनकश्रृंग, कुशस्थली, कुमुदवती, विशाला, अवन्तिका आदि नामों से विख्यात क्षिप्रा नदी के दाएं तट पर स्थित उज्ज्यिनी नगर द्वादश ज्योतिलिंग में महाकालेश्वर के नाम से
विख्यात है। माता सती का ऊर्ध्व ओष्ठ यहीं गिरने से क्षिप्रा नदी -तट पर शक्तिपीठ भी स्थित है। भगवान महादेव ने त्रिपुरासुर का वध यहीं किया था।आचार्य सांदीपनी के आश्रम में यहीं पर श्रीकृष्ण एवं सुदामा ने शिक्षा प्राप्त की थी। प्रति बारहवें वर्ष में जब सूर्य मेष राशि में और बृहस्पति सिंह राशि में आते हैं तब यहां पर कुम्भ का आयोजन होता है।
मौर्यकाल में उज्ज्यिनी मालवा प्रदेश की राजधानी थी। भर्तृहरि, विक्रमादित्य, भोज आदि न्यायप्रिय राजाओं ने इसके वैभव को बढ़ाया।
महाकवि कालिदास, वररुचि, भर्तृहरि, भारवि, वाराहमिहिर आदि अनेकों कवियों लेखकों ज्योतिष आचार्यों की कार्यस्थली रही है अवन्तिका नगरी। प्राचीन काल इसका अत्यंत ही गौरवशाली रहा है। सम्राटअशोक के पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा ने यहीं पर प्रवज्या (सन्यास) धारण की थी।
यहाँ पर भर्तृहरि गुफा, सांदीपनि आश्रम, कालभैरव मंदिर, यन्त्रमहल, सिद्धवट, हरसिद्धि देवी मंदिर गोपाल मंदिर आदि अनेकों दर्शनीय स्थल हैं।
क्रमशः🙏

18/03/2023

श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्--
आन्ध्रप्रदेश के कर्नूल जिले में कृष्णा नदी के पावन तट पर श्रीशैल पर्वत पर मल्लिकार्जुन नामक ज्योतिर्लिंग स्थित है। इसे दक्षिण का कैलाश भी कहा जाताहै । कृष्णा नदी की जिस शाखा पर यह तीर्थ स्थित है उसे पातालगंगा भी कहते हैं। यहाँ माता पार्वती मल्लिका के नाम से और देवाधिदेव महादेव अर्जुन नाम से सदैव विराजमान रहते हैं।
कहा जाता है कि रुष्ट कार्तिकेय को मनाने आए शिव-शक्ति यहाँ पर ज्योतिलिंग के रूप में स्थित हो गए। एक किवदंती के अनुसार गोप ग्वाले इस पर्वत पर अपनी गायें चराते थे । ग्वालों की श्यामा गाय नियमित रूपसे स्वेच्छा से पर्वत शिखर पर अपना दूध चढ़ा देती तब वहाँ एक मंदिर का निर्माण कराया गया जो मल्लिकार्जुनम् के नाम से विश्व में प्रसिद्ध हुआ।
माना जाता है कि यह मन्दिर लगभग 2000 वर्ष पुराना है।यहाँ माता सती की ग्रीवा गिरी थी अतः यह भ्रमराम्बा नाम से 51 शक्तिपीठों में से एक है।नवरात्र और शिवरात्रि पर यहाँ विशाल मेले का आयोजन होता है प्रसिद्ध महाभारत के वन पर्व, शिव पुराण में एवं पद्मपुराण में इस क्षेत्र के माहात्म्य को विस्तार से कहा गया है।
क्रमशः-----

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